पाण्डव पाँच भाई थे जिनके नाम हैं -
1. युधिष्ठिर
2. भीम
3. अर्जुन
4. नकुल
5. सहदेव
पाण्डु के उपरोक्त पाँचों पुत्रों में से युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन की माता कुन्ती थीं तथा नकुल और सहदेव की माता माद्री।
धृतराष्ट्र के सौ पुत्र कौरव कहलाए जिनके नाम हैं -
1. दुर्योधन
2. दुःशासन
3. दुःसह
4. दुःशल
5. जलसंघ
6. सम
7. सह
8. विंद
9. अनुविंद
10. दुर्धर्ष
11. सुबाहु
12. दुषप्रधर्षण
13. दुर्मर्षण
14. दुर्मुख
15. दुष्कर्ण
16. विकर्ण
17. शल
18. सत्वान
19. सुलोचन
20. चित्र
21. उपचित्र
22. चित्राक्ष
23. चारुचित्र
24. शरासन
25. दुर्मद
26. दुर्विगाह
27. विवित्सु
28. विकटानन्द
29. ऊर्णनाभ
30. सुनाभ
31. नन्द
32. उपनन्द
33. चित्रबाण
34. चित्रवर्मा
35. सुवर्मा
36. दुर्विमोचन
37. अयोबाहु
38. महाबाहु
39. चित्रांग
40. चित्रकुण्डल
41. भीमवेग
42. भीमबल
43. बालाकि
44. बलवर्धन
45. उग्रायुध
46. सुषेण
47. कुण्डधर
48. महोदर
49. चित्रायुध
50. निषंगी
51. पाशी
52. वृन्दारक
53. दृढ़वर्मा
54. दृढ़क्षत्र
55. सोमकीर्ति
56. अनूदर
57. दढ़संघ
58. जरासंघ
59. सत्यसंघ
60. सद्सुवाक
61. उग्रश्रवा
62. उग्रसेन
63. सेनानी
64. दुष्पराजय
65. अपराजित
66. कुण्डशायी
67. विशालाक्ष
68. दुराधर
69. दृढ़हस्त
70. सुहस्त
71. वातवेग
72. सुवर्च
73. आदित्यकेतु
74. बह्वाशी
75. नागदत्त
76. उग्रशायी
77. कवचि
78. क्रथन
79. कुण्डी
80. भीमविक्र
81. धनुर्धर
82. वीरबाहु
83. अलोलुप
84. अभय
85. दृढ़कर्मा
86. दृढ़रथाश्रय
87. अनाधृष्य
88. कुण्डभेदी
89. विरवि
90. चित्रकुण्डल
91. प्रधम
92. अमाप्रमाथि
93. दीर्घरोमा
94. सुवीर्यवान
95. दीर्घबाहु
96. सुजात
97. कनकध्वज
98. कुण्डाशी
99. विरज
100. युयुत्सु
(नोटः अलग अलग ग्रंथों में कुछ नामों में परिवर्तन भी मिलते हैं।)
उपरोक्त सौ कौरवों की एक बहन भी थी जिसका नाम था दुश्शला।
Thursday, March 1, 2012
पुराना किला ही था पांडवों का इंद्रप्रस्थ!
पुराना किला ही था पांडवों का इंद्रप्रस्थ!
शायद यहीं पर थी, पांडवों की राजधानी इंद्रप्रस्थ। पुराने किले में जगह-जगह शिलापटों पर लगे इन वाक्यों को पढ़कर पर्यटक एक बार जरूर चौंक पड़ते हैं। पांडवों की राजधानी इंद्रप्रस्थ कहां थी? इस बात को लेकर लोगों में बहस होती रही है। लेकिन खुदाई में मिले अवशेषों के आधार पर पुरातत्वविदें का एक बड़ा वर्ग यह मानता है कि पांडवों की राजधानी इसी स्थल पर रही होगी।यद्यपि पुरातत्वविदें के पास इस बात के पुख्ता प्रमाण नहीं हैं, लेकिन खुदाई के दौरान यहां मिले बर्तनों के अवशेषों से किले के आसपास पांडवों की राजधानी होने की बात को बल मिलता है। यहां खुदाई में ऐसे बर्तनों के अवशेष मिले हैं, जो महाभारत से जुडे़ अन्य स्थानों पर भी मिले हैं। इसके अलावा महाभारत से जुडे़ प्रसंग और प्राचीन परंपराएं भी इस ओर इशारा करती हैं, कि यहां पांडवों की राजधानी रही होगी।भारत में बहुत कम नगर ऐसे हैं, जो दिल्ली की तरह पुराने हों। इतिहासकारों के अनुसार पूर्व ऐतिहासिक काल में जिस स्थल पर इंद्रप्रस्थ बसा हुआ था, उसके ऊंचे टीले पर 16वीं शताब्दी में पुराना किला बनाया गया। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इस किले की कई स्तरों पर खुदाई की है। खुदाई में प्राचीन भूरे रंग से चित्रित मिट्टी के विशिष्ट बर्तनों के अवशेष मिले हैं, जो महाभारत काल के हैं। ऐसे ही बर्तन अन्य महाभारत कालीन स्थलों पर भी पाए गए हैं। इस बारे में एक तथ्य यह भी है कि इंद्रप्रस्थ के [अपभ्रंश] इंद्रपरत के नाम का एक गांव वर्तमान शताब्दी के प्रारंभ तक पुराना किला में स्थित था। राजधानी नई दिल्ली का निर्माण करने के दौरान अन्य गांवों के साथ उसे भी हटा दिया गया था। दिल्ली में स्थित सारवल गांव से 1328 ईस्वी का संस्कृत का एक अभिलेख प्राप्त हुआ है। यह अभिलेख लालकिला के संग्रहालय में मौजूद है। इस अभिलेख में इस गांव के इंद्रप्रस्थ जिले में स्थित होने का उल्लेख है।वहीं महाभारत के अनुसार कुरु देश की राजधानी गंगा के किनारे हस्तिनापुर में स्थित थी। जब पांडवों और उनके चचेरे भाई कौरवों के बीच संबंध बिगड़ गए तो कौरवों के पिता धृतराष्ट्र ने पांडवों को यमुना के किनारे खांडवप्रस्थ का क्षेत्र दे दिया। वहां उन्होंने समुद्र जैसे गड्ढों द्वारा घिरे हुए एक नगर को बनाया और उसकी रक्षात्मक प्राचीरें बनाई। विद्वानों का मत है कि पुराना किला की रूपरेखा भी इसी तरह की थी। इससे भी स्पष्ट होता है कि इंद्रप्रस्थ एक नगर का नाम था, जो पुराना किला के स्थान पर बसा था और जिस क्षेत्र में यह स्थित था, उस क्षेत्र का नाम खांडवप्रस्थ था। कहा जाता है कि कौरवों पर अपनी विजय के बाद पांडवों ने राजधानी इंद्रप्रस्थ को भगवान कृष्ण से संबंधित किसी यादव वंशज को सौंप दिया।एक और परंपरा मौजूद है, जिसके अनुसार पांडवों ने कौरवों से पांच गांव मांगे थे। जिनके नामों के अंत में पत आता है। जो संस्कृत के प्रस्थ का हिंदी साम्य है। ये पत वाले गांव हैं इंदरपत, बागपत, तिलपत, सोनीपत और पानीपत हैं। यह परम्परा महाभारत पर आधारित है। जिन स्थानों के नाम दिए गए हैं। उनमें ओखला नहर के पूर्वी किनारे पर दिल्ली के दक्षिण में लगभग 22 किलोमीटर दूरी पर तिलपत गांव मौजूद है। इन सभी स्थलों से महाभारत कालीन भूरे रंग के बर्तन मिले हैं।
शायद यहीं पर थी, पांडवों की राजधानी इंद्रप्रस्थ। पुराने किले में जगह-जगह शिलापटों पर लगे इन वाक्यों को पढ़कर पर्यटक एक बार जरूर चौंक पड़ते हैं। पांडवों की राजधानी इंद्रप्रस्थ कहां थी? इस बात को लेकर लोगों में बहस होती रही है। लेकिन खुदाई में मिले अवशेषों के आधार पर पुरातत्वविदें का एक बड़ा वर्ग यह मानता है कि पांडवों की राजधानी इसी स्थल पर रही होगी।यद्यपि पुरातत्वविदें के पास इस बात के पुख्ता प्रमाण नहीं हैं, लेकिन खुदाई के दौरान यहां मिले बर्तनों के अवशेषों से किले के आसपास पांडवों की राजधानी होने की बात को बल मिलता है। यहां खुदाई में ऐसे बर्तनों के अवशेष मिले हैं, जो महाभारत से जुडे़ अन्य स्थानों पर भी मिले हैं। इसके अलावा महाभारत से जुडे़ प्रसंग और प्राचीन परंपराएं भी इस ओर इशारा करती हैं, कि यहां पांडवों की राजधानी रही होगी।भारत में बहुत कम नगर ऐसे हैं, जो दिल्ली की तरह पुराने हों। इतिहासकारों के अनुसार पूर्व ऐतिहासिक काल में जिस स्थल पर इंद्रप्रस्थ बसा हुआ था, उसके ऊंचे टीले पर 16वीं शताब्दी में पुराना किला बनाया गया। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने इस किले की कई स्तरों पर खुदाई की है। खुदाई में प्राचीन भूरे रंग से चित्रित मिट्टी के विशिष्ट बर्तनों के अवशेष मिले हैं, जो महाभारत काल के हैं। ऐसे ही बर्तन अन्य महाभारत कालीन स्थलों पर भी पाए गए हैं। इस बारे में एक तथ्य यह भी है कि इंद्रप्रस्थ के [अपभ्रंश] इंद्रपरत के नाम का एक गांव वर्तमान शताब्दी के प्रारंभ तक पुराना किला में स्थित था। राजधानी नई दिल्ली का निर्माण करने के दौरान अन्य गांवों के साथ उसे भी हटा दिया गया था। दिल्ली में स्थित सारवल गांव से 1328 ईस्वी का संस्कृत का एक अभिलेख प्राप्त हुआ है। यह अभिलेख लालकिला के संग्रहालय में मौजूद है। इस अभिलेख में इस गांव के इंद्रप्रस्थ जिले में स्थित होने का उल्लेख है।वहीं महाभारत के अनुसार कुरु देश की राजधानी गंगा के किनारे हस्तिनापुर में स्थित थी। जब पांडवों और उनके चचेरे भाई कौरवों के बीच संबंध बिगड़ गए तो कौरवों के पिता धृतराष्ट्र ने पांडवों को यमुना के किनारे खांडवप्रस्थ का क्षेत्र दे दिया। वहां उन्होंने समुद्र जैसे गड्ढों द्वारा घिरे हुए एक नगर को बनाया और उसकी रक्षात्मक प्राचीरें बनाई। विद्वानों का मत है कि पुराना किला की रूपरेखा भी इसी तरह की थी। इससे भी स्पष्ट होता है कि इंद्रप्रस्थ एक नगर का नाम था, जो पुराना किला के स्थान पर बसा था और जिस क्षेत्र में यह स्थित था, उस क्षेत्र का नाम खांडवप्रस्थ था। कहा जाता है कि कौरवों पर अपनी विजय के बाद पांडवों ने राजधानी इंद्रप्रस्थ को भगवान कृष्ण से संबंधित किसी यादव वंशज को सौंप दिया।एक और परंपरा मौजूद है, जिसके अनुसार पांडवों ने कौरवों से पांच गांव मांगे थे। जिनके नामों के अंत में पत आता है। जो संस्कृत के प्रस्थ का हिंदी साम्य है। ये पत वाले गांव हैं इंदरपत, बागपत, तिलपत, सोनीपत और पानीपत हैं। यह परम्परा महाभारत पर आधारित है। जिन स्थानों के नाम दिए गए हैं। उनमें ओखला नहर के पूर्वी किनारे पर दिल्ली के दक्षिण में लगभग 22 किलोमीटर दूरी पर तिलपत गांव मौजूद है। इन सभी स्थलों से महाभारत कालीन भूरे रंग के बर्तन मिले हैं।
देश का गौरव - झाँसी की रानी
झाँसी की रानी
रचनाकार: सुभद्रा कुमारी चौहानसिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी,गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,बरछी ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।वीर शिवाजी की गाथायें उसकी याद ज़बानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवार।महाराष्टर-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव से मिली भवानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया,राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।अश्रुपूर्णा रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया,व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया,राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया।रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात,कैद पेशवा था बिठुर में, हुआ नागपुर का भी घात,उदैपुर, तंजौर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात?जबकि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात।बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।रानी रोयीं रिनवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार,उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार,'नागपूर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार'।यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान,नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान।हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,मेरठ, कानपूर, पटना ने भारी धूम मचाई थी,जबलपूर, कोल्हापूर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम।लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में,जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बड़ा जवानों में,रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वन्द्ध असमानों में।ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार,विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी रजधानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी,काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी,युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार,किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार,घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये अवार,रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार।घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी,दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी,यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी,होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
रचनाकार: सुभद्रा कुमारी चौहानसिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी,बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी,गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी,दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी,लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी,नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी,बरछी ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी।वीर शिवाजी की गाथायें उसकी याद ज़बानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।लक्ष्मी थी या दुर्गा थी वह स्वयं वीरता की अवतार,देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार,नकली युद्ध-व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार,सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवार।महाराष्टर-कुल-देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झाँसी में,ब्याह हुआ रानी बन आई लक्ष्मीबाई झाँसी में,राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छाई झाँसी में,चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव से मिली भवानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजियाली छाई,किंतु कालगति चुपके-चुपके काली घटा घेर लाई,तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भाई,रानी विधवा हुई, हाय! विधि को भी नहीं दया आई।निसंतान मरे राजाजी रानी शोक-समानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हरषाया,राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया,फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया,लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झाँसी आया।अश्रुपूर्णा रानी ने देखा झाँसी हुई बिरानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट शासकों की माया,व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया,डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया,राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया।रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों-बात,कैद पेशवा था बिठुर में, हुआ नागपुर का भी घात,उदैपुर, तंजौर, सतारा, करनाटक की कौन बिसात?जबकि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात।बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।रानी रोयीं रिनवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार,उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार,सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार,'नागपूर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार'।यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान,वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान,नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान,बहिन छबीली ने रण-चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान।हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी,यह स्वतंत्रता की चिनगारी अंतरतम से आई थी,झाँसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी,मेरठ, कानपूर, पटना ने भारी धूम मचाई थी,जबलपूर, कोल्हापूर में भी कुछ हलचल उकसानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम,नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम,अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम,भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम।लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में,जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में,लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बड़ा जवानों में,रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वन्द्ध असमानों में।ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।रानी बढ़ी कालपी आई, कर सौ मील निरंतर पार,घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार,यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खाई रानी से हार,विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार।अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी रजधानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।विजय मिली, पर अंग्रेज़ों की फिर सेना घिर आई थी,अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी,काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी,युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी।पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय! घिरी अब रानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार,किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार,घोड़ा अड़ा, नया घोड़ा था, इतने में आ गये अवार,रानी एक, शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार-पर-वार।घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीर गति पानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।रानी गई सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी,मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी,अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुज नहीं अवतारी थी,हमको जीवित करने आयी बन स्वतंत्रता-नारी थी,दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी,यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी,होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी,हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी।तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी,बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी,खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।।
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (1828 - 17 जून 1858) मराठा शासित झाँसी राज्य की रानी थी । वह् सन् १८५७ के भारतीय स्वतन्त्रता सन्ग्राम की नायिका थी । इनका जन्म काशी (वाराणसी) तथा मृत्यु ग्वालियर में हुई । इनके बचपन का नाम मनिकर्णिका था पर प्यार से मनु कहा जाता था । इनके पिता का नाम मोरोपंत तांबे था और वो एक महाराष्ट्रियन ब्राह्मण थे। इनकी माता भागीरथीबाई एक सुसन्कृत, बुद्धिमान एवं धार्मिक महिला थीं। मनु जब चार वर्ष की थीं तब उनकी माँ की म्रत्यु हो गयी । इनका पालन पिता ने ही किया । मनु ने बचपन में शास्त्रों की शिक्षा के साथ शस्त्रों की शिक्षा भी ली। इनका विवाह सन १८४२ में झांसी के राजा गंगाधर राव निवालकर के साथ हुआ, और ये झांसी की रानी बनी । विवाह के बाद इनका नाम लक्ष्मीबाई रखा गया । सन १८५१ में रानी लक्ष्मीबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया पर चार महीने की आयु में ही उसकी मृत्यु हो गयी । सन १८५३ में राजा गंगाधर राव का स्वास्थ्य बहुत बिगड़ने पर उन्हें दत्तक पुत्र लेने की सलाह दी गयी। पुत्र गोद लेने के बाद राजा गंगाधर राव की मृत्यु २१ नवंबर १८५३ में हो गयी । दत्तक पुत्र का नाम दामोदर राव रखा गया ।
ब्रितानी राजनीति
डलहौजी की राज्य हडपने की नीति के अन्तर्गत ब्रितानी राज्य ने दामोदर राव जो कि उस समय बालक थे, को झांसी राज्य का उत्तराधिकारी मानने से इन्कार कर दिया, तथा झांसी राज्य को ब्रितानी राज्य में मिलाने का निश्चय कर लिया । तब रानी लक्ष्मीबाई ने ब्रितानी वकील जान लैंग की सलाह ली और लंदन की अदालत में मुकदमा दायर किया । यद्यपि मुकदमे में बहुत बहस हुई परन्तु इसे खारिज कर दिया गया । ब्रितानी अधिकारियों ने राज्य का खजाना ज़ब्त कर लिया और उनके पति के कर्ज़ को रानी के सालाना खर्च में से काट लिया गया। इसके साथ ही रानी को झांसी के किले को छोड कर झांसी के रानीमहल मे जाना पडा । पर रानी लक्ष्मीबाई ने हर कीमत पर झांसी राज्य की रक्षा करने का निश्चय कर लिया था ।झांसी का युद्धझांसी 1857 के विद्रोह का एक प्रमुख केन्द्र बन गया जहाँ हिन्सा भड़क उठी। रानी लक्ष्मीबाई ने झांसी की सुरक्षा को सुदृढ़ करना शुरू कर दिया और एक स्वयंसेवक सेना का गठन प्रारम्भ किया । इस सेना में महिलाओं की भर्ती भी की गयी और उन्हें युद्ध प्रशिक्षण भी दिया गया। साधारण जनता ने भी इस विद्रोह में सहयोग दिया । 1857 के सितंबर तथा अक्तूबर माह में पड़ोसी राज्य ओरछा तथा दतिया के राजाओं ने झांसी पर आक्रमण कर दिया । रानी ने सफलता पूर्वक इसे विफल कर दिया । 1858 के जनवरी माह में ब्रितानी सेना ने झांसी की ओर बढना शुरू कर दिया और मार्च के महीने में शहर को घेर लिया । दो हफ़्तों की लडाई के बाद ब्रितानी सेना ने शहर पर कब्जा कर् लिया । परन्तु रानी, दामोदर राव के साथ अन्ग्रेजों से बच कर भागने में सफल हो गयी । रानी झांसी से भाग कर कालपी पहुंची और तात्या टोपे से मिली।
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (1828 - 17 जून 1858) मराठा शासित झाँसी राज्य की रानी थी । वह् सन् १८५७ के भारतीय स्वतन्त्रता सन्ग्राम की नायिका थी । इनका जन्म काशी (वाराणसी) तथा मृत्यु ग्वालियर में हुई । इनके बचपन का नाम मनिकर्णिका था पर प्यार से मनु कहा जाता था । इनके पिता का नाम मोरोपंत तांबे था और वो एक महाराष्ट्रियन ब्राह्मण थे। इनकी माता भागीरथीबाई एक सुसन्कृत, बुद्धिमान एवं धार्मिक महिला थीं। मनु जब चार वर्ष की थीं तब उनकी माँ की म्रत्यु हो गयी । इनका पालन पिता ने ही किया । मनु ने बचपन में शास्त्रों की शिक्षा के साथ शस्त्रों की शिक्षा भी ली। इनका विवाह सन १८४२ में झांसी के राजा गंगाधर राव निवालकर के साथ हुआ, और ये झांसी की रानी बनी । विवाह के बाद इनका नाम लक्ष्मीबाई रखा गया । सन १८५१ में रानी लक्ष्मीबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया पर चार महीने की आयु में ही उसकी मृत्यु हो गयी । सन १८५३ में राजा गंगाधर राव का स्वास्थ्य बहुत बिगड़ने पर उन्हें दत्तक पुत्र लेने की सलाह दी गयी। पुत्र गोद लेने के बाद राजा गंगाधर राव की मृत्यु २१ नवंबर १८५३ में हो गयी । दत्तक पुत्र का नाम दामोदर राव रखा गया ।
ब्रितानी राजनीति
डलहौजी की राज्य हडपने की नीति के अन्तर्गत ब्रितानी राज्य ने दामोदर राव जो कि उस समय बालक थे, को झांसी राज्य का उत्तराधिकारी मानने से इन्कार कर दिया, तथा झांसी राज्य को ब्रितानी राज्य में मिलाने का निश्चय कर लिया । तब रानी लक्ष्मीबाई ने ब्रितानी वकील जान लैंग की सलाह ली और लंदन की अदालत में मुकदमा दायर किया । यद्यपि मुकदमे में बहुत बहस हुई परन्तु इसे खारिज कर दिया गया । ब्रितानी अधिकारियों ने राज्य का खजाना ज़ब्त कर लिया और उनके पति के कर्ज़ को रानी के सालाना खर्च में से काट लिया गया। इसके साथ ही रानी को झांसी के किले को छोड कर झांसी के रानीमहल मे जाना पडा । पर रानी लक्ष्मीबाई ने हर कीमत पर झांसी राज्य की रक्षा करने का निश्चय कर लिया था ।झांसी का युद्धझांसी 1857 के विद्रोह का एक प्रमुख केन्द्र बन गया जहाँ हिन्सा भड़क उठी। रानी लक्ष्मीबाई ने झांसी की सुरक्षा को सुदृढ़ करना शुरू कर दिया और एक स्वयंसेवक सेना का गठन प्रारम्भ किया । इस सेना में महिलाओं की भर्ती भी की गयी और उन्हें युद्ध प्रशिक्षण भी दिया गया। साधारण जनता ने भी इस विद्रोह में सहयोग दिया । 1857 के सितंबर तथा अक्तूबर माह में पड़ोसी राज्य ओरछा तथा दतिया के राजाओं ने झांसी पर आक्रमण कर दिया । रानी ने सफलता पूर्वक इसे विफल कर दिया । 1858 के जनवरी माह में ब्रितानी सेना ने झांसी की ओर बढना शुरू कर दिया और मार्च के महीने में शहर को घेर लिया । दो हफ़्तों की लडाई के बाद ब्रितानी सेना ने शहर पर कब्जा कर् लिया । परन्तु रानी, दामोदर राव के साथ अन्ग्रेजों से बच कर भागने में सफल हो गयी । रानी झांसी से भाग कर कालपी पहुंची और तात्या टोपे से मिली।
Tuesday, September 27, 2011
सास बहू मंदिर
पर्यटन
उदयपुर में सास-बहू के मंदिर – राजपाल सिंह
झीलों की नगरी उदयपुर से मात्र अट्ठाइस किलोमीटर की दूरी पर है- जगप्रसिद्ध एकलिंग जी का मंदिर। इस मंदिर से थोड़ा पहले, कच्चे रास्ते पर खड़े हैं वास्तुकला के बेजोड़ नमूने- सास-बहू के मंदिर। इन्ही मंदिरों के आसपास कभी मेवाड़ राजवंश की स्थापना हुई थी। इनकी पहली राजधानी थी- नागदा। नागदा के वैभव की याद दिलाने में ये सास-बहू के मंदिर आज भी सक्षम हैं। मेवाड़ राज्य के संस्थापक बप्पा रावल ने अपना प्रारंभिक जीवन यहीं नागदा में व्यतीत किया था।
मेवाड़ की यह प्राचीन राजधानी नागदा तो आज ध्वस्त हो चुकी है, लेकिन किसी तरह से यहाँ सास-बहू मंदिर बचे रह गए हैं। इन मंदिरों और नागदा के ध्वंसावशेष के आधार पर यह कहना अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं होगा कि यहाँ कभी उत्कृष्ट कला का विकास हुआ।
मेवाड़ राज्य अपने जन्म से ही दिल्ली की आँख में चुभता रहा। दिल्ली के तत्कालीन सुल्तान शम्सुद्दीन अल्तमश ने तो इस पर आक्रमण कर इसे ध्वस्त कर डाला।
मंदिर सहस्रबाहु का
विक्रमी संवत ग्यारहवीं शताब्दी के आसपास बने सास-बहु के इन मंदिरों के बारे में अनुमान है कि मेवाड़ राजघराने की राजमाता ने विष्णु का मंदिर तथा बहू ने शेष नाग के मंदिर का निर्माण कराया। सास-बहू के द्वारा निर्माण कराए जाने से इन मंदिरों को सास-बहू के मंदिर के नाम से पुकारा जाता है। लेकिन, एक अन्य किंवदंती के अनुसार यहाँ पहले भगवान सहस्रबाहु का मंदिर था, जिसका नाम सहस्रबाहु से बिगड़कर सास-बहू हो गया। कारण जो भी रहा हो, आज ये मंदिर उस प्राचीन कला-संस्कृति के उत्कृष्ट नमूने हैं, जो कभी यहाँ फली-फूली थी।
वास्तुकला के बेजोड़ नमूने ये दोनों मंदिर एक ही परिसर में स्थित हैं। आज दोनों ही मंदिरों के गर्भगृहों में से देव प्रतिमाएँ गायब हैं। मंदिर बनानेवाले कलाकारों ने तत्कालीन परंपरा के अनुसार अपनी बारीक छैनी से समसामयिक जीवन व संस्कृति के अमर तत्वों को इन मंदिरों में उकेरा है। दोनों ही मंदिरों के बरामदों, तोरण-द्वारों व मंडपों को शिल्पकला के उत्कृष्ट नमूनों से सजाया है।
मंदिर की बाहरी दीवारों पर लगी सुर-सुंदरियों की प्रतिमाएँ नारी सौंदर्य का सजीव वर्णन करती-सी प्रतीत होती हैं। नर-नारी जीवन-जगत की गतिविधियों में शृंगार, नृत्य, क्रीड़ा और प्रेम आदि की अभिव्यक्ति बड़े सुंदर ढंग से अंकित की गई हैं। मिथुन-युगलों के बीच के प्यार-व्यापार को इतने सुंदर ढंग से दर्शाया गया है कि नर-नारी मूर्तियाँ शारीरिक सौंदर्य की पराकाष्ठा बन गई हैं।
कारीगरी, अद्भुत सूक्ष्म नक्काशी व भव्यता की दृष्टि से इन दोनों मंदिरों की समानता आबू पर्वत के जगप्रसिद्ध देलवाड़ा के मंदिरों व रणकपुर के जैन मंदिर से की जा सकती है। लेकिन प्राचीनता की दृष्टि से सास-बहू के मंदिर के प्रवेश-द्वार पर बने छज्जों पर महाभारत की पूरी कथा अंकित है। इन छज्जों से लगे बायें स्तंभ पर शिव-पार्वती की प्रतिमाएँ हैं, जो खजुराहो की मिथुन मूर्तियों से होड़ लेती-सी प्रतीत होती हैं। तोरणों का अलंकरण तो देखते ही बनता है।
मंदिर बहू का
बहू के मंदिर का सभामंडप तो अपने आप में अनूठा है। प्रत्येक स्तंभ पर लगभग चार फुट ऊँची, एक ही पत्थर से निर्मित प्रतिमाएँ लगी हुई हैं। ये नारी प्रतिमाएँ उत्कष्ट कलात्मक रूप में नारी सौंदर्य को दर्शाने के लिए उल्लेखनीय हैं। मंदिर के सामने एक ही भारी पत्थर से बना तोरण है, जिसमें तीन द्वार हैं। सास-बहू के दोनों मंदिरों के बीच में ब्रह्मा जी का मंदिर है। ब्रह्मा जी का मंदिर दोनों से छोटा है, फिर भी वह दोनों से कम नहीं है। इसके गुंबद को देखकर ऐसा लगता है मानो उसे बारीक जाली से ढक दिया गया हो।
हालाँकि, सास-बहू के ये मंदिर अपने समकालीन अन्य मंदिरों की तुलना में कहीं अच्छी दशा में हैं, फिर भी उचित साज-सँभाल के अभाव में ये धीरे-धीरे क्षरण का शिकार होने लगे हैं। समय के थपेड़ों ने मंदिर की दीवारों व मूर्तियों पर कालेपन की परछायीं डालना शुरू कर दी है। गर्भगृहों से आराध्य देवों की मूर्तियाँ गायब हैं। जब आराध्य देवों की मूर्तियाँ ही गायब हों, तो फिर मंदिर कैसा? राज्य पुरतत्व विभाग ने यहाँ एक नीला सूचना-पट्ट लगाकर उन्हें संरक्षित स्मारक घोषित कर अपने फ़र्ज़ से भी छुट्टी पा ली है। पर्यटन विभाग द्वारा ऐसे दुर्लभ स्मारकों की ख़ैर-ख़बर रख पाना तो और भी दूर की बात है। हालात, तो यहाँ तक बिगड़े हुए हैं कि उदयपुर स्थित राज्य सरकार के पर्यटन अधिकारी पूछने पर भी इन मंदिरों के बारे में किसी भी तरह की कोई जानकारी नहीं दे पाते। इन हालातों में तो ऐसे लगता है कि अब वह दिन दूर नहीं जब कि इन मंदिरों के खंडहर ढूँढ़े न मिलेंगे।
उदयपुर में सास-बहू के मंदिर – राजपाल सिंह
झीलों की नगरी उदयपुर से मात्र अट्ठाइस किलोमीटर की दूरी पर है- जगप्रसिद्ध एकलिंग जी का मंदिर। इस मंदिर से थोड़ा पहले, कच्चे रास्ते पर खड़े हैं वास्तुकला के बेजोड़ नमूने- सास-बहू के मंदिर। इन्ही मंदिरों के आसपास कभी मेवाड़ राजवंश की स्थापना हुई थी। इनकी पहली राजधानी थी- नागदा। नागदा के वैभव की याद दिलाने में ये सास-बहू के मंदिर आज भी सक्षम हैं। मेवाड़ राज्य के संस्थापक बप्पा रावल ने अपना प्रारंभिक जीवन यहीं नागदा में व्यतीत किया था।
मेवाड़ की यह प्राचीन राजधानी नागदा तो आज ध्वस्त हो चुकी है, लेकिन किसी तरह से यहाँ सास-बहू मंदिर बचे रह गए हैं। इन मंदिरों और नागदा के ध्वंसावशेष के आधार पर यह कहना अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं होगा कि यहाँ कभी उत्कृष्ट कला का विकास हुआ।
मेवाड़ राज्य अपने जन्म से ही दिल्ली की आँख में चुभता रहा। दिल्ली के तत्कालीन सुल्तान शम्सुद्दीन अल्तमश ने तो इस पर आक्रमण कर इसे ध्वस्त कर डाला।
मंदिर सहस्रबाहु का
विक्रमी संवत ग्यारहवीं शताब्दी के आसपास बने सास-बहु के इन मंदिरों के बारे में अनुमान है कि मेवाड़ राजघराने की राजमाता ने विष्णु का मंदिर तथा बहू ने शेष नाग के मंदिर का निर्माण कराया। सास-बहू के द्वारा निर्माण कराए जाने से इन मंदिरों को सास-बहू के मंदिर के नाम से पुकारा जाता है। लेकिन, एक अन्य किंवदंती के अनुसार यहाँ पहले भगवान सहस्रबाहु का मंदिर था, जिसका नाम सहस्रबाहु से बिगड़कर सास-बहू हो गया। कारण जो भी रहा हो, आज ये मंदिर उस प्राचीन कला-संस्कृति के उत्कृष्ट नमूने हैं, जो कभी यहाँ फली-फूली थी।
वास्तुकला के बेजोड़ नमूने ये दोनों मंदिर एक ही परिसर में स्थित हैं। आज दोनों ही मंदिरों के गर्भगृहों में से देव प्रतिमाएँ गायब हैं। मंदिर बनानेवाले कलाकारों ने तत्कालीन परंपरा के अनुसार अपनी बारीक छैनी से समसामयिक जीवन व संस्कृति के अमर तत्वों को इन मंदिरों में उकेरा है। दोनों ही मंदिरों के बरामदों, तोरण-द्वारों व मंडपों को शिल्पकला के उत्कृष्ट नमूनों से सजाया है।
मंदिर की बाहरी दीवारों पर लगी सुर-सुंदरियों की प्रतिमाएँ नारी सौंदर्य का सजीव वर्णन करती-सी प्रतीत होती हैं। नर-नारी जीवन-जगत की गतिविधियों में शृंगार, नृत्य, क्रीड़ा और प्रेम आदि की अभिव्यक्ति बड़े सुंदर ढंग से अंकित की गई हैं। मिथुन-युगलों के बीच के प्यार-व्यापार को इतने सुंदर ढंग से दर्शाया गया है कि नर-नारी मूर्तियाँ शारीरिक सौंदर्य की पराकाष्ठा बन गई हैं।
कारीगरी, अद्भुत सूक्ष्म नक्काशी व भव्यता की दृष्टि से इन दोनों मंदिरों की समानता आबू पर्वत के जगप्रसिद्ध देलवाड़ा के मंदिरों व रणकपुर के जैन मंदिर से की जा सकती है। लेकिन प्राचीनता की दृष्टि से सास-बहू के मंदिर के प्रवेश-द्वार पर बने छज्जों पर महाभारत की पूरी कथा अंकित है। इन छज्जों से लगे बायें स्तंभ पर शिव-पार्वती की प्रतिमाएँ हैं, जो खजुराहो की मिथुन मूर्तियों से होड़ लेती-सी प्रतीत होती हैं। तोरणों का अलंकरण तो देखते ही बनता है।
मंदिर बहू का
बहू के मंदिर का सभामंडप तो अपने आप में अनूठा है। प्रत्येक स्तंभ पर लगभग चार फुट ऊँची, एक ही पत्थर से निर्मित प्रतिमाएँ लगी हुई हैं। ये नारी प्रतिमाएँ उत्कष्ट कलात्मक रूप में नारी सौंदर्य को दर्शाने के लिए उल्लेखनीय हैं। मंदिर के सामने एक ही भारी पत्थर से बना तोरण है, जिसमें तीन द्वार हैं। सास-बहू के दोनों मंदिरों के बीच में ब्रह्मा जी का मंदिर है। ब्रह्मा जी का मंदिर दोनों से छोटा है, फिर भी वह दोनों से कम नहीं है। इसके गुंबद को देखकर ऐसा लगता है मानो उसे बारीक जाली से ढक दिया गया हो।
हालाँकि, सास-बहू के ये मंदिर अपने समकालीन अन्य मंदिरों की तुलना में कहीं अच्छी दशा में हैं, फिर भी उचित साज-सँभाल के अभाव में ये धीरे-धीरे क्षरण का शिकार होने लगे हैं। समय के थपेड़ों ने मंदिर की दीवारों व मूर्तियों पर कालेपन की परछायीं डालना शुरू कर दी है। गर्भगृहों से आराध्य देवों की मूर्तियाँ गायब हैं। जब आराध्य देवों की मूर्तियाँ ही गायब हों, तो फिर मंदिर कैसा? राज्य पुरतत्व विभाग ने यहाँ एक नीला सूचना-पट्ट लगाकर उन्हें संरक्षित स्मारक घोषित कर अपने फ़र्ज़ से भी छुट्टी पा ली है। पर्यटन विभाग द्वारा ऐसे दुर्लभ स्मारकों की ख़ैर-ख़बर रख पाना तो और भी दूर की बात है। हालात, तो यहाँ तक बिगड़े हुए हैं कि उदयपुर स्थित राज्य सरकार के पर्यटन अधिकारी पूछने पर भी इन मंदिरों के बारे में किसी भी तरह की कोई जानकारी नहीं दे पाते। इन हालातों में तो ऐसे लगता है कि अब वह दिन दूर नहीं जब कि इन मंदिरों के खंडहर ढूँढ़े न मिलेंगे।
Monday, July 4, 2011
Tuesday, October 14, 2008
मुलाकात 1
एक मुलाक़ात करो हमसे इनायत समझकर,हर चीज़ का हिसाब देंगे क़यामत समझकर,मेरी दोस्ती पे कभी शक ना करना,हम दोस्ती भी करते है इबादत समझकर
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