<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-7319195525113358508</id><updated>2012-02-16T00:30:26.065-08:00</updated><title type='text'>SUNDAR MALIK</title><subtitle type='html'>Hi 
Kya Meri Talash Hai</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://smalik06.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7319195525113358508/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://smalik06.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>malik</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09139758814525364467</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Eh8BkyTxt58/SJqthbJOKKI/AAAAAAAAADI/uvkv7Qt-o9A/s1600-R/hllo009%25255B1%25255D.gif'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>34</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7319195525113358508.post-5909728186344852625</id><published>2011-09-27T00:25:00.000-07:00</published><updated>2011-09-27T00:26:31.718-07:00</updated><title type='text'>सास बहू मंदिर</title><content type='html'>पर्यटन&lt;br /&gt;उदयपुर में सास-बहू के मंदिर – राजपाल सिंह &lt;br /&gt;झीलों की नगरी उदयपुर से मात्र अट्ठाइस किलोमीटर की दूरी पर है- जगप्रसिद्ध एकलिंग जी का मंदिर। इस मंदिर से थोड़ा पहले, कच्चे रास्ते पर खड़े हैं वास्तुकला के बेजोड़ नमूने- सास-बहू के मंदिर। इन्ही मंदिरों के आसपास कभी मेवाड़ राजवंश की स्थापना हुई थी। इनकी पहली राजधानी थी- नागदा। नागदा के वैभव की याद दिलाने में ये सास-बहू के मंदिर आज भी सक्षम हैं। मेवाड़ राज्य के संस्थापक बप्पा रावल ने अपना प्रारंभिक जीवन यहीं नागदा में व्यतीत किया था।&lt;br /&gt;मेवाड़ की यह प्राचीन राजधानी नागदा तो आज ध्वस्त हो चुकी है, लेकिन किसी तरह से यहाँ सास-बहू मंदिर बचे रह गए हैं। इन मंदिरों और नागदा के ध्वंसावशेष के आधार पर यह कहना अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं होगा कि यहाँ कभी उत्कृष्ट कला का विकास हुआ।&lt;br /&gt;मेवाड़ राज्य अपने जन्म से ही दिल्ली की आँख में चुभता रहा। दिल्ली के तत्कालीन सुल्तान शम्सुद्दीन अल्तमश ने तो इस पर आक्रमण कर इसे ध्वस्त कर डाला।&lt;br /&gt;मंदिर सहस्रबाहु का&lt;br /&gt;विक्रमी संवत ग्यारहवीं शताब्दी के आसपास बने सास-बहु के इन मंदिरों के बारे में अनुमान है कि मेवाड़ राजघराने की राजमाता ने विष्णु का मंदिर तथा बहू ने शेष नाग के मंदिर का निर्माण कराया। सास-बहू के द्वारा निर्माण कराए जाने से इन मंदिरों को सास-बहू के मंदिर के नाम से पुकारा जाता है। लेकिन, एक अन्य किंवदंती के अनुसार यहाँ पहले भगवान सहस्रबाहु का मंदिर था, जिसका नाम सहस्रबाहु से बिगड़कर सास-बहू हो गया। कारण जो भी रहा हो, आज ये मंदिर उस प्राचीन कला-संस्कृति के उत्कृष्ट नमूने हैं, जो कभी यहाँ फली-फूली थी।&lt;br /&gt;वास्तुकला के बेजोड़ नमूने ये दोनों मंदिर एक ही परिसर में स्थित हैं। आज दोनों ही मंदिरों के गर्भगृहों में से देव प्रतिमाएँ गायब हैं। मंदिर बनानेवाले कलाकारों ने तत्कालीन परंपरा के अनुसार अपनी बारीक छैनी से समसामयिक जीवन व संस्कृति के अमर तत्वों को इन मंदिरों में उकेरा है। दोनों ही मंदिरों के बरामदों, तोरण-द्वारों व मंडपों को शिल्पकला के उत्कृष्ट नमूनों से सजाया है।&lt;br /&gt;मंदिर की बाहरी दीवारों पर लगी सुर-सुंदरियों की प्रतिमाएँ नारी सौंदर्य का सजीव वर्णन करती-सी प्रतीत होती हैं। नर-नारी जीवन-जगत की गतिविधियों में शृंगार, नृत्य, क्रीड़ा और प्रेम आदि की अभिव्यक्ति बड़े सुंदर ढंग से अंकित की गई हैं। मिथुन-युगलों के बीच के प्यार-व्यापार को इतने सुंदर ढंग से दर्शाया गया है कि नर-नारी मूर्तियाँ शारीरिक सौंदर्य की पराकाष्ठा बन गई हैं।&lt;br /&gt;कारीगरी, अद्भुत सूक्ष्म नक्काशी व भव्यता की दृष्टि से इन दोनों मंदिरों की समानता आबू पर्वत के जगप्रसिद्ध देलवाड़ा के मंदिरों व रणकपुर के जैन मंदिर से की जा सकती है। लेकिन प्राचीनता की दृष्टि से सास-बहू के मंदिर के प्रवेश-द्वार पर बने छज्जों पर महाभारत की पूरी कथा अंकित है। इन छज्जों से लगे बायें स्तंभ पर शिव-पार्वती की प्रतिमाएँ हैं, जो खजुराहो की मिथुन मूर्तियों से होड़ लेती-सी प्रतीत होती हैं। तोरणों का अलंकरण तो देखते ही बनता है।&lt;br /&gt;मंदिर बहू का&lt;br /&gt;बहू के मंदिर का सभामंडप तो अपने आप में अनूठा है। प्रत्येक स्तंभ पर लगभग चार फुट ऊँची, एक ही पत्थर से निर्मित प्रतिमाएँ लगी हुई हैं। ये नारी प्रतिमाएँ उत्कष्ट कलात्मक रूप में नारी सौंदर्य को दर्शाने के लिए उल्लेखनीय हैं। मंदिर के सामने एक ही भारी पत्थर से बना तोरण है, जिसमें तीन द्वार हैं। सास-बहू के दोनों मंदिरों के बीच में ब्रह्मा जी का मंदिर है। ब्रह्मा जी का मंदिर दोनों से छोटा है, फिर भी वह दोनों से कम नहीं है। इसके गुंबद को देखकर ऐसा लगता है मानो उसे बारीक जाली से ढक दिया गया हो।&lt;br /&gt;हालाँकि, सास-बहू के ये मंदिर अपने समकालीन अन्य मंदिरों की तुलना में कहीं अच्छी दशा में हैं, फिर भी उचित साज-सँभाल के अभाव में ये धीरे-धीरे क्षरण का शिकार होने लगे हैं। समय के थपेड़ों ने मंदिर की दीवारों व मूर्तियों पर कालेपन की परछायीं डालना शुरू कर दी है। गर्भगृहों से आराध्य देवों की मूर्तियाँ गायब हैं। जब आराध्य देवों की मूर्तियाँ ही गायब हों, तो फिर मंदिर कैसा? राज्य पुरतत्व विभाग ने यहाँ एक नीला सूचना-पट्ट लगाकर उन्हें संरक्षित स्मारक घोषित कर अपने फ़र्ज़ से भी छुट्टी पा ली है। पर्यटन विभाग द्वारा ऐसे दुर्लभ स्मारकों की ख़ैर-ख़बर रख पाना तो और भी दूर की बात है। हालात, तो यहाँ तक बिगड़े हुए हैं कि उदयपुर स्थित राज्य सरकार के पर्यटन अधिकारी पूछने पर भी इन मंदिरों के बारे में किसी भी तरह की कोई जानकारी नहीं दे पाते। इन हालातों में तो ऐसे लगता है कि अब वह दिन दूर नहीं जब कि इन मंदिरों के खंडहर ढूँढ़े न मिलेंगे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7319195525113358508-5909728186344852625?l=smalik06.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://smalik06.blogspot.com/feeds/5909728186344852625/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7319195525113358508&amp;postID=5909728186344852625' title='0 Comments'/><link rel='edit' 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class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;/p&gt;&lt;br /&gt;&lt;p&gt;&lt;span class=""&gt;आप&lt;/span&gt; सभी ने इस ब्लोग्स को पसंद किया इस के लिए आप सभी का धन्यवाद - फिर से जल्दी ही कुछ नया लिखेगे &lt;/p&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7319195525113358508-6581573713998833863?l=smalik06.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://smalik06.blogspot.com/feeds/6581573713998833863/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7319195525113358508&amp;postID=6581573713998833863' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7319195525113358508/posts/default/6581573713998833863'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7319195525113358508/posts/default/6581573713998833863'/><link 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src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7319195525113358508-6871266187737777127?l=smalik06.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://smalik06.blogspot.com/feeds/6871266187737777127/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7319195525113358508&amp;postID=6871266187737777127' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7319195525113358508/posts/default/6871266187737777127'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7319195525113358508/posts/default/6871266187737777127'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://smalik06.blogspot.com/2008/10/1.html' title='मुलाकात 1'/><author><name>malik</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09139758814525364467</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image 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ki lakeeron mein nahi...Us Shaks se mujhe pyar bahut hai...Kaise kahoon ki tumse milne ki chahat nahi,Bekrar Dil ko abh bhi rahat nahi,Bhula deta magar kya karun,Aap ko bhul jane ki dil ko aadat nahi&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7319195525113358508-5444543142375061961?l=smalik06.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://smalik06.blogspot.com/feeds/5444543142375061961/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7319195525113358508&amp;postID=5444543142375061961' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7319195525113358508/posts/default/5444543142375061961'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7319195525113358508/posts/default/5444543142375061961'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://smalik06.blogspot.com/2008/10/blog-post_3838.html' title='मुलाकात'/><author><name>malik</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09139758814525364467</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Eh8BkyTxt58/SJqthbJOKKI/AAAAAAAAADI/uvkv7Qt-o9A/s1600-R/hllo009%25255B1%25255D.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7319195525113358508.post-3630318046278931378</id><published>2008-10-14T01:38:00.000-07:00</published><updated>2008-10-14T01:40:17.268-07:00</updated><title type='text'>रामतिल</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;रामतिल&lt;br /&gt;जगनी के नाम से आदिवासी बाहुल्‍य क्षेत्रों में पहचानी जाने वाली फसल रामतिल है। मध्‍यप्रदेश में इसकी खेती लगभग 220 हजार हेक्‍टेयर भूमि में की जाती है तथा उपज 44 हजार टन मिलती है। प्रदेश में देश के अन्‍य उत्‍पादक प्रदेशों की तुलना में औसत उपज अत्‍यंत कम (198 किलोग्राम प्रति हेक्‍टेयर ) है। मध्‍यप्रदेश में इसकी खेती प्रधान रूप से छिंदवाडा , बैतूल, मंडला, सिवनी, डिन्‍डौरी एवं शहड़ोल जिलों में की जाती है।&lt;br /&gt;रामतिल के बीजों में 35 – 45 प्रतिशत तेल एवं 25 से 35 प्रतिशत की मात्रा पायी जाती है। रामतिल की फसल विषम परिस्थितियों में भी उगाई जा सकती है। फसल को अनुपजाऊ एवं कम उर्वराशक्ति वाली भूमि में भी लिया जा सकता है। इसका तेल एवं बीज पूर्णत: विषैले तत्‍वों से मुक्‍त रहता है तथा यह कीडों बीमारियों जंगली जानवरों तथा पक्षियों से होने वाली क्षति से कम प्रभावित होती है। फसल भूमि का कटाव रोकती है। रामतिल की फसल के बाद उगाई जाने वाली फसल की उपज अच्‍छी आती है। प्रदेश में फसल की उपज को निम्‍नानुसार उन्‍नत कृषि तकनीकी अपनाकर बढ़ाया जा सकता है।&lt;br /&gt;भूमि का चुनाव&lt;br /&gt;फसल को आमतौर पर सभी प्रकार की भूमि में उगाया जा सकता है। उत्‍तम जल निकासी वाली गहरी दुमट भूमि काश्‍त हेतु अच्‍छी होती है।&lt;br /&gt;भूमी की तैयारी&lt;br /&gt;खेत की तैयारी करते समय पिछली फसल की कटाई पश्‍चात हल से दो बाद गहरी जुताई करें तथा 3-4 बाद बखर एवं पाटा चलाकर भूमि को समतल एवं खरपतवार रहित करना चाहिये जिसमें बीज समान गहराई तक पहुंचकर उचित अंकुरण एवं पौध संख्‍या प्राप्‍त हो सके।&lt;br /&gt;जातियों का चुनाव&lt;br /&gt;प्रदेश में फसल की काश्‍त हेतु निम्‍नलिखित अनुशंसित उन्‍नत किस्‍मों को अपनाना चाहिये:&lt;br /&gt;(1)                       उटकमंड़ – मध्‍यम अवधि में पककर तैयार होने वाली किस्‍म जो कि लगभग 110 दिनों में परिपक्‍व होकर तैयार होती है। बीजों में 43 प्रतिशत तेल की मात्रा होती है तथा उपज क्षमता औसतन 500 किलोग्राम प्रति हेक्‍टर है।&lt;br /&gt;(2)                       नंबर 5 -  बीजों का रंग काला मध्‍यम अवधि में (लगभग 105 दिनों में) पककर तैयार होती है। बीजों में 40 प्रतिशत तेल की मात्रा होती है तथा उपज क्षमता औसतन 475 किलोग्राम प्रति हेक्‍टर है।&lt;br /&gt;(3)                       आई .जी.पी 76 (सध्‍याढ़ी) मध्‍यम अवधि में (लगभग 105 दिनों में) पककर तैयार होती है। बीजों का आकार छोटा होता है तथा बीजों में 40 प्रतिशत तेल की मात्रा होती है। किस्‍म ताप एवं प्रकाश काल हेतु संवेदनशील होती है तथा उपज क्षमता औसतन 475 किलोग्राम प्रति हेक्‍टर है।&lt;br /&gt;(4)                       नंबर 71 – जल्‍दी पकने वाली (लगभग 92 -95 दिनों में) किस्‍म है जिसका रंग गहरा काला चमकीला होकर दाना आकार में बड़ा होता है। बीजों में 42 प्रतिशत तेल की मात्रा होती है। पौधों की ऊंचाई ज्‍यादा होती है तथा औसत उपज क्षमता 475 किलोग्राम प्रति हेक्‍टर है।&lt;br /&gt;(5)                       बिरसा नाइजर – 1 – किस्‍म जब पककर तैयार होती है तब तने का रंग हल्‍का गुलाबी होता है। मध्‍यम अवधि में (95-100 दिनों में ) पक्‍कर तैयार होती है। बीजों में 41 प्रतिशत तेल पाया जाता है तथा औसत उपज क्षमता 600 – 700 किलोग्राम / हेक्‍टर है।&lt;br /&gt;(6)                       श्रीलेखा – नई विकसित शीघ्र पकने वाली (86 दिनों में) पककर तैयार होती है। बीजों में 41 प्रतिशत तेल पाया जाता है तथा औसत उपज क्षमता 500 किलोग्राम / हेक्‍टर है।&lt;br /&gt;(7)                       पैयूर – 1 नई विकसित किस्‍म जो कि लगभग 90 दिनों में पककर तैयार होती है। पर्वतीय क्षेत्रों में काश्‍त हेतु उत्‍तम है। बीजों का रंग काला होता है तथा बीजों में 40 प्रतिशत तेल होता है। औसत उपज क्षमता 500 किलोग्राम/ हेक्‍टर है।&lt;br /&gt;(8)                       जे.एन.सी सी 1 – इसके पकने की अवधि 95 -100 दिन है। बीजों के 35 -38 प्रतिशत तेल की मात्रा होती है। इस किस्‍म की उपज क्षमता औसत 5 -7 क्विंटल प्रति हेक्‍टर है। यह किस्‍म सूखा के लिये सहनशील होती है।&lt;br /&gt;(9)                       जे.एन.सी -7 इसके पकने की अवधि 95 दिन है। इसका बीज पुष्‍ट तथा काले रंग का होता है। औसत उपज क्षमता 5-50 – 6.50 क्विंटल प्रति हेक्‍टर है। यह सूखा के लिये सहनशील है।&lt;br /&gt;(10)                   जे.एन.सी. 9 – इसके पकने की अवधि 95 दिन है। इसका बीज पुष्‍ट तथा काले रंग का होता है। औसत उपज क्षमता 5.50 – 7 क्विंटल प्रति हेक्‍टर है। बीजों में 38 – 40 प्रतिशत तेल होता है। यह किस्‍म ताप एवं प्रकाश काल हेतु संवेदनशील होती है।&lt;br /&gt;फसल चक्र&lt;br /&gt;फसल को दलहनी , अनाजवाली फसलों तथा मोटे अनाज वाली फसलों के साथ बोया जाता है। एकल फसल में इसकी उपज मिश्रित फसल की अपेक्षा ज्‍यादा आती है। फसल हेतु कुछ लाभदायक फसल चक्र निम्‍नानुसार है:&lt;br /&gt;फसल क्रम&lt;br /&gt;कुटकी            -     रामतिल&lt;br /&gt;रागी(अगेती)  -     रामतिल&lt;br /&gt;उड़द(अगेती) -     रामतिल&lt;br /&gt;मिश्रित फसल प्रणाली&lt;br /&gt;रामतिल     +          कोदो (2:2) रामतिल           +          कुटकी (2:2)&lt;br /&gt;रामतिल     +          बाजरा (2:2) रामतिल     +          मूंग (2:2)&lt;br /&gt;रामतिल     +          मूंगफली ( 6:2 अथवा 4:2)&lt;br /&gt;बीजोपचार&lt;br /&gt;फसल को भूमिजनित या बीजजनित बीमारियों से बचने के लिये बोनी के पूर्व बीजों को थाइरस अथवा केप्‍टान 3 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करना चाहिये।&lt;br /&gt;बोने का समय&lt;br /&gt;फसल की बोनी जुलाई माह के दूसरे सप्‍ताह से अगस्‍त माह के दूसरे सप्‍ताह तक की जा सकती है।&lt;br /&gt;बोने की विधि&lt;br /&gt;सामान्‍यत: 5 -8 किलोग्राम बीज / हेक्‍टर के मान से बोनी हेतु आवश्‍यक होता है। अंतरवर्तीय फसल हेतु बीज की दर कतारों के अनुपात पर निर्भर करती है। बोनी करते समय बीजों को पूरे खेत (कतारों) में समान रूप से वितरण हेतु बीजों को 1:20 के अनुपात में गोबर की छनी हुई अच्‍छी सड़ी खाद के साथ मिलाकर बोनी करना चाहिये।&lt;br /&gt;खाद एवं उर्वरक की मात्रा एवं देने की विधि&lt;br /&gt;फसल को 10 किलोग्राम नत्रजन +  20 किलोग्राम फास्‍फोरस / हेक्‍टेयर बोनी के समय ओर 10 किलोग्राम नत्रजन प्रति हेक्‍टेयर की दर से खड़ी फसल में बोनी के 35 दिन बाद देवें। इसके अलावा स्‍फुर घुलनशील जैव उर्वरक कल्‍चर (पी.एस.बी) भूमि में अनुपलब्‍ध स्‍फुर को उपलब्‍ध कर फसल को लाभ पहुंचाता है। पी.एस.बी. कल्‍चर को बोनी के पूर्व आखरी बखरनी के समय मिटटी में 5 से 7 किलोग्राम प्रति हेक्‍टर की दर से गोबर की खाद अथवा सूखी मिटटी में मिलाकर खेत में समान रूप से बिखेरें। इस समय खेत में नमी का होना आवश्‍यक होता है।&lt;br /&gt;भूमि में उपलब्‍ध तत्‍वों के परीक्षण उपरांत यदि भूमि में गंधक तत्‍व की कमी पायी जाती है तो 20 – 30 किलोग्राम / हेक्‍टेयर की दर से गंधक का प्रयोग करने पर तेल के प्रतिशत एवं पैदावार में बढ़ोतरी होती है।&lt;br /&gt;कतारों की दूरी&lt;br /&gt;अच्‍दे उत्‍पादन हेतु कतारों में बोनी हेतु अनुशंसा की जाती है। अच्‍छी उपज लेने हेतु बुवाई 30 x 10 से.मी. दूरी पर करें तथा बीज को 3 से.मी. की गहराई पर बोना चाहिये। पौधों की संख्‍या 3,00,000 पूरे खेत (कतारों) में समान रूप से वितरण हेतु 1:20 के अनुपात में गोबर की छनी हुई खाद के साथ मिलाकर बोनी करना चाहिये।&lt;br /&gt;सिंचाई&lt;br /&gt;रामतिल की फसलों को मुख्‍यत: खरीफ मौसम में वर्षा आधारित स्थिति में यदि सिंचाई का साधन उपलब्‍ध है तो सुरक्षा सिंचाई करना चाहिये। फूल आते समय एवं फल्लियॉ बनते समय सिंचाई देने से उपज में अच्‍छे परिणाम मिलते हैं।&lt;br /&gt;निंदाई – गुडाई&lt;br /&gt;बोनी के 15 -20 दिन पश्‍चात पहली निंदाई करना चाहिये तथा इसी समय आवश्‍यकता से अधिक पौधों को खेत से निकालना चाहिये। यदि आवश्‍यकता हुआ तो दूसरी निंदाई बोनी के करीब 35 -40 दिन बाद (नत्रजन युक्‍त उर्वरकों की खड़ी फसल में छिड़काव के पूर्व ) करना चाहिये। कतारों में बोयी गई फसल में हाथों द्वारा चलने वाला हो अथवा डोरा चलाकर नींदा नियंत्रण करें। रासायनिक नींदा नियंत्रण के लिये ‘’एलाक्‍लोर ‘’ 1.5 किलोग्राम सक्रिय घटक / हेक्‍टेयर की दर से 500 लीटर पानी में छिड़काव अथवा ‘’ लासो ‘’ दानेदार 20 किलोग्राम / हेक्‍टेयर की दर से बोनी के तुरंत बाद एवं अंकुरण के पूर्व भुरकाव करें।&lt;br /&gt;अमरबेल परजीवी संक्रमित क्षेत्रों से प्राप्‍त बीजों का प्रयोग बोनी हेतु नहीं करना चाहिये। यदि अमरबेल के बीज रामतिल के साथ मिल गये हो तो बोनी पूर्व छलनी से छानकर इसे अलग कर देना चाहिये।&lt;br /&gt;पौध संरक्षण&lt;br /&gt;(अ)           कीट&lt;br /&gt;रामतिल पर आनेवाले प्रमुख कीट रामतिल की सूंडी, सतही टिडडी माहों, बिहार रोमिल सूंडी सेमीलूपर आदि हैं। रामतिल की इल्‍ली हरे रंग की होती है जिस पर जामुनी रंग की धारियॉ रहती है। प‍त्तियों को खाकर पौधे की प्रारंभिक अवस्‍था में ही पौधे से रस चूसते हैं जिससे उपज में कमी आती है।&lt;br /&gt;सतही टिडडी के शिशु एवं वयस्‍क फसल की प्रारंभिक अवस्‍थाओं में पत्तियों को काटकर हानि पहुंचाते हैं।&lt;br /&gt;नियंत्रण&lt;br /&gt;(1)              रामतिल की इल्‍ली के नियंत्रण के लिये पेराथियान 2 प्रतिशत चूर्ण का भुरकाव 25 किलोग्राम प्रति हेक्‍टेयर की दर से करना चाहिये। इस चूर्ण के उपयोग से सतही टिडडी को भी नियंत्रित किया जा सकता है।&lt;br /&gt;(2)              माहों कीट के नियंत्रण के लिये वावधानी रखकर कीटनाशक दवा का चयन करना चाहिये। क्‍योंकि इसका आक्रमण पौधे पर फूल आने पर होता है। चूंकि रामतिल में परागीकरण होता है अत: ऐसी दवा का प्रयोग नहीं करना चाहिये जिससे मधुमक्‍खियों को नुकसान हो। इण्‍डोसल्‍फान 35 सी.की 1 मिली लीटर मात्रा प्रति 1 लीटर पानी के मान से 600 – 700 लीटर पानी में अच्‍छी तरह से बनाकर प्रति हेक्‍टेयर की दर से छिड़काव करने पर माहों का प्रभावी ढंग से नियंत्रण किया जा सकता है। कीटनाशकों का प्रयोग सुबह या देर शाम न करें।&lt;br /&gt;(ब) रोग&lt;br /&gt;(1) सरकोस्‍पोरा पर्णदाग – इस रोग में पत्तियों पर छोटे धूसर से भूरे धब्‍बे बनते हैं जिसके मिलने पर रोग पूरी पत्‍ती पर फैल जाता है तथा पत्‍ती गिर जाती है। नियंत्रण हेतु बोनी पूर्व बीजों को 0.3 प्रतिशत थायरस से बीजोपचार करें।&lt;br /&gt;(2) अल्‍अरनेरिया पत्‍ती धब्‍बा – इस रोग में पत्तियों पर भूरे, अंडाकार , गोलाकार एवं अनियंत्रित वलयाकार धब्‍बे दिखते हैं। रोग के नियंत्रण हेतु बोनी पूर्व बीजों को 0.3 प्रतिशत थायरस से बीजोपचार करें। जीनेब (0.2 प्रतिशत) अथवा बाविस्‍टीन (0.05 प्रतिशत) या टापसिन (0.25 प्रतिशत) दवा का छिड़काव रोग आने पर 15 दिन के अंतराल से करें।&lt;br /&gt;(3) जड़ सडन –  तना अधार एवं जड़ का छिलका हटाने पर फफूंद के स्‍कलेरोशियम होने के कारण कोयले के समान कालापन होता है। नियंत्रण हेतु 0.3 प्रतिशत थायरम से बोनी के पूर्व बीजोपचार करें।&lt;br /&gt;(4) भभूतिया रोग (चूर्णी फफूंद) – रोग में पत्तियों एवं तनों पर सफेद चूर्ण दिखता है। नियंत्रण हेतु 0.2 प्रतिशत घुलनशील गंधक का फुहारा पद्धति से फसल पर छिड़काव करें।&lt;br /&gt;फसल कटाई&lt;br /&gt;रामतिल की फसल लगभग 100 -120 दिनों में पककर तैयार होती है। जब पौधों की पत्तियां सूखकर गिरने लगे, फल्‍ली का शीर्ष भाग भूरे काले रंग का होकर मुड़ने लगे तब फसल को काट लेना चाहिये। कटाई उपरांत पौधों को गटठों में बॉधकर खेत में खुली धूप में एक सप्‍ताह तक सुखाना चाहिये उसके बाद खलिहान में लकड़ी / डंडों द्वारा पीटकर गहाई करना चाहिये। गहाई के बाद प्राप्‍त दानों को सूपे से फटककर साफ कर लेना चाहिये। बीजों को धूप में अच्‍छी तरह सुखाकर 9 प्रतिशत नमीं पर भंडारण करना चाहिये।&lt;br /&gt;उपज&lt;br /&gt;उचित प्रबंधन से रामतिल की उपज 600 -700 किलोग्राम प्रति हेक्‍टेयर तक प्राप्‍त होती है जो कि मुख्‍यत: अच्‍छी वर्षा एवं उन्‍नत तकनीक के अंगीकरण से प्राप्‍त होती है।&lt;br /&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7319195525113358508-3630318046278931378?l=smalik06.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://smalik06.blogspot.com/feeds/3630318046278931378/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7319195525113358508&amp;postID=3630318046278931378' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7319195525113358508/posts/default/3630318046278931378'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7319195525113358508/posts/default/3630318046278931378'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://smalik06.blogspot.com/2008/10/blog-post_2905.html' title='रामतिल'/><author><name>malik</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09139758814525364467</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Eh8BkyTxt58/SJqthbJOKKI/AAAAAAAAADI/uvkv7Qt-o9A/s1600-R/hllo009%25255B1%25255D.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7319195525113358508.post-4427944446466551925</id><published>2008-10-14T01:36:00.000-07:00</published><updated>2008-10-14T01:37:26.030-07:00</updated><title type='text'>मूंगफली</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;मूंगफली&lt;br /&gt;मूंगफली म.प्र. की एक प्रमुख तिलहनी फसल है। राज्‍य में इसकी उत्‍पादकता स्थिर नहीं है। इसका प्रमुख कारण वर्षा की अनिश्चित्‍ता, सूखा पड़ना अथवा कभी- कभी लगातार वर्षा होना तथा किसानों द्वारा इस फसल की उन्‍नत कृषि कार्यमाला को न अपनाना आदि है।&lt;br /&gt;भूमि का चुनाव&lt;br /&gt;पानी का अच्‍छा निकास, हल्‍की से मध्‍यम रेतीली कछारी या दुमट भूमि उपयुक्‍त है।&lt;br /&gt;भूमि की तैयारी&lt;br /&gt;तीन साल के अन्‍तराल में एक बार गहरी जुताई करें इसके बाद दो बार देशी हल या कल्‍टीवेटर चलायें एवं बखर चलाकर पाटा लगाना चाहिए।&lt;br /&gt;बीज दर&lt;br /&gt;100 – 120 किलोग्राम/ हेक्‍टर दाने बोने से 3.33 लाख के लगभग पौध संख्‍या प्राप्‍त होती है।&lt;br /&gt;उन्‍नत जातियॉं&lt;br /&gt;किस्‍म&lt;br /&gt;पकने की अवधि&lt;br /&gt;फलियॉं कि.ग्रा./ हे.&lt;br /&gt;तेल प्रतिशत    &lt;br /&gt;अन्‍य विवरण&lt;br /&gt;फूलो प्रगति (जे.एल. – 24) &lt;br /&gt;95 -100    &lt;br /&gt;1500-2400&lt;br /&gt;50.8&lt;br /&gt;अगेती उन्‍नत जाति है तथा पूरे देश में इसे सफलतापूर्वक लगाया जा रहा है। इसे ग्रीष्‍म ऋतु में नहीं लगाना चाहिए। यह किस्‍म खरीफ एवं ग्रीष्‍म के लिये उपयुक्‍त है। यह मध्‍यम से भारी मिटटी के लिये उपयुक्‍त है। यह कालर राट रोगी रोधी किस्‍म है मध्‍यम से भारी मिटटी के लिये उपयुक्‍त है। इसको खरीफ एवं गर्मी दोनों मौसमों में उगाया जा सकता है। 3 -4 दाने वाली लम्‍बी फली इसमें रूट राट (जड़सडन) का प्रभाव कम पाया गया है। दोनों ही मौसम में उगाया जा सकता है। खरीफ मौसम के लिये अनुसंशित ।&lt;br /&gt;जूनागढ़ – 11 (एस.बी. -11)     &lt;br /&gt;107-150    &lt;br /&gt;1000-1500 &lt;br /&gt;49.5&lt;br /&gt;ए.के. 12 – 24  &lt;br /&gt;105- 110    &lt;br /&gt;1000- 1500&lt;br /&gt;48.5&lt;br /&gt;गंगापुरी    &lt;br /&gt;95-100    &lt;br /&gt;1500-2000&lt;br /&gt;48  &lt;br /&gt;ज्‍योति&lt;br /&gt;105-110    &lt;br /&gt;1500-2000&lt;br /&gt;53.3&lt;br /&gt;जे.जी.एन -3&lt;br /&gt;100 – 105 &lt;br /&gt;1500- 2000&lt;br /&gt;50  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीजोपचार&lt;br /&gt;3 ग्राम थीरम या 2 ग्राम कार्बनडेजिम दवा/ किलो ग्राम बीज की दर से बीजोपचार करें। पौधों के सूखने की समस्‍या वाले क्षेत्र में 2 ग्राम थीरम + 1 ग्राम कार्बेन्‍डाजिम / किलो ग्राम बीज मिलाकर उपचारित करें या जैविक उपचार ट्रायकोडर्मा 4 ग्राम चूर्ण / किलो ग्राम बीज की दर से उपयोग करें। इसके पश्‍चात 10 ग्राम / किलो ग्राम बीज के मान से रायजोबियम कल्‍चर (मूंगफली) से भी उपचार करें।&lt;br /&gt;बोने का समय&lt;br /&gt;वर्षा प्रारंभ होने पर जून के मध्‍य से लेकर जुलाई के प्रथम सप्‍ताह तक बोनी करना चाहिए।&lt;br /&gt;बोने का तरीका&lt;br /&gt;बोनी कतारों में सरता दुफन या तिफन से लगभग 4 -6 से.मी. गहराई पर करना चाहिए। कतार से कतार की दूरी 30 से.मी. तथा पौधे की दूरी 8 – 10 से.मी. रखना चाहिए।&lt;br /&gt;खाद एवं उर्वरक&lt;br /&gt;भूमि की तैयारी के समय गोबर की खाद 5 -10 टन/ हेक्‍टर प्रयोग करें। उर्वरक के रूप में 20 किलोग्राम नत्रजन , 40 – 80 किलोग्राम स्‍फुर एवं 20 किलोग्राम पोटाश/ हेक्‍टर देना चाहिए। यदि खेत में गोबर की खाद तथा पी.एस.बी. का प्रयोग किया जाता है तो स्‍फुर की मात्रा 80 किलो ग्राम/ हेक्‍टर की जगह मात्र 40 किलो ग्राम / हेक्‍टर ही पर्याप्‍त है। खाद की पूरी मात्रा आधार खाद के रूप में प्रयोग करें। मूंगफली फसल में गंधक का विशेष महत्‍व है। इसलिए 25 किलो ग्राम/ हेक्‍टेयर के मान से गंधक अवश्‍य दिया जाना चाहिए। यदि यूरिया की जगह अमोनिया सल्‍फेट तथा फास्‍फेट के रूप में सिंगल सुपर फास्‍फेट का प्रयोग किया जाता है तो गंधक पर्याप्‍त मात्रा में मिल जाता है। अन्‍यथा 2 क्विंटल / हेक्‍टर की दर से जिप्‍सम या पाइराइटस का उपयोग आखिरी बखरनी के साथ करें। साथ ही 25 किलो ग्राम/ हेक्‍टर के मान से तीन साल के अन्‍तर पर जिंक सल्‍फेट का प्रयोग अवश्‍य करें।&lt;br /&gt;फसल चक्र:&lt;br /&gt;1 . मूंगफली (खरीफ) – गेहूं (रबी)&lt;br /&gt;2 . मूंगफली (खरीफ) – मक्‍का (खरीफ)&lt;br /&gt;3 . मूंगफली (खरीफ) – चना (रबी)&lt;br /&gt;4 . मूंगफली ग्रीष्‍म कपास (खरीफ)&lt;br /&gt;5 . मूंगफली ग्रीष्‍म मक्‍का / ज्‍वार / कपास&lt;br /&gt;अंतरवर्तीय फसलें&lt;br /&gt;अन्‍तवर्तीय फसल के रूप में मक्‍का, ज्‍वार, सोयाबीन, मूंग, उड़द, तुअर, सूर्यमुखी आदि फसलों को 4:2, 2:1, 8:2, 3:1, 6:3, 9:3, अनुपात में आवश्‍यकतानुसार  लिया जा सकता है।&lt;br /&gt;सिचाई&lt;br /&gt;सिंचाई की सुविधा होने पर अवर्षा से उत्‍पन्‍न सूखे की अवस्‍था में पहला पानी 50- 55 दिन में तथा दूसरा पानी 70 – 75 दिन में दिया जाना चाहिए।&lt;br /&gt;निंदाई – गुडाई&lt;br /&gt;फसल बोने के 15 -20, 25 -30 तथा 40 -45 दिन की अवस्‍था में डोरा या कोल्‍पा चलावें जिससे समय – समय पर नींदा नियंत्रण किया जा सके। नींदानाशक दवाओं के उपयोग से भी नींदा नियंत्रण किया जा सकता है।&lt;br /&gt;खरपतवारनाशी रसायनों की मात्रा एवं प्रयोग विधि&lt;br /&gt;खरपतवारनाशी रसायन    &lt;br /&gt;मात्रा सक्रिय तत्‍व, लीटर / हेक्‍टेयर  &lt;br /&gt;उपयोग विधि / समय&lt;br /&gt;पेंडीमिथेलिन &lt;br /&gt;0.75 – 1.0&lt;br /&gt;बुवाई बाद तुरंत फसल तथा खरपतवारों के उगने से पूर्व&lt;br /&gt;फलुक्‍लोरेलीन&lt;br /&gt;0.75 – 1.0&lt;br /&gt;बुवाई से पूर्व जमीन में&lt;br /&gt;एलाक्‍लोर&lt;br /&gt;1.0 – 1.5  &lt;br /&gt;बुवाई के बाद परंतु अंकुरण से पूर्व&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नोट: आवश्‍यकता पड़ने पर ही खरपतवारनाशी दवाओं का प्रयोग पूर्ण सावधानी अपनाते हुये करें।&lt;br /&gt;पौध संरक्षण&lt;br /&gt;(अ)           कीडे&lt;br /&gt;(अ)बोडला कीट (ब्‍हाइट ग्रब)&lt;br /&gt;(अ)           मई – जून के महीने में खेत की दो बार जुताई करना चाहिए।&lt;br /&gt;(अ)(ब) अगेती बुआई ‘’10 -20 जून के बीच ‘’ करना चाहिए।&lt;br /&gt;(अ)(स) मिटटी में फोरेट 10 जी या कारबोफयूरान 3 जी 25 किलो ग्राम / हेक्‍टेयर डालना चाहिए।&lt;br /&gt;(अ)(द) बीज को फफूंदनाशक उपचार से पहले क्‍लोरपायरीफास 12.5 मि.ली / किलो ग्राम बीज को उपचार कर छाया में सुखकर बोनी चाहिए।&lt;br /&gt;(अ)कामलिया कीट&lt;br /&gt;मिथाइल पेराथियान 2 प्रतिशत चूर्ण का 25 से 30 किलो ग्राम / हे. प्रारंभिक अवस्‍था में भुरकाव या पैराथियान 50 ईसी का 700 से 750 मिली. / हें के मान से छिड़काव करें।&lt;br /&gt;महों, थ्रिप्‍स एवं सफेद मक्‍खी&lt;br /&gt;इनके नियंत्रण लिए मोनोक्रोटोफॉस 36 ईसी का 550 मि.ली. / हे. या डाईमिथिएट का 30 ईसी का 500 मि.ली / हे. 500 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रयोग करें।&lt;br /&gt;सूरंग कीट&lt;br /&gt;क्‍यूनालफास 25 ई.सी का 1000 मि.ली या मोनोक्रोटोफॉस 36 एस.एल. 600 मि.ली / हे. का छिड़काव करें।&lt;br /&gt;चूहा एवं गिलहरी&lt;br /&gt;यह भी  मूंगफली को नुकसान करते है अत: इनके नियंत्रण पर ध्‍यान दें।&lt;br /&gt;(ब) रोग&lt;br /&gt;टिक्‍का / पर्ण धब्‍बा&lt;br /&gt;बोने के 4-5 सप्‍ताह से प्रारंभ कर 2-3 सप्‍ताह के अन्‍तर से दो-तीन बार कार्बेन्‍डाजिम 0.05 प्रतिशत या डायथेन एम – 45 का 0.2 प्रतिशत का छिड़काव करना चाहिए।&lt;br /&gt;कालर सडन / शुष्‍क जड़ सड़न&lt;br /&gt;बीज को 5 ग्राम थाइरम अथवा 3 ग्राम डाइथेन एम- 45 या 1 ग्राम कार्बेन्‍डाजिम प्रति किलो ग्राम बीज दर से उपचार करना चाहिए।&lt;br /&gt;फसल कटाई&lt;br /&gt;जैसे ही फसल पीली पड़ने लगे तथा प्रति पौधा 70- 80 प्रतिशत फली पक जावें उस समय पौधों को उखाड़ लेना चाहिए। फलियों को धूप में इतना सूखाना चाहिए कि नमी 8-10 प्रतिशत रह जाये तभी बोरों में रखकर भण्‍डारण नमी रहित जगह पर करें। बोरियों रखने के बाद उन पर मेलाथियान दवा का छिड़काव करना चाहिए।&lt;br /&gt;उपज&lt;br /&gt;समयानुकूल पर्याप्‍त वर्षा होने पर खरीफ में मूंगफली की उपज लगभग 15 से 20 क्विंटल / हे. तक ली जा सकती हैं।&lt;br /&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7319195525113358508-4427944446466551925?l=smalik06.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://smalik06.blogspot.com/feeds/4427944446466551925/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7319195525113358508&amp;postID=4427944446466551925' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7319195525113358508/posts/default/4427944446466551925'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7319195525113358508/posts/default/4427944446466551925'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://smalik06.blogspot.com/2008/10/blog-post_1433.html' title='मूंगफली'/><author><name>malik</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09139758814525364467</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Eh8BkyTxt58/SJqthbJOKKI/AAAAAAAAADI/uvkv7Qt-o9A/s1600-R/hllo009%25255B1%25255D.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7319195525113358508.post-5723735684347209610</id><published>2008-10-14T01:33:00.000-07:00</published><updated>2008-10-14T01:35:19.220-07:00</updated><title type='text'>चना</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;चना&lt;br /&gt;चना मध्‍य प्रदेश की एक महत्‍वपूर्ण दलहनी फसल है। प्रदेश में देशी, काबुली और गुलाबी चना की फसल सफलतापूर्वक ली जाती है। प्रदेश में लगभग 28.50 लाख हेक्‍टेयर में चने की फसल ली जाती है तथा उत्‍पादन लगभग 24.76 लाख टन  है। इस प्रकार मध्‍यप्रदेश पूरे देश में सबसे अधिक चना उत्‍पादन वाला प्रदेश है। प्रदेश की औसत उपज लगभग 900 किलोग्राम प्रति हेक्‍टर है। चना उत्‍पादन की उन्‍नत तकनीक को अपनाना आवश्‍यक है।&lt;br /&gt;भूमि का चुनाव एवं खेत की तैयारी&lt;br /&gt;चना फसल के लिए सबसे उपयुक्‍त मध्‍यम से भारी भूमि होती है। भूमि का पी.एच.मान 5.6 से 8.6 के बीच होता होना चाहिए। हल्‍की भूमि में चना फसल लेने की बाध्‍यता होने पर उसमें गोबर की खाद या हरी खाद का आवश्‍यक रूप से उपयोग करना चाहिए जिससे भूमि की जल धारण क्षमता बढ़ जाए।&lt;br /&gt;जिन खेतों में खरीफ फसल नहीं ली गई हो दो बाद आड़ा एवं खड़ा बखर चलाकर नमी को संरक्षित करें। जहां खरीफ फसल ली गई है वहां फसल की कटाई के तुरंत बाद पहले दिन एक बखर चलाकर दूसरे दिन उसके विपरीत दिशा में दूसरी बार पाटा सहित बखर चलाएं और खेत को बोने के लिए तैयार करें। खरीफ फसलों के अवशेषों को खेत से बाहर निकालें।&lt;br /&gt;उन्‍नत किस्‍में&lt;br /&gt;चने की उन्‍नत किस्‍मों का चुनाव भूमि के प्रकार सिंचाई जल की उपलब्‍धता व पिछले वर्षो में रोगों के प्रकोप की स्थिति आदि को ध्‍यान में रखकर ही करें। विभिन्‍न जातियों का प्रमाणित बीज ही उपयोग करें। चने की संस्‍तुत किस्‍मों का विवरण तालिका में दिया गया है।&lt;br /&gt;बीज की मात्रा एवं बीजोपचार&lt;br /&gt;चने की फसल से अधिक पैदावार लेने के लिए पौधों की संख्‍या तीन से साढ़े तीन लाख / हेक्‍टेयर होनी चाहिए। इसके लिए प्रति वर्गमीटर 30 से 35 पौधे होना चाहिये। सामान्‍य रूप से इस पौध संख्‍या को प्राप्‍त करने के लिए 75 से 100 किलोग्राम बीज / हेक्‍टेयर की आवश्‍यकता किस्‍मों के बीज आकार के अनुसार होती है। कतारों से कतारों की दूरी 30 से.मी. तथा पौधे से पौधे की दूरी 10 से.मी. रखकर वांछित पौध संख्‍या प्राप्‍त की जा सकती है।&lt;br /&gt;बुवाई के पूर्व बीज को फफूंदनाशक दवा से अवश्‍य उपचारित करें। थायरम 2 ग्राम तथा कार्बेन्‍डाजिम 1 ग्राम प्रति किलो ग्राम बीज के हिसाब से उपचारित करें। इसके बाद बीज को राइजोबियम तथा पीएचबी कल्‍चर से 5 ग्राम प्रत्‍येक को प्रति किलो ग्राम बीज के हिसाब से उपचारित करें और उपचारित बीज को छाया में सुखाकर बोआई करें। राइजोबियम कल्‍चर जे.पी.एस 65 का उपयोग लाभप्रद पाया गया है। &lt;br /&gt;बोने का समय&lt;br /&gt;सामान्‍य बोनी का समय 15 अक्‍टूबर से 15 नवम्‍बर तक है। सिंचित खेती के लिए नवंबर अन्‍त तक बोआई कर सकते हैं। देर से बोनी की स्थिति में उपयुक्‍त जाति का चयन करें तथा दिसंबर के प्रथम सप्‍ताह तक बोनी करें।&lt;br /&gt;खाद एवं उर्वरक&lt;br /&gt;मिटटी परीक्षण के अनुसार खाद एवं उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिए। चने की फसल को सामान्‍यत: 15 से 20 किलोग्राम नत्रजन , 45 – 50 किलो ग्राम स्‍फुर 20 किलोग्राम पौटाश की आवश्‍यकता होती है। सिंचिंत फसल में उपरोक्‍त नत्रजन एंव पोटाश के साथ स्‍फुर 60 किलोग्राम प्रति हेक्‍टर दें। देर से बोई गई चने की फसल में नत्रजन 40 किलोग्रमा प्रति हेक्‍टर की दर से दें। जीवाणु खाद राइजोबियम तथा पी.एच.बी. के साथ 2.5 टन प्रति हेक्‍टर कम्‍पोस्‍ट खाद का उपयोग लाभप्रद होता है।&lt;br /&gt;असिंचित खेती में लाभदायक उपाय&lt;br /&gt;चने की असिंचित खेती में नमी की कमी ही मुख्‍य समस्‍या होती है। इससे अंकुरण कम हो सकता है तथा पौधों की बढ़वार और बीज के आकार में कमी होने से उपज कम हो जाती है। इससे बचने के लिए बोआई के पूर्व बखर, पाटा चलाकर नमी संरक्षित करें। वर्षा होने या सिंचाई देने के बाद हेण्‍ड – हो  आवश्‍य चलायें इससे नमी एवं खरपतवार संरक्षण होगा।&lt;br /&gt;सिंचाई&lt;br /&gt;चने की फसल के लिए सामान्‍यरूप से दो सिंचाई की आवश्‍यकता होती है। पहली सिंचाई फूल आने के पहले बुवाई के लगभग 40 – 50 दिन बाद तथा दूसरी सिंचाई घेंटियों में दाना भरते समय बुवाई के 60  - 65 दिन बाद करना चाहिए। यदि एक ही सिंचाई उपलब्‍ध है तो उसे फूल आने के पहले दें। अधिक सिंचाई करने से पौधों की बढ़वार अधिक होती है और उपज में कमी आती है। फब्‍बारा विधि से सिंचाई करें। बहाव विधि से सिंचाई करने पर खेत को छोटी क्‍यारियों में बांट कर सिंचाई करें। इसके लिए बुवाई के तुरन्‍त बाद खेत में नालियां बना देना चाहिए।&lt;br /&gt;अन्‍तर्वर्तीय फसलें&lt;br /&gt;चने में अलसी और गेहूं को अन्‍तर्वर्तीय फसल के रूप में सफलतापूर्वक लिया जा सकता है। चना की चार कतारों के बाद अलसी या गेहूं की दो कतार के हिसाब से बुवाई अधिक लाभप्रद होती है।&lt;br /&gt;खरपतवार नियंत्रण&lt;br /&gt;असिंचित खेती में खरपतवार कम आते है फिर भी बुवाई के लगभग एक माह बाद हेण्‍ड हो चलाएं जिससे खरपतवार नियंत्रतण होगा और नमी भी संरक्षित होगी। सिंचिंत फसल में नींदा नियंत्रण के लिए पेन्डिमिथलीन 1 लीटर प्रति हेक्‍टर 500 – 600 लीटर पानी मिलाकर अंकुरण पूर्व फलैट फेन नोजल से छिड़काव करें।&lt;br /&gt;पौध संरक्षण&lt;br /&gt;(अ)    रोग&lt;br /&gt;(i)                जड़ तथा तने के रोग&lt;br /&gt;(1)     उक्‍ठा रोग – इस रोग से नए पौधे मुरझाकर मर जाते हैं। सामान्‍यत: यह रोग लगभग 30 से 35 दिन की अवस्‍था में आता है। रोगी पौधे के तने के नीचे वाले भाग को चीरकर देखने से आन्‍तरिक तन्‍तुओं में हल्‍का भूरा या काला रंग दिखाई देता है।&lt;br /&gt;(2)     कालर राट रोग – सोयाबीन की फसल लेने के बाद चना फसल लेने पर इसका प्रकोप बढ़ जाता है। रोगी पौधों की पत्तियां पीली पड़ जाती है और पौधे मर जाते हैं। पौधें की स्‍तम्‍भ मूल संधि भाग में सिकुडन प्रारंभ हो जाती है। प्रभावित भाग पर सफेद फफूंद दिखाई पड़ती है। सोयाबीन फसल के अवशेष खेत में होने तथा सिंचाई करने पर इसकी तीव्रता बढ़ जाती है।&lt;br /&gt;(3)     शुष्‍क विगलन रोग- पौधे पीले पड़ कर सूख जाते हैं। मृत जड़ शुष्‍क तथा कड़ी हो जाती है। निचले हिस्‍से को फाड कर देखने से कोयले के कणों के समान स्‍कलेरोशिया दिखाई देते हैं। फली बनने की अवस्‍था में नमी की कमी तथा तापक्रम अधिक होने पर जड़ काली हो जाती है।&lt;br /&gt;नियंत्रण&lt;br /&gt;जड़ तथा तने वाले रोगों की रोकथाम के लिए गर्मी में खेत की गहरी जुताई करें। समय पर बोआई करें, अलसी की अंतवर्तीय फसल लें। फसल अवशेष को खेत से निकाल दें। रोग निरोधक जातियां लगायें। बीज उपचारित कर बुवाई करें।&lt;br /&gt;(ii)             पत्तियों व शाखाओं के रोग&lt;br /&gt; अल्‍टरनेरिया झुलसा रोग&lt;br /&gt;फूल, फल बनते समय इस रोग का प्रकोप अधिक प्रकोप होता है। तने पर भूरे काले धब्‍बे बन जाते हैं। इसकी रोकथाम के लिए रोगी पौधें को उखाड दें तथा फसल को अत्‍यधिक बढ़वार से बचाएं। कम प्रकोप होने पर मेन्‍कोजेब के 0.3 प्रतिशत घोल का फसल पर छिडकाव करें।&lt;br /&gt;(ब) कीट&lt;br /&gt;चने की इल्‍ली का बहुत अधिक प्रकोप होता है। इल्‍ली प्राय: हरे रंग की होती है परन्‍तु पीले, गुलाबी, भूरे व स्‍लेटी रंग की भी पायी जाती है। इल्लियों के बगल में लंबी सफेद पीली पटटी दोनों ओर आवश्‍यक रूप से पाई जाती है।&lt;br /&gt;रासायनिक नियंत्रण&lt;br /&gt;इण्‍डोसल्‍फान 35 ई.सी 1.5 लीटर या प्रोफेनोफॉस 50 ई.सी 1.50 लीटर या क्विनालफॉस 25 ई.सी 1.00 लीटर को 500 - 600 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्‍टर की दर से छिड़काव करें। आवश्‍यकता पड़ने पर 15 दिन बाद पुन: कीटनाशक बदल कर छिड़काव करें। पंप या पानी उपलब्‍ध न हो तो क्विनालफॉस 1.5 प्रतिशत चूर्ण या मिथाइल पैराथियान 2 प्रतिशत चूर्ण या फेनवेलरेट 0.4 प्रतिशत चूर्ण 25 किलो ग्राम प्रति हेक्‍टर यन्‍त्र की सहायता से भुरकाव करें। यदि इल्लियां बड़ी हो गई हो और उपरोक्‍त कीटनाशकों से नियंन्त्रित नहीं हो रही हों तो मिश्रित कीटनाशकों का उपयोग करें जैसे प्रोफेनोफॉस + डेल्‍टामेथ्रिन का 1.50 लीटर या मिथोमिल का 1.00 लीटर प्रति हेक्‍टर छिड़काव करें। प्रभावी नियंत्रण के लिए दवा व पानी की सही मात्रा तथा खेत में एक समान छिड़काव करें। प्रभावी नियंत्रण के लिए दवा व पानी की सही मात्रा तथा खेत में एक समान छिड़काव करें। अंकुरण उपरांत टी (T) आकार की लकड़ी की खूटियां (50 प्रति हेक्‍टर ) खेत में समान रूप से लगायें जिस पर चिडि़यॉ बैठकर इल्‍ली को नियंत्रित रखेगी।&lt;br /&gt;तालिका  - चने की उन्‍नत किस्‍मों का विवरण&lt;br /&gt;क्र    &lt;br /&gt;किस्‍म&lt;br /&gt;अवधि (दिन)&lt;br /&gt;उपज (क्विं / हे.)&lt;br /&gt;विशेषताएं   &lt;br /&gt;(अ) देशी चना&lt;br /&gt;1    &lt;br /&gt;जवाहर चना 74    &lt;br /&gt;110- 120    &lt;br /&gt;15 -16    &lt;br /&gt;उकठा अवरोधी , देर से बोआई के लिए उपयुक्‍त&lt;br /&gt;2    &lt;br /&gt;भारती (आई.सी.सी.व्‍ही 10)  &lt;br /&gt;110 – 120    &lt;br /&gt;13 – 15   &lt;br /&gt;उकठा अवरोधी&lt;br /&gt;3    &lt;br /&gt;जवाहर चना 218    &lt;br /&gt;115 – 120    &lt;br /&gt;15 – 18   &lt;br /&gt;4    &lt;br /&gt;विजय&lt;br /&gt;115 – 120    &lt;br /&gt;13 – 16   &lt;br /&gt;5    &lt;br /&gt;जवाहर चना 322 &lt;br /&gt;115  &lt;br /&gt;15 – 18   &lt;br /&gt;6    &lt;br /&gt;जवाहर 11  &lt;br /&gt;97 5 105    &lt;br /&gt;15 – 18   &lt;br /&gt;बड़ा दाना उकठा निरोधी, तथा स्‍टंट विषाणु अवरोधी&lt;br /&gt;7    &lt;br /&gt;जवाहर चना 130    &lt;br /&gt;110  &lt;br /&gt;18 – 20   &lt;br /&gt;बडा दाना उकठा निरोधी, शुष्‍क मूल विगलन सहनशील सूखा व चने की उल्‍ली के प्रति सहनशील&lt;br /&gt;8    &lt;br /&gt;जवाहर चना 16    &lt;br /&gt;112  &lt;br /&gt;18 – 20   &lt;br /&gt;उकठा निरोधी, स्‍तम्‍भ मूल विगलन, बीजीएम तथा स्‍टंट हेतु मध्‍यम अवरोधी    &lt;br /&gt;9    &lt;br /&gt;जवाहर चना 315    &lt;br /&gt;115  &lt;br /&gt;15 – 18   &lt;br /&gt;उकठा अवरोधी    &lt;br /&gt;10    &lt;br /&gt;जवाहर चना 63    &lt;br /&gt;120 – 125    &lt;br /&gt;18 – 20   &lt;br /&gt;11    &lt;br /&gt;बी.जी.डी. 72&lt;br /&gt;115 – 120    &lt;br /&gt;15 – 18   &lt;br /&gt;12    &lt;br /&gt;जी.सी.पी. 101    &lt;br /&gt;110 – 150    &lt;br /&gt;15 – 18   &lt;br /&gt;(ब) गुलाबी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जवाहर गुलाबी चना  1    &lt;br /&gt;120  -125 &lt;br /&gt;14 – 16   &lt;br /&gt;भूनने के लिए उपयुक्‍त&lt;br /&gt;(स) काबुली&lt;br /&gt;1    &lt;br /&gt;काक- 2   &lt;br /&gt;110   - 150 &lt;br /&gt;15 – 18   &lt;br /&gt;बड़ा दाना 100 दानों का बजन 38 ग्राम उकठा अवरोधी    &lt;br /&gt;2    &lt;br /&gt;जे.जे.के. – 1&lt;br /&gt;110 – 150    &lt;br /&gt;15 – 18   &lt;br /&gt;बड़ा दाना 100 दानों का बजन 36 ग्राम, उकठा अवरोधी&lt;br /&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7319195525113358508-5723735684347209610?l=smalik06.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://smalik06.blogspot.com/feeds/5723735684347209610/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7319195525113358508&amp;postID=5723735684347209610' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7319195525113358508/posts/default/5723735684347209610'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7319195525113358508/posts/default/5723735684347209610'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://smalik06.blogspot.com/2008/10/blog-post_8200.html' title='चना'/><author><name>malik</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09139758814525364467</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Eh8BkyTxt58/SJqthbJOKKI/AAAAAAAAADI/uvkv7Qt-o9A/s1600-R/hllo009%25255B1%25255D.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7319195525113358508.post-2147764077093819575</id><published>2008-10-14T01:30:00.000-07:00</published><updated>2008-10-14T01:32:44.001-07:00</updated><title type='text'>अलसी</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;अलसी&lt;br /&gt;अलसी भारत की बहुमूल्‍य औद्यौगिक तिलहन फसल है। अलसी के प्रत्‍येक भाग का प्रत्‍यक्ष व अप्रत्‍यक्ष रूप से विभिनन रूपों में उपयोग किया जाता है। अलसी के बीज से निकलने वाला तेल प्राय: खाने के रूप में उपयोग किया जाता है। इसके तेल से प्राय: दवाइयॉ बनायी जाती है। इसका तेल पेंटस, वार्नश, व स्‍नेहक बनाने में प्रयुक्‍त होता है। इसके तेल से पैड इंक तथा प्रेस प्रिटिंग हेतु स्‍याही भी तैयार की जाती है। म.प्र. के बुदेलखंड क्षेत्र में इसका तेल खाने में उपयोग किया जाता है। तेल का उपयोग साबुन बनाने तथा दीपक जलाने में किया जाता है। इसका बीज फोड़ो फुन्‍सी में पुल्टिस बनाकर तैयार किया जाता है। अलसी की खली को दूध देने वाले जानवरों के लिये पशु आहार के रूप में उपयोग किया जाता है तथा खली में विभिन्‍न पौध पोषक तत्‍वों की उचित मात्रा होने के कारण इसका उपयोग खाद के रूप में किया जाता है। अलसी के पौधे का काष्‍ठीय भाग तथा छोटे- छोटे रेशों का प्रयोग कागज बनाने हेतु किया जाता है।&lt;br /&gt;हमारे देश में अलसी की खेती लगभग 2 मिलियन हैक्‍टर में होती है जो विश्‍व के कुल क्षेत्रफल का 25 प्रतिशत है। क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत का विश्‍व में प्रथम स्‍थान है, उत्‍पादन में चौथा तथा उपज प्रति हेक्‍टेयर में आठवा स्‍थान है। मध्‍यप्रदेश, उत्‍तर प्रदेश, महाराष्‍ट्र , बिहार, राजस्‍थान व उड़ीसा अलसी के प्रमुख उत्‍पादक राज्‍य है। म.प्र. व उ.प्र दोनो प्रदेशों में देश की अलसी के कुल क्षेत्रफल का लगभग 60 प्रतिशत भाग है। मध्‍यप्रदेश में अलसी का का आच्‍छादित क्षेत्रफल 4.89 लाख हेक्‍टेयर तथा उत्‍पादन 1.49 लाख टन है। प्रदेश में अलसी फसल की उत्‍पादकता 238 किलोग्राम प्रति हेक्‍टेयर है। जबकि राष्‍ट्रीय औसत उपज 353 किग्रा/ है. है। मध्‍य प्रदेश के सागर दमाहेह, टीकमगढ, बालाघाट एवं सिवनी प्रमुख अलसी उत्‍पादक जिले हैं। प्रदेश में अलसी के खेती विभिनन परिस्थितियों में असिंचित (वर्षा आधरित ) कम उपजाऊ भूमियों पर की जाती है। अलसी को शुद्ध फसल मिश्रित फसल, सह फसल पैरा व उतेरा फसल के रूप में उगाया जाता है। प्रदेश में अलसी की उपज (238 किग्रा/ हे.) बहुत कम है। देश में हुये अनुसंधान कार्य यह दर्शाते हैं कि अलसी की खेती उचित प्रबंधन के साथ की उपज तो उपज में लगलग 2 से 2.5 गुनी वृद्धि की संभावना है। कम उपज प्राप्‍त होने के प्रमुख कारण इस प्रकार है-&lt;br /&gt;अलसी के कम उपज के कारण –&lt;br /&gt;1 . कम उपजाऊ भूमि पर खेती करना&lt;br /&gt;2 . असिंचित अवस्‍था अथवा वर्षा आधरित क्षेत्रों में खेती करना&lt;br /&gt;3 . उतेरा पद्धति से खेती करना&lt;br /&gt;4 . कम उत्‍पादन स्‍थानीय किस्‍मों का प्रचलन&lt;br /&gt;5 . क्षेत्र विशेष के लिये उच्‍च उत्‍पादन देने वाली किस्‍मों का अभाव&lt;br /&gt;6. पर्याप्‍त मात्रा में उन्‍नतशील बीज का अभाव&lt;br /&gt;7 . असंतुलित एवं कम मात्रा में उर्वरक उपयोग&lt;br /&gt;8 . समय पर पौध संरक्षण के उपाय न अपनाना&lt;br /&gt;जलवायु&lt;br /&gt;अलसी की फसल को ठंडे व शुष्‍क जलवायु की आवश्‍यकता पड़ती है। अत: अलसी भारत वर्ष में अधिकतर जहां 45 -75 से.मी. वर्षा प्राप्‍त होती है वहां इसकी खेती सफलता पूर्वक की जा सकती है। अलसी के उचित अंकुरण हेतु 25 -30 डिग्री से.ग्रे. तापमान तथा बीज बनते समय 15-20 डिग्री से.ग्रे.तापमान होना चाहिए। रेशा प्राप्‍त करने वाली फसल को ठंडे एवं नीमयुक्‍त मौसम की आवश्‍यकता होती है। अलसी के वृद्धि काल में भारी वर्षा व बादल छाये रहना बहुत हानिकारक होता है। परिपक्‍वन अवस्‍था पर उच्‍च तापमान, कम नमी तथा शुष्‍क वातावरण की आवश्‍कता होती है।&lt;br /&gt;भूमि का चुनाव&lt;br /&gt;अलसी की फसल के लिये काली भारी एवं दोमट (,मटियार) भूमि अधिक उपयुक्‍त होती है। अधिक उपजाऊ मृदाओं की अपेक्षा मध्‍यम उपजाऊ मृदाओं अच्‍छी समझी जाती हैं। भूमि में उचित जल निकास का प्रबंध होना चाहिए। आधुनिक संकल्‍पना के अनुसार उचित जल एवं उर्वरक व्‍यवस्‍था करने पर किसी प्रकार की मिटटी में अलसी की खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है।&lt;br /&gt;खेत की तैयारी&lt;br /&gt;अलसी का अच्‍छा अंकुरण प्राप्‍त करने के लिये खेत को भुरभुरा एवं खरपतवार रहित होना चाहिये। अत: खेत को 2-3 बार हैरो चलाकर तैयार करना चाहिये। प्रत्‍येक जुताई के बाद पाटा लगाना आवश्‍यक हैं। जिससे नमी संरक्षित रह सके। अलसी का दाना छोटा एवं महीन होता है अत: अच्‍छे अंकुरण हेतु खेत का भुरभुरा होना अति आवश्‍यक है।&lt;br /&gt;फसल पद्धति&lt;br /&gt;प्रदेश में अलसी की खेती वर्षा आधरित खेत्रों में खरीफ पडत के बाद रबी में शुद्ध फसल के रूप में की जाती है। टीकमगढ़ केन्‍द्र में हुये अनुसंधान परिणाम यह प्रदर्शित करते हैं कि उचित फसल प्रबन्‍धन से खरीफ की विभिनन फसलों लेने के बाद अलसी की फसल ली जा सकती है। सोयाबीन अलसी व उर्द – अलसी आदि फसल चक्रों से अधिक लाभ लिया जा सकता है।&lt;br /&gt;मिश्रित खेती&lt;br /&gt;प्रारंभिक रूप से अलसी की खेती वर्षा आधरित क्षेत्र में एकल फसल के रूप में की जाती है। टीकमगढ़ में हुए परीक्षण से यह ज्ञात हुआ है कि अलसी की चना + अलसी (3:1) सह फसल के रूप में ली जा सकती है। अलसी की सह फसली खेती मसूर व सरसों के साथ भी की जा सकती है।&lt;br /&gt;तालिका -  अलसी के विभिन्‍न चक्रों का उपज पर प्रभाव&lt;br /&gt;फसल चक्र &lt;br /&gt;उपज (क्विं / हे)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शुद्ध लाभ  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खरीफ&lt;br /&gt;अलसी&lt;br /&gt;(रू.हे.)&lt;br /&gt;पड़त – अलसी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;17.4 &lt;br /&gt;13.825    &lt;br /&gt;उर्द – अलसी&lt;br /&gt;8.10 &lt;br /&gt;19.15&lt;br /&gt;21,347    &lt;br /&gt;सोयाबीन –अलसी&lt;br /&gt;16.20&lt;br /&gt;17.90&lt;br /&gt;23,615&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उतेरा खेती&lt;br /&gt;अलसी की उतेरा पद्धति धान उगाये जाने वाले क्षेत्रों में प्रचलित है, जहां अधिक नमी के कारण भूपरिष्‍करण में परेशानी आती है। अत: नमी का सदुपयोग करने हेतु धान के खेती में अलसी बोई जाती है। इस पद्धित में धान की खड़ी फसल में (फूल अवस्‍था) के बाद अलसी के बीज को छिटक दिया जाता है। फलस्‍वरूप धान की कटाई पूर्व अलसी का अंकुरण हो जाता है। संचित नमी से ही अलसी की फसल पककर तैयार की जाती है। अलसी इस विधि को पैरा / उतेरा पद्धित कहते हैं।&lt;br /&gt;उपयुक्‍त उन्‍नतशील किस्‍में&lt;br /&gt;जे.एल. टी. -26&lt;br /&gt;यह नीले फूल वाली नई किस्‍म है। यह किस्‍म टीकमगढ़ केन्‍द्र से विकसित की गई है। यह सिंचित एवं असिंचित दोनो अवस्‍थाओं हेतु उपयुक्‍त जाति है। यह किस्‍म 118 दिनों में पककर तैयार हो जाती है। इसमें तेल की मात्रा 40.99 प्रतिशत है। इसके 1000 दानों का बजन 6.8 ग्राम होता है। अलसी की मक्‍खी का प्रकोप कम होता है। पाउडरी मिल्‍डयू गेरूआ एवं उकटा रोगों के लिये प्रतिरोधी क्षमता रखती है। इसकी असिंचित अवस्‍था में 819 किलो ग्राम / हे एवं सिंचित अवस्‍था में 1300 – 1400 किलो ग्राम / हे. उपज प्राप्‍त होती है।&lt;br /&gt;किरन (आर.एल.सी.- 6)&lt;br /&gt;यह अधिक पैदावार देने वाली किस्‍म है। यह दहिया, गेरूआ एवं उकठा रोगों के लिये प्रतिरोधक है। फली की मक्‍खी (लोंगियाना) के लिए सहनशील है। पकने के लिए 120 दिन लेती है। पैदावार 1200 – 1300 किलो ग्राम प्रति हेक्‍टेयर है। इसकी बोनी देरी से भी की जा सकती है। विभिन्‍न फसल चक्रों के लिये उपयुक्‍त है।&lt;br /&gt;जवाहर 23&lt;br /&gt;फूल सफेद होते हैं। इसका पौधा सीधा होता है। पकने की अवधि 120 -125 दिन है। तेल की मात्रा 43 प्रतिशत है। यह किस्‍म दहिया गेरूआ एवं उकठा रोगों के लिये प्रतिरोधी है किन्‍तु फली को मक्‍खी एवं अल्‍टरनोरिया वड ब्‍लाइट के लिए ग्राही है। इसकी पैदावार 1100- 1200 किलो प्रति हेक्‍टर है। यह देर से बोने के लिये उपयुक्‍त नहीं है।&lt;br /&gt;जवाहर 552 (आर. 552 )&lt;br /&gt;यह किस्‍म  110 – 120 दिन में पकती है। इसका तना पतला एवं फूल नीला होता है। यह किस्‍म दहियाए गेरूआ एवं उकठा रोग के लिए प्रतिरोधी क्षमता रखती है। अल्‍टरनेरिया ब्‍लाइट पत्तियों पर असर अधिक करता है। फली मक्‍खी के लिए सहनशील है। इसकी पैदावार 1000- 1100 किलो ग्राम प्रति हेक्‍टर है।&lt;br /&gt;जे.एल.एस. – 9&lt;br /&gt;यह किस्‍म में सागर म.प्र. से विकसित हुई है। दाना चमकीला होता है। यह शुष्‍क परिस्थिति के लिए अति उपयुक्‍त पाई है। शुष्‍क परिस्‍थति में इससे 900-1000 किलो ग्राम प्रति हेक्‍टेयर उपज प्राप्‍त की जा सकती है। पकने की अवधि 120 दिन है।&lt;br /&gt;जवाहर – 17&lt;br /&gt;यह किस्‍म असिंचित एवं उतेरा पद्धति के लिये उपयुक्‍त पाई गई है। फूल का रंग नीला होता है। 115 दिन में पककर तैयार होती है। पौधों की ऊचाई 50 से.मी. होती है। इसकी उत्‍पादन क्षमता 1200- 1500 किलो ग्राम / हे. है।&lt;br /&gt;तालिका  - अलसी की उन्‍नतशील किस्‍मों का टीकमगढ़ जिले के प्रक्षेत्रों पर प्रभाव&lt;br /&gt;किस्‍मे&lt;br /&gt;उन्‍नत किस्‍म की उपज (क्वि. / हे)&lt;br /&gt;    &lt;br /&gt;स्‍थानीय किस्‍म की उपज (क्विं./ हे.)&lt;br /&gt;उपज में बढ़ोत्‍तरी %&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अधिकतम&lt;br /&gt;औसत&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जे एल – 23&lt;br /&gt;13.95&lt;br /&gt;11.50&lt;br /&gt;3.50&lt;br /&gt;230 &lt;br /&gt;आरएलसी – 6    &lt;br /&gt;15.26&lt;br /&gt;12.55&lt;br /&gt;7.90&lt;br /&gt;221 &lt;br /&gt;जेएलटी – 26    &lt;br /&gt;15.60&lt;br /&gt;15.05&lt;br /&gt;5.75&lt;br /&gt;161  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीज की मात्रा एवं बोनी की विधि&lt;br /&gt;30 किलो ग्राम बीज हेक्‍टर उपयोग करना चाहिए। बोनी कतारों में करना चाहिये। कतारों से कतारों की दूरी 25 सेमी एवं पौधों से पौधों की दूरी 5-7 से.मी रखें। बीज की गहराई 2 से;मी रखे। देशी हल में नारी या चौंगा लगाकर अथवा सीडड्रिल से बोनी करें।&lt;br /&gt;बोनी का समय&lt;br /&gt;इसकी बोनी  15 अक्‍टूबर से 30 अक्‍टूबर तक करना चाहिये सिंचित अवस्‍था में देरी से बोनी के लिए उपयुक्‍त किस्‍मों को 15 नवम्‍बर तक बोया जा सकता है। जल्‍दी बोनी करने पर अलसी की फसल को कली की मक्‍खी एवं पाउडरी मिल्‍डयू रोग आदि से बचाया जा सकता है।&lt;br /&gt;बीजोपचार&lt;br /&gt;एक ग्राम कार्बेन्‍डाजिम या टापसिन एवं अथवा थीरम 2.5 ग्राम दवा प्रति किलो ग्राम बीज के हिसाब से बुवाई पूर्व बीजोपचार अवश्‍य करें।&lt;br /&gt;उर्वरक प्रबन्‍धन&lt;br /&gt;जीवांश खाद&lt;br /&gt;अलसी की फसल को गोबर की खाद उपलब्‍ध होने पर 4 -5 टन / हे दें। अच्‍छी तरह से पचे हुये गोबर की खाद की मात्रा को अंतिम जुताई के समय खेत में अच्‍छी तरह से मिला देना चाहिए।&lt;br /&gt;रासायनिक अवस्‍था&lt;br /&gt;विभिन्‍न परिस्थितियों में रासायनिक उर्वकर की अलग – अलग प्रस्‍तावित मात्रा का प्रयोग करना चाहिये&lt;br /&gt;असिंचित अवस्‍था&lt;br /&gt;अलसी  को असिंचित अवस्‍था में नत्रजन स्‍फुर तथा पोटाश की क्रमश: 40:20:20 किग्रा/ हे. देना चाहिए। नत्रजन की आधी मात्रा स्‍फुर व पोटाश की पूरी मात्रा बोने के पहले तथा बची हुई नत्रजन की मात्रा प्रथम सिंचाई के तुरंत बाद खड़ी फसल में&lt;br /&gt;गंधक&lt;br /&gt;अलसी एक तिलहन फसल है और तिलहन फसलों से अधिकतम उत्‍पादन लेने हेतु गंधक प्रदान करना भी अनुसंशित किया गया है। अत: अलसी का उच्‍च उत्‍पादन प्राप्‍त करने हेतु 25 किग्रा/ हे. गंधक भी देना चाहिये। गंधक की पूरी मात्रा बीज बोने के पहले देना चाहिए।&lt;br /&gt;जैव उर्वरक&lt;br /&gt;आधुनिक कृषि में जैव उर्वरकों का प्रचलन बढ. रहा है। अलसी में एलोटोबेक्‍अर / एजोस्‍प्ररीलम और स्‍फुर घोलक जीवाणु आदि जैव उर्वरक उपयोग किये जा सकते हैं। उक्‍त जैव उर्वरक बीज उपचार द्वारा 10 ग्राम जैव उर्वरक प्रति किलो ग्राम बीज के हिसाब से दिये जा सकते है। मृदा उपचार द्वारा भी इनका उपयोग किया जा सकता है। इस हेतु 2 किलो ग्राम पी.एस.बी. जैव उर्वरकों की मात्रा को 50 किग्रा. सड़ी गोबर की खाद के साथ मिलाकर अंतिम जुताई के पहले नमी युक्‍त खेत में बराबर बिखेर देना चाहिए।&lt;br /&gt;सिंचाई प्रबंधन&lt;br /&gt;असिंचित अवस्‍था की तुलना में 1 सा 2 सिंचाई देने पर उपज 2 से 2.5 गुनी बढ़ाई जा सकती है। सिंचाई उपलब्‍ध होने पर प्रथत सिंचाई बोने का 35-40 दिन बाद तथा 60 – 65 दिन बाद दूसरी सिचाई करना चाहिये। टीकमगढ़ में किये गये परीक्षण से यह सिद्ध होता है कि अलसी को दो सिंचाई शाखा अवस्‍था एवं फली बनने की अवस्‍था पर देने पर सार्वजनिक उपज प्राप्‍त होती है।&lt;br /&gt;खरपतवार प्रबंधन&lt;br /&gt;अलसी बुवाई के 25 दिन तक खेत को खरपतवारो से रहित रखना चाहिये। फसल को खरपतवार रहित रखने हेतु बोने के 20 दिन बाद पहली निंदाई हाथ अथवा खुरपी द्वारा करनी चाहिये। रासायनिक खरपतवार नियंत्रण हेतु पेन्‍डामिथलीन की 1 किग्रा अथवा आइसोप्रोटोरोन की 0.75 कि.ग्रा / हे. मात्रा 500 ली. पानी में घोल कर अंकुरण के पूर्व खेत में छिड़काव करना चाहिये।&lt;br /&gt;पौध संरक्षण&lt;br /&gt;(अ)    रोग&lt;br /&gt;गेरूआ रोग&lt;br /&gt;पत्तियों के शीर्ष तथा निचली सतहों पर एवं तना शाखाओं पर गोल , लम्‍बवत नारंगी भूरे रंग के धब्‍बे दिखाई देते हैं। रोग से बचने के लिये सल्‍फेक्‍स 0.05 प्रतिशत या कैलेकिसन 0.05 प्रतिशत या डायथेन एम-45 का 0.25 प्रतिशत घोल खड़ी फसल पर छिड़काव दो बार 15 दिन के अंतराल से करें। निरोधक जातियां – आर 552, किरण आदि बुवाई हेतु उपयोग में लायें।&lt;br /&gt;उकठा रोग&lt;br /&gt;उकठा रोग काफी हानिकारक रोग है, जो मिटटी जनित अर्थात खेत की मिटटी में रोग ग्रस्‍त पौधों के ठूठ से फैलता है। इस रोग का प्रकोप फसल के अंकुरण से लेकर पकने की अवस्‍था तक कभी भी हो सकता है। पौधा रोग ग्रस्‍त होने पर पत्तियों के किनारे अंदर की ओर मुंडकर मुरझा जाता है। उकठा रोग नियंत्रण के लिये 2 या 3 वर्ष का फसल चक्र अपनाये अर्थात उकटा ग्रस्ति खेत में लगातार 2 -3 वर्षो तक अलसी की फसल न लगाये। थीरम या टापसिन फफूंदनाशक दवा से 2.5 ग्राम प्रति किलो ग्राम बीज की दर से उपचारित करें।&lt;br /&gt;बुकनी रोग या भभूतियां सफेद चूर्ण&lt;br /&gt;इस रोग के कारण पत्तियों पर सफेद चूर्ण जम जाता है। रोग की तीव्रता अधिक हो जाने पर दाने सिकुड जाते है, उनका आकार छोटा हो जाता है। देर से बुवाई करने पर एवं शीतकालीन वर्षा होने पर अधिक समय तक आर्द्रता बनी रहने पर इस रोग का प्रकोप बढ़ जाता है। नियंत्रण के लिये रोग की गंभीरता को देखते हुए 0.3 घुलनशील गंधक (सल्‍फेक्‍स) या केराथेन (0.2 प्रतिशत) का छिड़काव 15 दिनों के अंतराल से करें। फसल की बुवाई जल्‍दी करे। रोग निरोधक किस्‍में जैसे जवाहर-23, आर – 552 एवं किरण का उपयोग करे।&lt;br /&gt;अल्‍अरनेरिया अंगमारी या अल्‍रनेरिया ब्‍लाइट रोग&lt;br /&gt;जमीन के ऊपर अलसी पौधे के सभी अंग इस रोग से प्रभावित होते है। परन्‍तु विशेष रूप से फूलों के अंगो के रोग ग्रसित होने पर नुकसान सबसे अधिक होता है। फूलों की पंखुडियों (ब्राह दल पुंज) के नीचले हिस्‍से में गहरे भूरे रंग के लम्‍बवत धब्‍बे दिखाई देते हैं जो आकार में बढ़ने के साथ फूल के अन्‍दर तक पहुंच जाते है, जिसके कारण फूल खिलने के पूर्व ही मुरझाकर सूख जाते हैं। तथा दाने नहीं बनते। रोग से बचाव के लिये बीजों को थीरम या कार्बन्‍डाजिम दवा 2.5 ग्राम प्रति किलो ग्राम बीज की दर से उपचारित कर बोये। रोग की गंभीरता को देखते हुये रोबराल (0.2 प्रतिशत) या डाइथेन एम 45 (0.25 प्रतिशत) का छिड़काव 15 दिन के अंतराल से करें।&lt;br /&gt;कीट नियंत्रण&lt;br /&gt;अलसी की फसल पर विभिन्‍न अवस्‍थाओं पर कली मक्‍खी, अलसी की इल्‍ली, अर्धकुण्‍डलक इल्‍ली तथा चने की इल्‍ली का विशेष प्रकोप होता है।&lt;br /&gt;कली मक्‍खी (बडलाई)&lt;br /&gt;पहचान –&lt;br /&gt;प्रौढ़ मक्‍खी आकार में छोटी तथा नारंगी रंग की होती है। इसके पंख पारदर्शी होते है। इल्‍ली गुलाबी रंग की होती है।&lt;br /&gt;नुकसान का प्रकार -&lt;br /&gt;इल्लियां कलियों , फूलों विशेषकर अण्‍डाशयों को खाती है जिससे कैप्‍सूल नहीं बनते हैं एवं बीज भी नहीं बनते। सामान्‍य बोनी में 60-70 प्रतिशत तथा देर से बोने पर 82 से 88 प्रतिशत कलियॉं इस रोग के द्वारा ग्रसित देखी गई है। मादा मक्‍खी 1 से 10 तक अण्‍डे पंखुडी के निचले हिस्‍से में रखती है जिसमें इल्‍ली निकलकर कली के अंदर जनन अंगों विशेष रूप से अण्‍डाशयों को खाती है जिससे कली पुष्‍प के रूप में विकसित नहीं होती तथा कैप्‍सूल एवं बीजों का निर्माण ही नही होता है।&lt;br /&gt;नियंत्रण&lt;br /&gt;1 . बोनी अक्‍टूबर मध्‍य के पूर्व करने से कीट से साधारणत: नुकसान नहीं होता है।&lt;br /&gt;2 . निरोधक किस्‍में जैसे आर 552, जवाहर 23 लगाना चाहिये।&lt;br /&gt;3 . प्रकाश प्रपंच का उपयोग करें। कीट रात्रि में प्रकाश की ओर आकर्षित होते हैं। रोज सुबह इनको इकटटा कर नष्‍ट करें।&lt;br /&gt;4 . इस कीट की इल्लियों को एक मित्र कीट ( सस्‍टसिस हेंसिन्‍यूरी) 50 प्रतिशत परजवी युक्‍त कर मार देता है। इसके अतिरिक्‍त इलासमय यूरोटोमा, टीरीमस टेट्रास्टिक्‍स आदि कीट प्राक़ृतिक रूप से इस कीट के मेगट पर अपना निर्वाह करते हुये कली मक्‍खी की इल्लियों को बढ़ने से रोकते हैं।&lt;br /&gt;5 . एक किलो ग्राम गुड को 75 लीटर पानी में घोलकर मटटी के बर्तनों की सहायता से कई स्‍थानों पर रखें। इस कीट के प्रौढ गुड के घोल की ओर आकर्षित होते हैं।&lt;br /&gt;6 . कीट की संख्‍या अधिक होने पर फास्‍फोमिडान 85 एस.एव 300 मि.ली. पानी में अथवा इण्‍डोसल्‍फान 35 ई.सी 1500 मि.ली. / हे. का प्रथम छिड़काव इल्लियों के प्रकोप प्रारंभ होने पर दूसरा 15 दिन बाद करें। आवश्‍यकता पड़ने पर तीसरा छिड़काव 15 दिन बाद पुन: करें।&lt;br /&gt;अलसी की इल्‍ली&lt;br /&gt;पहचान –&lt;br /&gt;प्रौढ़ कीट मध्‍यम आकार का गहरे भूरे रंग का या घूसर रंग का होता है। अगले पंख गहरे घूसर रंग के पीले धब्‍बों से युक्‍त होते है तथा पिछले पंख सफेद चमकीले अर्ध पारदर्शक होकर बाहरी सतह घूसर रंग की होती है। इल्लियां लम्‍बी भूरे रंग की होती है।&lt;br /&gt;नुकसान का प्रकार&lt;br /&gt;ये कीट अधिकतर पत्तियों की बाहर की सतह को खाती है। इस कीट की इल्लियां तने के ऊपर भाग में पत्तियों को चिपका कर खाती रहती है। इस कारण कीट से ग्रसित पौधों की बाढ़ रूक जाती है।&lt;br /&gt;नियंत्रण&lt;br /&gt;इस कीट की 92 प्रतिशत इल्लियां मरर्तिर इंडिका नामक मित्र कीट के परजीवी युक्‍त होती है तथा ये बाद में मर जाती है।&lt;br /&gt;अर्ध कुण्‍डलक इल्‍ली&lt;br /&gt;पहचान – इस कीट के प्रौढ शलभ (पतंगा) के अगले पंखों पर सुलहरे धब्‍बे रहते हैं।  इल्लियां हरे रंग की होती है।&lt;br /&gt;नुकसान का प्रकार&lt;br /&gt;इल्लियां पत्तियों को खाती हैं बाद में फल्लियों को भी इस कीट की इल्लियां नुकसान पहुंचाती है।&lt;br /&gt;चने की इल्‍ली&lt;br /&gt;पहचान – इस कीट के प्रौढ़ भूरे रंग के होते है तथा अगले पंखों में सेंम के बीज के समान काला धब्‍बा रहता है। इल्लियों के रंग में विविधता पाई जाती है। जैसे पीले हरें, गुलाबी, नारंगी, भूरे या काली आदि शरीर के किनारों पर इल्लियों में हल्‍की एवं गहरी धारियां होती हैं।&lt;br /&gt;नुकसान के प्रकार&lt;br /&gt;छोटी इल्लियां पौधे के हरे पदार्थो को खुरचकर खाती है। बड़ी इल्लियां कलियों, फूलों एवं फलियों को नुकसान पहुंचाती है। इल्लियां फल्लियों में छेदकर अपना सिर अंदर घुसाकर दानों को खाती है। एक इल्‍ली अपने जीवन काल में 30 - 40 फल्लियों को नुकसान पहुंचाती है।&lt;br /&gt;निंयत्रण&lt;br /&gt;1 . फेरोमेन प्रपंचों का उपयोग करें। एक हेक्‍टेयर के लिये 5 प्रपंचों की आवश्‍यकता होती है।&lt;br /&gt;2 . खेत में प्रकाश प्रपंच का उपयोग करें। प्रपंच से एकत्र हुये कीड़ों को नष्‍ट करें।&lt;br /&gt;3 . क्‍लोरपायरीफास 20 ई.सी. की 750 से 1000 मि.ली. मात्रा प्रति हे. के हिसाब से छिड़काव करें।&lt;br /&gt;4 . न्‍यूक्लियर पाली हेड्रोसिस विषाणु 250 एल ई का छिड़काव करें।&lt;br /&gt;5 . कीट संख्‍या अधिक होने पर मोनोक्रोटोफास 36 ई.सी 750 मि.ली अथवा इण्‍डोसल्‍फान 35 ईसी 1000 मि.ली का छिड़काव करें या कार्बोरिल 50 प्रतिशत पाउडर का 20 किलो ग्राम प्रति हेक्‍टेयर के हिसाब से छिड़काव करें।&lt;br /&gt;  &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7319195525113358508-2147764077093819575?l=smalik06.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://smalik06.blogspot.com/feeds/2147764077093819575/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7319195525113358508&amp;postID=2147764077093819575' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7319195525113358508/posts/default/2147764077093819575'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7319195525113358508/posts/default/2147764077093819575'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://smalik06.blogspot.com/2008/10/blog-post_3010.html' title='अलसी'/><author><name>malik</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09139758814525364467</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Eh8BkyTxt58/SJqthbJOKKI/AAAAAAAAADI/uvkv7Qt-o9A/s1600-R/hllo009%25255B1%25255D.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7319195525113358508.post-2776224535602657865</id><published>2008-10-14T01:28:00.000-07:00</published><updated>2008-10-14T01:29:44.986-07:00</updated><title type='text'>सोयाबीन</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;सोयाबीन&lt;br /&gt;भूमि का चुनाव एवं तैयारी&lt;br /&gt;सोयाबीन की खेती अधिक हल्‍कीरेतीली व हल्‍की भूमि को छोड्कर सभी प्रकार की भूमि में सफलतापूर्वक की जा सकती है परन्‍तु पानी के निकास वाली चिकनी दोमट भूमि सोयाबीन के लिए अधिक उपयुक्‍त होती है। जहां भी खेत में पानी रूकता हो वहां सोयाबीन न लें।&lt;br /&gt;ग्रीष्‍म कालीन जुताई 3 वर्ष में कम से कम एक बार अवश्‍य करनी चाहिए। वर्षा प्रारम्‍भ होने पर 2 या 3 बार बखर तथा पाटा चलाकर खेत को तैयार कर लेना चाहिए। इससे हानि पहॅचाने वाले कीटों की सभी अवस्‍थाएं नष्‍ट होगीं। ढेला रहित और भूरभुरी मिटटी वाले खेत सोयाबीन के लिए उत्‍तम होते होते हैं। खेत में पानी भरने से सोयाबीन की फसल पर प्रि‍तकूल प्रभाव पड्ता है अत:  अि‍धक उत्‍पादन के ि‍लए खेत में जल ि‍नकास की व्‍यवस्‍था करना आवश्‍यक होता है। जहां तक संभव हो आखरी बखरनी एवं पाटा समय से करें ि‍जससे अंकुि‍रत खरपतवार नष्‍ट हो सके। यथा संभव मेंड् और कूड् रिज एवं फरो बनाकर सोयाबीन बोय।&lt;br /&gt;बीज दर&lt;br /&gt;1.                            छोटे दाने वाली किस्‍में – 70 किलो ग्राम प्रति हेक्‍टर&lt;br /&gt;1.2 मध्‍यम दोन वाली किस्‍में – 80 किलो ग्राम प्रति हेक्‍टर&lt;br /&gt;1.3 बडे़ दाने वाली किस्‍में – 100 किलो ग्राम प्रति हेक्‍टर&lt;br /&gt;1.बोने का समय - &lt;br /&gt;जून के अन्तिम सप्‍ताह में जुलाई के प्रथम सप्‍ताह तक का सयम सबसे उपयुक्‍त है बोने के समय अच्‍छे अंकुरण हेतु भूमि में 10 सेमी गहराई तक उपयुक्‍त नमी होना चाहिए। जुलाई के प्रथम सप्‍ताह के पश्‍चात बोनी की बीज दर 5- 10 प्रतिशत बढ़ा देनी चाहिए।&lt;br /&gt;पौध संख्‍या&lt;br /&gt;4 – 5 लाख पौधे प्रति हेक्‍टर ‘’ 40 से 60 प्रति वर्ग मीटर ‘’ पौध संख्‍या उपयुक्‍त है। जे.एस. 75 – 46 जे. एस. 93 – 05 किस्‍मों में पौधों की संख्‍या 6 लाख प्रति हेक्‍टेयर उपयुक्‍त है। असीमित बढ़ने वाली किस्‍मों के लिए 4 लाख एवं सीमित वृद्धि वाली किस्‍मों के लिए 6 लाख पौधे प्रति हेक्‍टेयर होना चाहिए।&lt;br /&gt;बोने की विधि&lt;br /&gt;सोयाबीन की बोनी कतारों में करना चाहिए। कतारों की दूरी 30 सेमी. ‘’ बोनी किस्‍मों के लिए ‘’ तथा 45 सेमी. बड़ी किस्‍मों के लिए उपयुक्‍त है। 20 कतारों के बाद कूड़ जल निथार तथा नमी संरक्षण के लिए खाली छोड़ देना चाहिए। बीज 2.5 से 3 सेमी. गहराई त‍क बोयें। बीज एवं खाद को अलग अलग बोना चाहिए जिससे अंकुरण क्षमता प्रभावित न हो।&lt;br /&gt;बीजोपचार&lt;br /&gt;सोयाबीन के अंकुरण को बीज तथा मृदा जनित रोग प्रभावित करते है। इसकी रोकथाम हेतु बीज को थीरम या केप्‍टान 2 ग्राम कार्बेन्‍डाजिम या थायोफेनेट मिथीईल 1 ग्राम मिश्रण प्रति किलो ग्राम बीज की दर से उपचारित करना चाहिए अथवा ट्राइकोडरमा 4 ग्राम एवं कार्बेन्‍डाजिम 2 ग्राम प्रति किलो ग्राम बीज से उपचारित करके बोयें।&lt;br /&gt;कल्‍चर का उपयोग&lt;br /&gt;फफूँदनाशक दवाओं से बीजोपचार के पश्‍चात बीज को 5 ग्राम राइजोबियम एवं 5 ग्राम पी.एस.बी.कल्‍चर प्रति किलो ग्राम बीज की दर से उपचारित करें। उपचारित बीज को छाया में रखना चाहिए एवं शीघ्र बोनी करना चाहिए। ध्‍यान रहें कि फफूँदनाशक दवा एवं कल्‍चर को एक साथ न मिलाऐं।&lt;br /&gt;सोयाबीन की उन्‍नत किस्‍में&lt;br /&gt;क्र   &lt;br /&gt;नाम किस्‍म&lt;br /&gt;अवधि दिन &lt;br /&gt;उपज प्रति हे. ‘’ क्विंटल’’    &lt;br /&gt;उपयुक्‍त भूमि &lt;br /&gt;फूल का रंग   &lt;br /&gt;दानों का रंग  &lt;br /&gt;दानों का आकार    &lt;br /&gt;पौधें की ऊचाई सेमी.&lt;br /&gt;1    &lt;br /&gt;पंजाब-1         &lt;br /&gt;90-95&lt;br /&gt;20-22    &lt;br /&gt;वर्षा निर्भर हल्‍की उथली&lt;br /&gt;बैंगनी&lt;br /&gt;पीला&lt;br /&gt;छोटा&lt;br /&gt;40&lt;br /&gt;2   &lt;br /&gt;जे.एस.335 &lt;br /&gt;95-95    &lt;br /&gt;25-30    &lt;br /&gt;तदैव &lt;br /&gt;बैगनी   &lt;br /&gt;पीला&lt;br /&gt;मध्‍यम     &lt;br /&gt;46  &lt;br /&gt;3&lt;br /&gt;जे.एस.90-40&lt;br /&gt;90-95    &lt;br /&gt;25-30    &lt;br /&gt;छोटा &lt;br /&gt;45  &lt;br /&gt;4&lt;br /&gt;जे.एस.71-05&lt;br /&gt;95-95    &lt;br /&gt;20-24    &lt;br /&gt;मध्‍यम&lt;br /&gt;30-40    &lt;br /&gt;5&lt;br /&gt;जे.एस.93-05&lt;br /&gt;90-95    &lt;br /&gt;20-24    &lt;br /&gt;30-40    &lt;br /&gt;6&lt;br /&gt;एम.ए.यू.एस 47       &lt;br /&gt;90-95    &lt;br /&gt;20-25    &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;7&lt;br /&gt;एम.ए.सी.एस 13  &lt;br /&gt;90-100 &lt;br /&gt;25-30    &lt;br /&gt;मध्‍यम मिरूम बैंगनी&lt;br /&gt;बैंगनी   &lt;br /&gt;दूधिया&lt;br /&gt;65  &lt;br /&gt;8&lt;br /&gt;पी.के. 472 &lt;br /&gt;98  &lt;br /&gt;25  &lt;br /&gt;तदैव &lt;br /&gt;सफेद   &lt;br /&gt;पीला &lt;br /&gt;35-45    &lt;br /&gt;9&lt;br /&gt;एम.एस.सी.एस 68  &lt;br /&gt;90-100 &lt;br /&gt;20-25    &lt;br /&gt;तदैव &lt;br /&gt;बैंगनी   &lt;br /&gt;दूधिया&lt;br /&gt;40  &lt;br /&gt;10&lt;br /&gt;पूसा-16    &lt;br /&gt;105-115  &lt;br /&gt;30-35    &lt;br /&gt;तदैव &lt;br /&gt;बैंगनी   &lt;br /&gt;पीला &lt;br /&gt;60-90    &lt;br /&gt;11   &lt;br /&gt;जे.एस.80-21&lt;br /&gt;95-109 &lt;br /&gt;24  &lt;br /&gt;कम जल निकास वाली गहरी काली&lt;br /&gt;बैंगनी   &lt;br /&gt;पीला &lt;br /&gt;मध्‍यम&lt;br /&gt;65  &lt;br /&gt;12   &lt;br /&gt;जे.एस.75-46&lt;br /&gt;90-100 &lt;br /&gt;24  &lt;br /&gt;तदैव &lt;br /&gt;बैंगनी   &lt;br /&gt;पीला &lt;br /&gt;मध्‍यम&lt;br /&gt;60  &lt;br /&gt;13   &lt;br /&gt;दुर्गा &lt;br /&gt;102-105 &lt;br /&gt;17  &lt;br /&gt;बैंगनी   &lt;br /&gt;मध्‍यम&lt;br /&gt;50  &lt;br /&gt;14   &lt;br /&gt;जे.एस.72-44&lt;br /&gt;110  &lt;br /&gt;25-30    &lt;br /&gt;छोटा &lt;br /&gt;50  &lt;br /&gt;15   &lt;br /&gt;जे.एस.76-205 &lt;br /&gt;104 &lt;br /&gt;16-22&lt;br /&gt;छोटा &lt;br /&gt;50-60    &lt;br /&gt;16   &lt;br /&gt;पी.के.1029 &lt;br /&gt;90-95    &lt;br /&gt;25-30    &lt;br /&gt;सफेद   &lt;br /&gt;मध्‍यम&lt;br /&gt;50-60    &lt;br /&gt;17   &lt;br /&gt;पी.के.1024 &lt;br /&gt;120 &lt;br /&gt;30-35    &lt;br /&gt;सफेद   &lt;br /&gt;मध्‍यम&lt;br /&gt;50-60    &lt;br /&gt;18   &lt;br /&gt;पी.के.416   &lt;br /&gt;115-120 &lt;br /&gt;32-38    &lt;br /&gt;सफेद   &lt;br /&gt;मध्‍यम&lt;br /&gt;60-70    &lt;br /&gt;19   &lt;br /&gt;पी.के. 564 &lt;br /&gt;105-115  &lt;br /&gt;25-35    &lt;br /&gt;तदैव &lt;br /&gt;सफेद   &lt;br /&gt;पीला &lt;br /&gt;मध्‍यम&lt;br /&gt;70-80    &lt;br /&gt;20   &lt;br /&gt;एन आर सी 37  &lt;br /&gt;110-115&lt;br /&gt;25-30    &lt;br /&gt;तदैव &lt;br /&gt;सफेद   &lt;br /&gt;पीला &lt;br /&gt;मध्‍यम&lt;br /&gt;90-100 &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मध्‍यप्रदेश के विभिन्‍न जलवायु क्षेत्र के लिए सोयाबीन की अनुशंसित जातियॉं&lt;br /&gt;कृषि जलवायु क्षेत्र&lt;br /&gt;जिले &lt;br /&gt;जाजियॉं   &lt;br /&gt;छत्‍तीसगढ़ का मैदान – कमोर का पठार तथा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बालाघाट, बारासिवनी&lt;br /&gt;जे.एस.80-21 तथा जे.एस.335 &lt;br /&gt;सतपुडा की पहाडि़यॉं&lt;br /&gt;जबलपुर, कटनी, पन्‍ना, सतना, रीवा, सीधी&lt;br /&gt;शहडोल, उमरिया, डिंडोरी, मंडला, सिवनी,&lt;br /&gt;जे.एस.80-21,जे.एस.335,&lt;br /&gt;जे.एस. 90-41, मैक्‍स- 58 तथा पी.के.- 472, जे.एस.93-05&lt;br /&gt;विंध्‍य का पठार   &lt;br /&gt;भोपाल, सीहोर, विदिशा,&lt;br /&gt;सागर, दमोह, रायसेन    &lt;br /&gt;जे.एस.76-205, जे.एस.80-21 तथा पी.के.472 जे.एस.93-05    &lt;br /&gt;मध्‍य नर्मदा घाटी  &lt;br /&gt;नरसिंपुर, होशंगाबाद, हरदा    &lt;br /&gt;जे.एस.80-21, जे.एस. 90-40, पी.के.472, जे.एस. 93-05 तथा एन.आर.सी.37    &lt;br /&gt;गिर्द क्षेत्र   &lt;br /&gt;ग्‍वालियर, भिण्‍ड, मुरैना, शिवपुरी, गुना&lt;br /&gt;जे.एस.80-21, जे.एस. 335 तथा जे.एस. 93-05    &lt;br /&gt;बुन्‍देलखंड़ क्षेत्र    &lt;br /&gt;छतरपुर, टीकमगढ़, दतिया    &lt;br /&gt;जे.एस. 80-21, जे.एस.335, जे.एस. 90-41, पी.के.472, जे.एस. 93-05 एन.आर.सी. 37    &lt;br /&gt;सतपुड़ा की पहाडि़यॉं&lt;br /&gt;छिंदवाडा एवं बैतूल &lt;br /&gt;जे.एस. 80-21, जे.एस. 335, जे.एस. 90-41, पी.के. 472 जे.एस.93-05    &lt;br /&gt;मालवार का पठार  &lt;br /&gt;मंदसौर, रतलाम , रायगढ, शाजापुर, उज्‍जैन, इंदौर, देवास, एवं धार का कुछ क्षेत्र  &lt;br /&gt;जे.एस.71-05, जे.एस. 80-21, जे.एस. 90-41, जे.एस. 76-205, जे.एस. 80-21, जे.एस. 335, पी.के.472, अहिल्‍या 1,2 तथा 3 जे.एस. 93-05 एन आर सी 37   &lt;br /&gt;निमाड़ घाटी &lt;br /&gt;खंडवा, खरगौन, बड़वानी    &lt;br /&gt;जे.एस.335, जे.एस.90-41     जे.एस. 93-05 एन.आर;सी. 37   &lt;br /&gt;झाबुआ की पहाडि़यॉं&lt;br /&gt;झाबुआ एवं धार का कुछ भाग &lt;br /&gt;जे.एस. 335, जे.एस. 90-41, जे.एस. 93-05&lt;br /&gt;समन्वित पोषण प्रबंधन&lt;br /&gt;अच्‍छी सड़ी हुई गोबर की खाद (कम्‍पोस्‍ट) 5 टन प्रति हेक्‍टर अंतिम बखरनी के समय खेत में अच्‍छी तरह मिला देवें तथा बोते समय 20 किलो नत्रजन 60 किलो स्‍फुर 20 किलो पोटाश एवं 20 किलो गंधक प्रति हेक्‍टर देवें। यह मात्रा मिटटी परीक्षण के आधर पर घटाई बढ़ाई जा सकती है तथा संभव नाडेप, फास्‍फो कम्‍पोस्‍ट के उपयोग को प्राथमिकता दें। रासायनिक उर्वरकों को कूड़ों में लगभग 5 से 6 से.मी. की गहराई पर डालना चाहिए। गहरी काली मिटटी में जिंक सल्‍फेट 50 किलो ग्राम प्रति हेक्‍टर एवं उथली मिटिटयों में 25 किलो ग्राम प्रति हेक्‍टर की दर से 5 से 6 फसलें लेने के बाद उपयोग करना चाहिए।&lt;br /&gt;खरपतवार प्रबंधन&lt;br /&gt;फसल के प्रारम्भिक 30 से 40 दिनों तक खरपतवार नियंत्रण बहुत आवश्‍यक होता है। बतर आने पर डोरा या कुल्‍फा चलाकर खरपतवार नियंत्रण करें व दूसरी निंदाई अंकुरण होने के 30 और 45 दिन बाद करें। 15 से 20 दिन की खड़ी फसल में घांस कुल के खरपतवारो को नष्‍ट करने के लिए क्‍यूजेलेफोप इथाइल एक लीटर प्रति हेक्‍टर अथवा घांस कुल और कुछ चौड़ी पत्‍ती वाले खरपतवारों के लिए इमेजेथाफायर 750 मिली. ली. लीटर प्रति हेक्‍टर की दर से छिड़काव की अनुशंसा है। नींदानाशक के प्रयोग में बोने के पूर्व फलुक्‍लोरेलीन 2 लीटर प्रति हेक्‍टर आखरी बखरनी के पूर्व खेतों में छिड़के और अवा को पेन्‍डीमेथलीन 3 लीटर प्रति हेक्‍टर या मेटोलाक्‍लोर 2 लीटर प्रति हेक्‍टर की दर से 600 लीटर पानी में घोलकर फलैटफेन या फलेटजेट नोजल की सहायकता से पूरे खेत में छिड़काव करें। तरल खरपतवार नाशियों के मिटटी में पर्याप्‍त पानी व भुरभुरापन होना चाहिए।।&lt;br /&gt;सिंचाई&lt;br /&gt;खरीफ मौसम की फसल होने के कारण सामान्‍यत: सोयाबीन को सिंचाई की आवश्‍यकता नही होती है। फलियों में दाना भरते समय अर्थात सितंबर माह में यदि खेत में नमी पर्याप्‍त न हो तो आवश्‍यकतानुसार एक या दो हल्‍की सिंचाई करना सोयाबीन के विपुल उत्‍पादन लेने हेतु लाभदायक है।&lt;br /&gt;पौध संरक्षण&lt;br /&gt;(अ)            कीट&lt;br /&gt;(अ)सोयाबीन की फसल पर बीज एवं छोटे पौधे को नुकसान पहुंचाने वाला नीलाभृंग (ब्‍लूबीटल) पत्‍ते खाने वाली इल्लियां, तने को नुकसान पहुंचाने वाली तने की मक्‍खी एवं चक्रभृंग (गर्डल बीटल) आदि का प्रकोप होता है एवं कीटों के आक्रमण से 5 से 50 प्रतिशत तक पैदावार में कमी आ जाती है। इन कीटों के नियंत्रण के उपाय निम्‍नलिखित है:&lt;br /&gt;(अ)कृषिगत नियंत्रण&lt;br /&gt;खेत की ग्रीष्‍मकालीन गहरी जुताई करें। मानसून की वर्षा के पूर्व बोनी नहीं करे। मानसून आगमन के पश्‍चात बोनी शीघ्रता से पूरी करें। खेत नींदा रहित रखें। सोयाबीन के साथ ज्‍वार अथवा मक्‍का की अंतरवर्तीय खेती करें। खेतों को फसल अवशेषों से मुक्‍त रखें तथा मेढ़ों की सफाई रखें।&lt;br /&gt;रासायनिक नियंत्रण&lt;br /&gt;बुआई के समय थयोमिथोक्‍जाम 70 डब्‍लू एस. 3 ग्राम दवा प्रति किलो ग्राम बीज की दर से उपचारित करने से प्रारम्भिक कीटों का नियंत्रण होता है अथवा अंकुरण के प्रारम्‍भ होते ही नीला भृंग कीट नियंत्रण के लिए क्‍यूनालफॉस 1.5 प्रतिशत या मिथाइल पेराथियान (फालीडाल 2 प्रतिशत या धानुडाल 2 प्रतिशत ) 25 किलो ग्राम प्रति हेक्‍टर की दर से भुरकाव करना चाहिए। कई प्रकार की इल्लियां पत्‍ती छोटी फलियों और फलों को खाकर नष्‍ट कर देती है इन कीटों के नियंत्रण के लिए घुलनशील दवाओं की निम्‍नलिखित मात्रा 700 से 800 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए। हरी इल्‍ली की एक प्रजाति जिसका सिर पतला एवं पिछला भाग चौड़ा होता है सोयाबीन के फूलों और फलियों को खा जाती है जिससे पौधे फली विहीन हो जाते हैं। फसल बांझ होने जैसी लगती है। चूकि फसल पर तना मक्‍खी, चक्रभृंग, माहो हरी इल्‍ली लगभग एक साथ आक्रमण करते हैं अत: प्रथम छिड़काव 25 से 30 दिन पर एवं दूसरा छिड़काव 40-45 दिन की फसल पर आवश्‍यक करना चाहिए।&lt;br /&gt;क्र   &lt;br /&gt;प्रयुक्‍त कीटनाशक  &lt;br /&gt;मात्रा प्रति हेक्‍टर&lt;br /&gt;1    &lt;br /&gt;क्‍लोरपायरीफॉस 20 ई.सी&lt;br /&gt;1.5 लीटर  &lt;br /&gt;2   &lt;br /&gt;क्‍यूनालफॉस 25 ई.सी    &lt;br /&gt;1.5 लीटर  &lt;br /&gt;3   &lt;br /&gt;ईथियान 50 ई.सी &lt;br /&gt;1.5 लीटर  &lt;br /&gt;4   &lt;br /&gt;ट्रायजोफॉस 40 ई.सी&lt;br /&gt;800 मि.ली. &lt;br /&gt;5   &lt;br /&gt;ईथोफेनप्राक्‍स 10 ई.सी    &lt;br /&gt;1.0 लीटर  &lt;br /&gt;6   &lt;br /&gt;मिथोमिल 40 एस.पी.    &lt;br /&gt;1.0 किग्रा.  &lt;br /&gt;7   &lt;br /&gt;नीम बीज का घोल 5 प्रतिशत&lt;br /&gt;35 कि.ग्रा. पावडर &lt;br /&gt;8   &lt;br /&gt;थयोमिथेक्‍जाम 25 डब्‍लू जी  &lt;br /&gt;100 ग्राम&lt;br /&gt;छिड़काव यन्‍त्र उपलब्‍ध न होने की स्थिति में निम्‍न लिखित में से किसी एक पावडर (डस्‍ट) का उपयोग 20 – 25 किग्रा. प्रति हेक्‍टर करना चाहिए&lt;br /&gt;1. क्‍यूनालफॉस – 1.5 प्रतिशत&lt;br /&gt;2.                            मिथाईल पैराथियान – 2.0 प्रतिशत&lt;br /&gt;जैविक नियंत्रण&lt;br /&gt;कीटों के आरम्भिक अवस्‍था में जैविक कट नियंत्रण हेतु बी.टी एवं ब्‍यूवेरीया बैसियाना आधरित जैविक कीटनाशक 1 किलोग्राम या 1 लीटर प्रति हेक्‍टर की दर से बुवाई के 35-40 दिन तथा 50-55 दिन बाद छिड़काव करें। एन.पी.वी. का 250 एल.ई समतुल्‍य का 500 लीटर पानी में घोलकर बनाकर प्रति हेक्‍टेयर छिड़काव करें। रासायनिक कीटनाशकों की जगह जैविक कीटनाशकों को अदला बदली कर डालना लाभदायक होता है।&lt;br /&gt;1.      गर्डल बीटल प्रभावित क्षेत्र में जे.एस. 335, जे.एस. 80 – 21, जे.एस 90 – 41 , लगावें&lt;br /&gt;1.2. निंदाई के समय प्रभावित टहनियां तोड़कर नष्‍ट कर दें&lt;br /&gt;1.3. कटाई के पश्‍चात बंडलों को सीधे गहराई स्‍थल पर ले जावें&lt;br /&gt;1.4. तने की मक्‍खी के प्रकोप के समय छिड़काव शीघ्र करें&lt;br /&gt;1.(ब) रोग&lt;br /&gt;1 . फसल बोने के बाद से ही फसल निगरानी करें। यदि संभव हो तो लाइट ट्रेप तथा फेरोमेन टयूब का उपयोग करें।&lt;br /&gt;2 . बीजोपचार आवश्‍यक है। इसके बाद रोग नियंत्रण के लिए फफूँद के आक्रमण से बीज सड़न रोकने हेतु कार्बेन्‍डाजिम 1 ग्राम + 2 ग्राम थीरम के मिश्रण से प्रति किलो ग्राम बीज उपचारित करना चाहिए। थीरम के स्‍थान पर केप्‍टान एवं कार्बेन्‍डाजिम के स्‍थान पर थायोफेनेट मिथाइल का प्रयोग किया जा सकता है।&lt;br /&gt;3 . पत्‍तों पर कई तरह के धब्‍बे वाले फफूंद जनित रोगों को नियंत्रित करने के लिए कार्बेन्‍डाजिम 50 डबलू पी या थायोफेनेट मिथाइल 70 डब्‍लू पी 0.05 से 0.1 प्रतिशत से 1 ग्राम दवा प्रति लीटर पानी का छिड़काव करना चाहिए। पहला छिड़काव 30 -35 दिन की अवस्‍था पर तथा दूसरा छिड़काव 40 – 45 दिन की अवस्‍था पर करना चाहिए।&lt;br /&gt;4 . बैक्‍टीरियल पश्‍चयूल नामक रोग को नियंत्रित करने के लिए स्‍ट्रेप्‍टोसाइक्‍लीन या कासूगामाइसिन की 200 पी.पी.एम. 200 मि.ग्रा; दवा प्रति लीटर पानी के घोल और कापर आक्‍सीक्‍लोराइड 0.2 (2 ग्राम प्रति लीटर ) पानी के घोल के मिश्रण का छिड़काव करना चाहिए। इराके लिए 10 लीटर पानी में 1 ग्राम स्‍ट्रेप्‍टोसाइक्‍लीन एवं 20 ग्राम कापर अक्‍सीक्‍लोराइड दवा का घोल बनाकर उपयोग कर सकते हैं।&lt;br /&gt;5 . गेरूआ प्रभावित क्षेत्रों (जैसे बैतूल, छिंदवाडा, सिवनी) में गेरूआ के लिए सहनशील जातियां लगायें तथा रोग के प्रारम्भिक लक्षण दिखते ही 1 मि.ली. प्रति लीटर की दर से हेक्‍साकोनाजोल 5 ई.सी. या प्रोपिकोनाजोल 25 ई.सी. या आक्‍सीकार्बोजिम 10 ग्राम प्रति लीटर की दर से ट्रायएडिमीफान 25 डब्‍लू पी दवा के घोल का छिड़काव करें।&lt;br /&gt;6 . विषाणु जनित पीला मोजेक वायरस रोग व वड व्‍लाइट रोग प्राय: एफ्रिडस सफेद मक्‍खी, थ्रिप्‍स आदि द्वारा फैलते हैं अत: केवल रोग रहित स्‍वस्‍थ बीज का उपयोग करना चाहिए। एवं रोग फैलाने वाले कीड़ों के लिए थायोमेथेक्‍जोन 70 डब्‍लू एव. से 3 ग्राम प्रति किलो ग्राम की दर से उपचारित कर एवं 30 दिनों के अंतराल पर दोहराते रहें। रोगी पौधों को खेत से निकाल देवें। इथोफेनप्राक्‍स 10 ई.सी. 1.0 लीटर प्रति हेक्‍टर थायोमिथेजेम 25 डब्‍लू जी, 1000 ग्राम प्रति हेक्‍टर।&lt;br /&gt;7 . पीला मोजेक प्रभावित क्षेत्रों में रोग के लिए ग्राही फसलों (मूंग, उड़द, बरबटी) की केवल प्रतिरोधी जातियां ही गर्मी के मौसम में लगायें तथा गर्मी की फसलों में सफेद मक्‍खी का नियमित नियंत्रण करें।&lt;br /&gt;8 . नीम की निम्‍बोली का अर्क डिफोलियेटर्स के नियंत्रण के लिए कारगर साबित हुआ है।&lt;br /&gt;फसल कटाई एवं गहराई&lt;br /&gt;अधिकांश पत्तियों के सूख कर झड़ जाने पर और 10 प्रतिशत फलियों के सूख कर भूरी हो जाने पर फसल की कटाई कर लेना चाहिए। पंजाब 1 पकने के 4 – 5 दिन बाद, जे.एस. 335 , जे.एस. 76 – 205 एवं जे.एस. 72 – 44 जे.एस. 75 – 46 आदि सूखने के लगभग 10 दिन बाद चटकने लगती हैं। कटाई के बाद गडढ़ो को 2 – 3 दिन तक सुखाना चाहिए जब कटी फसल अच्‍छी तरह सूख जाये तो गहराई कर दोनों को अलग कर देना चाहिए। फसल गहाई थ्रेसर, ट्रेक्‍टर, बेलों तथा हाथ द्वारा लकड़ी से पीटकर करना चाहिए। जहां तक संभव हो बीज के लिए गहराई लकड़ी से पीट कर करना चाहिए, जिससे अंकुरण प्रभावित न हो।&lt;br /&gt; अन्‍तर्वर्तीय फसल पद्धति&lt;br /&gt;सोयाबीन के साथ अन्‍तर्वर्तीय फसलों के रूप में निम्‍नानुसार फसलों की खेती अवश्‍य करें&lt;br /&gt;1 . अरहर +  सोयाबीन (2:4)&lt;br /&gt;2 . ज्‍वार + सोयाबीन (2:2)&lt;br /&gt;3 . मक्‍का +  सोयाबीन ( 2:2)&lt;br /&gt;4 . तिल + सोयाबीन (2:2)&lt;br /&gt;अरहर एवं सोयाबीन में कतारों की दूरी 30 से.मी. रखें।&lt;br /&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7319195525113358508-2776224535602657865?l=smalik06.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://smalik06.blogspot.com/feeds/2776224535602657865/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7319195525113358508&amp;postID=2776224535602657865' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7319195525113358508/posts/default/2776224535602657865'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7319195525113358508/posts/default/2776224535602657865'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://smalik06.blogspot.com/2008/10/blog-post_6191.html' title='सोयाबीन'/><author><name>malik</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09139758814525364467</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Eh8BkyTxt58/SJqthbJOKKI/AAAAAAAAADI/uvkv7Qt-o9A/s1600-R/hllo009%25255B1%25255D.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7319195525113358508.post-5605944430936824640</id><published>2008-10-14T01:26:00.000-07:00</published><updated>2008-10-14T01:27:31.363-07:00</updated><title type='text'>राई एवं सरसों</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;राई एवं सरसों&lt;br /&gt;मध्‍य प्रदेश भारत की तिलहन उत्‍पादन करने वाला महत्‍वपूर्ण प्रदेश है। राज्‍य में राई एवं सरसों की खेती लगभग 6.82 लाख हेक्‍टर में की जाती है। प्रदेश में चम्‍बल संभाग के मुरैना जिले में इसकी सर्वाधिक उत्‍पादकता (1359 किलो / हे.) है, जबकि राज्‍य की उत्‍पादकता मात्र 1083 किलो / हे. है। राई- सरसों , उत्‍तरी मध्‍यप्रदेश की प्रमुख रबी फसल है जो लगभग 70 प्रतिशत क्षेत्र में बोई जाती है। वर्तमान में मालवा क्षेत्र में भी इसका रकबा बढ़ा है। राई एवं सरसों की खेती सिंचित एवं बरानी क्षेत्रों में आसानी से की जाती है तथा इसके तेल का प्रयोग खाद्य तेल के रूप में तथा खली पशुओं के मुख्‍य आहार के रूप में प्रयोग की जाती है। प्रदेश मे इसकी खेती का रकबा एवं उत्‍पादन लगातार बढ़ रहा है तथा भविष्‍य में इसकी काफी संभावनाएं हैं।&lt;br /&gt;राई  सरसों प्रजातियों में मुख्‍य रूप से सरसों की खेती कुल क्षेत्र के 90 प्रतिशत क्षेत्र में की जाती है, बाकी बचे 10 प्रतिशत क्षेत्र में तोरिया आदि की खेती सीमान्‍त एवं लघु सीमान्‍त क्षेत्रों में की जाती है।&lt;br /&gt;उन्‍नत जातियॉ&lt;br /&gt;(1) तोरिया&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(अ)                             जवाहर तोरिया – 1 (जे.एम.टी- 689 ) – राई – सरसों , मुरैना द्वारा 1996 में विकसित इस जाति के पौधों की ऊंचाई 125 – 160 से.मी. है तथा पकने की अवधि 85-90 दिन है। इसकी उपज देने की क्षमता 15 से 18 क्विं. प्रति हेक्‍टर है। बीज का रंग कत्‍थई लाल सा होता है और इसमें तेल की मात्रा 42 प्रतिशत से अधिक होती है। यह किस्‍म श्‍वेत किटट रोग के प्रतिरोधी है।&lt;br /&gt;(ब) भवानी&lt;br /&gt;इसके पौधों की ऊचाई 70-75 से.मी. तक होती है। यह किस्‍म 80-85 दिनों में पककर तैयार हो जाती है। इसकी उपज क्षमता 12 से 13.5 क्विं प्रति हेटर तक होती है । बीज का रंग भूरा तथा तेल की मात्रा 44 प्रतिशत तक पाई जाती है। यह शीघ्र पकने वाली एवं द्विफसलीय पद्यति के लिये एक उचित किस्‍म है।&lt;br /&gt;(स) टी – 9&lt;br /&gt;इसके पौधों की ऊचाई 102 – 108 से.मी होती है तथा यह 95 – 100 दिनों में पककर तैयार हो जाती है। इसकी उपज क्षमता 12- 15 क्विं प्रति हेक्‍टर होती है। इसके बीज का रंग भूरा जिसमें तेल की मात्रा 44 प्रतिशत तक पाई जाती है।&lt;br /&gt;(2) गोभी सरसों&lt;br /&gt;(अ) टेरी उत्‍तम जवाहर (टेरी ‘’00’’ आर – 9903)&lt;br /&gt;यह गोभी सरसों की किस्‍म टेरी, नई दिल्‍ली द्वारा 2004 में विकसित की गई है। इसका मुल्‍यांकन टेरी, नई दिल्‍ली एवं अखिल भारतीय समन्वित राई – सरसों ज.ने कृषि विश्‍वविद्यालय परियोना द्वारा किया गया है। किस्‍म को म.प्र. के लिये अनुमोदित किया गया है। इसमें केनोला प्रकार का (‘’00’’टाइप) तेल पाया जाता है। इसके पौधों की ऊंचाई 125-130 से.मी. होती है। इसके पकने की अवधि 130-135 दिन होती है। इसमें फलियों के चटकने के प्रति रोधिता पाई जाती है एवं पौधे के गिरने के प्रति सहिष्‍णु है। इसके बीज का रंग भूरा होता है। तथा इसकी उपज क्षमता 15-17 क्विं प्रति हेक्‍टर होती है। इसमें तेल की मात्रा 42 प्रतिशत से अधिक पाई जाती है। इसके 1000 दानों का वजन 3.2 से 3.5 ग्राम तक होता है। इसके तेल में युरासिक अम्‍ल की मात्रा 2 प्रतिशत से कम एवं ओलिक अम्‍ल की मात्रा 60 प्रतिशत से अधिक पाई जाती है। इसको तेल रहित प्रति ग्राम खली में नोलेट की मात्रा 30 माइक्रोमोल्‍स से भी कम पायी जाती है, जो पशु आहार के लिये उपयुक्‍त पाई गई है।&lt;br /&gt;(3) सरसों&lt;br /&gt;(1) जवाहर सरसों – 1 (जे.एम.- 1) जे.एम. डब्‍ल्‍यू.आर. 93-39&lt;br /&gt;यह सरसों की किस्‍म 1999 में राई- सरसों परियोजना , मुरैना द्वारा विकसित की गई है तथा यह देश की पहली श्‍वेत किटट रोग रोधी किस्‍म है। इसके पौधों की ऊंचाई 170-185 से.मी होती है तथा यह किस्‍म 125-130 दिनों में पक जाती है। यह किस्‍म फलियों के चटकने तथा पौधों के गिरने के प्रति सहिष्‍णु है। इसकी उपज क्षमता 15 से 20 क्विं प्रति हैक्‍टर है। इसके बीज का रंग काला भूरा तथा आकार गोल होता है। इसमें तेल की मात्रा 40 प्रतिशत से अधिक होती है। इसके 1000 दानों का वजन 4-5 ग्राम तक होता है।&lt;br /&gt;(2) जवाहर सरसों – 2 (जे.एम-2) जे.एम.डब्‍ल्‍यू.आर. 941 -1-2&lt;br /&gt;वर्ष 2004 में राई सरसों परियोजना मुरैना द्वारा विकसित यह किस्‍म भी श्‍वेत किटट रोग प्रतिरोधी किस्‍म है एवं अल्‍टरनेरिया भुलसन रोग के प्रति सहिष्‍णु है। इसके पौधों की ऊंचाई 165-170 सें.मी तक पकने की अवधि 135-138 दिन है। यह किस्‍म भी फलियों के चटकने एवं पौधों के गिरने के प्रति सहिष्‍णु है। इसकी उपज क्षमता 15 से 30 क्वि. प्रति हेक्‍टर तक पाई गई है। इसके काले भूरे रंग गोल आकार के बीज में तेल की मात्रा 40 प्रतिशत से अधिक पाई जाती है। इसके 1000 दानों का वजन 4.5 ग्राम से 5.2 ग्राम तक होता है।&lt;br /&gt;(3) जवाहर सरसों – 3 (जे.एम.-3) जे . एम. एम . 915&lt;br /&gt;यह किस्‍म भी राई-सरसों परियोजना मुरैना द्वारा 2004 में विकसित एवं अनुमोदित की गई है। इस किस्‍म आल्‍टरनेरिया भुलसन रोग के प्रति सहिष्‍णु है तथा इस किस्‍म  में अन्‍य किस्‍मों की अपेक्षाकृत माहू का प्रकोप भी कम पाया जाता है। इसके पौधों की ऊचाई 180- 185 से.मी , फलियों की संख्‍या 180-200 प्रति पौधा एवं इसके पकने की अवधि 130 से 132 दिन है। इसकी उपज क्षमता 15 से 25 क्विं प्रति हेक्‍टर है। काले भूरे एवं गोलाकार बीजों में तेल की मात्रा 40 प्रतिशत से अधिक पाई जाती है। इसके 1000 दानों का वजन 4 से 5 ग्राम तक होता है।&lt;br /&gt;(4) रोहिणी (के.आर.वी- 24)&lt;br /&gt;इस जाति की फलियॉ ठहनी से चिपकी हुई होती है। इसके पौधों की ऊंचाई 150- 155 से.मी होती है। यह किस्‍म 130 – 135 दिनों में पककर 20 से 22 क्विं प्रति हेक्‍टर उपज देती है। इसके दाने में 42 प्रतिशत से अधिक तेल पाया जाता है।&lt;br /&gt;(5) वरूणा (टी-59)&lt;br /&gt;यह सरसों की बहुत पुरानी प्रचलित एक स्थिर किस्‍म है। इसके पौधों की ऊचाई 145-155 से.मी. तथा इसके पकने की अवधि 135-140 दिन एवं बीजों में तेल की मात्रा 42 प्रतिशत से अधिक पाई जाती है। इसकी औसत उपज क्षमता 20-22 क्विं प्रति हेक्‍टर है। इसके 1000 दानों का वजन 5 से 5.5 ग्राम तक होता है।&lt;br /&gt;(6) क्रांति&lt;br /&gt;सरसों की इस जाति में आरा मक्‍खी का प्रकोप कम होता है। इसके पौधों की ऊंचाई 155-200 से.मी. तक पकने की अवधि 125-135 दिन होती है। इसकी औसत पैदावार 1 5-20 क्विं प्रति हेक्‍टर होती है। इसके 1000 दानों का वजन 4.5 ग्राम होता है, जिसमें तेल की मात्रा 40 प्रतिशत से अधिक होती है।&lt;br /&gt;(7) पूसा बोल्‍ड&lt;br /&gt;आर.ए.आर.आई, नई दिल्‍ली द्वारा 1984 में विकसित की गई यह किस्‍म बड़े दाने एवं अच्‍छी पैदावार देने वाली किस्‍म है। इसके पौधों की ऊचाई 1 70-180 से.मी तथा पकने की अवधि 125-130 दिन है। इसकी औसत उपज क्षमता 15 से 20 क्विं प्रति हेक्‍टर है। 1000 दानों का वजन 4.80 ग्राम होता है, जिसमें तेल की मात्रा 41 प्रतिशत से अधिक पाई गई है।&lt;br /&gt;भूमि का चुनाव&lt;br /&gt;राई-सरसों के लिए उत्‍तम जल निकास वाली समतल या बुलई दुमट भूमि सबसे अधिक उपयुक्‍त है।&lt;br /&gt;भूमि की तैयारी&lt;br /&gt;अधिकतम उपज प्राप्‍त करने हेतु खेत की मिटटी को जुताई द्वारा अत्‍याधिक भुरभुरी बनाकर समतल कर लेना चाहिये। भूमि की तैयारी के समय नमी संरक्षण का विशेष ध्‍यान रखना चाहिये। इसके लिये खेत की जुताई करने के तुरंत बाद साथ ही साथ पाटा भी चलाना चाहिए।&lt;br /&gt;बीज की मात्रा एवं उपचार&lt;br /&gt;तोरिया एवं सरसों के लिये 5 किलोग्राम बीज  प्रति हेक्‍टर पर्याप्‍त  है। बोने से पूर्ण बीज को 6 ग्राम एप्रान एस.डी.-35 य ा 3 ग्राम थाइरम से प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करके बोना चाहिए।&lt;br /&gt;जैविक खाद&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1 . बारानी क्षेत्र में देशी खाद (40-50 क्विं प्रति हेक्‍टर) बुआई के करीब एक महीने पूर्व खेत में डालें और वर्षा के मौसम में जुताई के स ाथ खेत में मिला दें।&lt;br /&gt;2. सिंचित क्षेत्रों के लिये अच्‍छा सड़ा हुआ देशी खाद (100 क्विं प्रति हेक्‍टर) बुआई के करीब एक महीने पूर्व खेत में डालकर जुताई से अच्‍छी तरह मिला दें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रासायनिक खाद&lt;br /&gt;क्र संख्‍या&lt;br /&gt;फसल का नाम&lt;br /&gt;रासायनिक खाद(किग्रा / हे.)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नत्रजन&lt;br /&gt;स्‍फुर&lt;br /&gt;पोटाश&lt;br /&gt;1    &lt;br /&gt;तोरिया&lt;br /&gt;60  &lt;br /&gt;30  &lt;br /&gt;20  &lt;br /&gt;2   &lt;br /&gt;असिंचित सरसों&lt;br /&gt;40  &lt;br /&gt;20  &lt;br /&gt;10  &lt;br /&gt;3   &lt;br /&gt;सिंचित सरसों&lt;br /&gt;80  &lt;br /&gt;40  &lt;br /&gt;20  &lt;br /&gt;4   &lt;br /&gt;सिंचित दो फसली क्षेत्र में&lt;br /&gt;100 &lt;br /&gt;50  &lt;br /&gt;25  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन क्षेत्रों में जमीन में गन्‍धक की कमी हो उनमें 20-25 किग्रा प्रति हेक्‍टर गन्‍धक तत्‍व देना आवश्‍यक है, जिसकी पूर्ती अमोनियम सल्‍फेट , सुपर फास्‍फेट अथवा अमोनिया फास्‍फेट सल्‍फेट आदि उर्वरकों से की जा सकती है।&lt;br /&gt;उपरोक्‍त उर्वरक उपलब्‍ध न होने पर जिपस्‍म या पायराइड का उपयोग भी किया जा सकता है। जस्‍ते की कमी वाले क्षेत्रों में 2 या 3 फसलों के बाद 25 किलो ग्राम जिंक सल्‍फेट प्रति हेक्‍टर आधार खाद के साथ मिलाकर उपयोग करें।&lt;br /&gt;बोने का समय&lt;br /&gt;(अ)     तोरिया : सितंबर माह का प्रथम पक्ष (जब औसत तापक्रम 28-30 डिग्री से. ग्रे. हो ) तोरिया के बाद गेहूं की फसल लेने हेतु इसकी बोनी आवश्‍यक रूप से सितंबर माह के दूसरे सप्‍ताह तक पूरी कर लेनी चाहिये। गेहूं के अलावा प्‍याज की फसल भी आसानी से ली जा सकती है।&lt;br /&gt;(ब) सरसों : - अक्‍टूबर माह का प्रथम पक्ष (जब औसत तापक्रम 26-28 डिग्री से.गेड हो) इसकी खेती आवश्‍यक रूप से अक्‍टूबर माह के दूसरे सप्‍ताह तक पूरी कर लेना चाहिये ताकि फसल कीट रोग व्‍याधियों एवं पाला आदि प्रकोप से बची रहे।&lt;br /&gt;बोने की विधि एवं पौध अन्‍तराल&lt;br /&gt;अधिक उत्‍पादन के लिये ट्रेक्‍टर चलित बुआई की मशीन एवं देशी हल के साथ नारी द्वारा फसल की कतार से कतार की दूरी 30 से.मी. रखकर बीज को 2.5 से 3 से.मी की गहराई पर ही बोएं। बीज को अधिक गहरा बोने पर अंकुरण कम हो सकता है। पौधों की दूरी 10 से.मी रखना चाहिये।&lt;br /&gt;खरपतवार नियंत्रण&lt;br /&gt;बुवाई के 20-25 दिन बाद हैण्‍ड हो अथवा निदाई गुडाई करना आवश्‍यक होता है साथ ही साथ घने पौधों को निकालकर अलग कर देना चाहिये।&lt;br /&gt;प्‍याजी खरपतवार के लिये रासायनिक खरपतवारनाशी बासलिन 1 कि.ग्राम. सक्रीय तत्‍व प्रति हैक्‍टर बुआई से पूर्व छिड़क कर भूमि में मिलावें अथवा बोनी के तुरंत बाद एवं अंकुरण से पूर्व आइसोप्रोटूरोन अथवा पेन्‍डीमिथलीन खरपतवारनाशी का 1 क्रिग्रा. सक्रीय तत्‍व का छिड़काव करें। इन खरपतवार नाशियों से दोनों ही प्रकार (एक दली व दो दली) के खरपतवार नियंत्रित किये जा सकते है। खरपतवार नाशियों का छिड़काव फलेट फेन नोजल से 600 लीटर पानी का प्रति हैक्‍टर उपयोग करें। छिड़काव के समय खेत में उचित नमी होनी आवश्‍यक है।&lt;br /&gt;फसल पद्धति&lt;br /&gt; तोरिया     सरसों&lt;br /&gt;फसल चक्र&lt;br /&gt;पड़त – तोरिया&lt;br /&gt;पड़त – सरसों (वर्षा आधरित)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तोरिया – गेहूं&lt;br /&gt;मूंग/उड़द – सरसों (वर्षा आधरित)&lt;br /&gt;बाजरा- सरसों&lt;br /&gt;ग्‍वार – सरसों&lt;br /&gt;सोयाबीन – सरसों&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंतर फसल&lt;br /&gt;तोरिया +  गोभी सरसों&lt;br /&gt;(1:1 30 से.मी कतारों में)&lt;br /&gt;(वर्षा आधरित )   &lt;br /&gt;चना + सरसों&lt;br /&gt;मसूर + सरसों&lt;br /&gt;4:1 (वर्षा आधरित)&lt;br /&gt;गेहूं + सरसों&lt;br /&gt;(9:1) सिंचित&lt;br /&gt;जल प्रबंधन&lt;br /&gt;पलेवा के बाद बोई गई फसल में बुआई के 40-45 दिन बाद तथा बिना पलेवा बोई गई फसलों में पहली सिंचाई 35-40 दिन बाद करने से फसल भरपूर पैदावार मिलती है। आवश्‍यक होने पर 75 -80 दिन बाद दूसरी सिंचाई करें।&lt;br /&gt;फसल संकट&lt;br /&gt;(अ) कीट&lt;br /&gt;(1)              राई- सरसों का चेंपा या माहू (एफिड)&lt;br /&gt;यह कीट बहुत छोटा हरा-पीला या भूरा काला रंग का होता है। यह पौधा के तने पुष्‍पदण्‍ड , पुष्‍पक्रम , फली आदि से रस चूसता है। यह कीट बहुत तेजी से बढ़ता है और पूरी फसल को बर्वाद कर सकता है। इस कीड़े की बढ़वार के लिये बादलों वाला मौसम बहुत अनुकूल होता है। इसके प्रकोप से फलियों व तेल की मात्रा कम हो जाती है। अत्‍यधिक प्रकोप होने पर पत्तियों एवं फलियों पर एक विशेष प्रकार का चिपचिपा मीठा पदार्थ छोड़ा जाता है जिस पर काला फफूंद नामक नोग लग जाता है।&lt;br /&gt;नियंत्रण&lt;br /&gt;1.      समय पर बुवाई&lt;br /&gt;2.      प्रकोप की प्रारंभिक अवस्‍था में कीट ग्रस्‍त टहनियों को तोड़कर नष्‍ट कर दें।&lt;br /&gt;2.&lt;br /&gt;3.      फसल पर माहू का प्रकोप होने पर आर्थिक दृष्टि से दवाओं का उपयोग तभी करना चाहिये जब खेत में 30 प्रतिशत पौधों पर माहू हो अथवा प्रति पौधे पर औसतन 8-13 माहू पौधे की ऊपरी 10 से.मी. टहनी पर जाये जायें। माहू के सफल नियंत्रण के लिये डेमेक्रान (फास्‍फोमिडान) 300 मि.ली दवा को 600 लीटर पानी में घोलकर प्रथम छिड़काव अधिक क्षतिकारक अवस्‍था पर एवं दूसरा 15 दिन बाद करने पर अत्‍यधिक लाभ होता है।&lt;br /&gt;3.(2) आरा मक्‍खी&lt;br /&gt;इस मक्‍खी के लावी हरे-पीले रंग से गहरे रंग, 1-1.5 से.मी लम्‍बे होते है तथा अक्‍टूबर से नवम्‍बर तक राई- सरसों की पत्‍ती खाकर बहुत नुकसान करते हैं।&lt;br /&gt;नियंत्रण&lt;br /&gt;1&amp;shy; इन कीड़ों की रोकथाम मेलाथियान 50 ई.सी या एण्‍डोसल्‍फान 35 ई.सी. की 500 मि.ली. मात्रा 500 लीटर पानी में मिलाकर प्रति हैक्‍टर छिडकने से की जा सकती है।&lt;br /&gt;(3) चितकबरा कीड़ा (पेण्‍टेड बग)&lt;br /&gt;यह कीड़ा अक्‍टूबर से नवंबर तथा मार्च माह में सक्रिय होता है। पूर्ण विकसित कीड़ा अण्‍डाकार जिसके ऊपर सफेद , पीले व नारंगी रंग के धब्‍बे होते हैं। यह कीड़ा पौधे के तने तथा पत्तियों से रस चूसता है जिससे पौधो की  पत्तियां पर सफेद धब्‍बे स्‍पष्‍ट दिखाई देते हैं। गंभीर प्रकोप में सम्‍पूर्ण पौधे नष्‍ट हो जाते हैं।&lt;br /&gt;नियंत्रण&lt;br /&gt;1.      सरसों के पुराने डण्‍ठल व अन्‍य अवशेषों को जलाकर नष्‍ट करें।&lt;br /&gt;2.      तोरिया फसल के बोने के 20-25 दिन बाद सिंचाई करें।&lt;br /&gt;3.      कीट नियंत्रण के लिये पैराथियोन चूर्ण 2 प्रतिशत प्रति हेक्‍टर 10-15 किलो ग्राम का भूरकाव करें।&lt;br /&gt;4.      मेटासिस्‍टाक्‍स 25 ई.सी दवा का 600 मि.ली. प्रति हेक्‍टर की दर से छिड़काव प्रभावशाली पाया गया है।&lt;br /&gt;(ब) रोग&lt;br /&gt;(1) अल्‍टरनेरिया ब्‍लाइट (काला धब्‍बा)&lt;br /&gt;यह रोग भी दो अवस्‍थाओं में आता है। पहले पत्तियों की ऊपरी सतह पर गोल धारीदार कत्‍थई रंग के धब्‍बे प्रगट होते हैं। बाद में काले धब्‍बे फलियों व डालियों पर बनते हैं। रोगग्रस्‍त फलियों में दाने पोचे रह जाते हैं और उनमें तेल का प्रतिशत भी घट जाता है। दानों का वजन कम हो जाता है।&lt;br /&gt;नियंत्रण&lt;br /&gt;फसल बोने के 50 दिन बाद रिडोमिल एम. जेड-72 (0.25 प्रतिशत) का छिडकाव करें तथा 15 दिन बाद रोवेरोल (0.2 प्रतिशत ) का दूसरा छिड़काव करें।&lt;br /&gt;(2) सफेद रतुआ या श्‍वेत किटट&lt;br /&gt;यह रोग दो अवस्‍थाओं में आता है। पहले पत्तियों की निचली सतह पर सफेद दूधिया धब्‍बे बनते हैं और फूल आने के बाद स्‍वस्‍थ बालियों के स्‍थान पर फूली हुई विकृतियॉ दिखाई देती हैं जिन्‍हें ‘’ स्‍टेग हैड’’ यानि अति वृद्धि में तना, पुष्‍पक्रम व पुष्‍पदण्‍ड आदि फूले हुये दिखाई देते हैं।&lt;br /&gt;नियंत्रण&lt;br /&gt;1 . बीजों का उपचार करके बोयें।&lt;br /&gt;2 . पत्तियों पर रोग के लक्षण दिखते ही रिडोमिल एम जेड- 72 के 0.25 प्रतिशत घोल (अर्थात 25 ग्राम दवा को 10 लीटर पानी में घोलकर ) बोनी के 50 एवं 75 दिन बाद छिड़काव करें। रिडोमिल दवा न मिलने पर थायथेन एम-45 (0.25 प्रतिशत ) का छिड़काव भी किया जा सकता है।&lt;br /&gt;(3) चूर्णिया आसिता या छछुआ&lt;br /&gt;पत्तियों , फलियों व तने पर मटमैला सफेद धब्‍बों के रूप में दिखाई देते है। तापमान बढ़ने पर यह बिमारी अधिक फैलती है।&lt;br /&gt;नियंत्रण&lt;br /&gt;1.      फसल की समय पर बोनी करें।&lt;br /&gt;2.      फसल पर घुलनशील गंधक (0.3 प्रतिशत) या कारथेन (0.1 प्रतिशत) दवा का 15 दिन के अन्‍तर से छिड़काव करें।&lt;br /&gt;2.(4) तना सड़न&lt;br /&gt;यह रो स्‍कलेरोटोनिया नामक फफूंद से होता है तथा नमी वाले खेतों में अधिक होता है। रोग्रस्‍त पौधों के तने दूर से सफेद दिखाई देते हैं। ग्रसित पौधे अंदर से पोले हो जाते हैं और उनमें अन्‍दर सफेद फफूंद के बीच काले रंग के स्‍कलोरोशिया दिखाई देते हैं। किसान इस रोग को सरसों के पोलियों अथवा पोला रोग के नाम से जानते हैं।&lt;br /&gt;नियंत्रण&lt;br /&gt;1 . बीज को केप्‍टान  अथवा बेविस्‍टीन से 3 ग्राम प्रति किलो ग्राम बीज की दर से उपचारित करके बोना चाहिये।&lt;br /&gt;2 . बेविस्‍टीन दवा (0.05 प्रतिशत) का पुष्‍प अवस्‍था पर छिड़काव बहुत असरदार पाया गया हैं।&lt;br /&gt;3 . फसल चक्र अपनाऍ&lt;br /&gt;कटाई एवं गहराई&lt;br /&gt;पौध कार्यकी परिपक्‍वता (फिजियोलोजिकल मैच्‍योरिटी) पर जब 75 प्रतिशत फलियॉ पीली पड़ जाये तब फसल को काटना चाहिये, ताकि फलियॉं चटकने से बच सकें। कटी हुई फसल को अच्‍छी तरह से सुखाकर जब बीज में नमी का प्रतिशत आठ के आस पास हो,  वैज्ञानिक तरीके से भण्‍डारण करें। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7319195525113358508-5605944430936824640?l=smalik06.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://smalik06.blogspot.com/feeds/5605944430936824640/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7319195525113358508&amp;postID=5605944430936824640' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7319195525113358508/posts/default/5605944430936824640'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7319195525113358508/posts/default/5605944430936824640'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://smalik06.blogspot.com/2008/10/blog-post_6652.html' title='राई एवं सरसों'/><author><name>malik</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09139758814525364467</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' 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द्वारा सीमान्‍त एवं उपसीमान्‍त भूमि में वर्षा आधारित सीमित निवेश तथा कुप्रबंधन की स्थिति में काश्‍त करना ही फसल की कम उत्‍पादकशीलता के प्रमुख कारण है। इसके अलावा प्रदेश के विभिन्‍न सस्‍य – जलवायु क्षेत्रों के लिये विकसित की गई उन्‍नत किस्‍मों का तथा सस्‍य उत्‍पादन तकनीकी का अंगीकार करने से प्रदेश में तिल की उत्‍पादनशीलता में सारगर्नित वृद्धि होना पायी गई है। प्रदेश हेतु विकसित की गई उन्‍नत तकरीक अपनाकर कृषक  भाई अधिक उपज प्राप्‍त कर सकते हैं।&lt;br /&gt;भूमि का चुनाव&lt;br /&gt;फसल को प्रदेश की अधिकांश भूमि में उगाया जा सकता है। अच्‍छी जल निकास वाली हल्‍की से मध्‍यम गठी हुई मिटटी में फसल अच्‍छी होती है। बलुई दुमट मिटटी में पर्याप्‍त नमीं होने पर फसल बहुत अच्‍छी होती है। अम्‍लीय या क्षारीय भूमि तिल की काश्‍त हेतु अनुपयोगी होती है। काश्‍त करने हेतु भूमि का अनुकूलन पी.एच.मान 5.5 से 8.0 है।&lt;br /&gt;भूमि की तैयारी&lt;br /&gt;बीज के उचित अंकुरण एवं खेत में पर्याप्‍त पौध संख्‍या प्राप्‍त करने हेतु अच्‍छी तरह से गहरी जुताई किया गया भुरभुरी मिटटी वाला खेत आवश्‍यक होता है। खेत को एक या दो बार हल तथा एक बार बखर चलाना चाहिये। पाटा चलाकर खेत को समतल करे। असमतल खेत में अनावश्‍यक पानी का जमाव होने से पौधे मर सकते हैं जिससे खेत में पौधों की संख्‍या कम हो सकती है तथा कम पौध संख्‍या का सीधा प्रभाव उपज पड़ता है तथा कम उपज प्राप्‍त होती है। अत: इस बात का विशेष ध्‍यान रखना चाहिये की खेत में अनावश्‍यक पानी का जमाव नहीं हो।&lt;br /&gt;जातियों का चुनाव&lt;br /&gt;प्रदेश में काश्‍त हेतु निम्‍नलिखित उन्‍नत किस्‍मों को अनुशंसित किया गया है।&lt;br /&gt;1 . टी .के. जी. – 21 – ऑचलिक कृषि अनुसंधान केन्‍द्र , टीकमगढ (ज.ने.कृ.वि.वि. जबलपुर म.प्र.) द्वारा वर्ष 1992 में काश्‍त हेतु विमोचित की गई है। दाने का रंग सफेद होकर सरकोस्‍पोरा पर्णदाग तथा जीवाणुचित्‍ती रोगों के प्रति रोधक किस्‍म है। 75-78 दिनों में पककर तैयार होती है तथा दानों में तेल की मात्रा 55.9 प्रतिशत होती है। उचित शस्‍य प्रबंधन के अंतर्गत औसत उपज 950 कि.ग्रा. / हेक्‍टर प्राप्‍त होती है।&lt;br /&gt;2 . टी .के. जी. – 22 – टीकमगढ़ केन्‍द्र  द्वारा वर्ष 1994 में प्रदेश में काश्‍त हेतु विमोचित की गई है। दानें सफेद रंग के होकर फाईटोफथेरा अंगमारी रोग रोधक किस्‍म है। परिपक्‍वता अवधि 76-81 दिन होकर दानों में 53.3 प्रतिशत तेल की मात्रा पायी जाती है। उत्‍तम शस्‍य प्रबंधन के द्वारा औसत उपज 950 कि.ग्रा. / हे. प्राप्‍त होती है।&lt;br /&gt;3 . टी .के. जी. – 55 – यह किस्‍म भी टीकमगढ़ केन्‍द्र द्वारा वर्ष 1998 में प्रदेश में काश्‍त हेतु विमोचित की गई है। सफेद रंग के दानों वाली किस्‍म होकर फाईटोफथोरा अंगमारी एवं मेक्रोफोमिना तना एवं जड़ सडन बीमारी के लिये सहनशील है। 76 से 78 दिनों में पककर तैयार होती है। तेल की मात्रा 53 प्रतिशत पायी जाती है। औसत उपज क्षमता 630 कि.ग्रा. / हे. है।&lt;br /&gt;4 . टी .के. जी. – 8 – टीकमगढ़ केन्‍द्र द्वारा वर्ष 2000 में प्रदेश में काश्‍त हेतु विमोचित की गई है। दानों का रंग सफेद होकर किस्‍म फाईटोफथोरा अंगमारी, आल्‍टरनेरिया पत्‍तीधब्‍बा तथा जीवाणु अंगमारी के प्रति सहनशील है। लगभग 86 दिनों में पक कर तैयार होती है। औसत उपज क्षमता 600 – 700 कि.ग्रा. / हे. है।&lt;br /&gt;5 . कंचन तिल (जे.टी.7) – मध्‍य प्रदेश के सभी खरीफ तिल लेने वाले क्षेत्रों में जिसमें विशेषकर बुन्‍देलखंड क्षेत्र शामिल है के लिए उपयुक्‍त है। वर्ष 1981 में प्रदेश में काश्‍त हेतु विमोचित की गई है। दानों का रंग सफेद होकर आकार में बड़े होते हैं तथा तेल की मात्रा 54 प्रतिशत होती है। बहुशाखीय किस्‍म होकर इसकी औसत उपज क्षमता 880 कि.ग्रा. / हे. है।&lt;br /&gt;6 एन. 32 –&lt;br /&gt;वर्ष 1970 में प्रदेश में काश्‍त हेतु विमोचित की गई है। सफेद चमकदार रंग के बीज एक  तनेवाली (शाखा रहित ) किस्‍म है। 90- 100 दिनों में पककर तैयार होती है, तेल की मात्रा 53 प्रतिशत होकर औसत उपज क्षमता 770 कि.ग्रा. / हे. है।&lt;br /&gt;7 . आर. टी. 46&lt;br /&gt;यह किस्‍म सन 1989 में काश्‍त हेतु विमोचित हुई है। चारकोल विगलन रोग हेतु रोधक है। भूरे रंग का बीज होकर बीजों में तेल की मात्रा 49 प्रतिशत होती है। किस्‍म लगभग 76 – 85 दिनों में पकती है तथा औसत उपज क्षमता 600 – 800 कि.ग्रा / हे. है।&lt;br /&gt;8 . रामा (इम्‍प्रुव्‍हट सिलेक्‍शन – 5&lt;br /&gt;यह किस्‍म सन 1989 में काश्‍त विमोचित हुई है। दानों का रंग लाल भूरा लाल होता है। दानों में तेल की मात्रा 45 प्रतिशत होती है तथा उचित शस्‍य प्रबंधन के अंतर्गत औसत उपज 700 – 1000 कि.ग्रा. / हे. आती है। प्रदेश में रबी एवं ग्रीष्‍मकालीन काश्‍त हेतु उपज है।&lt;br /&gt;9 . उमा (ओ.एम.टी. 11-6-3)&lt;br /&gt;यह किस्‍म सन 1990 में काश्‍त हेतु विमोचित हुई है। जल्‍दी परिपक्‍व होने वाली (75 – 80 दिनों में) किस्‍म हे। बीजों में तेल की मात्रा 51 प्रतिशत होकर औसत उपज क्षमता 603 कि.ग्रा. / हे. है।&lt;br /&gt;फसल चक्र&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तिल जल्‍दी पकने वाली फसल होने के कारण एकल फसल अथवा कई फसल पद्धतियों में रबी या ग्रीष्‍म के लिये उपयुक्‍त है। प्रदेश में तिल उगाने वाले विभिनन क्षेत्रों में साधारणत: ली जाने वाली क्रमिक फसल इस तरह है।&lt;br /&gt;धान  -     तिल&lt;br /&gt;तिल        -     गेहूं&lt;br /&gt;कपास और तिल    - गेहूं&lt;br /&gt;मिश्रित / अन्‍त: फसल पद्धति&lt;br /&gt;तिल की एकल फसल उपज आय मिश्रित / अन्‍त: फसल से अधिक होती है। प्रदेश में ली जाने वाली कुछ लोकप्रिय मिश्रित / अन्‍त: फसल पद्धतियॉं इस प्रकार है:&lt;br /&gt;तिल +  मूंग (2:2 अथवा 3:3 )&lt;br /&gt;तिल + उड़द (2:2 अथवा 3:3)&lt;br /&gt;तिल + सोयाबीन ( 2:1 अथवा 2:2)&lt;br /&gt;बीजोपचार&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मृदा जन्‍य एवं बीजजन्‍य रोगों से बचाव के लिये बोनी पूर्व बीज को थायरस 3 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से या थायरम (0.05 प्रतिशत) 1 :1 से बीजोपचार करें। जहॉं पर जीवाणु पत्‍ती धब्‍बा रोग की संभावना होती है वहॉ बोनी के पूर्ण बीजों को एग्रीमाइसीन – 100 के 0.025 प्रतिशत के घोल में आधा घंटे तक भिगोयें।&lt;br /&gt;बोनी का समय&lt;br /&gt;प्रदेश में फसल को मुख्‍यत: दो मौसम में उगाया जाता है जिनका बोनी का समय निम्‍नानुसार है:&lt;br /&gt;खरीफ :     जुलाई माह का प्रथम सप्‍ताह&lt;br /&gt;अर्द्ध रबी:    अगस्‍त माह के अंतिम सप्‍ताह से सितंबर माह के प्रथम सप्‍ताह तक&lt;br /&gt;ग्रीष्‍मकालीन :     जनवरी माह के दूसरे सप्‍ताह से फरवरी माह के दूसरे सप्‍ताह तक&lt;br /&gt;बोने की विधि&lt;br /&gt;फसल को आमतौर पर छिटककर बोया जाता है जिसके फलस्‍वरूप निंदाई – गुडाई करने एवं अंर्त:क्रियायें करने में अत्‍यंत बाधा आती है। फसल से अधिक उपज पाने के लिये कतारों में बोनी करनी चाहिये। छिटकवां विधि से बोनी करने पर बोनी हेतु 4 -7 कि;ग्रा. / हे. बीज की आवश्‍यकता होती है। कतारों में बोनी करने हेतु यदि ड्रील का प्रयोग किया जाता है तो बीज दर घटाकर 2.5 – 3 किग्रा. / हे. बीज की आवश्‍यकता होती है। बोनी के समय बीजों का समान रूप से वितरण करने के लिए बीज को रेत (बालू) सुखी मिटटी या अच्‍छी तरह से सडी हुई गोबर की खाद के साथ 1:20 के अनुपात में मिलाकर बोना चाहिये। मिश्रित पद्धति में तिल की बीजदर 2.5 कि;ग्रा. / हे. से अधिक नहीं होना चाहिये। कतार से कतार एवं पौधे से पौधे के बीच की दूरी 30 गुणा 10 सेमी. रखते हुए लगभग 3 से.मी. की गहराई पर बोना चाहिये।&lt;br /&gt;खाद एवं उर्वरक की मात्रा एवं देने की विधि&lt;br /&gt;जमीन की उत्‍पादकता को बनाए रखने के लिये तथा अधिक उपज पाने के लिए भूमि की तैयारी करते समय अंतिम बखरनी के पहले 10 टन / हे. के मान से अच्‍छी सडी हुई गोबर की खाद को मिला देना चाहिये। वर्षा पर निर्भर स्थिति में 40 :30 :20 (नत्रजन : फास्‍फोरस : पोटाश) कि.ग्रा. / हेक्‍टर की मान से देने हेतु सिफारिश की गई है। फास्‍फोरस एवं पोटाश की संपूर्ण मात्रा आधार खाद के रूप में तथा नत्रजन की आधी मात्रा के साथ मिलाकर बोनी के समय दी जानी चाहिये।&lt;br /&gt;नत्रजन की शेष मात्रा पौधों में फूल निकलने के समय यानी बोनी के 30 दिन बाद दी जा सकती है। रबी मौसम में फसल में सिफारिश की गई उर्वरकों की संपूर्ण मात्रा आधार रूप में बोनी के समय दी जानी चाहिये। तिलहनी फसल होने के कारण मिटटी में गंधक तत्‍व की उपलब्‍धता फसल के उत्‍पादन एवं दानों में तेल के प्रतिशत को प्रभावित करती है। अत: फास्‍फोरस तत्‍व की पूर्ति सिंगल सुपर फास्‍फेट उर्वरक द्वारा करना चाहिये। भूमि परीक्षण के उपरांत जमीन में यदि गंधक तत्‍व की कमी पायी जाती है तो वहॉं पर जिंक सल्‍फेट 25 कि.ग्रा. प्रति हेक्‍टर की दर से भूमि में तीन साल में एक बार अवश्‍य प्रयोग करें।&lt;br /&gt;सिंचाई&lt;br /&gt;खरीफ मौसम में फसल वर्षा आधारित होती है। अत: वर्षा की स्थिति , भूमि में नमी का स्‍तर, भूमि का प्रकार एवं फसल की मांग अनुरूप सिंचाई की आवश्‍यकता भूमि में पर्याप्‍त नमीं बनाये रखने के लिये होती है। खेतों में एकदम प्रात: काल के समय पत्तियों का मुरझाना , सूखना एवं फूलों का न फूलना लक्ष्‍य दिखाई देने पर फसल में सिंचाई की आवश्‍यकता को दर्शाते हैं। अच्‍छी उपज के लिये सिंचाई की क्रांतिक अवस्‍थाये बोनी से पूर्व या बोनी के बाद, फूल आने की अवस्‍था है, अत: इन तीनों अवस्‍थाओं पर किसान भाई सिंचाई अवश्‍य करें।&lt;br /&gt;निंदाई गुड़ाई&lt;br /&gt;बोनी के 15 -20 दिन बाद निंदाई एवं फसल में विरलीकरण की प्रक्रिया को पूरा कर लें। फसल में निंदा की तीव्रता को देखते हुये यदि आवश्‍यकता होने पर 15 -20 दिन बाद पुन: निंदाई करें। कतारा में कोल्‍पा अथवा हैंड हो चलाकर नींदा नियंत्रित किया जा सकता है, कतारों के बीच स्थित निंदा निंदाई करते हुये नष्‍ट करना चाहिये। रासायनिक विधि से नींदा नियंत्रण हेतु ‘’ लासो ‘’ दानेदार 10 प्रतिशत को 20 कि.ग्रा. / हे. के मान से बोनी के तुरंत बाद किन्‍तु अंकुरण के पूर्व नम भूमि मे समान रूपसे छिड़ककर देना चाहिये एलाक्‍लोर 1.5 लीटर सक्रिय घटक का छिड़काव पानी में घोलकर बोनी के तुरंत बाद किन्‍तु अंकुरण के पूर्व करने से खरपतवारों को नियंत्रित किया जा सकता है।&lt;br /&gt;पौध संरक्षण&lt;br /&gt;(अ)       कीट&lt;br /&gt;तिल की फसल को नुकसान पहुंचाने वाले प्रमुख कीटों में तिल की पत्‍ती मोडक फल्‍ली, छेदक , गाल फलाई , बिहार रोमिल इल्‍ली, तिल हॉक मॉथ आदि कीट प्रमुख है इन कीटों के अतिरिक्‍त जैसिड़ तिल के पौधों में एक प्रमुख बीमारी पराभिस्‍तम्‍भ (पायलोडी) फैलने में भी सहायक होता है।&lt;br /&gt;(1)              गाल फलाई के मैगोट फूल के भीतर भाग को खाते हैं और फूल के आवश्‍यक अंगों को नष्‍ट कर पित्‍त बनाते हैं। कीट संक्रमण सितंबर माह में फलियॉ निकलते समय शुरू होकर नवंबर माह के अंत तक सक्रिय रहते हैं। नियंत्रण हेतु कलियॉ निकलते समय फसल पर 0.03 प्रतिशत डाइमेथेएट या 0.06 प्रतिशत इन्‍डोसल्‍फान या 0.05 प्रतिशत मोनोक्रोटोफॉस कीटनाशक दवाई को 650 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्‍टर की मात्रा से छिड़काव करें।&lt;br /&gt;(2)              तिल की पत्‍ती मोडक एवं फली छेदक इल्लियॉ प्रारंभिक अवस्‍था में पत्तियों को खाती है। फसल की अंतिम अवस्‍था में यह फूलों का भीतरी भाग खाती है। फसल पर पहली बार संक्रमण 15 दिन की अवस्‍था पर होता है तथा फसल वृद्धि के पूरे समय तक सक्रिय रहता है। इसे नियंत्रण करने के लिये इन्‍डोसल्‍फान 0.07 प्रतिशत अथवा क्विनॉलफॉन 0.05 प्रतिशत का 750 लीटर पानी में घोलकर बनाकर प्रति हैक्‍टर की मान से फूल आने की अवस्‍था से आरंभ कर 15 दिनों के अंतराल से 3 बार छिड़काव करें।&lt;br /&gt;(3)              तिल हाक माथ इल्लियॉ पौधों की सभी पत्तियों खाती है। इस कीट का संक्रमण कभी – कभी दिखाई देता है। फसल की पूरी अवस्‍था में कीट सक्रिय रहते हैं। नियंत्रण हेतु इल्लियों को हॉथ से निकालकर नष्‍ट करें। कार्बोरिल का 20 किग्रा. प्रति हेक्‍टर के दर से खड़ी फसल में भुरकाव करना चाहिये।&lt;br /&gt;(3)&lt;br /&gt;(4)              बिहार रोमयुक्‍त इल्लियॉ आरंभिक अवस्‍था में लार्वा कुछ पौधों का अधिकांश भाग खाते हैं। परिपक्‍व इल्लियॉ दूसरे पौधों पर जाती है ओर तने को छोड़कर सभी भाग खाती है। इस आक्रमण खरीफ फसल में उत्‍तरी भारत में सितंबर और अक्‍टूबर के आरंभ में अधिक होता है। नियंत्रित करने हेतु इन्‍डोसल्‍फान 0.07 प्रतिशत या मोनोक्रोटोफॉस 0.05 प्रतिशत का 750 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति हेक्‍टर के मान से छिड़काव करें।&lt;br /&gt;(4)(ब) रोग&lt;br /&gt;(1)              फाइटोफथोरा अंगमारी&lt;br /&gt;पत्तियॉं तनों पर जलसिक्‍त धब्‍बे दिखाई देते हैं, इस स्‍थान पर सिंघाडे के रंग के धब्‍बे बनते हैं जो बाद में काले से पड़ जाते हैं। आर्द वातावरण में यह रोग तेजी से फैलता है जिससे पौधा झुलस जाता है एवं जड़े सड़ जाती है।&lt;br /&gt;(2) अल्‍टरनेरिया पर्णदाग -&lt;br /&gt;पत्तियों पर अनियंत्रित बैंगनी धब्‍बा तथा तने पर लग्‍बे बैंगनी धब्‍बे बनते हैं। रोग ग्रसित पत्तियॉ मुड जाती है।&lt;br /&gt;(3)  कोरिनोस्‍पोरा अंगमारी पत्तियों पर अनियंत्रित बैंगनी धब्‍बा तथा तने पर लग्‍ते बैंगनी धब्‍बे बनते हैं। रोगग्रसित पत्तियॉं मुड़ जाती हैं।&lt;br /&gt;(4)  जड़ सडन -&lt;br /&gt;(4)&lt;br /&gt;इस रोग में रोग्रसित पौधे की जड़े तथा आधार से छिलका हटाने पर काले स्‍कलेरोशियम दिखते हैं जिनसे जड़ का रंग कोयले के समान धूसर काला दिखता है। रोग से संक्रमित जड़ को कम शक्ति लगाकर उखाड़ने पर कॉच के समान टूट जाती है। तने के सहारे जमीन की सतह पर सफेद फफूंद दिखाई देती है जिसमें राई के समान स्‍क्‍लेरोशिया होते हैं। इसके अलावा फयुजेरियम सेलेनाई फफूंद के संक्रमित पौधों की जड़े सिकुडी सी लालीमायुक्‍त होती है।&lt;br /&gt;(5)  शाकाणु अंगमारी – पत्तियों पर गहरे, भूरे रंग के काले अनियंत्रित धब्‍बे दिखते हैं जो आर्द एवं गरम वातावरण में तेजी से बढने के कारण पत्‍ते गिर जाते हैं एवं तनों के संक्रमण में पौधा मर जाता है।&lt;br /&gt;(6)  शाकाणु पर्णदाग -  पत्तियों पर गहरे भूरे कोंणीय धब्‍बे जिनके किनारे काले रंग के दिखाई देते हैं।&lt;br /&gt;(7)  भभूतिया रोग – पत्तियों पर श्‍वेत चूर्ण दिखता है तथा रोग की तीव्रता में तनों पर भी दिखता है एवं पत्तियॉ झड जाती है।&lt;br /&gt;(8)  फाइलोड़ी – रोग में सभी पुष्‍पीय भाग हरे रंग की पत्तियों के समान हो जाते हैं। पत्तियॉ छोटे गुच्‍छों में लगती हैं। रोग ग्रस्‍त पौधों में फल्लियॉ नहीं बनती हैं यदि बनती हैं तो उसमें बीज नहीं बनता है।&lt;br /&gt;फसल कटाई&lt;br /&gt;फसल की सभी फल्लियॉ प्राय: एक साथ नहीं पकती किंतु अधिकांश फल्लियों का रंग भूरा पीला पड़ने पर कटाई करना चाहिये। फसल के गटठे बनाकर रख देना चाहिये। सूखने पर फल्लियों के मुंह चटक कर खुल जायें तब इनको उलटा करके डंडों से पीटकर दाना अलग कर लिया जाता है। इसके पश्‍चात बीज को सुखाकर 9 प्रतिशत नमी शेष रहने पर भंडारण करना चाहिये।&lt;br /&gt;उपज&lt;br /&gt;उपरोक्‍तानुसार अच्‍छी तरह से फसल प्रबंध होने पर तिल की सिंचित अवस्‍था में 1000-1200 कि.ग्रा. / हे. और असिंचित अवस्‍था में उचित वर्षा होने पर 500 – 600 कि.ग्रा. / हेक्‍टर उपज प्राप्‍त होती है।&lt;br /&gt; &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7319195525113358508-3793836175612856366?l=smalik06.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://smalik06.blogspot.com/feeds/3793836175612856366/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7319195525113358508&amp;postID=3793836175612856366' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7319195525113358508/posts/default/3793836175612856366'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7319195525113358508/posts/default/3793836175612856366'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://smalik06.blogspot.com/2008/10/blog-post_2985.html' title='तिल'/><author><name>malik</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09139758814525364467</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Eh8BkyTxt58/SJqthbJOKKI/AAAAAAAAADI/uvkv7Qt-o9A/s1600-R/hllo009%25255B1%25255D.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7319195525113358508.post-5331791064982983691</id><published>2008-10-14T01:23:00.000-07:00</published><updated>2008-10-14T01:24:11.545-07:00</updated><title type='text'>कुसुम</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;कुसुम&lt;br /&gt;कुसुम को करड़ी के नाम से भी जाना जाता है। कुसुम की जड़े जमीन में गहराई तक जाकर पानी सोख लेने की क्षमता रखने के कारण इसे बारानी खेती के लिये विशेष उपयुक्‍त पाया गया है। सिंचित क्षेत्र में कुसुम का पौधा कम पानी में भी सफलतापूर्वक उगता रहता है। सितंबर माह में भूमि में पर्याप्‍त नमी होते हुए भी अन्‍य रबी फसलें जैसे गेहूं चना आदि की बुआई अधिक तापमान के कारण नहीं कर सकते हैं। लेकिन कुसुम ताप असंवेदनशील होने के कारण इन परिस्थितियों में भी लग सकते है। लेकिन कुसुम ताप असंवेदनशील होने के कारण इन परिस्थितियों में भी लग सकते है और भूमि में स्थित नमी का पूरा लाभ ले सकते हैं। इसके दानों में तेल की मात्रा 30 से 35 प्रतिशत होती है। यह तेल खाने के लिये अच्‍छा स्‍वादिष्‍ट तथा इसमें पाये जाने वाले विपुल असतृप्‍त वसीय अम्‍लों के कारण हृदय रोगियों के लिए विशेष उपयुक्‍त होता है। इसके तेल में लिनोलिक अम्‍ल लगभग 42 प्रतिशत होता है जिसके कारण कोलेस्‍टेराल की मात्रा खून में नहीं बढ़ पाती है। अत: इसका सेवन हृदय रोगियों के लिये उपयुक्‍त रहता है। इसके हरे पत्‍तों की उत्‍तम स्‍वादिष्‍ट भाजी बनती है, जिसमें लौह तत्‍व तथा केरोटीन से भरपूर होने के कारण बहुत स्‍वास्‍थ्‍यप्रद होती है।&lt;br /&gt;कुसुम की सूखी लाल पंखुडियों से उत्‍तम प्रकृति का (खाने योग्‍य) रंग प्राप्‍त होता है। इन पं‍खुडि़यों से तैयार कुसुम चाय से चीन में बहुत सी बीमारियों का इलाज किया जाता है।&lt;br /&gt;उपयुक्‍त फसल पद्धति&lt;br /&gt;कुसुम को निम्‍नलिखित चार फसल पद्धतियों में बोया जाता है। खरीफ फसल कटते ही जितना जल्‍दी हो सके कुसुम को बोये।&lt;br /&gt;क्र.    &lt;br /&gt;फसल पद्धति&lt;br /&gt;खरीफ की फसल&lt;br /&gt;कुसुम बोने का समय&lt;br /&gt;1&lt;br /&gt;द्वितीय फसल के रूप में    &lt;br /&gt;मूंग, उड़द सोयाबीन    &lt;br /&gt;सितंबर अंत से अक्‍टूबर प्रथत सप्‍ताह 25 अक्‍टूबर तक&lt;br /&gt;2    &lt;br /&gt;बारानी खेती में    &lt;br /&gt;पड़त खेत&lt;br /&gt;सितंबर से अक्‍टूबर प्रथम सप्‍ताह&lt;br /&gt;3    &lt;br /&gt;एक या दो सिंचाई के साथ&lt;br /&gt;दलहनी फसल या सोयाबीन&lt;br /&gt;25 अक्‍टूबर तक&lt;br /&gt;4    &lt;br /&gt;अंतरवर्तीय फसल पद्धति चना +  कुसुम&lt;br /&gt;सोयाबीन या दलहनी फसल या पड़त खेत&lt;br /&gt;25 अक्‍टूबर तक&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अलसी + कुसुम&lt;br /&gt;सोयाबीन या दलहनी फसल या पड़त पड़त खेत&lt;br /&gt;25 अक्‍टूबर तक&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चना व अलसी के अतिरिक्‍त कुसुम को मसूर , राजगिरा , राई व सरसों के साथ भी अन्‍तर्वर्तीय फसल के रूप में ले सकते है। अन्‍तर्वर्तीय फसल पद्धति में कुसुम की 2 कतारों के बाद दूसरी फसल की 6 कतारें बोयी जाती है।&lt;br /&gt;बारानी खेती में सोयाबीन – कुसुम फसल पद्धति अधिक लाभकारी पाई गई है। खरीफ मौसम में उड़द एवं मूंग की फसल लेने के बाद जब खेत खाली हो जाते हैं तो उसी समय खेत की तैयारी करके कुसुम की बुआई कर सकते है। हालांकि उस समय तापमान अधिक रहता है लेकिन कुसुम फसल ताप असंवेदनशील होने के कारण इसकी बुआई सितंबर के अंत में कर सकते हैं, जबकि अन्‍य रबी फसलों की बुआई अधिक तापमान के कारण नहीं कर सकते हैं।&lt;br /&gt;उन्‍नत जातियॉ&lt;br /&gt;जातियॉ    &lt;br /&gt;पकने की अवधि (दिन)&lt;br /&gt;तेल की मात्रा (प्रतिशत)    &lt;br /&gt;उपज (कि/ हे.)&lt;br /&gt;दाने का आकार (ग्राम)    &lt;br /&gt;विशेषताऍं  &lt;br /&gt;जवाहर कुसुम -1&lt;br /&gt;140-145    &lt;br /&gt;30  &lt;br /&gt;1500-1600 &lt;br /&gt;5.5 – 6.5    &lt;br /&gt;कॉटेवाली, अधिक पैदावार बड़े दाने एवं फूल सफेद रंग&lt;br /&gt;जवाहर कुसुम – 1    &lt;br /&gt;142 -147    &lt;br /&gt;32  &lt;br /&gt;1300- 1400&lt;br /&gt;4.0-4.5    &lt;br /&gt;बिना कॉटेवाली, फूल लाल रंग के (खिले फूल पीले रंग के व मुरझाने पर नारंगी रंग के) दानों का आकार छोटा, छिलका पतला&lt;br /&gt;जवाहर कुसुम-73    &lt;br /&gt;140-145    &lt;br /&gt;31  &lt;br /&gt;1400-1500 &lt;br /&gt;4.5-5.0    &lt;br /&gt;बिना कॉटेवाली, फूल पीले-लाल (खिले फूल पीले व मुरझाने पर नारंगी लाल) दाना जवाहर कुसुम 7 से बड़ा&lt;br /&gt;जवहार कुसुम-97    &lt;br /&gt;135-140    &lt;br /&gt;30  &lt;br /&gt;1500-1600 &lt;br /&gt;5.5-6.5    &lt;br /&gt;बिना कॉटेवाली, अधिक उपज वाली फूल पीले – लाल (खिले फूल पीले व मुरझाने पर नारंगी लाल) दानों का आकार बड़ा&lt;br /&gt;जवाहर कुसुम -99  &lt;br /&gt;115-120    &lt;br /&gt;29  &lt;br /&gt;1100-1200 &lt;br /&gt;5.5-6.5    &lt;br /&gt;अर्द्धकॉटीय , बडे कैप्‍सूल बडे दाने, नारंगी रंग के फूल एवं छोटे पौधे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बुवाई&lt;br /&gt;1 . असिंचित अवस्‍था में भूमि में अधिक नमी नहीं होने पर :-&lt;br /&gt;असिंचित अवस्‍था में कुसुम की बोनी की जाना हो तो जमीन की अच्‍छी तैयारी करना अति आवश्‍यक है  जिससे खेत में नमी भरपूर नहीं होने पर भी अच्‍छा अंकुरण हो सके। बोनी के उपरान्‍त कतारों को कटाते हुए खेत में पाटा अवश्‍य चलावें।&lt;br /&gt;विधि&lt;br /&gt;. खेत की तैयारी व नमी को देखते हुए या तो सूखा बीज बोये (विशेषत: बोनी के बाद वर्षा की संभावना होने पर ) या बीज को 12 से 14 घंटे पानी में भिगोकर भी बिजाई कर सकते है।&lt;br /&gt;. बीज गहरा बोये ताकि वह नमी में गिरे तथा पाटा चलायें।&lt;br /&gt;सावधानी&lt;br /&gt;इस विधि से बोये खेत में अंकुरण के लिये बाद में सिंचाई नहीं दें।&lt;br /&gt;2 . खेत में पर्याप्‍त नमी नहीं होने पर विधि&lt;br /&gt;बीज सूखी जमीन में बोये और एक सिंचाई दें। यह पद्धति ज्‍यादा अच्‍छी है क्‍योंकि सिंचाई के पानी का उपयोग शुरू से ही अंकुरण व पौध के बढ़वार के लिये होता है।&lt;br /&gt;अच्‍छे अंकुरण के लिए उपाय&lt;br /&gt;कुसुम के अंकुरण का विशेष ध्‍यान रखना जरूरी है। अच्‍छा अंकुरण व पर्याप्‍त पौध संख्‍या अच्‍छी पैदावार का सूचक है। स्‍मरण रहे कि कुसुम को अंकुरण के लिये ज्‍यादा नमी की आवश्‍यकता होती है क्‍योंकि इसके बीज का छिलका कड़ा होता है। इसलिये जब तक बीज पर्याप्‍त नमी में नहीं गिरता व बीज के चारों ओर गीली मिटटी नहीं चिपकती तब तक बीज फूलेगा नहीं व अंकुरित नहीं होगा। यह आवश्‍यक है कि बोनी के तुरंत बाद पाटा चलाये जिससे कूड में से नमी उड़ नहीं पाये व गीली मिटटी बीज के चारो ओर चिपक रहे। यह ध्‍यान रहे कि बीज के अंकुरण के लिए ज्‍यादा नमी की आवश्‍यकता होती है लेकिन एक बार बीज फूलने पर अत्‍यधिक नमी बीज को नुकसान भी पहुंचाती है, जिससे अंकुरण नहीं होता। इसलिए बीज की बोनी नमी में करने के बाद व पाटा लगाने के बाद यदि वर्षा होती है या सिंचाई दी जाती है तो अंकुरण नहीं होता क्‍योंकि फूला हुआ बीज पानी के  संपर्क में आ जाता है  व सड़ जाता है। इसी प्रकार यदि बीज पानी में भिगोकर बोया है तो इसके बाद सिंचाई नहीं करें।&lt;br /&gt;भूमि&lt;br /&gt;मध्‍य से भारी काली / गहरी भूमि विशेष उपयुक्‍त होती है।&lt;br /&gt;बीज की मात्रा&lt;br /&gt;20 किलो ग्राम प्रति हेक्‍टर&lt;br /&gt;बोने की विधि&lt;br /&gt;बीज को कतारों में बोयें। कतारों की आपसी दूरी 45 से.मी. रखें। कतारों में पौधों से पौधें की दूरी 20 से.मी. रखना चाहिये।&lt;br /&gt;बीजोपचार&lt;br /&gt;3 ग्राम थायरम प्रति किलो ग्राम बीज में ( थायरम न होने पर बविस्टिन, ब्रासिकाल आदि फफूंद नाशक दवा)&lt;br /&gt;उर्वरक की मात्रा&lt;br /&gt;40 किलो ग्राम नत्रजन , 40 किलो ग्राम स्‍फुर प्रति हेक्‍टर। जहॉ पोटाश की आवश्‍यकता हो 20 किलो ग्राम पोटाश प्रति हेक्‍टर तथा 20 से 25 किलो ग्राम गंधक का प्रयोग करें।&lt;br /&gt;पौधों का विरलीकरण&lt;br /&gt;बोनी के 20 से 25 दिन बाद कतारों में पौधों की आपसी दूरी 20 से.मी. रखें।&lt;br /&gt;निंदाई एवं गुडाई&lt;br /&gt;अंकुरण के पश्‍चात आवश्‍यकतानुसार एक या दो बार निंदाई करने के बाद ‘डोरा’ चलाकर खेत को नींदा रहित रखें व मिटटी की पपडी को तोड़ते रहे जिससे भूमि में जल के ह्रास कम होगा।&lt;br /&gt;सिंचाई&lt;br /&gt;एक या दो सिंचाई देना पर्याप्‍त है। जब पौधा ऊचा बढ़ने लगें (लगभग 50-55 दिन बाद ) तब पहली सिंचाई व जब पौधे में शाखाऍ पूर्ण विकसित हो (लगभग 80-85 दिन बाद) तब दूसरी सिंचाई दें। दो से अधिक सिंचाई न करें।&lt;br /&gt;पौध संरक्षण&lt;br /&gt;(अ)           कीट&lt;br /&gt;1 . माहो&lt;br /&gt;कुसुम में माहों कीट की समस्‍या है। इसके नियंत्रण के लिए निम्‍न दो विधियॉ हैं।&lt;br /&gt;1          . नीम बीज के निमोली का 5 प्रतिशत घोल जब फसल पर सबसे पहले दिखायी दें उसके एक हफते बाद छिड़काव करें। इसके 15 दिन बाद रोगर (डाइमेथेएट) 750 मि.ली. दवा प्रति हेक्‍टर की दर से छिड़काव करें।&lt;br /&gt;2          जब माहो सर्वप्रथम कुसुम के फसल पर दिखाई दे तो तुरंत नीम बीज के निमोली का 5 प्रतिशत घोल खेत के चारों तरफ के बार्डर पर 2 मीटर चौडा छिड़काव करें और इसके 15 दिन बाद रोगर (डाइमेथोंएट) 750 मि.ली. दवा प्रति हेक्‍टर की दर से छिड़काव करें। इससे 90 प्रतिशत माहो नियंत्रित होते हैं क्‍योंकि यह कीट सबसे पहले बार्डर पर आते है इसके बाद खेत के अन्‍दर जाते हैं।&lt;br /&gt;22 . मक्‍खी तथा फलछेदक इल्‍ली&lt;br /&gt;यदि इन कीटों की समस्‍या हो तो तब थायोडान 750 मि.ली. प्रति हेक्‍टर का छिड़काव फसल पर करें।&lt;br /&gt;(ब) रोग&lt;br /&gt;कुसुम में रोग संबंधी कोई समस्‍या नहीं है। बिमारियॉ हमेशा वर्षा के बाद, अधिक आर्द्रता की वजह से, खेत में फैली गंदगी से, खेत के आस – पास काफी समय से संचित गंदा पानी फसल में बहकर आने से एक ही स्‍थान पर बार – बार कुसुम की फसल लेने से होती है। अत: उचित फसल- चक्र अपनाना, बीज उपचारित कर बोना व प्रतिवर्ष खेत बदलना आवश्‍यक है।&lt;br /&gt;1 . जड़ सडन रोग&lt;br /&gt;बोनी पूर्व बीजोपचार करें। सूखे से अत्‍यधिक प्रभावित फसल को एकाएक सिंचाई देने से यह रोग फैलता है।&lt;br /&gt;2. अल्‍टरनेरिया पत्‍तों के धब्‍बे&lt;br /&gt;बोनी पूर्व बीजोपचार करें। रोग नियंत्रण हेतु फसल पर डायथेन- एम 45 का 0.25 प्रतिशत छिड़काव करें।&lt;br /&gt;पक्षियों से सुरक्षा&lt;br /&gt;पक्षियों में विशेषकर तोते इस फसल को अधिक नुकसान पहुंचाते है। इसलिए दाने भरने से ले‍कर पकने तक लगभग तीन हफते फसल की रखवाली आवश्‍यक है। तोते कुसुम के कैप्‍सूल को काटकर नुकसान करते है एवं दानों को खाते है।&lt;br /&gt;कटाई एवं गहराई&lt;br /&gt;कार्यिक परिपक्‍वता (फसल पूर्ण सूखने) पर कांटेदार कुसुम की कटाई हाथ में दस्‍ताने पहिनकर या उसे कपड़े से लपेटकर या दो शाखा वाली लकड़ी में पौधे को फंसाकर दराते से करते है। गहराई पौधों को डंडे से पीटकर, चौडे मुंह वाले पावर थ्रेसर से या पौधों के उपर ट्रेक्‍टर चलाने से बड़ी आसानी से होती है। बिना कॉटे वाली जातियॉ की कटाई में कोई परेशानी या दस्‍ताने पहनने की जरूरत नहीं होती है।&lt;br /&gt;उपज&lt;br /&gt;असिंचित फसल    :     12 से 15 क्विंटल प्रति हेक्‍टर&lt;br /&gt;सिंचित फसल           :     25 से 30 क्विंटल प्रति हेक्‍टर&lt;br /&gt;आवश्‍यक सावधानियॉ&lt;br /&gt;. कुसुम को अन्‍य रबी फसलों की अपेक्षा जल्‍दी बोया जाता है। अत: जमीन की तैयारी बहुत जल्‍दी करना आवश्‍यक है।&lt;br /&gt;. बुवाई के समय जमीन में अंकुरण के लिये पर्याप्‍त नमी होना आवश्‍यक है।&lt;br /&gt;. कुसुम को गहरी जमीन में ही बोये।&lt;br /&gt;. उर्वरकों का संतुलित प्रयोग आवश्‍य करें।&lt;br /&gt;उपयोग&lt;br /&gt;. कुसुम फूल उत्‍तम औषधि&lt;br /&gt;. बीजों से उत्‍तम किस्‍म का स्‍वादिष्‍ट तेल।&lt;br /&gt;. यह तेल हृदय रोगियों के लिए विशेष उपयुक्‍त ।&lt;br /&gt;. तेल से वार्निश , रंग , साबून आदि उत्‍पादक पदार्थ बन सकते है।&lt;br /&gt;. हरी पत्तियों से स्‍वादिष्‍ट सब्‍जी एवं लौह तत्‍तव तथा केरोटीन से भरपुर।&lt;br /&gt;. फफूंद न लगने वाली खली जिसमें उत्‍तम प्रोटीन तत्‍व जो दुधारू पशुओं के लिए उपयुक्‍त&lt;br /&gt;. फूलों से प्राकृतिक उत्‍तम रंग।&lt;br /&gt;. शुष्‍कता प्रतिरोधी फसल जो कम वर्षा वाले क्षेत्रों में भी अधिक पैदावार देती है।&lt;br /&gt;. कांटेदार फसल पूर्ण बढ़ने पर जानवरों से सुरक्षा ।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7319195525113358508-5331791064982983691?l=smalik06.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://smalik06.blogspot.com/feeds/5331791064982983691/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7319195525113358508&amp;postID=5331791064982983691' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7319195525113358508/posts/default/5331791064982983691'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7319195525113358508/posts/default/5331791064982983691'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://smalik06.blogspot.com/2008/10/blog-post_6756.html' title='कुसुम'/><author><name>malik</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09139758814525364467</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Eh8BkyTxt58/SJqthbJOKKI/AAAAAAAAADI/uvkv7Qt-o9A/s1600-R/hllo009%25255B1%25255D.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7319195525113358508.post-6476358537287340547</id><published>2008-10-14T01:20:00.000-07:00</published><updated>2008-10-14T01:21:58.386-07:00</updated><title type='text'>अरहर</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;अरहर &lt;br /&gt;भारत विश्‍व में दलहनी फसलों के क्षेत्रफल एवं उत्‍पादन में प्रथम स्‍थान पर है। देश में दलहनी फसले 2 करोड़ 38 लाख हेक्‍टर भूमि में बोई जाती है, जिनकी उत्‍पादकता केवल 622 कि.ग्रा / हे. जो कि बहुत कम है। मध्‍यप्रदेश का स्‍थान दलहनी फसलों के क्षेत्र एवं उत्‍पादन में क्रमश: पहला व दूसरा है। मध्‍यप्रदेश में दलहनी फसलें 50.4 लाख हेक्‍टर भूमि में उगाई जाती है, जिससे सीधे नत्रजन ग्रहण कर पौधों को देती है, जिससे भूमि की उर्वरा शक्ति बनी रहती है। दलहनी फसले खाद्यान्‍न फसलों की अपेक्षा अधिक सूखारोधी होती है। इसलिये सूखा ग्रस्‍त प्रदेशों में भी इससे अधिक उपज मिलती है। कम अवधि की दलहनी फसलें अंतरवर्तीय व बहुफसल पद्धति में उपयुक्‍त होती हैं। दलहन प्रोटीन का सशक्‍त स्‍त्रोत होने से भारतियों के भोजन में इनका समावेश होता है।&lt;br /&gt;खरीफ की दलहनी फसलों में अरहर प्रमुख है। मध्‍य प्रदेश में अरहर को लगभग 4.75 लाख हेक्‍टर क्षेत्र में लिया जाता है जिससे औसतन 842 किलो ग्राम प्रति हेक्‍टर उत्‍पादन होता है। उन्‍नत तकनीक से अरहर का उत्‍पादन दो गुना किया जा सकता है।&lt;br /&gt;भूमि का चुनाव एवं तैयारी&lt;br /&gt;इसे विविध प्रकार की भूमि में लगाया जा सकता है, पर हल्‍की रेतीली दोमट या मध्‍यम भूमि जिसमें प्रचुर मात्रा में स्‍फुर तथा पी.एच.मान 7-8 के बीच हो व समुचित जल निकासी वाली हो इस फसल के लिये उपयुक्‍त है। गहरी भूमि व पर्याप्‍त वर्षा वाले क्षेत्र में मध्‍यम अवधि की या देर से पकने वाली जातियॉ बोनी चाहिए। हल्‍की रेतीली कम गहरी ढलान वाली भूमि में व कम वर्षा वाले क्षेत्र में जल्‍दी पकने वाली जातियां बोना चाहिए। देशी हल या ट्रेक्‍टर से दो-तीन बार खेत की गहरी जुताई करे व पाटा चलाकर खेत को समतल करें। जल निकासी की समुचित व्‍यवस्‍था करें।&lt;br /&gt;बोनी का समय, बीज की मात्रा व तरीका&lt;br /&gt;अरहर की बोनी वर्षा प्रारंभ होने के साथ ही कर देना चाहिए। सामान्‍यत: जून के अंतिम सप्‍ताह से लेकर जुलाई के प्रथम सप्‍ताह तक बोनी करें। जल्‍दी पकने वाली जातियों में 25- 30 किलोग्राम बीज प्रति हेक्‍टर एवं मध्‍यम पकने वाली जातियों में 15 से 20 किलो ग्राम बीज / हेक्‍टर बोना चाहिए। कतारों के बीच की दूरी शीघ्र पकने वाली जातियों के लिए 30 से 45 से.मी व मध्‍यम तथा देर से पकने वाली जातियों के लिए 60 से 75 सें.मी. रखना चाहिए। कम अवधि की जातियों के लिए पौध अंतराल 10-15 से.मी. एवं मध्‍यम तथा देर से पकने वाली जातियों के लिए 20 – 25 से.मी. रखें।&lt;br /&gt;बीजोपचार&lt;br /&gt;बोनी के पूर्व फफूदनाशक दवा से बीजोपचार करना बहुत जरूरी है। 2 ग्राम थायरस + ग्राम कार्बेन्‍डेजिम फफूदनाशक दवा प्रति किलो ग्राम बीज के हिसाब से उपचारित करें। उपचारित बीज को रायजोबियम कल्‍चर 10 ग्राम प्रति किलो बीज के हिसाब से उपचारित करें। पी.एच.बी. कल्‍चर का उपयोग करें।&lt;br /&gt;जातियों का चुनाव&lt;br /&gt;भूमि का प्रकार, बोने का समय, जलवायु आदि के आधर पर अरहर की जातियों का चुनाव करना चाहिए। ऐसे क्षेत्र जहॉ सिंचाई के साधन उपलब्‍ध हो बहुफसलीय फसल पद्धति हो या रेतीली हल्‍की ढलान वाली व कम वर्षा वाली असिंचित भूमि हो तो जल्‍दी पकने वाली जातियां बोनी चाहिए। मध्‍यम गहरी भूमि में जहॉं पर्याप्‍त वर्षा होती हो और सिंचित एवं असिंचित स्थिति में मध्‍यम अवधि की जातियॉ बोनी चाहिए। निम्‍न तालिका द्वारा उपयुक्‍त जातियों का विवरण दिया गया है:&lt;br /&gt;तालिका  - अरहर की उन्‍नत किस्‍में&lt;br /&gt;किस्‍म&lt;br /&gt;उपज क्विं / हे.&lt;br /&gt;अवधि (दिन)&lt;br /&gt;विशेषताऐं  &lt;br /&gt;खरगोन-2 &lt;br /&gt;10 – 12  &lt;br /&gt;150-160 &lt;br /&gt;असीमित वृद्धि वाली, लाल दाने की मध्‍यम अवधि वाली, उन्‍नत जाति&lt;br /&gt;जवाहर अरहर -3  &lt;br /&gt;15-18&lt;br /&gt;200-220 &lt;br /&gt;असीमित वृद्धि वाली लाल दाने की देरी से पकने वाली उन्‍नत जाति &lt;br /&gt;सी – 11  &lt;br /&gt;16-18&lt;br /&gt;160-180 &lt;br /&gt;असीमित वृद्धि वाली, लाल दाने की मध्‍यम अवधि वाली उकटा रोधक जाति&lt;br /&gt;आई.सी.पी.एल-87119(आशा)   &lt;br /&gt;18 – 20  &lt;br /&gt;160-180 &lt;br /&gt;असीमित वृद्धि वाली लाल दाने की मध्‍यम अवधि वाली उकटा रोधक तथा बहुरोग रोधी  &lt;br /&gt;जवाहर अरहर – 4 &lt;br /&gt;18-20&lt;br /&gt;180-200 &lt;br /&gt;असीमित वृद्धि वाली, लाल दाने की मध्‍यम देरी से पकने वाली&lt;br /&gt;न- 148   &lt;br /&gt;10-12&lt;br /&gt;160-180 &lt;br /&gt;असीमित वृद्धि वाली , लाल दाने&lt;br /&gt;जवाहर के.एम-7   &lt;br /&gt;20-22    &lt;br /&gt;170-180 &lt;br /&gt;असीमित वृद्धि वाली दाना मध्‍यम आकार का भूरा लाल रंग का उकटा रोधक&lt;br /&gt;उपास – 120    &lt;br /&gt;10-12&lt;br /&gt;130-140 &lt;br /&gt;असी‍मित वृद्धि वाली लाल दाने की , कम अवधि मे पकने वाली&lt;br /&gt;आई;सी.पी.एल-87(प्रगति) &lt;br /&gt;10-12&lt;br /&gt;125-135 &lt;br /&gt;सीमित वृद्धि वाली बीज मध्‍यम आकार व गहरा लाल रंग का, कम अवधि में पकती है    &lt;br /&gt;एम.ए.3   &lt;br /&gt;18-20&lt;br /&gt;210-230 &lt;br /&gt;असीमित वृद्धि वाली , दाना गहरे भूरे रंग का, म.प्र. के उत्‍तर पूर्व भाग के लिए उपयुक्‍त&lt;br /&gt;बी.एस.एम.आर – 853 (वैशली) &lt;br /&gt;18-20&lt;br /&gt;160-180 &lt;br /&gt;असीमित वृद्धि वाली , सफेद दाना, की मध्‍यम अवधि वाली बहुरोग रोधी किस्‍म&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उरर्वरक का प्रयोग&lt;br /&gt;बुवाई के समय 20 किग्रा. नत्रजन 50 किग्रा स्‍फुर 20 किग्रा पोटाश व 20 किग्रा गंधक प्रति हेक्‍टर कतारों में बीज के नीचे दिया जाना चाहिए। तीन वर्ष में एक बार 25 कि.ग्रा जिंक सल्‍फेट का उपयोग आखरी बखरीनी पूर्व भुरकाव करने से पैदावार में अच्‍छी बढोत्रो होती है।&lt;br /&gt;सिंचाई&lt;br /&gt;जहां सिंचाई की सुविधा उपलब्‍ध हो वहां एक सिंचाई फूल आने पर व दूसरी फलियॉ बनने की अवस्‍था पर करने से पैदावार अच्‍छी होती है।&lt;br /&gt;खरपतवार प्रबंधन&lt;br /&gt;खरपतवार नियंत्रण के लिए 20-25 दिन में पहली निंदाई तथा फूल आने से पूर्व दूसरी निंदाई करें। 2-3 बार खेत में कोल्‍पा चलाने से नीदाओं पर अच्‍छा नियंत्रण रहता है व मिटटी में वायु संचार बना रहता है। पेन्‍डीमेथीलिन 1.25 किग्रा सक्रिय तत्‍व/ हे. बोनी के बाद प्रयोग करने से नींदा नियंत्रण होता है। नींदानाषक प्रयोग के बाद एक नींदाई लगभग 30 से 40 दिन की अवस्‍था पर करना चाहिए।&lt;br /&gt;अंतरवर्तीय फसल&lt;br /&gt;अंतरवर्तीय फसल पद्धति से मुख्‍य फसल को पूर्ण पैदावार एवं अंतरवर्तीय फसल से अतिरिक्‍त पैदावार प्राप्‍त होगी। मुख्‍य फसल में कीटों का प्रकोप होने पर या किसी समय में मौसम की प्रतिकूलता होने पर किसी न किसी फसल से सुनिश्चित लाभ होगा। साथ-साथ अंतरवर्तीय फसल पद्धति में कीटों और रोगों का प्रकोप नियंत्रित रहता है। निम्‍न अंतरवर्तीय फसल पद्धति म.प्र. के लिए उपयुक्‍त है:&lt;br /&gt;1 . अरहर + मक्‍का का ज्‍वार 2:1 कतारों के अनुपात में (कतारों के बीच की दूरी 40 से.मी)&lt;br /&gt;2 . अरहर +  मूंगफली या सोयाबीन 2:4 कतारों के अनुपात में&lt;br /&gt;3 . अरहर + उड़द या मूंग 1:2 कतारों के अनुपात में&lt;br /&gt;पौध संरक्षण&lt;br /&gt;(अ)           रोग&lt;br /&gt;उकटा रोग: इस रोग का प्रकोप अधिक होता है। यह फयूजेरियम नामक कवक से फैलता है। रोग के लक्षण साधारणतया फसल में फूल लगने की अवस्‍था पर दिखाई देते है। नवम्‍बर से जनवरी महीनें के बीच में यह रोग देखा जा सकता है। पौधा पीला होकर सूख जाता है। इससें जडें सड़ गर गहरें रंग की हो जाती है तथा छाल हटाने पर जड़ से लेकर तने की ऊचाई तक काले रंग की धारियॉ पाई जाती है। इस बीमारी से बचने के लिए रोग रोधी जातियॉ जैसे सी – 11 जवाहर के.एस -7 बी.एस.एम.आर – 853 , आशा आदि बोये। उन्‍नत जातियों का बीज बीजोपचार करके ही बोयें । गर्मी में खेत की गहरी जुताई व अरहर के साथ ज्‍वार की अंतरवर्तीय फसल लेने से इस रोग का संक्रमण कम होता है।&lt;br /&gt;2 . बांझपन विषाणु रोग : यह रोग विषाणु (वायरस) से फैलता है। इसके लक्षण पौधे के उपरी शाखाओं में पत्तियॉ छोटी , हल्‍के रंग की तथा अधिक लगती है और फूल – फली नही लगती है। ग्रसित पौधों में पत्तियॉ अधिक लगती है। यह रोग माइट मकडी के द्वारा फैलता है। इसकी रोकथाम हेतु रोग रोधी किस्‍मों को लगाना चाहिए। खेत में उग आये बेमौसम अरहर के पौधों को उखाड कर नष्‍ट कर देना चाहिए। मकडी का नियंत्रण करना चाहिए।&lt;br /&gt;3 . फायटोपथोरा झुलसा रोग: रोग ग्रसित पौधा पीला होकर सूख जाता है। इसकी रोकथाम हेतु 3 ग्राम मेटेलाक्‍सील फफूंदनाशक दवा प्रति किलो ग्राम बीज के हिसाब से उपचारित करें। बुआई पाल (रिज) पर करना चाहिए और मूंग की फसल साथ में लगाये।&lt;br /&gt;ब. कीट : -&lt;br /&gt;1 . फली मक्‍खी : यह फली पर छोटा सा गोल छेद बनाती है। इल्‍ली अपना जीवनकाल फली के भीतर दानों को खाकर पूरा करती है एवं खाद में प्रौढ़ बनकर बाहर आती है। दानों का सामान्‍य विकास रूक जाता है।&lt;br /&gt;मादा छोटे व काले रंग की होती है जो वृद्धिरत फलियों में अंडे रोपण करती है। अंडो से मेगट बाहर आते है ओर दाने को खाने लगते है। फली के अंदर ही मेगट शंखी में बदल जाती है जिसके कारण दानों पर तिरछी सुरंग बन जाती है ओर दानों का आकार छोटा रह जाता है। तीन सप्‍ताह में एक जीवन चक्र पूर्ण करती है।&lt;br /&gt;2 . फली छेदक इल्‍ली : -  छोटी इल्लियॉ फलियों के हरे उत्‍तकों को खाती है व बडे होने पर कलियों , फूलों फलियों व बीजों पर नुकसान करती है। इल्लियॉ फलियों पर टेढे – मेढे छेद बनाती है। &lt;br /&gt;इस कीट की मादा छोटे सफेद रंग के अंडे देती है। इल्लियॉ पीली, हरी, काली रंग की होती है तथा इनके शरीर पर हल्‍की गहरी पटिटयॉ होती है। अनुकूल परिस्थितियों में चार सप्‍ताह में एक जीवन चक्र पूर्ण करती है।&lt;br /&gt;3 . फल्‍ली का मत्‍कुण : मादा प्राय: फलियों पर गुच्‍छों में अंडे देती है। अंडे कत्‍थई रंग के होते है। इस कीट के शिशु वयस्‍क दोनों ही फली एवं दानों का रस चूसते है, जिससे फली आडी-तिरछी हो जाती है एवं दाने सिकुड जाते है। एक जीवन चक्र लगभग चार सप्‍ताह में पूरा करते है।&lt;br /&gt;4 . प्‍लू माथ -  इस कीट की इल्‍ली फली पर छोटा सा गोल छेद बनाती है। प्रकोपित दानों के पास ही इसकी विश्‍टा देखी जा सकती है। कुछ समय बाद प्रकोपित दानो के आसपास लाल रंग की फफूंद आ जाती है।&lt;br /&gt;5 . ब्रिस्‍टल ब्रिटल :- ये भृंग कलियों, फूलों तथा कोमल फलियों को खाती है जिससे उत्‍पादन में काफी कमी आती है। यक कीट अरहर मूंग, उड़द , तथा अन्‍य दलहनी फसलों पर भी नुकसान पहुंचाता है। भृंग को पकडकर नष्‍ट कर देने से प्रभावी नियंत्रण हो जाता है।&lt;br /&gt;(ब) कीट&lt;br /&gt;कीटो के प्रभावी नियंत्रण हेतु समन्वित प्रणाली अपनाना आवश्‍यक है&lt;br /&gt;1 . कृषि कार्य द्वारा : गर्मी में खेत की गहरी जुताई करें&lt;br /&gt;2. शुद्ध अरहर न बोयें&lt;br /&gt;3 . फसल चक्र अपनाये&lt;br /&gt;4 . क्षेत्र में एक ही समय बोनी करना चाहिए&lt;br /&gt;5 . रासायनिक खाद की अनुशंसित मात्रा का प्रयोग करें।&lt;br /&gt;6 . अरहर में अन्‍तरवर्तीय फसले जैसे ज्‍वार, मक्‍का, या मूंगफली को लेना चाहिए।&lt;br /&gt;2 . यांत्रिक विधि द्धारा : -&lt;br /&gt;1. फसल  प्रपंच लगाना चाहिए&lt;br /&gt;2 . फेरामेन प्रपंच लगाये&lt;br /&gt;3 . पौधों को हिलाकर इल्लियों को गिरायें एवं उनकों इकटठा करके नष्‍ट करें&lt;br /&gt;4 . खेत में चिडियाओं के बैठने की व्‍यवस्‍था करे।&lt;br /&gt;3 . जैविक नियंत्रण द्वारा : -&lt;br /&gt;1 . एन.पी.वी 5000 एल.ई / हे.  + यू.वी. रिटारडेन्‍ट 0.1 प्रतिशत + गुड 0.5 प्रतिशत मिश्रण को शाम के समय खेत में छिडकाव करें।&lt;br /&gt;2 . बेसिलस थूरेंजियन्‍सीस 1 किलोग्राम प्रति हेक्‍टर  + टिनोपाल 0.1 प्रतिशत + गुड 0.5 प्रतिशत का छिड़काव करे। &lt;br /&gt;4 जैव – पौध पदार्थ के छिड़काव द्वारा : -&lt;br /&gt;1 . निंबोली सत 5 प्रतिशत का छिड़काव करे।&lt;br /&gt;2 . नीम तेल या करंज तेल 10 -15 मी.ली. + 1 मी.ली. चिपचिपा पदार्थ (जैसे सेन्‍डोविट टिपाल) प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।&lt;br /&gt;3 . निम्‍बेसिडिन 0.2 प्रतिशत या अचूक 0.5 प्रतिशत का छिड़काव करें।&lt;br /&gt;5 रासायनिक नियंत्रण द्वारा&lt;br /&gt;1 . आवश्‍यकता पड़ने पर ही कीटनाशक दवाओं का प्रयोग करें।&lt;br /&gt;2 . फली मक्‍खी नियंत्रण हेतु संर्वागीण कीटनाशक दवाओं का छिडकाव करे जैसे डायमिथोएट 30 ई.सी 0.03 प्रतिशत मोनोक्रोटोफॉस 36 एस.एल. 0.04 प्रतिशत आदि।&lt;br /&gt;3 . फली छेदक इल्लियों के नियंत्रण के लिए – फेनवलरेट 0.4 प्रतिशत चूर्ण या क्‍लीनालफास 1.5 प्रतिशत चूर्ण या इन्‍डोसल्‍फान 4 प्रतिशत चूर्ण का 20 से 25 किलोग्राम / हे. के दर से भुरकाव करें या इन्‍डोसलफॉन 35 ईसी. 0.7 प्रतिशत या क्‍वीनालफास 25 ई.सी 0.05 प्रतिशत या क्‍लोरोपायरीफॉस 20 ई.सी . 0.6 प्रतिशत या फेन्‍वेलरेट 20 ई.सी 0.02 प्रतिशत या एसीफेट 75 डब्‍लू पी 0.0075 प्रतिशत या ऐलेनिकाब 30 ई.सी 500 ग्राम सक्रिय तत्‍व प्रति हे. या प्राफेनोफॉस 50 ई.सी एक लीटर प्रति हे. का छिड़काव करें। दोनों कीटों के नियंत्रण हेतु प्रथम छिडकाव सर्वागीण कीटनाशक दवाई का करें तथा 10 दिन के अंतराल से स्‍पर्श या सर्वागीण कीटनाशक दवाई का छिड़काव करें। कीटनाशक का तीन छिड़काव या भुरकाव पहला फूल बनने पर दूसरा 50 प्रतिशत फुल बनने पर और तीसरा फली बनने बनने की अवस्‍था पर करना चाहिए।&lt;br /&gt;नोट: - इन्‍डोसल्‍फान 35 ई.सी 0.07 प्रतिशत का छिड़काव करें। यह लाभदायी कीट केम्‍पोलिटेसीस क्‍लोरिडी नामक कीट के लिए बहुत सुरक्षित पाया गया है।&lt;br /&gt;कटाई एवं गहराई&lt;br /&gt;जब पौधे की पत्तियॉं गिरने लगे एवं फलियॉ सूखने पर भूरे रंग की पड़ जाए तब फसल को काट लेना चाहिए। खलिहान में 8- 10 दिन धूप में सूखाकर ट्रेक्‍टर या बैलों द्वारा दावन कर गहाई की जाती है। बीजों को 8-9 प्रतिशत नमी रहने तक सूखाकर भण्‍डारित करना चाहिए।&lt;br /&gt;उननत उत्‍पादन तकनीकी अपनाकर अरहर की खेती करने से 15-20 क्विं / हे. उपज असिंचित अवस्‍था में और 25-30 क्विं/ हे. उपज सिंचित अवस्‍था में प्राप्‍त की जा सकती है। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7319195525113358508-6476358537287340547?l=smalik06.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://smalik06.blogspot.com/feeds/6476358537287340547/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7319195525113358508&amp;postID=6476358537287340547' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7319195525113358508/posts/default/6476358537287340547'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7319195525113358508/posts/default/6476358537287340547'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://smalik06.blogspot.com/2008/10/blog-post_5534.html' title='अरहर'/><author><name>malik</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09139758814525364467</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Eh8BkyTxt58/SJqthbJOKKI/AAAAAAAAADI/uvkv7Qt-o9A/s1600-R/hllo009%25255B1%25255D.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7319195525113358508.post-734678528026194710</id><published>2008-10-14T00:33:00.000-07:00</published><updated>2008-10-14T00:34:37.204-07:00</updated><title type='text'>आम</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;आम&lt;br /&gt;प्रश्‍न- आम में खाद एवं उर्वरकों की कितनी मात्रा होती है ?&lt;br /&gt;उत्‍तर- अमोनिया सल्‍फेट, सुपर फास्‍फेट और म्‍युरेट ऑफ पोटाश का 1:3:1 का मिश्रण तैयार कर लिया जाता है और पौधे की आयु के हिसाब से उसकी नीचे लिखी मात्राएं प्रयोग की जाती हैं।&lt;br /&gt;पौधे की आयु (वर्षो में)&lt;br /&gt;उर्वरक-मिश्रण (कि.ग्रा)    &lt;br /&gt;गोबर की खाद (कि.ग्रा)    &lt;br /&gt;1    &lt;br /&gt;0.5  &lt;br /&gt;10  &lt;br /&gt;2   &lt;br /&gt;1    &lt;br /&gt;20  &lt;br /&gt;3   &lt;br /&gt;1    &lt;br /&gt;30  &lt;br /&gt;4         &lt;br /&gt;1.5  &lt;br /&gt;40  &lt;br /&gt;5   &lt;br /&gt;1.5  &lt;br /&gt;40  &lt;br /&gt;6-10 &lt;br /&gt;2 से 2.5  &lt;br /&gt;40  &lt;br /&gt;11 – 15&lt;br /&gt;3 से 5    &lt;br /&gt;60  &lt;br /&gt;15 के ऊपर&lt;br /&gt;5 से 10   &lt;br /&gt;60  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तीन साल तक की आयु वाले पौधों के खाद, 2 खुराकों में क्रमश: मार्च और जून में देनी चाहिए। फल वाले वृक्षों में उर्वरकों के मिश्रण की आधी खुराक जुलाई के महीने में और शेष आधी खुराक अक्‍टूबर के महीने में दी जानी चाहिए।&lt;br /&gt;प्रश्‍न- आम की मुलायम पत्तियां व शाखाओं से रस सूचने वाले कीट की राकथाम ?&lt;br /&gt;उत्‍तर- जनवरी के महीने से या कली फटने की अवस्‍था से हर 20 दिन के अन्‍तर पर वृक्षों पर कोनफिडोर की 100 मि.ली दवा प्रति 200 लीटर पानी में मिलाकर या 0.2 प्रतिशत मैलाथियान का छिड़काव कम से कम दो-तीन बार अवश्‍य करें।&lt;br /&gt;प्रश्‍न- आम के पौधों में उन कीड़ों की रोकथाम जो कोशिका से रस चूस लेते हैं, जिससे मुलायम शाखायें और मंजरियां सूख जाती हैं तथा अधपके फल गिर जाते हैं। &lt;br /&gt;उत्‍तर- गर्मियों में पेड़ के आस-पास की मिट्टी की गुड़ाई करने से इस कीड़े के अण्‍डे नष्‍ट हो जाते हैं। इसके अलावा पौधें के मुख्‍य तने के जमीन के पास वाले भाग पर 30 से.मी. चौडी अल्‍काथीन या प्‍लांस्टिक की एक मिट्टी लपेट देने से व उस पर कोई चिकना पदार्थ लगाने से इस कीड़े के शिशु पेड़ पर नहीं चढ़ पाते। इसके अलावा पेड़ के चारों तरफ 2 प्रतिशत मिथाइल पैराथियान को पौधे के जड़ों में डालें।&lt;br /&gt;प्रश्‍न- आम की गुठली में छेद करके उसे खाने वाली इल्‍ली की रोकथाम ?&lt;br /&gt;उत्‍तर- इसकी रोकथाम के लिए जो भी फल पेड़ से गिर पड़े उसे तथा पेड़ की सूखी पत्तियों और शाखाओं को इकटठा करके नष्‍ट कर दें और क्‍लोरोपाइरीफास और साइपरमैथरीन के मिश्रण की 2 मि.ली दवा प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें। &lt;br /&gt;प्रश्‍न- आम के पौधे में तने पर छिद्र करके जाला बुनने वाले कीट की रोकथाम?&lt;br /&gt;उत्‍तर- इस कीट की रोकथाम के लिये इसके द्धारा बनाये गये छिद्रों को किसी पतले तार से साफ करके उनमें 0.3 से 0.4 प्रतिशत क्‍लोरोपाइरीफास में रूई भिगोकर छेद में डाल कर बंद कर देना चाहिए।&lt;br /&gt;प्रश्‍न- आम के पौधे में कब और कितनी बार सिंचाई की जाती है ?&lt;br /&gt;उत्‍तर- कम आयु वाले पौधों को गर्मियों के मौसम में हर सप्‍ताह और सर्दियों के मौसम में हर पखवाड़े सींचाना चाहिए। जिन वृक्षों पर फल आ रहे हो उन्‍हें फल आने की अवस्‍था से लेकर फलों के पकने की अवस्‍था तक हर 10 दिन के बाद सींचना चाहिए।&lt;br /&gt;प्रश्‍न – आम के पत्‍तों पर सफेद चूर्ण पड़ने से मंजरियां और फूल सूखकर गिर जाते हैं। उपाय बताएं ?&lt;br /&gt;उत्‍तर – इस बीमारी के लक्षण दिखाई देते ही आम के पेडों पर 0.2 से 0.3 प्रतिशत वाले गंधक के घोल का छिड़काव करे। इसके अलावा 250 लीटर पानी में 500 ग्राम कैराथेन घोल का छिड़काव करें।&lt;br /&gt;प्रश्‍न – आम के पत्‍तों, शाखाओं ओर फूलों जैसे मुलायम भागों पर गहरे भूरे रंग के धब्‍बे पड़ जाते हैं। उपाय बताये ?&lt;br /&gt;उत्‍तर – प्रभावित पौधों पर 0.2 प्रतिशत जिनैब का छिड़काव करें इसके 15 दिन बाद 0.3 प्रतिशत कॉपर आक्‍सीक्‍लोराइड का छिड़काव करें।&lt;br /&gt;प्रश्‍न – आम के उस रोग से रोकथाम जिसमें पूरा और नपुंसक फलों का एक ठोस गुच्‍छा बन जाता है।&lt;br /&gt;उत्‍तर – प्रभातिव बौर और शाखाओं को तोड़ दें। इसके अलावा अक्‍टूबर के महीने में प्‍लेनोफिक्‍स की एक मिली. मात्रा 4.5 लीटर पानी का घोल बनाकर छिड़काव करें और कलियां आने की अवस्‍था में जनवरी के महीने में पेड़ के बौर तोड़ दें।&lt;br /&gt;प्रश्‍न – आम के उस रोग का नियंत्रण जिसमें पत्तियां पीली पड़ जाती है और मुरझा जाती हैं&lt;br /&gt;उत्‍तर – प्रभावित पौधों पर कार्बेन्‍डाजिम 25 ग्राम 10 लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें एवं जड़ों के आस- पास डाल दें या डायथेन एम-45 की 2 ग्राम प्रति लीटर पानी के घोल का छिड़काव करें इसके 10 -15 बाद 0.5 प्रतिशत यूरिया का छिड़काव करें।&lt;br /&gt;प्रश्‍न- 5 वर्ष के बीज जनित आम के पेड़ में फल नहीं लगने का कारण बताएं ?&lt;br /&gt;उत्‍तर – आम के पेड़ जो बीज से जनित पेड़ होते हैं वो फल बहुत देर से देते हैं जब पेड़ आकार में भारी जो जातें हैं। इस तरह के पेड़ 10 साल बाद ही फल देना शुरू करते हैं।&lt;br /&gt;प्रश्‍न – आम के पेड़ में पिछले पांच वर्षो से फल नहीं आ रहें हैं। उपाय बायें ?&lt;br /&gt;उत्‍तर – आम की पुरानी शाखाएं काट दें तथा कटाई – छंटाई समय पर करें। इसमें पेड़ के तने से 2 फीट दूरी पर गड्ढ़ा किया जाता है और एक पेड़ में 3.0 ग्राम पेक्‍लोब्‍यूट्राजोल या कल्‍टार को मिट्टी में मिलाकर सितंबर के महिने में प्रति पेड़ की दर से डालना चाहिए तथा मिट्टी की जांच करायें।&lt;br /&gt;प्रश्‍न- आम के पौधों में जड़ सड़न रोग की रोकथाम ?&lt;br /&gt;उत्‍तर – खाद एवं उर्वरक देते समय ट्राइकोडर्मा की 4-5 ग्राम मात्रा प्रति किलो सड़ी हुई गोबर की खाद में मिला कर पौधे की जड़ों में दें तथा इसके साथ बाविस्‍टीन की 2 ग्राम प्रति लीटर पानी का घोल बनाकर दें।&lt;br /&gt;प्रश्‍न – 8 वर्षीय आम के पेड़ में अच्‍छी फलत लगने के उपाय ?&lt;br /&gt;उत्‍तर – गोबर की खाद लगभग 89 किलो, नाइट्रोजन 200 ग्राम ऑफ ईयर (फल न आने वाला वर्ष) में व ऑन ईयर (फल आने वाला वर्ष) में 400 ग्राम, अन्‍य सभी की मात्रा ऑन ईयर और ऑफ ईयर के लिए बराबर दें। फास्‍फोरस 130 ग्राम, पोटेशियम 500 ग्राम, कैन 800 , एम.ओ.पी. 800 ग्राम। फल गिरने के बचाव के लिए 2 4 डी की 2 ग्राम दवा 100 लीटर पानी में मिलाकर अप्रैल या मई के अंतिम सप्‍ताह में छिड़काव करें। पैक्‍लोब्‍यूट्राजोल 10 ग्राम प्रति पेड़ सितंबर से अक्‍टूबर ड्रिंच करें।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7319195525113358508-734678528026194710?l=smalik06.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://smalik06.blogspot.com/feeds/734678528026194710/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7319195525113358508&amp;postID=734678528026194710' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7319195525113358508/posts/default/734678528026194710'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7319195525113358508/posts/default/734678528026194710'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://smalik06.blogspot.com/2008/10/blog-post_3969.html' title='आम'/><author><name>malik</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09139758814525364467</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Eh8BkyTxt58/SJqthbJOKKI/AAAAAAAAADI/uvkv7Qt-o9A/s1600-R/hllo009%25255B1%25255D.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7319195525113358508.post-3786770514895179043</id><published>2008-10-14T00:32:00.000-07:00</published><updated>2008-10-14T00:33:27.845-07:00</updated><title type='text'>अनार</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;अनार&lt;br /&gt;प्रश्‍न- अनार में पत्‍तों पर धब्‍बों के लिए समाधान ?&lt;br /&gt;उत्‍तर- इसके लिए जैसे ही कुछ पत्‍तों पर धब्‍बे दिखें तभी मैंकोजेब 2 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।&lt;br /&gt;प्रश्‍न- अनार में फल सड़न से बचाव ?&lt;br /&gt;उत्‍तर- इसके लिए 2 ग्राम प्रति लीटर कवच और 1 ग्राम प्रति लीटर कार्बेन्‍डाजिम से छिड़काव करें।&lt;br /&gt;प्रश्‍न- अनार में फल के झड़ने की रोकथाम?&lt;br /&gt;उत्‍तर- पेड़ पर ज्‍यादा फल आने से फल झडते हैं और ये आंधी, पानी की कमी, ज्‍यादा नाइट्रोजन, ज्‍यादा तापमान, ज्‍यादा पानी और परागण की कमी से होता है इनका उचित ध्‍यान रखें। प्‍लेनोफिक्‍स 1 मिली. / 3-4 लीटर पानी का छिड़काव फूल आने के समय करना चाहिए। &lt;br /&gt;प्रश्‍न- अनार में फल छेदक कीट का नियंत्रण ?&lt;br /&gt;उत्‍तर- इसके नियंत्रण के लिए साइपर मैथरीन या मोनोक्रोटोफास 0.2 प्रतिशत का छिड़काव करें।&lt;br /&gt;प्रश्‍न- अनार में खाद एवं उर्वरक की मात्रा ?&lt;br /&gt;उत्‍तर- अनार के 3 वर्ष से ज्‍यादा के पौधे में 20 किलो गोबर की खाद 1.5 किसान खाद, 1 किलो सुपर फास्‍फेट, 7.5 ग्राम पोटाश का प्रयोग करें। 20 किलो गोबर की खाद, आधी मात्रा किसान खाद और पूरी मात्रा सुपर फास्‍फेट और पोटाश की दिसंबर या जनवरी में दे तथा बची हुई किसान खाद का चौथाई हिस्‍सा फल बनते समय और चौथाई हिस्‍सा फल बनने के चार पांच हप्‍ते के बाद दे।&lt;br /&gt;प्रश्‍न- अनार के पौधे में सिंचाई का समय?&lt;br /&gt;उत्‍तर- अनार की अच्‍छी पैदावार और उपज के लिए नियोजित सिंचाई की बहुत आवश्‍यकता है। गर्मियों के मौसम में सिंचाई की अधिक आवश्‍यकता होती है पौधों में सिंचाई 7-10 दिन के अंतराल पर करते हैं।&lt;br /&gt; प्रश्‍न- अनार के फलों में तितली के द्वारा नुकसान की रोकथाम ?&lt;br /&gt;उत्‍तर- इसके लिए साइपर मैथरीन 0.2 प्रतिशत का छिड़काव करें एवं 15 दिन बाद मोनोक्रोटोफास 0.2 प्रतिशत का भी छिड़काव करें।&lt;br /&gt;प्रश्‍न- अनार के पौधे में एफिड के प्रकोप का नियंत्रण ?&lt;br /&gt;उत्‍तर- इसकी रोकथाम के लिए एमिडाक्‍लोप्रिड नामक रसायन की 1 मि.ली. मात्रा एक लीटर पानी के हिसाब से घोल बनाकर छिड़काव करें।&lt;br /&gt;प्रश्‍न- अनार के पौधे में तना छेदक कीट का नियंत्रण ?&lt;br /&gt;उत्‍तर- क्‍लोरोपाइरीफोस एवं साइपर मैथरीन दवा के मिश्रण की 2 मि.ली. मात्रा प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।&lt;br /&gt;प्रश्‍न- अनार की पत्तियों तथा फल पर छोटे भूरे रंग के घब्‍बे का नियंत्रण ?&lt;br /&gt;उत्‍तर- मैंकोजेब की 500 ग्राम मात्रा व कारबेंडाजिम की 100 ग्राम मात्रा को 200 से 250 लीटर पानी में घोल बनाकर फल बनते समय छिड़काव करें और पूर्ण रोकथाम के लिए 10- 15 दिन पर दो छिड़काव करें। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7319195525113358508-3786770514895179043?l=smalik06.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://smalik06.blogspot.com/feeds/3786770514895179043/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7319195525113358508&amp;postID=3786770514895179043' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7319195525113358508/posts/default/3786770514895179043'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7319195525113358508/posts/default/3786770514895179043'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://smalik06.blogspot.com/2008/10/blog-post_5102.html' title='अनार'/><author><name>malik</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09139758814525364467</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Eh8BkyTxt58/SJqthbJOKKI/AAAAAAAAADI/uvkv7Qt-o9A/s1600-R/hllo009%25255B1%25255D.gif'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7319195525113358508.post-8597910812582566413</id><published>2008-10-14T00:31:00.000-07:00</published><updated>2008-10-14T00:32:14.232-07:00</updated><title type='text'>पपीता</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;पपीता&lt;br /&gt;प्रश्‍न – पपीते के पेड़ से छाल पीला होकर गिरने, लड़ गलने और पत्तियों के सूखने से पौधे मर जाते हैं। नियंत्रण बनायें ?&lt;br /&gt;उत्‍तर – जल निकास में सुधर करें और ग्रसित पौधों को तुरन्‍त उखाड़कर फैंक दें। पौधों पर एक प्रतिशत र्बोडों मिश्रण या कॉपर आक्‍सीक्‍लोराइड को 3 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें या करजेट एम-8 1 ग्राम प्रति लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें।&lt;br /&gt;प्रश्‍न – पपीते की नर्सरी में पौधों के गलकर मरने से बचाव ?&lt;br /&gt;उत्‍तर- बीज बोने से पहले बाविस्‍टीन 2 से 3 ग्राम प्रति किलो बीज से उपचारित करें। तथा सीड बेड को 2.5 प्रतिशत फोरमल्डिहाइड घोल से उपचारित करें। उत्‍तम जल निकास रखें या 0.1 प्रतिशत बाविस्‍टीन के घोल से सिंचाई करें&lt;br /&gt;प्रश्‍न- पपीते के पत्‍तों की शिराओं में टेडे – मेढ़े भूरे रंग के दाग का नियंत्रण ?&lt;br /&gt;उत्‍तर – छंटाई के बाद प्रभावित भागों को नष्‍ट करें, कॉपर आक्‍सीक्‍लोराइड (0.3 प्रतिशत) के घोल का छिड़काव करें एवं पत्‍ते निकलने पर 0.1 प्रतिशत बाविस्टिन का छिड़काव करें। वर्षा ऋतु में कार्बोन्‍डाजिम (0.1 प्रतिशत) का छिड़काव 15 दिन के अंतराल पर आवश्‍यक है।&lt;br /&gt;प्रश्‍न – प्‍लास्टिक की थैलियों में पपीते के बीज को कैसे उगाये ?&lt;br /&gt;उत्‍तर – इसके लिए 200 गेज और 20 x 15 से.मी. आकार की थैलियों की जरूरत होती है। जिनके नीचे और किनारों में छेद कर देते हैं तथा 1:1:1 पत्‍ती की खाद, गोबर और मिट्टी का मिश्रण बनाकर थैलियों में भर देते हैं। प्रत्‍येक थैली में दो या तीन बीज बोते हैं। पौधों की उचित ऊंचाई के होने पर इनकों खेत में प्रतिरोपण कर देते हैं। प्रतिरोपण करते समय थैली का नीचे का भाग फाड़ देना चाहिए।&lt;br /&gt;प्रश्‍न – पपीते में उस रोग का नियंत्रण जिससे फल में छिद्र हो जाता है एवं दूध की तरह पदार्थ निकलता है जिससे पपीते छोटे रह जाते हैं।&lt;br /&gt;उत्‍तर – इसके नियंत्रण के लिए मिथाइल पैराथियान 500 मिली. व डाइथेन एम- 45 दवा की 500 ग्राम प्रति 250 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।&lt;br /&gt;प्रश्‍न – पपीते के फलों का सूख कर गिरने का नियंत्रण ?&lt;br /&gt;उत्‍तर – फूल आने के समय मैटाक्‍सल दवा एक टंकी में 15 से 20 ग्राम डालकर और मैन्‍कोजेब 30 – 35 ग्राम दवा का छिड़काव करें व उस पानी को जड़ों में डालें। इस प्रक्रिया को 2 से 3 बार 10 से 15 के अंतराल पर दोहरायें।&lt;br /&gt;प्रश्‍न – पपीते के फलों का पीला होकर सड़ने से रोकथाम ?&lt;br /&gt;उत्‍तर – पपीते को तभी तोड़े जब वे हरे या हल्‍के पीले रंग के हों एवं पूरे आकार में आ चुके हो पौधे के थमले के आस-पास यह ध्‍यान रखें कि पानी 24 घण्‍टे से ऊपर न खड़ा रहे जिससे बीमारी लगने की संभावना रहती है।&lt;br /&gt;प्रश्‍न – पपीते के पौधों में फूल लगते हैं परंतु फल नहीं लगते। उपाय बतायें ?&lt;br /&gt;उत्‍तर – पपीते में 3 प्रकार के पौधे होते हैं एक जिसमें नर फूल होते हैं दूसरा जिसमें मादा फूल होते हैं और तीसरे नर मादा दोनो फूल होते हैं। जिन पौधों में फूल लग रहे हैं किन्‍तु फल नहीं लग रहे वे नर पौधे हो सकते हैं। उन फौधों को निकाल दें ओर नर मादा फूल वाली किस्‍मों का चयन करें। 10 मादा पौधों में 1 नर पौधा आवश्‍यक होता है।&lt;br /&gt;प्रश्‍न- पपीते के पौधों में फलों का थोड़ा बड़ा होकर सूख कर एवं पीले होकर गिर जाने पर नियंत्रण ?&lt;br /&gt;उत्‍तर – इस रोग के दो कारण हो सकते हैं पहला फफूंद रोग जिससे फलों में काले रंग के धब्‍बे आकर फल गिर जाते हैं। इसकी रोकथाम के लिए एक प्रतिशत करजेट एम-8 की 2 ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी में छिड़काव करें एवं पानी की कमी के कारण भी फल गिर जाते हैं। गर्मियों में हप्‍ते में एक बार व सर्दियों में 15 दिन में एक बार पानी अवश्‍य दें।&lt;br /&gt;प्रश्‍न – पपीते में रिंग स्‍पौट वाइरस की रोकथाम ?&lt;br /&gt;उत्‍तर – पौधों को उखाड़ कर जला दें और डाइमिथोएट 0.1 प्रतिशत नामक रसायन का छिड़काव करें।  &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7319195525113358508-8597910812582566413?l=smalik06.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://smalik06.blogspot.com/feeds/8597910812582566413/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7319195525113358508&amp;postID=8597910812582566413' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7319195525113358508/posts/default/8597910812582566413'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7319195525113358508/posts/default/8597910812582566413'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://smalik06.blogspot.com/2008/10/blog-post_7570.html' title='पपीता'/><author><name>malik</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09139758814525364467</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Eh8BkyTxt58/SJqthbJOKKI/AAAAAAAAADI/uvkv7Qt-o9A/s1600-R/hllo009%25255B1%25255D.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7319195525113358508.post-2803546160851662651</id><published>2008-10-14T00:30:00.001-07:00</published><updated>2008-10-14T00:30:59.224-07:00</updated><title type='text'>अमरूद</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;अमरूद&lt;br /&gt;प्रश्‍न- अमरूद का भण्‍डारण कैसे करे?&lt;br /&gt;उत्‍तर- अमरूद का भण्‍डारण जीरो एनर्जी कूल चेम्‍बर में कर सकते है। चेम्‍ब्‍र के अन्‍दर का तापमान बाहर के तापमान से 12 से 14 डिग्री सेल्सियस तक कम रहता है। इसमें फल एवं सब्जियों को लगभग 10 से 15 दिनों तक भण्‍डारित किया जा सकता है।&lt;br /&gt;प्रश्‍न- अमरूद में उस कीट का नियंत्रण कैसे करें जो पेड़ के तने पर रिबन की तरह जाल बनाते है जिसके अन्‍दर गिडार छाल को खाकर नुकसान पहुंचाते हैं।&lt;br /&gt;उत्‍तर- इस कीट के नियंत्रण के लिए कारटैप हाइड्रो क्‍लोराइड 200 से 300 ग्राम दवा प्रति 200 लीटर पानी का घोल बनाकर पेड के तनों पर छिड़काव करें। इस प्रक्रिया को 10 से 15 दिन के अंतराल पर दोहरायें तथा मैलाथियान 500 मिली. दवा 200 लीटर पानी में घोल बना कर पेड़ों पर छिड़काव करें।&lt;br /&gt;प्रश्‍न – अमरूद के गूदे को खाने वाली सुझडी का नियंत्रण बतायें ?&lt;br /&gt;उत्‍तर- ये फल की मक्‍खी के कारण होता हैं मैलाथियान 500 मिली. लीटर दवा 200-250 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें। इस प्रक्रिया को 10 दिन के बाद दोहरायें।&lt;br /&gt;प्रश्‍न – अमरूद की डालियों की छाल फटने से पेड़ के सूखने से बचाव&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उत्‍तर- बाविस्‍टीन, डाइथेन एम-45 दवा के मिश्रण की 300 से 400 ग्राम मात्रा व बोरेक्‍स 600 ग्राम प्रति 200 लीटर पानी के हिसाब से घोल बनाकर छिड़काव करें। इस प्रक्रिया को 3 से 4 बार 10 से 15 दिन के अन्‍तराल पर दोहरायें।&lt;br /&gt;प्रश्‍न- 10 साल के अमरूद के पौधे में फल नहीं लगता ? उपाय बतायें ?&lt;br /&gt;उत्‍तर- सूखी टहनियों को समय से काटकर निकाल दें पौधे को मार्च से जून तक 4 बार सींचें। पूरी तरह से विकसित पौधे जिनकी उम्र लगभग 10 वर्ष हो इनके लिए 60 किलोग्राम गोबर की खाद, 250 ग्राम अमोरियम सल्‍फेट 1.25 किलोग्राम पोटेशियम सल्‍फेट तथा उतनी ही मात्रा सुपर फास्‍फेट दें। बगीचे की उचित देखभाल व कीट व रोग की रोकथाम का विशेष ध्‍यान रखें।&lt;br /&gt;प्रश्‍न- अमरूद में खाद उर्वरक कब व कितना डालते हैं ?&lt;br /&gt;उत्‍तर- गोबर की खाद 5 किलों, कैन 200 ग्राम, फास्‍फोरस 250 ग्राम, पोटाश 150 ग्राम, प्रति वर्ष व प्रति पौधा दें।&lt;br /&gt;प्रश्‍न- अमरूद में फलों पर खुरदरे धब्‍बे जो आपस में मिलकर बड़े हो जाते हैं से बचाव बतायें ?&lt;br /&gt;उत्‍तर- डाईथेन एम-45 की 500 ग्राम मात्रा प्रति 200 लीटर पानी में मिलाकर 3 से 4 बार 10 से 15 दिनों के अंतराल पर छिड़काव करें।&lt;br /&gt;प्रश्‍न- अमरूद के काले पड़ने से बचाव बतायें ?&lt;br /&gt;उत्‍तर- ये ऐंथ्रैक्‍नोज रोग है इसके लिए 1 ग्राम कार्बेन्‍डाजीम प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें।&lt;br /&gt;प्रश्‍न- अमरूद में फल छोटा होने और फूल कम आने पर नियंत्रण ?&lt;br /&gt;उत्‍तर- अमरूद की फसल में खाद एवं उर्वरक की मात्रा लगभग 100 किलो गोबर की खाद, 3 किलो कैल्शियम अमोनियम नाइट्रेट, 2.5 किलो सुपर फास्‍फेट, 2 किलो पोटाश, 1 किलो बोरोन प्रति पौधा के हिसाब से लें। बरसात की फसल न लें। सिंचाई का विशेष ध्‍यान रखें।&lt;br /&gt;प्रश्‍न- अमरूद के फलों में कीटों का नियंत्रण?&lt;br /&gt;उत्‍तर- कीटों के नियंत्रण के लिए मैलाथियान या क्‍लोरोपाइरीफास की 2 से 3 मिली. प्रति लीटर मात्रा पानी के हिसाब से या 200 लीटर के टंकी के अन्‍दर 400-500 मिली. दवा एवम् 5-6 किलो गुड़ मिलाकर छिड़काव करें। इस प्रक्रिया को 15-20 दिन के बाद दोहरायें।&lt;br /&gt;प्रश्‍न- अमरूद में खरपतवार का नियंत्रण&lt;br /&gt;उत्‍तर- अमरूद में खरपतवार नियंत्रण के लिए समय-समय पर निराई-गुडाई करें एवं रासायनिक खरपतवार नियंत्रण के लिए ग्रेमेक्‍सोन की 2 से 3 मिली. मात्रा प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7319195525113358508-2803546160851662651?l=smalik06.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://smalik06.blogspot.com/feeds/2803546160851662651/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7319195525113358508&amp;postID=2803546160851662651' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7319195525113358508/posts/default/2803546160851662651'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7319195525113358508/posts/default/2803546160851662651'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://smalik06.blogspot.com/2008/10/blog-post_6293.html' title='अमरूद'/><author><name>malik</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09139758814525364467</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Eh8BkyTxt58/SJqthbJOKKI/AAAAAAAAADI/uvkv7Qt-o9A/s1600-R/hllo009%25255B1%25255D.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7319195525113358508.post-2809711448414547608</id><published>2008-10-14T00:28:00.000-07:00</published><updated>2008-10-14T00:29:24.245-07:00</updated><title type='text'>अंगूर</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;अंगूर&lt;br /&gt;प्रश्‍न- अंगूर में थ्रिप्‍स के प्रकोप का नियंत्रण बतायें?&lt;br /&gt;उत्‍तर- 0.1 प्रतिशत एमिडा क्‍लोप्रिड 50 ई.सी के घोल का छिड़काव करें। आवश्‍यकता पड़ने पर इनका छिड़काव 15 दिन के अंतराल पर दुबारा करें।&lt;br /&gt;प्रश्‍न- अंगूल में सिंचाई कब और कितनी बार दें ?&lt;br /&gt;उत्‍तर – फूल आने तथा पूरा फल बनने (मार्च से मई) तक पानी की कमी से उत्‍पादन एवं गुणवत्‍ता दोनों पर बुरा असर पड़ता है। इस दौरान 7 -10 दिन के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए। फल पकने की प्रक्रिया शुरू होते ही पानी बंद कर देना चाहिए नहीं तो फल फट एवं सड़ सकते हैं। फलों की तुड़ाई के बाद भी एक सिंचाई अवश्‍य देनी चाहिए।&lt;br /&gt;प्रश्‍न- अंगूर में खाद एवं उर्वरक की मात्रा कितनी देनी चाहिए  ?&lt;br /&gt;उत्‍तर- 5 वर्ष की बेल को लगभग 500 ग्राम नत्रजन , 700 ग्राम फास्‍फोरस, 700 ग्राम पोटेशियम सल्‍फेट एवं 50-60 कि.ग्रा गोबर की सड़ी हुई खाद की आवश्‍यकता होती है। जनवरी के अंतिम सप्‍ताह में नत्रजन एवं पोटाश की आधी मात्रा एवं फास्‍फोरस की सारी मात्रा डाल देनी चाहिए। शेष मात्रा फल लगने के बाद दें। खाद एवं उर्वरकों को अच्‍छी तरह मिट्टी में मिलाने के बाद तुरंत सिंचाई करें।&lt;br /&gt;प्रश्‍न- अंगूर में सिंचाई कब करते हैं दे ?&lt;br /&gt;उत्‍तर-  अंगूर में सिंचाई हर 15 दिन के अंतराल पर करना चाहिए। जब फल आने लगे तब ज्‍यादा सिंचाई न करें।&lt;br /&gt;प्रश्‍न- अंगूर में कीट की रोकथाम जो नये व पुराने पत्तियों को खाते है  ?&lt;br /&gt;उत्‍तर- कार्बरिल 0.2 प्रतिशत का घोल बनाकर छिड़काव करें। इसके अलावा मैलाथियान 0.2 प्रतिशत का घोल बनाकर भी छिड़‍काव कर सकते हैं।&lt;br /&gt;प्रश्‍न- अंगूर के हरी टहनियों पर भूरे रंग के धब्‍बे एवं पत्तियों पर त्रिकोणीय धब्‍बे का नियंत्रण ?&lt;br /&gt;उत्‍तर- सल्‍फैक्‍स 2 से 3 ग्राम दवा प्रति लीटर पानी में घोल कर छिड़काव अवश्‍य करें। कॉपर करें। कॉपर आक्‍सीक्‍लोराइड की 3 ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें और डाइथेन एम-45 की 2 ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी के हिसाब से 10 से 15 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें।&lt;br /&gt;केला&lt;br /&gt;प्रश्‍न- केले के फल में फटने से बचाव ?&lt;br /&gt;उत्‍तर- कॉपर ऑक्‍सीक्‍लोराइड दवा की 3 मिली. व बोरेक्‍स 3 ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें। फल को उचित समय तोड़ें पौधे पर ही ज्‍यादा न पकने दें। नियमित सिंचाई करें।&lt;br /&gt;प्रश्‍न- केले के फलों के गिरने से बचाव  ?&lt;br /&gt;उत्‍तर- नैपथलीन एसिटिक एसिड या प्‍लेनोफिक्‍स की 1 मि.ली. मात्रा प्रति 4.5 लीटर पानी के हिसाब से घोल बनाकर छिड़काव करें जब फल गिरने का अंदेशा हो या तोड़ाई से 20-25 दिन पहले।&lt;br /&gt;प्रश्‍न- केले के पत्‍तों पर धब्‍बों का नियंत्रण  ?&lt;br /&gt;उत्‍तर- कार्बिन्‍डाजिम 0.1 प्रतिशत से छिड़काव करें या ट्राइकोडर्मा 2 ग्राम प्रति लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें।&lt;br /&gt;प्रश्‍न- केले के पौधों का पीला होना एवं पत्‍तों के गिरने पर नियंत्रण ?&lt;br /&gt;उत्‍तर- ये नाइट्रोजन की कमी से होता है। इसके लिए नाइट्रोजन उर्वरक की 200 ग्राम मात्रा प्रति पौधे के हिसाब से डालें। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7319195525113358508-2809711448414547608?l=smalik06.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://smalik06.blogspot.com/feeds/2809711448414547608/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7319195525113358508&amp;postID=2809711448414547608' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7319195525113358508/posts/default/2809711448414547608'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7319195525113358508/posts/default/2809711448414547608'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://smalik06.blogspot.com/2008/10/blog-post_14.html' title='अंगूर'/><author><name>malik</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09139758814525364467</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Eh8BkyTxt58/SJqthbJOKKI/AAAAAAAAADI/uvkv7Qt-o9A/s1600-R/hllo009%25255B1%25255D.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7319195525113358508.post-6012800347243266933</id><published>2008-10-13T02:28:00.000-07:00</published><updated>2008-10-13T02:33:24.545-07:00</updated><title type='text'>धान</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;धान&lt;br /&gt;धान का कटोरा कहे जाने वाले छत्‍तीसगढ़ अंचल का मध्‍य प्रदेश से अलग हो जाने के बावजूद भी इस प्रदेश में लगभग 17 लाख हेक्‍टर भूमि में धान की खेती प्रमुखता के साथ की जाती है़। प्रदेश के बालाघाट, रीवा, सतना, सीधी, शहडोल, उमरिया, कटनी, जबलपुर, सिवनी, डिन्‍डौरी, मण्‍डला व पन्‍ना जिलों के अधिकांश क्षेत्रों में धान की खेती प्रमुखता से की जाती है जबकि दमोह, ग्‍वालियर, न‍रसिंहपुर, छतरपुर, टीकमगढ़, छिंदवाड्ज्ञ, बैतूल, होशंगाबाद व रायसेन जिलों के कुछ सीमित क्षेत्रों में धान की खेती की प्रचलन है।&lt;br /&gt;      धान की अधिकतर खेती वर्षा आधारित दशा में होती है जो धान के कुल क्षेत्रफल का लगभग 75 प्रतिशत है। इन क्षेत्रों में कहीं-कहीं सितम्‍बर-अक्‍टूबर माह में फसल सुरक्षा हेतु पानी की सुविधा है। सिंचित क्षेत्रों में धान की खेती बालाघाट और जबलपुर जिलों में ही सीमित है।&lt;br /&gt;धान की खेती में खामियॉ&lt;br /&gt;यद्यपि धान के कुल रकबा के 70 प्रतिशत भाग में स्‍थानीय प्रजातियों के बजाय विकसित प्रजातियों की बोनी की जाती है किंतु किसान खेतों की दशा, जल की उपलब्‍धता के अनुसार उनका सही चयन नहीं करता है।&lt;br /&gt;खेती के लिए विकिसति उन्‍नत कृषि तकनीकी जैसे बुवाई, प्रबंधन, पोषण, जल-प्रबंधन, पौधा संरक्षण आदि पर अमल न होना।&lt;br /&gt;धान में एकीकृत नींदा नियंत्रण पद्धति ही सर्वोत्‍तम होती है और नींदा-प्रबंधन सबसे कठिन समस्‍या है। समय पर सुनियोजित नींदा-नियंत्रण न करना इसकी खेती में बाधक है।&lt;br /&gt;धान में कई प्रकार के कीटों एवं रोगों का प्रकोप शैशव काल से फसल पकने की अवस्‍था तक किसी न किसी रूप में होता रहता है। इनके प्रभावी नियंत्रण को न अपनाना एक समस्‍या बन जाती है।&lt;br /&gt;धान की खेती की प्रचलित पद्धतियॉ&lt;br /&gt;अ. सीधे बीज बोने की पद्धतियॉ&lt;br /&gt;खेत में सीधे बीज बोकर निम्‍न तरह से धान की खेती की जाती है।&lt;br /&gt;1. छिटकवां बुवाई&lt;br /&gt;2. नाड़ी हल या दुफन या सीड ड्रिल से कतारों में बुवाई&lt;br /&gt;3. बियासी पद्धति (छिटकवां विधि से सवागुना अधिक बीज बोकर लगभग एक महीने की फसल की पानी भरे खेत में हल्‍की जुताई)&lt;br /&gt;ब. रोपा विधि&lt;br /&gt;      रोपणी में पौध तैयार करके लगभग एक महीने के पौधों को मचौआ किये गये खेतों में रोपण करना। रोपण कार्य कतारों में निर्धारित दूरी पर नहीं किया जाता है। अनियंत्रित ढंग से बहुत अधिक पौधों को काफी सघनता से रोपण करने से रोपाई का खर्च एवं समय आदि बढ़ जाता है।&lt;br /&gt;धान की खेती वाले खेतों की दशाऍ&lt;br /&gt;अ. वर्षा आधीन खेती के क्षेत्रों में&lt;br /&gt;1. बिना बंधान वाले समतल या हल्‍के ढलान वाले खेत&lt;br /&gt;      इस तरह के खेत अधिकतर डिन्‍डौरी, मण्‍डला, शहडोल व सीधी जिलों के पहाड़ी क्षेत्रों में हैं और इन खेतों में बहुत जल्‍दी पकने वाली (लगभग 80-90 दिनों) स्‍थानीय प्रजातियों की खेती की जाती है।&lt;br /&gt;2. हल्‍की बंधान वाले खेत&lt;br /&gt;      इन खेतों में 30 से 60 सेमी. ऊंची मंडे़ रहती है। ऐसे खेती हल्‍की से भारी सभी प्रकार की जमीनों में होती है। खेतों के आकार छोटे-बड़े (0.1 एवं 1.0 हेक्‍टेयर, तक के) होते हैं। बालाघाट और सिवनी जिलों के खेतों के आकार अधिक तर छोटे रहते हैं।&lt;br /&gt;3. ऊंची बंधान वाले खेत&lt;br /&gt;      इन खेतों में 60 सेमी. से अधिक ऊंची और मोटी मेढ़ें रहती हैं तथा खेतों में ज्‍यादा समय तक पानी रोका जा सकता है। इन खेतों का भी आकार छोटा से बड़ा तक रहता है और सभी प्रकार के जमीनों में ऐसे खेत होते हैं।&lt;br /&gt;4. अधिक जल भराव वाले निचले खेत&lt;br /&gt;      इन खेतों में वर्षा का पानी जल्‍दी इकट्ठा होकर जमा हो जाता है जिसे आसानी से नहीं निकाला जा सकता है। अधिकतर पहाड़ी या उतार-चढ़ाव वाले क्षेत्रों में ऐसे खेत होते हैं।&lt;br /&gt;5. बॉध वाले क्षेत्र&lt;br /&gt;      रीवा, सीधी, शहडोल, कटनी जिलों में ढलान के क्षेत्रों में बहुत ऊंची व मजबूत मेढ़ें बनाकर बड़े आकारों (2.0 से 5.0 हेक्‍टर) के खेत बनाए जाते हैं जिन्‍हें स्‍थानीय बोलचाल में बांधों के नाम से संबोधित किया जाता है। इनमें वर्षा का पानी काफी मात्रा में इकट्ठा होता है। इनके निचले भागों को छोड़कर, ऊंचे भागों में जहॉ जलस्‍तर कम रहता है, धान की खेती की जाती है।&lt;br /&gt;ब. सिंचित खेत&lt;br /&gt;      नहरों, तालाबों, नदियां, नालों या नलकूपों में से किसी एक श्रोत से पूर्णकालिक या आंशिक रूप में (सुरक्षात्‍मक) सिंचाई की सुविधा वाले खेत।&lt;br /&gt;प्रजातियों के चयन का आधार&lt;br /&gt;1. पतले चावल वाली:- खाने के लिए अधिक उपुयक्‍त होने के कारण अधिक बाजार मूल्‍य होता है।&lt;br /&gt;2. मोटे चावल वाली:- पोहा उद्योग के लिये उपयुक्‍त होने से पोहा मिल के क्षेत्रों में अच्‍छा मूल्‍य मिलता है।&lt;br /&gt;3. सुगंधित चावल वाली:- उचित व्‍यापार का अभाव होने से बहुत कम खेती की जाती है। इसे शौकिया रूप से थोड़े क्षेत्रों में कहीं-कहीं बोई जाती है।&lt;br /&gt;4. संकर प्रजातियॉ:- बीज महंगा है, बीजों की पर्याप्‍त उपलब्‍धता नहीं है तथा उपयुक्‍त उन्‍नत काश्‍तकारी की जानकारी किसानों को नहीं है, अत: इनका क्षेत्रफल कम है।&lt;br /&gt;5. रंगीन पत्‍ती वाली:- जंगली धान के नियंत्रण/उन्‍मूलन हेतु इनकी आवश्‍यकता महसूस की जाती है, किंतु हर अवधि में पैदा होने वाली वांछित चावल की किस्‍मों की प्रजातियां उपलब्‍ध नहीं है, अत: प्रचलन कम है।&lt;br /&gt;तालिका : मध्‍यप्रदेश के विभिन्‍न क्षेत्रों के लिये उन्‍नत प्रजातियॉ एवं उनकी विशेषताऍ&lt;br /&gt;क्र.&lt;br /&gt;प्रजाति&lt;br /&gt;अवधि (दिन)&lt;br /&gt;उपज (क्विं./हे.&lt;br /&gt;विशेषताऍ  &lt;br /&gt;उपयुक्‍त क्षेत्र&lt;br /&gt;1.&lt;br /&gt;हीरा&lt;br /&gt;70-75&lt;br /&gt;15-20&lt;br /&gt;छोटा पौधा, मध्‍यम आकार का चावल&lt;br /&gt;असिंचित क्षेत्रों के बंधान रहित समतल व हल्‍के ढलान वाले खेतों के लिए व बिना बंधान वाले समतल     &lt;br /&gt;2.&lt;br /&gt;जे.आर.-75&lt;br /&gt;80-85&lt;br /&gt;20-25&lt;br /&gt;छोटा पौधा, मध्‍यम पतला दाना&lt;br /&gt;बहुत हल्‍की भूमि वाले छोटे-मेढ़युक्‍त खेत, कम वर्षा वाले क्षेत्र तथा देरी की बोवाई।     &lt;br /&gt;3.&lt;br /&gt;पूर्वा&lt;br /&gt;85-90&lt;br /&gt;20-25&lt;br /&gt;छोटा पौधा, लम्‍बा पतला लाल रंग का दाना&lt;br /&gt;हल्‍की मेंढ़ वाले हल्‍की व मध्‍यम खेत, कम वर्षा वाले क्षेत्र  &lt;br /&gt;4.&lt;br /&gt;कलिंगा-3&lt;br /&gt;80-85&lt;br /&gt;20-25&lt;br /&gt;लम्‍बा पतला दाना, मध्‍यम ऊंचा तना&lt;br /&gt;हल्‍की मेंढ़ वाले हल्‍की व मध्‍यम खेत, कम वर्षा वाले क्षेत्र  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शीघ्र पकने वाली प्रजाजियॉ&lt;br /&gt;1.&lt;br /&gt;जे.आर.-201&lt;br /&gt;100-105&lt;br /&gt;25-30&lt;br /&gt;छोटा पौधा, लम्‍बा पतला दाना, अनेक रोग व कीड़ों जैसे तना सड़न, झुलसन, गंगई के लिये निरोधी क्षमता&lt;br /&gt;हल्‍का बंधान वाले हल्‍की तथा मध्‍यम भूमि के खेतों में वर्षा आधीन खेती के लिए उपयुक्‍त&lt;br /&gt;2.&lt;br /&gt;जे.आर.-345&lt;br /&gt;100-105&lt;br /&gt;25-30&lt;br /&gt;छोटा पौधा, छोटा मोटा दाना, लाल रंगा का दाना, तना छेदक प्रकोप निरोधी&lt;br /&gt;-तदैव-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;3.&lt;br /&gt;पूर्णिमा&lt;br /&gt;105-110&lt;br /&gt;30-35&lt;br /&gt;छोटा पौधा, लम्‍बा दाना, उर्वरकों के लिए प्रयोग से उपज क्षमता में बढोत्‍तरी&lt;br /&gt;-तदैव-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;4.&lt;br /&gt;जे.आर.-353&lt;br /&gt;110-115&lt;br /&gt;25-30&lt;br /&gt;मध्‍यम ऊंचा पौधा, लम्‍बा मोटा दाना अधिक उर्वरकों के प्रयोग से गिरना, खरपतवार दबाना&lt;br /&gt;-तदैव-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मध्‍यम अवधि में पकने वाली प्रजातियॉ&lt;br /&gt;1.&lt;br /&gt;आई.आर;-56&lt;br /&gt;120-125&lt;br /&gt;45-50&lt;br /&gt;लम्‍बा पतला दाना, छोटा पौधा&lt;br /&gt;2.&lt;br /&gt;आई.आर.-64&lt;br /&gt;125-130&lt;br /&gt;50-55&lt;br /&gt;लम्‍बा पतला दाना, छोटा पौधा &lt;br /&gt;3.&lt;br /&gt;महामाया&lt;br /&gt;125-130&lt;br /&gt;55-60&lt;br /&gt;लम्‍बा मोटा दाना, छोटा पौधा, गंगाई कीट निरोधी &lt;br /&gt;4.&lt;br /&gt;क्रांति&lt;br /&gt;130-135&lt;br /&gt;55-60&lt;br /&gt;मोटा दाना, छोटा पौधा, गंगई संवेदनशील  &lt;br /&gt;5.&lt;br /&gt;माधुरी&lt;br /&gt;130-135&lt;br /&gt;40-45&lt;br /&gt;लम्‍बा, पतला व सुगंधित दाना, छोटा पौधा &lt;br /&gt;6.&lt;br /&gt;पूसा बासमती-1&lt;br /&gt;130-135&lt;br /&gt;40-45&lt;br /&gt;लम्‍बा, पतला व सुगंधित दाना, छोटा पौधा &lt;br /&gt;7.&lt;br /&gt;पूसा सुगंधा-2&lt;br /&gt;120-125&lt;br /&gt;40-45&lt;br /&gt;लम्बा, पतला व सुगंधित दाना  &lt;br /&gt;8.&lt;br /&gt;पूसा सुगंधा-3&lt;br /&gt;120-125&lt;br /&gt;40-45&lt;br /&gt;लम्‍बा, पतला व सुगंधित दाना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देर से पकने वाली प्रजातियॉ&lt;br /&gt;1.&lt;br /&gt;स्‍वर्णा&lt;br /&gt;145-150&lt;br /&gt;55-60&lt;br /&gt;मध्‍यम लम्‍बा दाना, छोटा पौधा &lt;br /&gt;2.&lt;br /&gt;श्‍यामला&lt;br /&gt;140-145&lt;br /&gt;50-55&lt;br /&gt;मध्‍यम लंबा दाना, छोटा पौधा &lt;br /&gt;3.&lt;br /&gt;महासुरी&lt;br /&gt;145-150&lt;br /&gt;45-50&lt;br /&gt;मध्‍यम पतला दाना, मध्‍यम ऊंचा पौधा उत्‍तम गुणवत्‍ता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तालिका : विभिन्‍न क्षेत्रों के लिये संकर प्रजातियॉ एवं उनकी विशेषताऍ&lt;br /&gt;क्र.&lt;br /&gt;प्रजाति&lt;br /&gt;पकने की अवधि (दिन)&lt;br /&gt;औसत उपज (क्विं./हे.)&lt;br /&gt;1.&lt;br /&gt;ए.पी.एच.आर.-1&lt;br /&gt;130-135&lt;br /&gt;60-70&lt;br /&gt;2.&lt;br /&gt;ए.पी.एच.आर.-2&lt;br /&gt;120-125&lt;br /&gt;60-70&lt;br /&gt;3.&lt;br /&gt;एम.जी.आर.&lt;br /&gt;110-115&lt;br /&gt;55-60&lt;br /&gt;4.&lt;br /&gt;सी.एन.आर.एच.-3&lt;br /&gt;120-125&lt;br /&gt;55-60&lt;br /&gt;5.&lt;br /&gt;डी.आर.आर.एच.-1&lt;br /&gt;125-130&lt;br /&gt;60-70&lt;br /&gt;6.&lt;br /&gt;पन्‍त संकर धान-1&lt;br /&gt;115-120&lt;br /&gt;55-60&lt;br /&gt;7.&lt;br /&gt;नरेन्‍द्र संकर धान-2&lt;br /&gt;125-130&lt;br /&gt;55-60&lt;br /&gt;8.&lt;br /&gt;सी.ओ.&lt;br /&gt;आर.एच.-2&lt;br /&gt;120-125&lt;br /&gt;55-60&lt;br /&gt;9.&lt;br /&gt;ए.डी.टी.आर.एच.-2&lt;br /&gt;115-120&lt;br /&gt;60-70&lt;br /&gt;10.&lt;br /&gt;सहयाप्री&lt;br /&gt;125-130&lt;br /&gt;55-60&lt;br /&gt;11.&lt;br /&gt;के.एन.एच.-2&lt;br /&gt;125-130&lt;br /&gt;60-70&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उपलब्‍ध भूमि के अनुसार उपयुक्‍त प्रजातियों का चयन&lt;br /&gt;उपरोक्‍त में वर्णन किए गए खेतों की दशाओं के अनुकूल उपयुक्‍त प्रजातियां निम्‍नानुसार हैं:&lt;br /&gt;1.&lt;br /&gt;बिना बंधान वाले समतल/हल्‍के ढालान वाले खेत&lt;br /&gt;हीरो, जे.आर.-75, पूर्वा, कलिंगा-3&lt;br /&gt;डिण्‍डौरी, मण्‍डला, सीधी, शहडोल, उमरिया     &lt;br /&gt;2.&lt;br /&gt;हल्‍की बंधान वाले हल्‍की व मध्‍यम भूमि&lt;br /&gt;जे.आर. 201, जे.आर. 345, पूर्णिमा, जे.आर. 353&lt;br /&gt;रीवा, सीधी, पन्‍ना, शहडोल, सतना, कटनी, छतरपुर, टीकमगढ़, ग्‍वालियर, बालाघाट, डिण्‍डौरी, मण्‍डला, कटनी&lt;br /&gt;3.&lt;br /&gt;हल्‍की बंधान वाले भारी भूमि&lt;br /&gt;पूर्णिमा, जे.आर; 345&lt;br /&gt;जबलपुर, सिवनी, दमोह, बालाघाट, मण्‍डला, डिण्‍डौरी, सतना, न‍रसिंहपुर, छिंदवाड़ा    &lt;br /&gt;4.&lt;br /&gt;ऊंची बंधान वाले हल्‍की व मध्‍यम कृषि&lt;br /&gt;आई.आर.36, महामाया, आई.आर.34&lt;br /&gt;क्रमांक 2 व 3 के अनुसार     &lt;br /&gt;5.&lt;br /&gt;ऊंची बंधान हल्‍की व मध्‍यम भूमि&lt;br /&gt;आई.आर.36, 64, महामाया, क्रांति, माधुरी, पूसा, बासमती&lt;br /&gt;जबलपुर सिवनी, सतना, रीवा, बालाघाट (क्रांति छोड़कर)&lt;br /&gt;6.&lt;br /&gt;अधिक जलभराव वाले गहरे खेत&lt;br /&gt;महामाया, स्‍वर्णा, श्‍यामला, मासुरी, सफरी-17, पूसा बासमती।&lt;br /&gt;बालाघाट&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्रांति, पूसा बासमती, श्‍यामला जबलपुर, सिवनी, पूसा सुगंधा-2, पूसा सुगंधा-3&lt;br /&gt;जबलपुर, सिवनी&lt;br /&gt;                                       &lt;br /&gt;सिंचित क्षेत्रों में सिंचाई जल की उपलब्‍धता के अनुसार किसी भी मध्‍यम व देर से पकने वाली या संकर प्रजातियों की खेती की जा सकती है।&lt;br /&gt;टीप : संकर प्रजातियों की खेती क्रमांक 4, 5 व 6 दशाओं में करना उचित होगा।&lt;br /&gt;खेत की तैयारी&lt;br /&gt;      धान के लिये खेतों की तैयारी बुवाई की पद्धति के अनुसार निम्‍नानुसार करना चाहिए:&lt;br /&gt;(1) लेही पद्धति के अलावा सीधे बीज बोने के लिए&lt;br /&gt;      रबी फसलों की कटाई के बाद खासतौर पर गर्मी के महीनों में खेत की गहरी जुताई तथा वर्षा प्रारंभ होते ही खेत तैयार करके बोनी करें। यदि रबी खेत पड़ती हो और गर्मियों की जुताई संभव न हो तो वर्षा शुरू होने के बाद जुताई करके खेत तैयार करें। प्रथम वर्षा के बाद निकले खरपतवारों की जुताई करके धान की बुवाई करने से शुरू की अवस्‍था में खरपतवारों का प्रकोप कम होता है। सूखी जमीन की तैयारी करके वर्षा के पूर्व ही धान बोने से फसल के साथ-साथ नींदा भी बहुत होते हैं। भारी जमीनों में जहॉ वर्षा के बाद खेत की तैयारी मुश्किल हो जाती है, वहॉ खेत से वर्षा के बाद उगे हुए नींदा को पैराक्‍वाट नींदा नाशक द्वारा नष्‍ट कर सीधे बीज की बोनी करने से से समय व पैसा दोनों की बचत हो सकती है। किंतु यह कार्य पड़त जमीनों में संभव नहीं होगा। उगे हुए खरपतवार को नष्‍ट करने के लिये 1 लीटर पैराक्‍वाट नींदा नाशक 500 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें तथा छिड़काव के दूसरे या तीसरे दिन बाद सीधे बीज की बोनी करें। नींदा बड़े होने पर पैराक्‍वाट की मात्रा डेढ़ गुनी करें तथा इसके उपयोग के बाद खरपतवार सूख जाने पर (दवा डालने के 3-4 दिन बाद) पर बुवाई करें। यदि गोबर खाद का उपयोग कर रहे हों 5-10 टन प्रति हेक्‍टेयर इसे आखिरी जुताई या बखरनी के पूर्व जमीन में डालकर जुताई करें। बरखनी द्वारा इसे मिट्टी में अच्‍छी से मिलाएं।&lt;br /&gt;(2) लेही पद्धति व रोपाई के लिये&lt;br /&gt;      इन पद्धतियों के लिये भी गर्मी के दिनों की गहरी जुताई लाभप्रद होती है। ठन्‍ प्‍द्धतियों में खेत की तैयारी के लिये, खेतों में वर्षा या सिंचाई का जल भरकर 2-3 बखरनी या पडलर चलाकर मचौआ करते है। इससे खेत की मिट्टी एवं पानी की गाढ़ी लेई बन जाती है। खेत के कूड़ा, करकट, डाले गये गोबर खाद/कम्‍पोस्‍ट/पौधों के अवशेष/हरी खाद तथा खरपतवारों के अवशेष आदि मचौआ तथा मिट्टी में मिल जाते हैं। इस प्रकार खेत को समतल करके लेही के लिये अंकुरित बीजों की बोनी तथा रोपाई के लिए पौधों का रोपाई करना चाहिये।&lt;br /&gt;बीज की मात्रा&lt;br /&gt;      धान के लिये बीज की मात्रा बुवाई के पद्धति के अनुसार अलग-अलग रखनी चाहिए, जो निम्‍नानुसार होनी चाहिए:&lt;br /&gt;क्र.&lt;br /&gt;बोवाई की पद्धति&lt;br /&gt;बीज दर (किलो/हेक्‍ट.)&lt;br /&gt;1.&lt;br /&gt;छिटकवां विधि से बीज बोना&lt;br /&gt;100-120    &lt;br /&gt;2.&lt;br /&gt;कतारों में बीज बोना&lt;br /&gt;90-100    &lt;br /&gt;3.&lt;br /&gt;लेही पद्धति&lt;br /&gt;70-80&lt;br /&gt;4.&lt;br /&gt;रोपाई पद्धति&lt;br /&gt;30-40&lt;br /&gt;5.&lt;br /&gt;बियासी पद्धति&lt;br /&gt;125-150&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;टीप : रोपाई पद्धति में बीजों को पहिले नर्सरी में बोकर पौध तैयार किये जाते है।&lt;br /&gt;रोपणी में पौध तैयार करना&lt;br /&gt;      जितने रकबे में धान की रोपाई करना हो उसके 1/20 भाग में रोपणी बनाना चाहिये। इस रोपणी में निर्धारित क्षेत्र के लिये आवश्‍यक बीज इस प्रकार से क्रमश: बोनी करना चाहिए कि लगभग 3-4 सप्‍ताह के पौध रोपाई के लिये समय पर तैयार हो जायें। रोपणी के लिये 2-3 बार जुताई, बखरनी करके अच्‍छी तरह पहिले खेत तैयार करना चाहिए। इसके बाद खेत में 1.5-2.0 मीटर चौड़ी पटि्टयॉ बना लेना चाहिए तथा इनकी लम्‍बाई खेत के अनुसार कम अधिक हो सकती है। प्रत्‍येक पट्टी के बीच 30 सेमी. की नाली रहनी चाहिए। इन नालियों की मिट्टी नाली बनाते समय पट्टि‍यॉ में डालने से पट्टि‍यॉ ऊंची हो जाती है। ये नालियॉ जरूरत के अनुसार सिंचाई व जल निकास के लिये सहायक होती हैं। रोपणी में बीजों की बुवाई 8 से 10 सेमी. के अंतर से कतारों में करने से रख-रखाव तथा रोपणी हेतु पौध उखाड़ने में आसानी होती है। रोपणी में क्षेत्रफल के अनुसार 150 किलोग्राम नत्रजन, 100 किलोग्राम स्‍फुर तथा 50 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्‍टेयर देना चाहिए। एक-तिहाई नत्रजन तथा पूरी स्‍फुर व पोटाश की मात्रा बुवाई के समय देना चाहिये तथा शेष नत्रजन उगे हुये पौधों में 12-14 दिन बाद छिड़ककर देना चाहिये।&lt;br /&gt;लेही के लिये बीज अंकुरित करना&lt;br /&gt;      लेही पद्धति से बोनी करने के लिये खेत की तैयरी के तुरंत बाद अंकुरित बीज उपलब्‍ध होना चाहिये। अत: लेही बोनी के लिये प्रस्‍तावित समय के 3-4 दिन पहिले से ही बीज अंकुरित करने का कार्य शुरू कर देना चाहिए। इस हेतु निर्धारित बीज की मात्रा को रा‍त्रि में पानी में 8-10 घंटे भिगोना चाहिये, फिर इन भीगे हुए बीजों का पानी निकालकर पानी निथार देना चाहिये। तदुपरांत इन बीजों को पक्‍की सूखी सतह पर बोरों से ठीक से ढंक देना चाहिये। ढकने के 24-30 घंटे के अंदर बीज अंकुरित हो जाता है। इसके बाद ढके गये बोरों को हटाकर बीज को छाया में फैला कर सुखाऐं। इन अंकुरित बीजों का इस्‍तेमाल 6-7 दिनों तक किया जा सकता है।&lt;br /&gt;बीजोपचार&lt;br /&gt;      बीजों को खेत में या रोपणी में बुवाई करने के पूर्व उपचारित कर लेना चाहिए। सबसे पहिले बीजों को नमक के घोल में डालें। इसके लि‍ये 10 लीटर पानी में 1.6 किलोग्राम खाने का नमक डालकर घोल बनाएं। इस तरह के घोल में बीजों को डुबाने से हल्‍के बीज पानी में तैरने लगते हैं, उन्‍हें छान कर अलग कर लें, फिर नीचे के बीजों को पानी से निकाल कर दो बार साफ पानी से अच्‍छी तरह से धोयें तथा छाया में फैलाकर सुखाएं। सुखाए गये बीजों में 2 ग्राम मोनोसाल या केप्‍टान या थायरम़ + 2.5 ग्राम थायरम अथवा मेन्‍कोजेब बेविस्‍टन प्रति किलोग्राम बीज के हिसाब से उपचारित करके बोनी करें। बैक्‍टेरियल बीमारियों के बचाव के लिये बीजों को 0.05 प्रतिशत स्‍ट्रेप्‍टोसाइक्लिन के घोल में डुबाकर उपचारित करना लाभप्रद होता है।&lt;br /&gt;बुवाई का समय&lt;br /&gt;      वर्षा प्रारंभ होते ही धान की बुवाई का कार्य प्रारंभ कर देना चाहिए। जून मध्‍य से जुलाई प्रथम सप्‍ताह तक बोनी का समय सबसे उपयुक्‍त होता है। बुवाई में विलम्‍ब होने से उपज पर विपरीत प्रभाव पड्ता है। रोपाई के बीजों की बुवाई रोपणी में जून के प्रथम सप्‍ताह से ही सिंचाई के उपलब्‍ध स्‍थानों पर कर देना चाहिये क्‍योंकि जून के तीसरे सप्‍ताह से जुलाई मध्‍य तक की रोपाई से अच्‍छी पैदावार मिलती है। लेही विधि से धान के अंकुरण हेतु 6-7 दिनों का समय बच जाता है। अत: बीजू धान को देरी होने पर लेही विधि से बोनी करने से अधिक लाभ होगा।&lt;br /&gt;बुवाई की विधियॉं&lt;br /&gt;छिटकवॉं विधि:- इस विधि में अच्‍छी तरह से तैयार खेत में निर्धारित बीज की मात्रा छिटककर हल्‍की बखरनी द्वारा बीज को मिट्टी में ढक देते हैं।&lt;br /&gt;2. कतारों की बोनी:- अच्‍छी तरह से तैयार खेत में निर्धारित बीज की मात्रा नारी हल या दुफन या सीडड्रिल द्वारा 20 सेमी. की दूरी की कतारों में बोनी करना चाहिये।&lt;br /&gt;3. बियासी विधि:- इस विधि में छिटकवॉं या कतारों की बोनी के अनुसार निर्धारित बीज की सवा गुना मात्रा बोते हैं। इसके बाद लगभग एक महीने की खड़ी फसल में हल्‍का पानी भरकर हल्‍की जुताई कर देते है। जहां पौधे घने उगे हों जुताई के बाद उखड़े हुये घने पौधों को विरली स्‍थान पर लगा देना चाहिये। बियासी करने से खेत में खरपतवार कम हो जाते हैं तथा जल धारण क्षमता अच्‍छी हो जाती है। इससे फसल की बढ़वार अच्‍छी होती है।&lt;br /&gt;4. लेही विधि:- इस विधि में खेत में पानी भरकर मचौआ करना चाहिए, फिर समतल खेत में निर्धारित बीज की मात्रा छिटक देना चाहिए। बोनी के दूसरे दिन बाद खेत में 8-10 सेमी. अधिक पानी नहीं रहना चाहिए तथा खेत की मेड़ बंधी रहना चाहिए। यदि तेज वर्षा होने का लक्षण हो तब बुवाई नहीं करना चाहिए।&lt;br /&gt;5. रोपा विधि:- सामान्‍य तौर पर 3-4 सप्‍ताह के पौध रोपाई के लिये उपयुक्‍त होते हैं तथा एक जगह पर 2-3 पौध लगाना पर्याप्‍त होता है। रोपाई में विलम्‍ब होने पर एक जगह पर 4-5 पौधे लगाना उचित होगा। जल्‍दी व मध्‍यम पकने वाली प्रजातियों के अधिक आयु के पौधे नहीं लगाना चाहिये। उपयुक्‍त समय पर विभिन्‍न प्रजातियों के पौधों के लिये कतारों से कतारों तथा पौधों से पौधों की दूरी निम्‍नानुसार रखना चाहिये, किंतु विलम्‍ब होने की दशा में इन अतंरालों को कम कर देना चाहिए:-&lt;br /&gt;प्रजातियॉं तथा रोपाई का समय&lt;br /&gt;पौधों की ज्‍योमिती (सेमी. X सेमी.)&lt;br /&gt;1. जल्‍दी पकने वाली प्रजातियॉं उपयुक्‍त समय पर&lt;br /&gt;15 X 15&lt;br /&gt;2. जल्‍दी पकने वाली प्रजातियॉं विलम्‍ब समय पर&lt;br /&gt;15 X 10&lt;br /&gt;3. मध्‍यम अवधि की प्रजातियॉं उपयुक्‍त समय पर&lt;br /&gt;20 X 15&lt;br /&gt;4. मध्‍यम अवधि की प्रजातियॉं विलम्‍ब समय पर&lt;br /&gt;15 X 15&lt;br /&gt;5. देर से पकने वाली प्रजातियॉं उपयुक्‍त समय पर&lt;br /&gt;25 X 20&lt;br /&gt;6. देर से पकने वाली प्रजातियॉं विलम्‍ब समय पर&lt;br /&gt;20 X 15 या 15 X 15&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संकर प्रजातियों के 3 सप्‍ताह की पौध, एक पौध प्रति हिल के हिसाब से समय पर लगाने पर 20 सेमी. X 15 सेमी. तथा रोपाई में विलम्‍ब होने पर 15 सेमी. X  15 सेमी. की दूरी पर लगाना चाहिये।&lt;br /&gt;खाद एवं उर्वरकों का उपयोग&lt;br /&gt;गोबर खाद या कम्‍पोस्‍ट:- धान की फसल में 5 से 10 टन/हेक्‍टेयर तक अच्‍छी सड़ी गोबर की खाद या कम्‍पोस्‍ट का उपयोग करने से महंगे उर्वरकों के उपयोग में बचत की जा सकती है। हर वर्ष इसकी पर्याप्‍त उपलब्‍धता न होने पर कम से कम एक वर्ष के अंतर से इसका उपयोग करना बहुत लाभप्रद होता है। इनके उपयोग से जमीन की भौतिक, रासायनिक एवं जैविक गुणों में सुधार होता है, जिससे मिट्टी की जल धारण क्षमता में वृद्धि होती है। इसके उपयोग से प्रमुख पोषक तत्‍वों के साथ-साथ द्वितीयक एवं सूक्ष्‍म पोषक तत्‍वों की पूर्ति धीरे-धीरे होती रहती है।&lt;br /&gt;हरी खाद का उपयोग&lt;br /&gt;   रोपाई वाली धान में हरी खाद के उपयोग में सरलता होती है, क्‍योंकि मचौआ करते समय इसे मिट्टी में आसानी से बिना अति‍रिक्‍त व्‍यय के मिलाया जा सकता है। हरी खाद के लिये सनई का लगभग 25 किलोग्राम बीज प्रति हेक्‍टेयर के हिसाब से रोपाई के एक महीने पहिले बोना चाहिए। लगभग एक महीने की खड़ी सनई की फसल को खेत में मचौआ करते समय मिला देना चाहिए। यह 3-4 दिनों में सड़ जाती है। यदि खेत खाली न हो तो पानी के साधन से आजू-बाजू के खेतों में समय से लगायें तथा लगभग एक महीने की हरी फसल काट कर धान वाले खेत में फैला दें और मचौआ करके मिट्टी में मिलाएं। ऐसा करने से लगभग 50-60 किलोग्राम/हेक्‍टेयर उर्वरकों की बचत होगी। इसका उपयोग गोबर खाद या कम्‍पोस्‍ट से भी अधिक लाभकारी होता है। बीजू धान में हर चौथी या पॉचवी धान की कतार के बाद सनई बोएं तथा एक महीने की सनई का पौधा हो जाने पर, इसे कतार में ही ताईचुंग गुरमा या हेण्‍ड हो चलाकर मिट्टी में मिला दें। ऐसा करने से लगभग एक चौथाई उर्वरकों की बचत होती है तथा निदाई में भी सुविधा होगी।&lt;br /&gt;जैव उर्वरकों का उपयोग&lt;br /&gt;   कतारों की बोनी वाली धान में 5000 ग्राम/हेक्‍टेयर प्रत्‍येक एजोटोबेक्‍टर आर.पी.एस.बी. जीवाणु उर्वरक का उपयोग करने से लगभग 15 किलोग्राम/हेक्‍टेयर नत्रजन और स्‍फुर उर्वरक बचाएं जा सकते हैं। इन दोनों जीवाणु उर्वरकों को 50 किलोग्राम/हेक्‍टेयर सूखी सड़ी हुई गोबर की खाद में मिलाकर बुवाई करते समय कूड़ों में डालने से इनका उचित लाभ मिलता है।&lt;br /&gt;   बीजू धान में उगने के 20 दिनों तथा रोपाई धान में रोपाई के 20 दिनों की अवस्‍था में, 15 किलोग्राम/हेक्‍टेयर हरी नीली काई का भुरकाव करने से लगभग 20 किलोग्राम/हेक्‍टेयर नत्रजन उर्वरक की बचत की जा सकती है। ध्‍यान रहे काई का भुरकाव करते समय खेत में पर्याप्‍त नमी या हल्‍की पानी की सतह (5+2 सेमी.) रहनी चाहिये।&lt;br /&gt;उर्वरकों का उपयोग&lt;br /&gt;   प्रदेश के हर क्षेत्रों में प्राय: नत्रजन, स्‍फुर व पोटाश उर्वरकों के उपयोग से धान की फसल में पर्याप्‍त वृद्धि होती है। धान की फसल में इन उर्वरकों की मात्रा का निर्धारण बोई जाने वाली प्रजाति व भूमि के आधार पर तालिका में बताये अनुसार करना चाहिए।&lt;br /&gt;      प्रदेश के हर क्षेत्रों में प्राय: नत्रजन, स्‍फुर व पोटाश उर्वरकों के उपयोग से धान की फसल में पर्याप्‍त वृद्धि होती है। धान की फसल में इन उर्वरकों की मात्रा का निर्धारण बोई जाने वाली प्रजाति व भूमि के आधार पर तालिका में बताये अनुसार करना चाहिए।&lt;br /&gt;द्वितीयक एवं सूक्ष्‍म पोषी तत्‍वों का उपयोग&lt;br /&gt;   जहां पर लगातार उर्वरकों के उपयोग से धान व अन्‍य फसलों का अच्‍छा उत्‍पादन लिया जा रहा हो एवं सघन खेती (द्वि फसली/बहुफसली) पद्धति अपनाई जा रही हो, वहां भूमि में जस्‍ता की कमी हो रही है। इसी तरह लगातार गंधक रहित उर्वरकों जैसे डी.ए.पी. तथा यूरिया के बढ़ते उपयोग से गंधक की कमी खेतों में हो रही है। अत: 25 किलोग्राम जिंक सल्‍फेट/हेक्‍टेयर बुवाई के समय प्रति वर्ष या एक वर्ष के अंतराल से देना काफी फायदेमंद रहता है।&lt;br /&gt;तालिका : प्रजातियों के अनुसार धान के उपयुक्‍त उर्वरकों की मात्रा&lt;br /&gt;धान की प्रजातियॉं&lt;br /&gt;उर्वरकों की मात्रा (किलोग्राम/हेक्‍टेयर)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नत्रजन&lt;br /&gt;स्‍फुर&lt;br /&gt;पोटाश&lt;br /&gt;1. शीघ्र पकने वाली 100 दिन से कम, छोटे तने वाली&lt;br /&gt;40-50&lt;br /&gt;20-30&lt;br /&gt;15-20&lt;br /&gt;2. शीघ्र पकने वाली 110 दिन से कम, ऊंचे तने वाली&lt;br /&gt;25-30&lt;br /&gt;15-20&lt;br /&gt;10-15&lt;br /&gt;3. मध्‍यम अवधि 110-125 दिन की, छोटे तने वाली&lt;br /&gt;80-100&lt;br /&gt;30-40&lt;br /&gt;20-25&lt;br /&gt;4. मध्‍यम अवधि 110-125 दिन की, ऊंचे तने वाली&lt;br /&gt;40-50&lt;br /&gt;20-30&lt;br /&gt;15-20&lt;br /&gt;5. देर से पकने वाली 125 दिनों से अधिक, छोटे तने वाली&lt;br /&gt;100-120&lt;br /&gt;50-60&lt;br /&gt;30-40&lt;br /&gt;6. देर से पकने वाली, ऊंचे तने वाली&lt;br /&gt;50-60&lt;br /&gt;25-30&lt;br /&gt;15-20&lt;br /&gt;7. संकर प्रजातियॉं&lt;br /&gt;120&lt;br /&gt;60&lt;br /&gt;40&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;      उपरोक्‍त मात्रा प्रयोगों के परिणामों पर आधारित है, किंतु भूमि परीक्षण द्वारा उर्वरकों की मात्रा का निर्धारण वांछित उत्‍पादन के लिये किया जाना लाभप्रद होगा।&lt;br /&gt;      स्‍फुर, पोटाश और जिंक सल्‍फेट की पूरी मात्रा बीजू धान में बुवाई तथा रोपाई वाली धान में रोपाई के समय पर देना जरूरी है, किंतु धान की फसल में नत्रजन यदि बुवाई के समय न देकर बुवाई के 15-20 दिनों बाद निंदाई करके या रोपाई के 6-7 दिनों बाद दें तो नत्रजन के उपयोग की क्षमता बढ्ेगीा यदि बीजू धान में बुवाई के तुरंत बाद नींदानाशी का उपयोग कर रहे हैं तो बुवाई के समय निर्धारित मात्रा की एक तिहाई नत्रजन बीज बोते समय दे सकते हैं। प्रभावी उपयोग क्षमता के लिये नत्रजन की मात्रा का विभाजन करके फसल की विभिन्‍न अवस्‍थाओं में प्रजातियों के अनुसार निम्‍न तरह से करना चाहिये।&lt;br /&gt;तालिका : प्रजातियों के अनुसार धान की विभिन्‍न अवस्‍थाओं में नत्रजन की मात्रा का विभाजन&lt;br /&gt;नत्रजन उर्वरक देने का समय&lt;br /&gt;धान के प्रजातियों के पकने की अवधि‍     &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शीघ्र&lt;br /&gt;मध्‍यम&lt;br /&gt;देर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नत्रजन  उम्र&lt;br /&gt;नत्रजन  उम्र&lt;br /&gt;नत्रजन  उम  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(%) (दिन)&lt;br /&gt;(%) (दिन)&lt;br /&gt;(%) (दिन)&lt;br /&gt;1. बीजू धान में निंदाई करके या बियासी करके अथवा रोपाई के 6-7 दिनों बाद&lt;br /&gt;50   20&lt;br /&gt;30  20-25&lt;br /&gt;25  20-25     &lt;br /&gt;2. कैसे निकलते समय&lt;br /&gt;25  35-40&lt;br /&gt;40- 45-55&lt;br /&gt;40  50-60&lt;br /&gt;3. प्रभोट के प्रारंभ काल में&lt;br /&gt;25  50-60&lt;br /&gt;30  60-70&lt;br /&gt;35  65-75&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नत्रजन उर्वरकों की उपयोग क्षमता में सुधार&lt;br /&gt;नत्रजन युक्‍त उर्वरकों का उपयोग बीज बोते समय या रोपा लगाते समय करने से कोई विशेष लाभ नहीं होगा। बीजू धान में बोनी के 15-20 दिनों की अवस्‍था पर निंदाई करके इनका उपयोग करें। रोपाई धान में रोपाई के 6-7 दिनों पर प्रथम बार नत्रजन उर्वरक दें।&lt;br /&gt;2. नत्रजन का उपयोग कई बार में बताई गई तालिका अनुसार करें।&lt;br /&gt;3. नत्रजन उर्वरक धान में पानी द्वारा रिसकर नीचे चले जाते हैं। अत- इन पर नीम की खली की पर्त चढ़ाकर उपयोग करने से इनकी उपयोग क्षमता बढ़ती है। 100 किलोग्राम में 20 किलोग्राम नीम की खली का बारीक चूर्ण मिलाना उचित होगा। खली का चूर्ण मिलाने के लिये यूरिया में 1 लीटर मिट्टी के तेल का छिड़काव करने से खली यूरिया पर चिपक जाती है। नीम की खली चिपकी हुई यूरिया का नुकसान नहीं होता है। इसी प्रकार नत्रजन उर्वरकों में कोलतार की पर्त चढ़ा कर केवल एक ही बार में पूरी मात्रा दी जा सकती है, जो पौधों को आवश्‍यकतानुसार पूरे जीवनकाल में मिलती रहती है। इसके लिये 100 किलोग्राम यूरिया में 5 किलोग्राम कोलतार, 1.5 लीटर मिट्टी के तेल के सहारे चिपकाना चाहिये।&lt;br /&gt;4. यूरिया की बड़े आकार की गोलियॉं (यूरिया सुपर ग्रेन्‍यूल्‍स) कतारों में रोपाई की गई धान में, एक कतार के अंतराल पर तथा कतार में एक पौधे के अंतराल से बुवाई के 5-6 दिन बाद जमीन में 5-6 सेमी. गहराई में स्‍थापित करने से नत्रजन की उपयोग क्षमता, छिटककर दी गई नत्रजन से दुगनी की जा सकती है।&lt;br /&gt;नत्रजन उर्वरकों के उपयोग में सावधानियॉं&lt;br /&gt;1. सूखे खेतों में उर्वरक न डालें।&lt;br /&gt;2. खरपतवार से ग्रस्‍त फसल में उर्वरक उनकी निंदाई करने के बाद ही डालें।&lt;br /&gt;3. उर्वरक डालते समय खेत में 4-5 सेमी. तक पानी रह सकता है। नम खेत में ही उर्वरक डालें। अधिक पानी रहने पर पानी निकालने के बाद उर्वरक डालें। उर्वरक डालते समय तथा उसके बाद खेत की मेंड़ बंधी रहना चाहिये।&lt;br /&gt;4. वर्षा के बाद गीले पौधों पर नत्रजन उर्वरक न डालें। यह ध्‍यान रखें कि यदि जल्‍दी पानी बरसने की उम्‍मीद हो, तब भी खेत में उर्वरक न डालें।&lt;br /&gt;उतेरा फसल पद्धति में उर्वरकों का उपयोग&lt;br /&gt;     प्रदेश के कई जिलों जैसे सिवनी, डिण्‍डोरी, मण्‍डला, बालाघाट व जबलपुर के असिंचित क्षेत्रों के कुछ इलाकों में धान की खड़ी फसल में कटाई के 15-20 दिन पूर्व उतेरा फसल के रूप में तिवड़ा, बटरी, अलसी, मसूर व उर्द की बुवाई की जाती है। जहां पर यह पद्धति अपनाई जाती है, वहां धान की फसल में निर्धारित उर्वरकों के अलावा 20 किलोग्राम स्‍फुर प्रति हेक्‍टेयर की अतिरिक्‍त मात्रा का उपयोग करना काफी लाभप्रद होता है।&lt;br /&gt;नींदा नियंत्रण&lt;br /&gt;      धान की फसल में बीज उगने या पौधा लगाने से लेकर कटाई तक हर अवस्‍था में कई प्रकार के खरपतवार उगते हैं। सॉवा, टोरी वट्टा, कनकी, मोथा, बदौर, जलदूब, जलखुम्‍बी, मृंगराज, विल्‍जा व जंगली धान जैसे खरपतवार इतनी अधिक तादाद में उगते हैं कि कभी-कभी धान की फसल काटने लायक ही नहीं रह जाती है। हर महीने में उगने वाले नींदा अलग-अलग है, किंतु सॉवा, मोथा, जलदूव, जंगली धान व कनकी का प्रयोग तो पूरे फसल काल में खतरनाक रहता है। सॉवा, टोरी, बट्टा और जंगली धान की तो निंदाई के लिये फसल के पौधों के साथ पहचानना भी दुष्‍कर हो जाता है। धान की बुवाई अलग-अलग ढंग से अलग-अलग स्थितियों में की जाती है तथा जल्‍दी पकने वाली किस्‍मों से लेकर लंबी अवधि की प्रजातियॉं उगाई जाती है। अत: इनमें निंदा नियंत्रण के उपाय भी अलग-अलग ढंग से निम्‍नानुसार अपनाना चाहिये।&lt;br /&gt;(अ) बीजू छिटकवॉ धान जिसमें बियासी नहीं की जाती हो&lt;br /&gt;1. बुवाई के तुरंत बाद नई जमीन में या सूखी जमीन की बोनी में पानी बरसने के तुरंत बाद ब्‍यूटाक्‍लोर 2.5 किलोग्राम/हेक्‍टेयर सक्रिय तत्‍व का छिड़काव 500 लीटर पानी में घोलकर करने से लगभग 20-25 दिनों तक निंदा नहीं उगते हैं।&lt;br /&gt;2. खरपतवार उग आने के बाद जुताई करके, खेत तैयार करके बुवाई करने से फसल में लगभग 10-15 दिनों तक खरपतवार नहीं रहते हैं।&lt;br /&gt;3. खड़ी फसल में दो बार 20-25 दिनों और 40-45 दिनों की अवस्‍था पर निदाई करें।&lt;br /&gt;4. चौड़ी पत्‍ती वाले खरपतवार की अधिकता होने पर 2, 4-डी नामक नीदानाशी 0.5 किग्रा./हेक्‍टेयर का छिड़काव लगभग 25 से 30 दिनों तक की फसल पर करें। यदि कोई और फसल धान के साथ हो तब यह छिड़काव न करें।&lt;br /&gt;(ब) बीज छिटकवा धान, जहॉ बियासी की जाती हो&lt;br /&gt;      जहॉं बियासी अपनाई जाती हो, वहॉं बियासी करने के बाद 7 दिनों के अंदर निंदाई व चलाई किया जाना चाहिये। दूसरी निंदाई 25-30 दिनों पर करना चाहिये। बियासी के लिये समय पर पानी उपलब्‍ध होने पर निंदाई करना चाहिये। बोनी के 40-45 दिनों बाद बियासी नहीं करना चाहिये।&lt;br /&gt;(स) कतारों में बोई गई बीजू धान में&lt;br /&gt;      ‘अ’ में बताए गये तरीके से नीदा नियंत्रण करें। इसके अलावा कतारों के बीच ताइचुंग गुरमा लगभग 15 दिनों के अंतराल से 50 दिनों तक फसल में कतारों के बीच चलाने से निंदाई का व्‍यय बहुत कम हो जाता है। निंदाई से निकाले गये खरपतवारों की पलवार कतारों के बीच इस प्रकार बिछाएं कि उनकी जड़ें जमीन के संपर्क में न आने पायें। ऐसा करने से नये खरपतवार नहीं उग पाते, नमी का संरक्षण होता है और खेत में पोषक तत्‍वों की वृद्धि होती है।&lt;br /&gt;(द) रोपाई धान में&lt;br /&gt;1. रोपाई के बाद 6-7 दिनों तक में ब्‍यूटाक्‍लोर 2 से 2.50 किलोग्राम/हेक्‍टेयर का छिड़काव करने से लगभग 25-30 दिनों तक खरपतवार का प्रकोप कम होता है।&lt;br /&gt;2. खड़ी फसल में रोपाई के 30 और 45 दिनों पर करने से खरपतवार पर नियंत्रण हो जाता है।&lt;br /&gt;3. कतारों की रोपाई में कतारों के बीच ताइचुंग गुरमा चलाने से खरपतवार का प्रभावी नियंत्रण होता है।&lt;br /&gt;4. चौड़ी पत्‍ती वाले खरपतवार उगने पर, 2,4-डी नींदा नाशी 0.5 किलोग्राम/हेक्‍टेयर का छिड़काव लगभग एक माह की फसल पर करने से इनका नियंत्रण हो जाता है।&lt;br /&gt;(ई) जहॉं पर जंगली धान का प्रकोप हो&lt;br /&gt;      जंगली धान के प्रकोप वाले खेतों में, बैंगनी पत्‍ती वाली धान की प्रजातियॉं जैसे श्‍यामला, आर. 470 (नाग केशर व जलकेशर स्‍थानीय प्रजातियॉं) उगाने से निंदाई में सुविधा होती है।&lt;br /&gt;जल प्रबंधन&lt;br /&gt;      धान अधिक पानी चाहने वाली फसल है। किसी भी अवस्‍था में पानी की कमी होने पर उपज में गिरावट आती है, किंतु कंसे निकलते समय और दाना भरते समय पानी की कमी से उपज में बहुत गिरावट होती है। बालें निकलते समय और दाना भरते समय भी पानी की कमी से उपज में बहुत गिरावट होती है। लगातार खेत में पानी भरे रखेन से यद्यपि खरपतवार कम उगते हैं फिर भ्‍ज्ञी उपज पर बुरा असर पड़ता है। खेत से भरा हुआ पानी 3-4 दिनों के लिये निकालकर फिर दूसरी पानी भरते रहने का क्रम बनाना फसल की उपज के लिये सर्वोत्‍तम जल प्रबंधन है। प्रजातियों के अनुसार धान की फसल की विभिन्‍न अवस्‍थाओं पर खेत में पानी के सतह की ऊंचाई निम्‍नानुसार सुनिश्चित करना चाहिये।&lt;br /&gt;तालिका : धान की फसल में जल प्रबंधन&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खेत में पानी के सतह की ऊंचाई (से.मी.) &lt;br /&gt;फसल की अवस्‍था&lt;br /&gt;ऊंची प्रजातियॉं&lt;br /&gt;बौनी प्रजातियॉं&lt;br /&gt;लगभग 1 माह की अवस्‍था&lt;br /&gt;5+2 सेमी.&lt;br /&gt;5+2 सेमी.&lt;br /&gt;1 माह से 2 माह की अवस्‍था&lt;br /&gt;10+2 सेमी.&lt;br /&gt;7+2 सेमी.   &lt;br /&gt;2 माह के बाद&lt;br /&gt;15+2 सेमी.&lt;br /&gt;10+2 सेमी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धान की कटाई के 15-20 दिनों पूर्व खेत से भरा हुआ पानी निकाल देना चाहिये। इस अवधि में पानी भरा रहने से चावल अधिक टूटता है।&lt;br /&gt;पौध संरक्षण&lt;br /&gt;(अ) कीट&lt;br /&gt;      धान की सभी अवस्‍थाओं में किसी न किसी विनाशकारी कीटों या रोगों के प्रकोप की आशंका बनी रहती है, अत: हमेशा खेत की निगरानी करते रहना चाहिये तथा इनका प्रकोप दिखने पर कृषि परामर्श केन्‍द्रों से सम्‍पर्क करके उचति पौध संरक्षण उपाय अपनाना चाहिये। किसी भी कीट या रोग के प्रकोप को नजर अंदाज नहीं करना चाहिये।&lt;br /&gt;(अ) प्रमुख कीट&lt;br /&gt;1. सफेद पृष्‍ठीय फुदका&lt;br /&gt;सोगेटेला फुर्सीफैरा&lt;br /&gt;1.1 पत्‍ती मोड़क (चितरी)&lt;br /&gt;नैबेलोक्रोसिस मेडिनालिस   &lt;br /&gt;1.2 गधी कीट&lt;br /&gt;लेप्‍टोकोराइजा वेरीकोर्निस   &lt;br /&gt;1.3 चढ़ने वाली इल्‍ली (तितली)&lt;br /&gt;माइथिमना सेपरेटा  &lt;br /&gt;1.4 धान का गाल मिज (गंगई)&lt;br /&gt;ओरसिलिया ओराइजी&lt;br /&gt;1.5 धान का तना छेदक&lt;br /&gt;ट्राइपोराइजा इंसर्टुल्‍स&lt;br /&gt;1.6 भूरा पृष्‍ठीय फुदका&lt;br /&gt;नीलापर्वत्‍ज्ञ ल्‍यूगेन्‍स &lt;br /&gt;1.7 धान का हिस्‍सा&lt;br /&gt;डाइक्‍लोहिस्‍पा आर्मिजेरा    &lt;br /&gt;1.8 हरा फुदका&lt;br /&gt;निफोटेटिक्‍स हेरिसेन्‍स&lt;br /&gt;1.9 कोष कृमि बंकी&lt;br /&gt;निम्‍फला डिपेटालिस &lt;br /&gt;1.10 सैनिक कीट (फौजी कीट)&lt;br /&gt;स्‍पोडोप्‍टेरा मेउरेसिया&lt;br /&gt;2. कृंतक&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;2.1 छोटा बेन्‍डीकूट&lt;br /&gt;बेडीकोटा बेंगालेन्सिस&lt;br /&gt;2.2 कोमल रोएंदार चूहा&lt;br /&gt;मिलारडिया मेल्‍टाडा &lt;br /&gt;2.3 प्रक्षेत्र चूहा (मूस)&lt;br /&gt;मस मुसकुलस&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हानिकारक कीटों का सर्वेक्षण&lt;br /&gt;1. खेत में हानिकारक कीटों के प्रकोप तथा जैव नियंत्रण के साधनों परजीवी एवं परभक्षी मित्र कीट की संख्‍या के सही आंकलन हेतु फसल की बुवाई एवं रोपाई से लेकर कंसे बनने तक प्रत्‍येक 7 दिनों के अंतराल पर नियमित रूप से फसल निरीक्षण करें।&lt;br /&gt;2. निरीक्षण के साथ ही नाशी कीटों एवं मित्र कीटों की संख्‍या के आंकलन हेतु जाल का भी उपयोग करें।&lt;br /&gt;3. प्रकाश के प्रति आकर्षित होने वाले कीटों के निरीक्षण हेतु 125 वाट मरक्‍यूरी वेपर बल्व युक्‍त प्रकाश प्रपंच का प्रति रात्रि में 2 घंटे लगातार उपयोग करें। (7 बजे से 9 बजे तक)&lt;br /&gt;आर्थिक क्षति स्‍तर (ई.टी.एल.)&lt;br /&gt;धान के हानिकारक कीटों हेतु आर्थिक क्षति स्‍तर&lt;br /&gt;क्र.&lt;br /&gt;कीट का नाम&lt;br /&gt;आर्थिक क्षति स्‍तर  &lt;br /&gt;1.&lt;br /&gt;सफेद पृष्‍ठीय फुदका&lt;br /&gt;5 से 10 कीट/झुरमुट (हिल)&lt;br /&gt;2.&lt;br /&gt;हरा फुदका&lt;br /&gt;5 से 10 कीट/झुरमुट (हिल)&lt;br /&gt;3.&lt;br /&gt;भूरा फुदका&lt;br /&gt;5 से 10 कीट/झुरमुट (हिल)&lt;br /&gt;4.&lt;br /&gt;पत्‍ती मोड़क कीट&lt;br /&gt;2 ग्रसित नई पत्तियॉं/झुरमुट (हिल)&lt;br /&gt;5.&lt;br /&gt;तना छेदक&lt;br /&gt;10 प्रतिशत मृत केन्‍द्र (डेड हार्ट)   &lt;br /&gt;6.&lt;br /&gt;गाल मिज&lt;br /&gt;5 प्रतिशत चमकीले प्ररोह (पत्तियॉ)    &lt;br /&gt;7.&lt;br /&gt;हिस्‍पा&lt;br /&gt;2 वयस्‍क कीट/झुरमुट (हिल)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;समन्वित नाशी कीट प्रबंधन के उपाय&lt;br /&gt;(अ) सस्‍या क्रियाओं द्वारा&lt;br /&gt;1. ग्रीष्‍म कालीन गहरी जुताई- ग्रीष्‍म कालीन गहरी जुताई, मेढ़ों की सफाई तथा पिछली फसल के अवशेषों को नष्‍ट करने से तना छेदक, कीट की इल्लियॉं एवं शंखियॉं इत्‍यादि भूमि से ऊपर आकार तेज धूप, अधिक तापमान एवं पक्षियों द्वारा नष्‍ट हो जाते हैं।&lt;br /&gt;2. बुवाई/रोपाई का समय- शीघ्र एवं उचित समय पर बुवाई/रोपाई करना आवश्‍यक है। नर्सरी में बीजों की बुवाई जून माह में तथा रोपाई जुलाई माह तक पूर्ण कर लेने पर नाशीकीटों का प्रकोप कम किया जा सकता है।&lt;br /&gt;3. रोपों का उपचार- रोपाई से पूर्व रोपों की जड़ो को क्‍लोरपायरीफास 20 ई.सी. (200 मि.ली. दवा 200 लीटर पानी) के घोल में डुबाकर प्रति एकड़ की दर से उपचारित करना चाहिये।&lt;br /&gt;4. स्‍वस्‍थ बीज, प्रतिरोधक (प्रकोप सहने योग्‍य) जातियों का चुनाव करें जैसे&lt;br /&gt;कीट&lt;br /&gt;प्रतिरोधक प्रकोप सहने योग्‍य जातियॉं&lt;br /&gt;माल मिज&lt;br /&gt;रूचि, महामाया, अभया, फाल्‍गुना   &lt;br /&gt;भूरा फुदका&lt;br /&gt;सोनासाली, प्रतिभा, पारिजात, मानसरोवर&lt;br /&gt;हरा फुदका&lt;br /&gt;आई.आर. 20, वाणी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(ब) यांत्रिक क्रियाओं द्वारा&lt;br /&gt;1. हानिकारक कीटों के अण्‍ड समूह एवं इल्लियों को एकत्रित कर नष्‍ट करें।&lt;br /&gt;2. पौधे के कीट प्रकोपित भागों को नष्‍ट करें।&lt;br /&gt;प्रकोपित भाग&lt;br /&gt;हानिकारक कीट&lt;br /&gt;चमकीली प्ररोह पत्तियॉ&lt;br /&gt;गाल मिज   &lt;br /&gt;मृत केंद्र खोखला सड़ा तना&lt;br /&gt;तना छेदक  &lt;br /&gt;ग्रसित पत्तियॉ&lt;br /&gt;हिस्‍पा, पत्‍ती मोड़क &lt;br /&gt;अण्‍ड समूह&lt;br /&gt;तना छेदक&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;3. रोपों की प‍त्तियों के अग्र सिरे को रोपाई पूर्व काट कर अलग कर देवें।&lt;br /&gt;4. मरक्‍यूरी वेपर 125 वाट बल्‍वयुक्‍त प्रकाश प्रपंच को प्रति रात्रि लगभग 2 घंटे (7 से 9 बजे) चलायें।&lt;br /&gt;5. फैरोमोन ट्रेप प्रपंच का उपयोग करें।&lt;br /&gt;(स) जैविक क्रियाओं द्वारा&lt;br /&gt;1. संरक्षण- निम्‍नलिखित जैविक कीट नियंत्रण साधनों को संरक्षित कर जैव नियंत्रण को प्रोत्‍साहित किया जा सकता है। जैसे- स्‍पाइडर (मकड़ी), स्‍टेफेलिनिड बीटल, ड्रेगन फ्लाई, मिरिड बग, मिनोचिलस, ट्राइकोग्रामा कोटेसिया (अण्‍ड परजीवी), प्‍लेटीगेस्‍टर, नियानस्‍टेट्स, हेपिलोगोनाटोपस, एपेन्‍टेलिस, टिलेनोमस, ट्रेस्टिकस इत्‍यादि।&lt;br /&gt;2. वृद्धि- धान की तना छेदक इल्लियों के नियंत्रण हेतु ट्राइकोग्रामा जेपोनिकम अण्‍ड परजीवी के 50,000 अण्‍डे प्रति हेक्‍टेयर प्रति सप्‍ताह की दर से छह सप्‍ताह तक रोपाई के 30 दिन बाद से खेत में छोड़ना प्रारंभ करें।&lt;br /&gt;(द) रासायनिक कीटनाशकों द्वारा&lt;br /&gt;      समन्वित नाशी जीव प्रबंधन के अनुसार रासायनिक कीटनाशकों का प्रकोप आवश्‍यकतानुसार, सुरक्षित एवं अंतिम उपाय के रूप में ही करें। पत्‍ती भक्षक एवं तना छेदक हेतु मेलाथियान 50 ई.सी. 500 मि.ली. / हेक्‍टेयर या इंडोसल्‍फान 35 ई. सी. 1000 मि.ली. / हेक्‍टेयर या साइपरमेथिरिन 25 ई.सी. 250 मि.ली./हेक्‍टेयर या मिथो‍मिल 40 एस.पी. 1000 ग्राम / हेक्‍टेयर की दर से उपयोग करें। रस चूसक कीटों हेतु मिथाइल डेमेटान 25 ई.सी. 1000 मि.ली. / हेक्‍टेयर या ट्राइजोफास 40 ई.सी. 1000 मि.ली. / हेक्‍टेयर या डाइमिथोएट 30 ई.सी. 500 मि.ली. / हेक्‍टेयर या कारटप हाइड्रोक्‍लोराइड 50 एस.पी. 1000 मि.ली. / हेक्‍टेयर या फोरेट 10 जी 15 किग्रा. / हेक्‍टेयर की दर से उपरोक्‍त में से किसी एक दवा का उपयोग करें।&lt;br /&gt;(क) चूहों का नियंत्रण&lt;br /&gt;इनके नियंत्रण के लिये जिंक फास्‍फाइड 2 प्रतिशत दवा का उपयोग करें। इसके लिए आवश्‍यकतानुसार जहरीला चारा बनायें। 100 ग्राम जहरीला चारा बनाने के लिए किसी एक प्रकार के अनाज के दाने को 3-4 घंटे पानी में फुलाकर तथा पानी निथार कर उसमें किसी भी खाने के तेल को अच्‍छी तरह मिलायें, तत्‍पश्‍चात उसमें 2.5 ग्राम जिंक फास्‍फाइड मिलाऐं। चारे को चूहों के बिलों में डाल दें तथा बिलों को बंद कर दें। जहरीला चारा देने से पहले चूहों को सादे भोजन से एक या दो दिन लहटाना अच्‍छा होता है।&lt;br /&gt;(ब) रोग&lt;br /&gt;      धान की प्रमुख बीमारियों के नाम, कवक उनके लक्षण, पौधों की अवस्‍था, जिसमें आक्रमण होता है, निम्‍नानुसार है:&lt;br /&gt;1. झुलसा रोग&lt;br /&gt;आक्रमण- पौधे से लेकर दाने बनने तक की अवस्‍था तक इस रोग का आक्रमण होता है। इस रोग का प्रभाव मुख्‍यत: पत्तियों पर प्रकट होता है। इस रोग से पत्तियों, तने की गॉंठों, बाली पर ऑंख के आकार के धब्‍बे बनते हैं। धब्‍बे बीच में राख के रंग के तथा किनारों पर गहरे भूरे या ललामी लिये होते हैं। कई धब्‍बे मिलकर सफेद ंरग के बड़े धब्‍बे बना लेते हैं जिससे पौधा झुलस जाता है। गॉंठों पर या बालियों के आधार पर प्रकोप होने पर पौधा हल्‍की हवा से ही गॉंठों पर से तथा बाली के आधार से टूट जाता है।&lt;br /&gt;रोग की सुप्‍त अवस्‍था/फैलाव&lt;br /&gt;      यह रोग बीज जनित है पर बाद में रोगीले पौधों, नीदों तथा हवा द्वारा फैलता है।&lt;br /&gt;नियंत्रण&lt;br /&gt;1. स्‍वच्‍छ खेती करना आवश्‍यक है। खेत में पड़े पुराने पौध अवशेष को भी नष्‍ट करें।&lt;br /&gt;2. रोग रोधी किस्‍मों का चयन करें। जैसे आदित्‍य, तुलसी, जया, बाला, पंकज, साबरमती, गरिमा, प्रगति इत्‍यादि।&lt;br /&gt;3. बीजोपचार करें- बीजोपचार कार्बेन्‍डाजिम अथवा बेनोमायल- 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की मात्रा से घोल बनाकर 6 से 12 घंटे तक बीज को डुबोयें, तत्‍पश्‍चात छाया में बीज को सुखाकर बोनी करें।&lt;br /&gt;4. खड़ी फसल में रोग के लक्षण दिखाई देने पर कार्बेन्‍डाजिम 1 ग्राम या हिनोसान 1 मि.ली. या मेंक्‍कोजेब 3 ग्राम प्रति लीटर के हिसाब से छिड़काव करना चाहिये। दैहिक दवायें अधिक प्रभावी है।&lt;br /&gt;धान की जातियों को क्षेत्रानुसार चुनाव करने से इस रोग से बचा जा सकता है।&lt;br /&gt;2. भूरा धब्‍बा या पर्णचित्‍ती रोग&lt;br /&gt;आक्रमण- इस रोग का आक्रमण भी पौध अवस्‍था से दाने बनने की अवस्‍था तक होता है।&lt;br /&gt;लक्षण- मुख्‍य रूप से यह रोग पत्तियों, पर्णछन्‍द तथा दानों पर आक्रमण करता है। पत्तियों पर गोल अंडाकर, आयताकार छोटे भूरे धब्‍बे बनते हैं जिससे पत्तियॉं झुलस जाती हैं तथा पूरा का पूरा पौधा सूखकर मर जाता है। दाने पर भूरे रंग के धब्‍बे बनते हैं तथा दाने हल्‍के रह जाते हैं।&lt;br /&gt;नियंत्रण- यह रोग बीज जनित है परंतु खरपतवार तथा बाद में रोगीले पौधों से तथा हवा से भी इस रोग का फैलाव होता है। अत: खेत में पड़े पुराने पौध अवशेष को नष्‍ट करें। रोग की रोकथाम के लिये झोंका रोग की विधि से बीजोपचार करें। खड़ी फसल पर लक्षण दिखते ही मेन्‍कोजेब 3 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें तथा निरोधक जातियों जैसे- क्रांति, आई.आर.-36 की बुवाई करें।&lt;br /&gt;3. खैरा रोग&lt;br /&gt;      यह रोग भूमि में जस्‍ते की कमी के कारण होता है।&lt;br /&gt;आक्रमण- पौधे से लेकर बाढ़ की अवस्‍था में रोग के लक्षण दिखाई देते हैं। प्रदेश के अधिकांश जिलों में जिंक की कमी पाई जाती है।&lt;br /&gt;लक्षण- जस्‍ते की कमी वाली खेत में पौध रोपण के 2 सप्‍ताह के बाद ही पुरानी पत्तियों के आधार भाग में हल्‍के पीले रंग के धब्‍बे बनते हैं, जो बाद में कत्‍थई रंग के हो जाते हैं, जिससे पौधा बौना रह जाता है तथा कल्‍ले कम निकलते हैं एवं जड़ें भी कम बनती हैं तथा भूरी रंग की हो जाती है।&lt;br /&gt;नियंत्रण :&lt;br /&gt;1. खैरा रोग के नियंत्रण के लिये 20-25 किग्रा. जिंक सल्‍फेट प्रति हेक्‍टेयर बुवाई पूर्व उपयोग करें।&lt;br /&gt;2. पौध रोपण से पहले पौधे को 0.4 प्रतिशत जिंक सल्‍फेट के घोल में 12 घंटे तक डुबाकर रोपण करें।&lt;br /&gt;3. खड़ी फसल में 1000 लीटर पानी में 5 किलोग्राम जिंक सल्‍फेट तथा 2.5 किग्रा. बिना बुझा हुआ चूने के घोल का मिश्रण बनाकर उसमें 2 किलोग्राम यूरिया मिलाकर छिड़काव करने से रोग का निदान तथा फसल की बढ़वार में वृद्धि होती है।&lt;br /&gt;4. कुछ जातियों में खैरा रोग का प्रकोप कम होता है: जैसे- रतना, अन्‍नपूर्णा, कावेरी, साबरमती- कुछ में मध्‍यम- जैसे- आई.आर. 8, पदमा, बाला, आई.आर. 20, कृष्‍णा तथा साकेत तथा कुछ में अधिक जैसे- जया, पंकज, सफरी इत्‍यादि। अत: क्षेत्र के अनुसार जाति का चयन करें।&lt;br /&gt;4. शाकाणु पर्ण रोग&lt;br /&gt;लक्षण- इसका आक्रमण बाढ् की अवस्‍था में होता है। इस रोग में पौधे की नई अवस्‍था में नसों के बीच में पारदर्शकता लिये हुए लंबी-लंबी धारियॉं पड़ जाती हैं, जो बाद में कत्‍थाई रंग ले लेती है।&lt;br /&gt;रोग की सुप्‍त अवस्‍था/फैलाव&lt;br /&gt;      झुलसन रोग की तरह ही इस रोग का फैलाव होता है।&lt;br /&gt;नियंत्रण -&lt;br /&gt;1. शाकाणु झुलसन की तरह बीजोपचार करें।&lt;br /&gt;2. शाकाणु पर्णधारी रोग के लिये आई.आर. 20, श्रांगृवि और कृष्‍णा, जातियॉं रोग सहिष्‍णु पाई गई है।&lt;br /&gt;5. दाने का कंड़वा&lt;br /&gt;आक्रमण- दाने बनने की अवस्‍था में।&lt;br /&gt;लक्षण- बाली के 3-4 दानें में कोयले जैसा काला पाउडर भरा होता है, जो या तो दाने के फट जाने से बाहर दिखाई देता है या बंद रहने पर सामान्‍य दाने जैसा ही रहता है, परंतु ऐसे दाने देर से पकते हैं तथा हरे रहते हैं। सूर्य की धूप निकलने से पहले देखने पर संक्रमित दानों का काला चूर्ण स्‍पष्‍ट दिखाई देता है।&lt;br /&gt;रोग की सुप्‍त अवस्‍था/फैलाव – रोगाणु एक वर्ष से अधिक सक्रिय रहते हैं।&lt;br /&gt;नियंत्रण- इस रोगा प्रकोप अभी तक तीव्र नहीं पाया गया है। अत: उपचार की आवश्‍यकता नहीं है, परंतु अधिक नत्रजन देने से रोग अधिक बढ़ता है। अत: खेत में संतुलित खाद का प्रयोग करना चाहिये।&lt;br /&gt;6. शाकाणु झुलसन रोग&lt;br /&gt;आक्रमण- बढ़वार की किसी भी अवस्‍था में इस रोग का आक्रमण हो सकता है।&lt;br /&gt;लक्षण- इस रोग में पत्तियों पर जलसिक्‍त पार भाषक धब्‍बे प्रकट होते हैं, जो बाद में सिरे तथा किनारे से सूखने लगती हैं, सिरे और किनारे टेढ़े-मेढ़े अनियमित होते हैं तथा पौधे झुलसे हुये से लगते हैं।&lt;br /&gt;रोग की सुप्‍त अवस्‍था/फैलाव – रोग के जीवाणु मिट्टी और बीज में रहते हैं। इसका फैलाव रोग ग्रसित पौधों के संपर्क तथा सिंचाई के पानी से होता है।&lt;br /&gt;नियंत्रण:&lt;br /&gt;1. स्‍वच्‍छ खेती को प्राथमिकता देना आवश्‍यक है। खेत में पानी की निकासी करें।&lt;br /&gt;2. बोने से पूर्व 6 ग्राम स्‍ट्रेप्‍टोसाकलिन दवा को 20 लीटर पानी के घोल से बीज उपचारित करें।&lt;br /&gt;3. खड़ी फसल पर रोग के लक्षण दिखाई देने पर उपरोक्‍त दवा के घोल का छिड़काव करें अथवा 1 ग्राम ताम्रयुक्‍त दवा प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।&lt;br /&gt;4. शाकाणु प्रतिरोधक जातियों का उपयोग करें- जैसे आई.आर. 20, रतना, जया, बाला, कृष्‍णा इत्‍यादि।&lt;br /&gt;कटाई-गहाई एवं भण्‍डारण :&lt;br /&gt;      पूरी तरह से पकी फसल की कटाई करें। पकने के पहिले कटाई करने से दाने पोचे हो जाते हैं। कटाई में विलम्‍ब करने से दाने झड़ते हैं तथा चावल अधिक टूटता है। फसल को चूहों से भी बचाना बहुत जरूरी होता है। कटाई के बाद फसल को 1-2 दिन खेत में सुखाने के बाद खलियान में ले जाना चाहिए। खलियान में ठीक से सुखाने के बाद गहाई करना चाहिए। गहाई के बाद उड़ावनी करके साफ दाना इकट्ठा करना चाहिये और अच्‍छी तरह धूप में सुखाने के बाद भण्‍डारण करना चाहिये।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7319195525113358508-6012800347243266933?l=smalik06.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://smalik06.blogspot.com/feeds/6012800347243266933/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7319195525113358508&amp;postID=6012800347243266933' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7319195525113358508/posts/default/6012800347243266933'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7319195525113358508/posts/default/6012800347243266933'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://smalik06.blogspot.com/2008/10/blog-post_797.html' title='धान'/><author><name>malik</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09139758814525364467</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Eh8BkyTxt58/SJqthbJOKKI/AAAAAAAAADI/uvkv7Qt-o9A/s1600-R/hllo009%25255B1%25255D.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7319195525113358508.post-5303343809036023549</id><published>2008-10-13T02:17:00.000-07:00</published><updated>2008-10-13T02:25:22.920-07:00</updated><title type='text'>उड़द</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;उड़द&lt;br /&gt;मध्‍यप्रदेश में उड़द की खेती मंदसौर, झाबुआ, खरगोन, रतलाम, खण्‍डवा तथा धार जिले में अधिक होती है। मध्‍यप्रदेश में उड़द की उपज 2-4 क्विंटल प्रति हेक्‍टेयर है जो कि बहुत कम है। उन्‍नत जातियों में 10-15 क्विंटल प्र‍ति हेक्‍टेयर पैदावार देने की क्षमता है। उड़द अधिकतर खरीफ मौसम में शुद्ध या अंर्तवर्तीय फसल के रूप में ली जाती है।&lt;br /&gt;भूमि का चुनाव: उड़द की खेती विभिन्‍न प्रकार की भूमि में होती है। हल्‍की रेतीली, दुमट या मध्‍यम प्रकार की भूमि में जिसमें पानी का निकास अच्‍छा हो, उड़द के लिए अधिक उपयुक्‍त होती है। पी.एच. मान 7 से 8 के बीच वाली भूमि उड़द के लिये उपयुक्‍त होती है। अम्‍लीय व क्षारीय भूमि उपयुक्‍त नहीं है।&lt;br /&gt;भूमि की तैयारी: वर्षा आरंभ होने के बाद दो-तीन बार हल बखर चलाकर खेत को समतल करें। वर्षा आरंभ होने से पहले बोनी करने से पौधे की बढ़वार अच्‍छी होती है।&lt;br /&gt;उन्‍नत किस्‍में: मध्‍यप्रदेश के लिए अनुमोदित जातियों का चुनाव करें। जातियों की विशेषताएं निम्‍न प्रकार है:-&lt;br /&gt;* बसंत बहार, टी.पी.यू् 4 और बी.बी. 3 : अधिक उपज देने वाली जातियॉ हैं।&lt;br /&gt;* टाईप 9 : पकने की अवधि 70-75 दिन, 1000 दानों का वजन 35 ग्राम, उपज 12 क्विंटल प्रति हेक्‍टेयर। बीज मध्‍यम छोटा, हल्‍का काला व मध्‍यम ऊंचाई वाला पौधा।&lt;br /&gt;* जबाहर उड़द-2 (आर.यू. 2) : पकने की अवधि 70 दिन, 1000 दानों का वजन 33 ग्राम उपज 10 क्विंटल प्रति हेक्‍टेयर। बीज मध्‍यम छोटा, चमकीला काला, पौधा कम फैलने वाला, मुख्‍य तने पर ही फलियॉ, पास-पास गुच्‍छों में लगती हैं।&lt;br /&gt;* जबाहर उड़द 3- (जे.यू. 77-41) : पकने की अवधि 70 से 75 दिन, 1000 दानों का वजन 38 ग्राम, उपज 10 से 12 क्विंटल प्रति हेक्‍टेयर बीज मध्‍यम, छोटा हल्‍का काला, घनी रोऍ युक्‍त पौधा मध्‍यम कम फैलने वाला।&lt;br /&gt;* खरगोन-3 : पकने की अवधि 85 से 90 दिन, 1000 दानों का वजन 42 ग्राम, उपज 8 से 10 क्विंटल प्रति हेक्‍टेयर पौधा फैलने वाला व ऊंचा, बीज बड़ा, हल्‍का काला।&lt;br /&gt;* पंत यू-30 : दाने काले मध्‍यम आकार के होते हैं। यह 70 दिनों में पक जाती है। औसत उपज 12 क्विंटल प्रति हेक्‍टेयर। यह रीवा व ग्‍वालियर तथा पीले मोजेक रोग से प्रभावित क्षेत्रों के लिए उपयुक्‍त है।&lt;br /&gt;फसल चक्र&lt;br /&gt;1. उड़द-गेहूँ&lt;br /&gt;2. उड़द-करडी&lt;br /&gt;3. उड़द-सरसों&lt;br /&gt;बीजोपचार एवं बीज दर: 20 किलोग्राम बीज प्रति हेक्‍टेयर बोना चाहिए। बोनी के पूर्व बीज को 3 ग्राम थायरम प्रति किलोग्राम बीज के हिसाब से उपचारित करें।&lt;br /&gt;बोनी का समय: मानसून के आगमन पर या जून के अंतिम सप्‍ताह में पर्याप्‍त वर्षा होने पर बुवाई करें।&lt;br /&gt;बोने की विधि: बोनी नारी या तिफन से करें। कतारों की दूरी 30 सेमी. तथा पौधों की दूरी 10 सेमी. रखे एवं बीज 4-6 सेमी. की गहराई में बोयें।&lt;br /&gt;खाद एवं उर्वरक की मात्रा: नत्रजन 20 किलोग्राम व स्‍फुर 50 किलो ग्राम (100 कि. डी.ए.पी. प्रति हेक्‍टेयर) के हिसाब से सम्‍पूर्ण खाद की मात्रा बुवाई के समय कतारों में बीज के ठीक नीचे डालना चाहिये। दलहनी फसलों में गंधकयुक्‍त उर्वरक जैसे सिंगल सुपर फास्‍फेट, अमोनियम, सल्‍फेट, जिप्‍सम आदि का उपयोग करना चा‍हिए। विशेषत: गंधक की कमी वाले क्षेत्र में 20 किलोग्राम गंधक प्रति हेक्‍टेयर गंधक युक्‍त उर्वरकों से दें। भूमि में पोटाश की कमी होने पर 20 किलोग्राम पोटाश/हेक्‍टेयर बुवाई के समय दें।&lt;br /&gt;सिंचाई: फूल एवं दाना भरने की अवस्‍था पर खेत में नमी कम हो तो एक सिंचाई फसल को देना चाहिये।&lt;br /&gt;निंदाई-गुड़ाई: खरपतवार फसलों को अनुमान से कही अधिक क्षति पहुंचाते है। अत: विपुल उत्‍पादन के लिये समय पर निंदाई-गुड़ाई कुल्‍पा व डोरा आदि चलाते हुए अन्‍य आधुनिक नींदानाशक का समुचित उपयोग करना चाहिए। नींदानाशक बासलीन 2 से 2.5 लीटर प्रति हेक्‍टेयर 600 लीटर पानी में घोल बनाकर जमीन बखरने के पूर्व नमी युक्‍त खेत में छिड़कने से अच्‍छे परिणाम मिलते हैं।&lt;br /&gt;पौध संरक्षण कीट: उड़द की फसल को 16 प्रकार के कीट अगस्‍त व सितम्‍बर माह में हानि पहुंचाते है, जिससे 38 प्रतिशत तक उपज में कमी आ सकती है।&lt;br /&gt; 1. रस चूसने वाले कीट- फुदका माहो, सफेद मक्‍खी, थ्रिप्‍स आदि के निम्‍फ व प्रोढ़ पत्तियों की निचली सतह से रस चूसते हैं जिससे पत्तियॉ पीली होकर गिर जाती है। सफेद मक्‍खी मोजक विषाणु रोग वाहक है। इनके नियंत्रण हेतु डायमेथियोट 30 ई.सी. 0.3 प्रतिशत या फास्‍फारेसिडान 25 एम.एल. 250 एम.एल. प्रति हेक्‍टेयर या मिथाइल डिमेटान 25 ई.सी. 1000 मि.ली./हेक्‍टेयर का छिड़काव करें।&lt;br /&gt; 2. फली बीटल- यह कीट भूरा व काला होता है जो पत्तियों को कुतर कर गोल छेद बनता है जिससे पत्तियॉ छलनी हो जाती है। क्विनाफास 1.5 प्रतिशत या थायोडान 4 प्रतिशत डस्‍ट 20 किग्रा. / हेक्‍टेयर 15 दिन क अंतर से दो बार फसल पर भुरकाव करें।&lt;br /&gt; 3. इल्लियॉ- ये 5 प्रकार की होती है जो हरी, भूरी, काली, लाल व रोऍदार होती है तथा पत्तियों खाती हैं। फालीडाल 2 प्रतिशत या थायोडान 4 प्रतिशत डस्‍ट 20 किग्रा./हेक्‍टेयर का फसल पर भुरकार करें।&lt;br /&gt; 4. फली छेदक इल्‍ली- यह इल्‍ली मटमैले रंग की काली धब्‍बे वाली होती है जो तना फूल व फलियों के अंदर घुसकर क्षति करती है। इससे 40 प्रतिशत फलियॉ क्षतिग्रस्‍त होती है एवं 15 से 20 प्रतिशत उपज में हानि होती है। फलियॉ बनते समय एक लीटर मोनोक्रोटोफास 36 एस.एल. प्रति हेक्‍टेयर छिड़कें तथा आवश्‍यकता होने पर 15 दिन बाद दोहरायें। उड़द की जल्‍दी पकने वाली जातियॉ पंत यू. 30 में अपेक्षाकृत कम कीट लगते हैं।&lt;br /&gt; (ब) रोग&lt;br /&gt; 1. पावडरी मिल्‍ड्य- यह रोग पौधा अवस्‍था में फलियॉ लगने तक कभी भी देखा जा सकता है। इस रोग के कारण पैदावार में काफी क्षति होती है। यह रोग प्रारंभिक अवस्‍था के समय आता है तो पौधे पूर्ण रूप से सूख जाते हैं। इस रोग से पत्तियॉ, शाखाओं और फलियों पर सफेद चूर्ण सा दिखाई देता है। यह रोग अगस्‍त माह के प्रथम सप्‍ताह में प्रारंभ होता है। देर से बोई गई फसल पर इस रोग का प्रकोप अधिक होता है।&lt;br /&gt; नियंत्रण-&lt;br /&gt; 1. घुलनशील गंधक 30 ग्राम 10 लीटर पानी में&lt;br /&gt; 2. कार्बन्‍डाजिम 10 ग्राम 10 लीटर पानी में अथवा&lt;br /&gt; 3. केरेथन एल.सी. 3 मि.ली. 10 लीटर पानी में घोल बनाकर 10 दिन के अंतर से छिड़काव करें।&lt;br /&gt; 4. रोग रोधक जातियॉ उड़द ए.बी.जी. 17 का चुनाव करें।&lt;br /&gt; 2. मेक्रोफौमिना पर्ण दाग तथा तना विगलन रोग- इस रोग के मुख्‍य लक्षण पौधों की जड़ों, तनों के विगलन में तथा पत्‍तों पर भूरे लाल रंग के धब्‍बों के रूप में दिखाई पड़ते हैं। यह रोग पौधों की किसी भी अवस्‍था में आता है। अंकुरण के एक माह बाद पौधे संक्रमित होने लगते हैं तथा जड़ तना सड़न के कारण पौधे मरने लगते हैं या छोटे रह जाते हैं। विगलन जड़ से शुरू होकर तने तक फैलता है तथा भूमि के निकट तने पर लाल भूरे रंग से लेकर काले रंग के धब्‍बे बनते हैं। तने पर असंख्‍य काले रंग के स्‍केलेरोशिया बनते हैं। संक्रमित तना बाद में काले रंग का हो जाता है।&lt;br /&gt; नियंत्रण-&lt;br /&gt; 1. थीरम 3 ग्राम प्रति किलो ग्राम बीज के साथ मिलाकर बीजोपचार करें।&lt;br /&gt; 2. फसलचक्र अपनाएं, रोग रोधी फसलें जैसे ज्‍वार, बाजरा इत्‍यादि की बोनी करें।&lt;br /&gt; 3. पीला मोजेक- इस रोग के कारण उपज में बहुत अधिक कमी होती है। उपज में कमी संक्रमण की अवस्‍था पर निर्भर करती है। यदि संक्रमण फसल की प्रारंभिक अवस्‍था में होता है तब उपज बिलकुल नहीं होती है। रोग के प्रथम लक्षण पत्तियों पर गोलाकार पीले धब्‍बे के रूप में दिखाई देता है। ये दाग एक साथ मिलकर तेजी से फैलते हैं, जिससे पत्तियों पर पीले धब्‍बे, हरे धब्‍बे के अगल-बगल दिखाई देते हैं जो बाद में बिल्कुल पीले हो जाते हैं। नई निकलती हुई पत्तियों में से लक्षण आरंभ से ही दिखाई देते है। यह रोग सफेद मक्‍खी द्वारा संचारित होता है।&lt;br /&gt; नियंत्रण-&lt;br /&gt; 1. सफेद मक्‍खी की रोकथाम हेतु मैटासिस्‍टाक्‍स 0.1 प्रतिशत के घोल का छिड़काव 15 दिन के अंतर से करें।&lt;br /&gt; 2. रोगी पौधों को उखाड़कर जला दें।&lt;br /&gt; 3. रोग रोधी जातियॉ जैसे उड़द पंत यू 19 एवं पंत यू 30 की बोनी करें।&lt;br /&gt; कटाई एवं उपज-&lt;br /&gt; फसल पूरी तरह पक जाने पर कटाई करें। उन्‍नत कृषि कार्यमाला अपनाने से उड़द की पैदावार 8 से 10 क्विंटल प्रति हेक्‍टेयर प्राप्‍त की ज सकती है।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7319195525113358508-5303343809036023549?l=smalik06.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://smalik06.blogspot.com/feeds/5303343809036023549/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7319195525113358508&amp;postID=5303343809036023549' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7319195525113358508/posts/default/5303343809036023549'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7319195525113358508/posts/default/5303343809036023549'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://smalik06.blogspot.com/2008/10/blog-post_5520.html' title='उड़द'/><author><name>malik</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09139758814525364467</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Eh8BkyTxt58/SJqthbJOKKI/AAAAAAAAADI/uvkv7Qt-o9A/s1600-R/hllo009%25255B1%25255D.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7319195525113358508.post-2354975969716779865</id><published>2008-10-13T02:12:00.000-07:00</published><updated>2008-10-13T02:16:33.773-07:00</updated><title type='text'>गेहूँ</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;गेहूँ&lt;br /&gt;गेहूँ प्रदेश की प्रमुख धान्‍य फसल है। भारत की खाद्यान्‍न संबंधित आत्‍मनिर्भरता तथा आर्थिक उन्‍नति में इसका महत्‍वपूर्ण योगदान है। प्रदेश में इसका कुल रकबा 269.50 हजार हेक्‍टेयर तथा उत्‍पादकता 1859 किलोग्राम प्रति हेक्‍टेयर है, जो की अन्‍य प्रदेशों की तुलना में कम है। उन्‍नत किस्‍म व नई उत्‍पादन तकनीक को अपनाकर निश्चित ही उत्‍पादन में वृद्धि की जा सकती है।&lt;br /&gt;भूमि का चुनाव: गेहूँ की खेती उचित जल प्रबंध के साथ सभी प्रकार की भूमियों में की जा सकती है। विपुल उत्‍पादन के लिये गहरी एवं मध्‍यम दोमट भूमि अधिक उपयुक्‍त है।&lt;br /&gt;भूमि की तैयारी:&lt;br /&gt;(अ) असिंचित क्षेत्र: वर्षा पर निर्भर क्षेत्रों में छोटे-छोटे कन्‍टूर बनाकर भूमि के कटाव और वर्षा जल को रोका जाना चाहिए। गर्मियों में खेत की गहरी जुताई करें। नमी संरक्षण हेतु प्रत्‍येक वर्षा के बाद बतर आने पर समय-समय पर खेत की जुताई करते रहें तथा वर्षा समाप्‍त होने पर प्रत्‍येक जुताई के बाद पाटा अवश्‍य लगायें।&lt;br /&gt;(ब) सिंचित क्षेत्र: खरीफ फसल काटने के तुरंत बाद ही जमीन की परिस्थिति के अनुसार जुताई करें। यदि खेत कड़ा हो और जुताई संभव न हो तब सिंचाई देकर जुताई करें। दो या तीन बार बखर या हल चला कर जमीन भुरभुरी करें, अंत में पाटा चला कर भूमि समतल बनायें।&lt;br /&gt;बुवाई का समय: सिंचाई की व्‍यवस्‍था के आधार पर निम्‍नानुसार बोनी करें:-&lt;br /&gt;1. असिंचित गेहूँ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;15 अक्‍टूबर से 31 अक्‍टूबर तक&lt;br /&gt;2. अर्द्धसिंचित गेहूँ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;15 अक्‍टूबर से 10 नवम्‍बर तक   &lt;br /&gt;3. सिंचित गेहूँ समय से&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;10 नवम्‍बर से 25 नवम्‍बर तक   &lt;br /&gt;4. सिंचित गेहूँ देरी से&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;05 दिसम्‍बर से 20 दिसम्‍बर तक&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीज की मात्रा: बीज की मात्रा का निर्धारण दानों के वजन एवं अंकुरण क्षमता पर निर्भर करता है। सामान्‍यत: 38 ग्राम प्रति एक हजार बीज के वजन वाली किंस्‍मों का बीज 100 किलोग्राम प्रति हेक्‍टेयर की दर से बोए। देरी से बोनी की स्थिति में बीज दर में 20-25 प्रतिशत बढोत्‍तरी करके बोनी करें। अंकुरण कम होने की दशा में बीज दर आवश्‍यकतानुसार निर्धारण कर बोनी करें।&lt;br /&gt;बीजोपचार: दीमक के नियंत्रण हेतु बीज को कीटनाशक दवा क्‍लोरोपाइरीफास 20 ई.सी. 400 मि.ली. 5 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति क्विंटल बीज के हिसाब से बीजोपचार करें। इसके पश्‍चात कार्बोक्सिन (विटावेक्‍स 75 डब्‍ल्‍यू.पी.) या बेनोमिल (बेनलेट 50 डब्‍ल्‍यू.पी.) 1.5-2.5 या थाइरम 2.5-3 या थाइरम 2.5-3 ग्राम दवा प्रति किलोग्राम बीज के हिसाब से उपचारित करें। बुवाई पूर्व बीज को एजेटोबेक्‍टर 5-10 ग्राम एवं पी.एस.बी. कल्‍चर 10-20 ग्राम प्रति किलो ग्राम के हिसाब से उपचारित करें।&lt;br /&gt;बुवाई का तरीका: असिंचित अवस्‍था में कतार से कतार की दूरी 30 सेमी. अर्धसिंचित अवस्‍था में कतार की दूरी 23-25 सेमी. तथा सिंचित अवस्‍था में कतार से कतार की दूरी 20-23 सेमी. रखें। पिछेती बोनी की अवस्‍था में कतार से कतार की दूरी 18 सेमी. रखना चाहिए। बीज की बुवाई 3-4 सेमी. गहराई पर करें। शुष्‍क बुवाई की स्थिति में उथली बोनी अंकुरण के लिये लाभप्रद होती है।&lt;br /&gt;उन्‍नत किस्‍में:&lt;br /&gt;क्र&lt;br /&gt;कृषि परिस्थितिकी&lt;br /&gt;पिसी किस्‍में&lt;br /&gt;कठिया किस्‍में&lt;br /&gt;अवधि (दिनों में)&lt;br /&gt;उपज (क्विं./हे.)&lt;br /&gt;1.&lt;br /&gt;असिंचित/ अर्धसिंचति&lt;br /&gt;जे.डब्‍ल्‍यू.एस.-17, सुजाता, एच.डब्‍ल्‍यू.-2004, एच.आई. 1500, एम.पी.-3020&lt;br /&gt;एच.डी. 4672 (अमर), एच.आई. 8627&lt;br /&gt;135-140&lt;br /&gt;15-20&lt;br /&gt;2.&lt;br /&gt;सिंचित (समय पर बोनी हेतु)&lt;br /&gt;एम.पी. 1142, एच.आई.-1077, जी.डब्‍ल्‍यू.-273, जी.डब्‍ल्‍यू.-322, जी.डब्‍ल्‍यू.-190&lt;br /&gt;राज 1555, एच.डी. 4530, एच.&lt;br /&gt;आई.-8498, एच.आई.-8381, जे.डब्‍ल्‍यू. 1106 (सुधा)&lt;br /&gt;115-125&lt;br /&gt;40-50&lt;br /&gt;3.&lt;br /&gt;सिंचि‍त (देरी से बोनी हेतु्)&lt;br /&gt;डी.एल.-788-2, लोक-1, जी.डब्‍ल्‍यू. 173, एम.पी. 4010, एच.डी. 2864&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;95-110&lt;br /&gt;35-40&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खाद उर्वरक की मात्रा:&lt;br /&gt;अ. असिंचित अवस्‍था: आधार खाद के रूप में 40 किलोग्राम नत्रजन, 20 किलो ग्राम स्‍फुर प्रति हेक्‍टेयर बुवाई के समय दुफन या नारी के अगले पोर से देना चाहिए। मिट्टी परि‍क्षण में यदि पोटाश की मात्रा कम पाई जाती है तो 10 किलोग्राम प्रति हेक्‍टेयर के हिसाब से बुआई के समय देना चाहिए। खाद को बीज से 2-3 सेमी. नीचे डालना चाहिए।&lt;br /&gt;ब. अर्धसिंचित अवस्‍था: नत्रजन 60 किलो ग्राम, स्‍फुर 40 किलोग्राम तथा 20 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्‍टेयर देना चाहिए। स्‍फुर एवं पोटाश की पूरी मात्रा तथा नत्रजन की आधी मात्रा बोनी के समय आधार रूप में, शेष आधी 30 किलो ग्राम मात्रा प्रति हेक्‍टैयर प्रथम सिंचाई पर दें।&lt;br /&gt;स. सिंचित अवस्‍था: सिंचित अवस्‍था में नत्रजन 100-120 किलो ग्राम, स्‍फुर 60 किलो ग्राम तथा पोटाश 30 किलो ग्राम प्रति हेक्‍टेयर देना चाहिए। बोनी के समय नत्रजन आधार रूप में ½ तथा पूरी मात्रा में स्‍फुर व पोटाश देना चाहिए। शेष ½ नत्रजन में से ¼ प्रथम सिंचाई (20-21 दिनों) पर तथा ¼ दूसरी सिंचाई (40-45 दिनों) पर देना चाहिए। जिन खेतों में मिट्टी परिक्षण पर जस्‍ते की कमी पाई जाती है वहॉं 25 किलो ग्राम जिंक सल्‍फेट प्रति हेक्‍टेयर बुवाई के पहले खेत में आधार खाद के रूप में देना चाहिए। यदि खेतों में सतत् गेहूँ की खेती की जा रही है तो 2 वर्ष में एक बार 25 किलो ग्राम प्रति हेक्‍टेयर की दर से जिंक सल्‍फेट डालना चाहिए।&lt;br /&gt;सिंचाई प्रबंधन: सिंचाई की उपलब्‍धता के आधार पर गेहूँ की विभिन्‍न अस्‍थाओं पर निम्‍न तालिका के अनुसार सिंचाई करें:-&lt;br /&gt;सिंचाई&lt;br /&gt;फसल अवस्‍था (‍बोनी के दिनों बाद&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शीर्ष जड़ अवस्‍था (18-21 दिन)&lt;br /&gt;कल्‍ले बनने की अवस्‍था (40*42 दिन)&lt;br /&gt;गभोट की अवस्‍था (55-60 दिन)&lt;br /&gt;फूल बनने की अवस्‍था (65-70 दिन)&lt;br /&gt;दूध अवस्‍था (80-85 दिन)&lt;br /&gt;दाने भरने की अवस्‍था (100-105 दिन)&lt;br /&gt;दो सिंचाई&lt;br /&gt;√&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;X&lt;br /&gt;X&lt;br /&gt;√&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;X&lt;br /&gt;X&lt;br /&gt;तीन सिंचाई&lt;br /&gt;√&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;X&lt;br /&gt;√&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;X&lt;br /&gt;√&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;X&lt;br /&gt;चार सिंचाई&lt;br /&gt;√&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;√&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;√&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;X&lt;br /&gt;√&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;X&lt;br /&gt;पॉंच सिंचाई&lt;br /&gt;√&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;√&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;√&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;√&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;√&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;X&lt;br /&gt;छह सिंचाई&lt;br /&gt;√&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;√&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;√&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;√&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;√&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;√&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नोट:- एक सिंचाई उपलब्‍ध होने पर बोनी के 30-35 दिन बाद दें।&lt;br /&gt;खरपतवार प्रबंधन:&lt;br /&gt;अ. चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार: इनके नियंत्रण के लिए 2-4, डी सोडियम साल्‍ट 0.5 किलो ग्राम सक्रिय तत्‍व प्रति हेक्‍टेयर की दर से 500 लीटर पानी में घोल बनाकर 25-30 दिन बाद छिड़काव करें। दवा का 40 दिन बाद छिड़काव फसल के लिये हानिप्रद होता है। गेहूँ के साथ चना, मसूर, मटर की फसल होने पर इस दवा का प्रयोग न करें।&lt;br /&gt;ब. संकर पत्ती वाले खरपतवार: संकर पत्ती वाले खरपतवार में जंगली जई, चिरैया बाजरा की समस्‍या पाई गई है। इससे बीज की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है। जिन खेतों में खरपतवार दिखाई दे, उन्‍हें उखाड़ कर नष्‍ट कर दें। यदि खेत में नींदा बहुत अधिक है तो फसल चक्र अपनाएं। ऐसी स्थिति में बरसीम या रिजका की फसल लेना लाभप्रद है क्‍योंकि चारे की कटाई के साथ ये खरपतवार कट कर नष्‍ट हो जाते है। रासायनिक नियंत्रण हेतु:-&lt;br /&gt;मेटाक्‍सुरान (डोसानेक्‍स) 1-1.5 किलो ग्राम सक्रिय तत्‍व या पेन्‍डीमिथलीन 1.00 किलोग्राम सक्रिय तत्‍व प्रति हेक्‍टेयर की दर से बोनी के तुरंत बाद तथा अंकुरण के पहले 600 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।&lt;br /&gt;आइसोप्रोटूरान 0.75 किलोग्राम सक्रिय तत्‍व प्रति हेक्‍टेयर 600 लीटर पानी में घोल बनाकर बोनी के 30-35 दिन बाद छिड़काव करें। इसके प्रयोग से दोनों ही प्रकार के खरतपवार नियंत्रित किये जा सकते हैं।&lt;br /&gt;खेत में दोनों प्रकार के नीदा है तो आइसोप्रोटूरान 0.75 किलो ग्राम सक्रिय तत्‍व तथा 2-4, डी 0.5 किलो ग्राम सक्रिय तत्‍व का मिश्रण प्रति हेक्‍टेयर की दर से उपरोक्‍त बताई विधि अनुसार उपयोग करें। इस मिश्रण के प्रयोग से चिरैया, बाजरा, जंगली जई एवं अन्‍य खरपतवारों को प्रभावी रूप से नियंत्रित किया जा सकता है।&lt;br /&gt;नीदा नाशक दवा का छिड़काव प्रथम सिंचाई के एक सप्‍ताह बार करें। छिड़काव के समय मिट्टी में नमी का होना अति आवश्‍यक है।&lt;br /&gt;बोवाई पूर्व बीज को छलना लगाकार साफ करें तथा खरपतवारों के बीजों को अलग करें। पलेवा देकर खेत में जमें खरपतवारों को बखर चलाकर नष्‍ट किया जा सकता है।&lt;br /&gt;पौध संरक्षण:&lt;br /&gt;(अ) रोग: गेहूँ की उपज पर रोग के प्रकोप से उपज में काफी प्रभाव होता है। केवल गेरूआ रोग से ही गेहूँ की उपज में लगभग 12 प्रतिशत की हानि होती है।&lt;br /&gt;अ. भूरा गेरूआ: गेहूँ की पत्‍तियों पर नारंगी भूरे रंग के धब्‍बे पड़ जाते है जो गोल होते है।&lt;br /&gt;ब. काला गेरूआ: इसका प्रकोप अधिकतर तने पर आता है।&lt;br /&gt;स. पीला गेरूआ: इस रोग में पत्‍तियों की ऊपरी सतह पर पीले रंग के धब्‍बे उभर आते है।&lt;br /&gt;      इन रोगों की रोकथाम के लिये रोगरोधी किस्‍में लगाये तथा उर्वरकों का संतुलित इस्‍तेमाल करें, फसल की सामयिक बोनी करें। रोग के लक्षण दिखाई देने पर जिंक मेगनीज कार्बामेट 2 किग्रा. या जिनेव 2.5 किग्रा. प्रति हेक्‍टेयर 1000 लीटर पानी में मिलाकर फसल पर छिड़काव करें।&lt;br /&gt;1. कड़वा रोग: यह बीज जनित रोग है। रोगी पौधों में बालियां कुछ पहले निकल जाती है। इन बालियों में दानों के स्‍थान पर काला चूर्ण भर जाता है, जो हवा के झोके के साथ एक पौधे से दूसरे पौधों तक पहुँच जाता है। रोग्ग्रस्‍त पौधों को उखाड़कर जला देना चाहिए। रोगरोधी किस्‍मों को ही लगाना चाहिए। बोनी के पहले बीज को वीटावेक्‍स (कार्बोक्सिन) 2.5 ग्राम प्रति किलो ग्राम बीज की दर से उपचार करना चाहिये।&lt;br /&gt;2. कर्नलबन्‍ट: इस रोग का प्रभाव दानों पर होता है। दानों में काले रंग का पाउडर बन जाता है। यह रोग बीज द्वारा फैलता है। इसकी रोकथाम के लिये जिस खेत में रोग लगा हो उस खेत में 2-3 वर्ष तक गेहूँ नहीं होना चाहिए। बोने से पहले बीज को थायरम 2.5 ग्राम दवा प्रति किलो ग्राम बीज की दर से उपचारित करें। फूलने की अवस्‍था में सिंचाई न करें।&lt;br /&gt;3. पर्ण ब्‍लास्‍ट: पत्तियॉं किनारों से सूखना प्रारम्‍भ करती हैं। आरंभ में पत्तियों में अण्‍डाकार सूखे धब्‍बे दिखाई देते हैं, बाद में यह टूटकर पूरी पत्तियों में फैल जाते हैं। नियंत्रण हेतु डायथेन एम-45 (0.25 प्रतिशत) के घोल का छिड़काव फसल पर करें।&lt;br /&gt;(ब) कीट: गेहूँ की फसल में दीमक, जड़माहो, भूरी मकड़ी आदि कीटों का प्रकोप होता है। इनके नियंत्रण हेतु एकीकृत कीट नियंत्रण विधि अपनाएं।&lt;br /&gt;एकीकृत कीट नियंत्रण&lt;br /&gt;1. खेत की अच्‍छी तरह जुताई करना चाहिये।&lt;br /&gt;2. कच्‍ची व अधपकी गोबर की खाद का प्रयोग नहीं करना चाहिए क्‍योंकि इसके प्रयोग से दीमक के प्रकोप की संभावना अधिक होती है।&lt;br /&gt;3. खेत के आसपास मेढ़ों में यदि दीमक का बमीठा हो तो उसे गहरा खोदकर नष्‍ट कर देना चाहिए।&lt;br /&gt;4. गेहूँ की बुवाई समय पर तथा बीज उपचारित करें। यदि दीमक के प्रकोप की संभावना है तब बीज को क्‍लोरोपायरीफास 20 ई.सी. 400 मि.ली. 5 लीटर पानी में घोलकर 100 किलो ग्राम बीज को उपचारित करें। देरी से बोये गये (दिसम्‍बर-जनवरी) गेहूँ पर जड़ माहो को प्रकोप अधिक होता है। अत: समय पर बोनी करें।&lt;br /&gt;5. खड़ी फसल पर दीमक या जड़माहो का प्रकोप होने पर क्‍लोरोपायरीफास 20 ई.सी. 1.25 लीटर प्रति हेक्‍टेयर की दर से दवा को सिंचाई जल के साथ दें। अर्धसिंचित भूमि में उपरोक्‍त दवा की मात्रा 3 लीटर पानी में घोलकर 50 किलोग्राम रेत में मिलाकर खेत में फैलाकर पानी लगावें।&lt;br /&gt;6. अर्धसिंचित फसल में नवम्‍बर-दिसम्‍बर माह में कल्‍ला छेदक भृंग के नियंत्रण के लिये मेलाथियान 500 मि.ली. या मिथाईल डेमेटान 650 मि.ली. दवा का 500 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्‍टेयर छिड़काव करें। इससे जेसिड का भी नियंत्रण हो जाता है।&lt;br /&gt;7. भूरी मकड़ी का प्रकोप असिंचित गेहूँ पर होता है। नियंत्रण के लिये फारमोथियान 25 ई.सी. का 650 मि.ली. प्रति हेक्‍टेयर या मिथाइल डेमेटान का 650 मि.ली. प्रति हेक्‍टेयर की दर से छिड़काव करें। यदि आवश्‍यक हो तो 15 दिन बाद दवा का पुन: छिड़काव करें।&lt;br /&gt;कटाई एवं गहाई: पकी फसल की कटाई जल्‍दी करना चाहिये, क्‍योंकि आग एवं ओला से कभी-कभी पकी फसल को बहुत नुकसान होता है। अधिक पकी फसल काटने से बालियॉं टूटती हैं और दाने झड़ते हैं। फसल की कटाई सुबह और शाम के समय करना चाहिए, इससे दाने कम झड़ेंगे। कटाई तेज धार वाले हंसिया से करना चाहिए। काटी गई फसल को तुरंत बोझों में बॉध लेना चाहिये, क्‍योंकि कटाई के समय तेज हवा चलने से कटी हुई फसल जड़ कर खराब हो जाती है। काटी गई फसल के बोझों को बैलगाड़ी या ट्रेक्‍टर ट्राली से ढुलाई करके खलिहान से इकट्ठा करना चाहिए। खलिहान में थ्रेसर या बैलों से गहाई करना चाहिए। इसके बाद उड़वानी द्वारा दाना अलग करके धूप में सुखाकर भंडारित करना चाहिये। खलिहान में आग और चूहों से बचाव करना चाहिए।&lt;br /&gt;औसत उपज:&lt;br /&gt;सिंचित दशा में : 40-50 क्विंटल प्रति हेक्‍टेयर&lt;br /&gt;बारानी दशा में : 20-25 क्विंटल प्रति हेक्‍टेयर&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7319195525113358508-2354975969716779865?l=smalik06.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://smalik06.blogspot.com/feeds/2354975969716779865/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7319195525113358508&amp;postID=2354975969716779865' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7319195525113358508/posts/default/2354975969716779865'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7319195525113358508/posts/default/2354975969716779865'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://smalik06.blogspot.com/2008/10/blog-post_7289.html' title='गेहूँ'/><author><name>malik</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09139758814525364467</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Eh8BkyTxt58/SJqthbJOKKI/AAAAAAAAADI/uvkv7Qt-o9A/s1600-R/hllo009%25255B1%25255D.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7319195525113358508.post-5039625309023134644</id><published>2008-10-13T02:10:00.000-07:00</published><updated>2008-10-13T02:11:55.482-07:00</updated><title type='text'>मसूर</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;मसूर&lt;br /&gt;मसूर का दलहनी फसल के रूप में महत्‍वपूर्ण स्‍थान है। मध्‍यप्रदेश में इसका क्षेत्रफल लगभग 5 लाख हेक्‍टेयर है। राज्‍य में चने के बाद मसूर का क्षेत्रफल एवं उत्‍पादन दोनों में दूसरा स्‍थान है। बारानी क्षेत्रों में इसकी खेती सफलतापूर्वक की जाती है। अच्‍छे बाजार भाव और अधिक उपज मिलने से कृषक इसे सिंचित क्षेत्र में भी ले रहे हैं। दाल के लिये उपयोग के अतिरिक्‍त कई प्रकार के व्‍यंजनों में भी इसका उपयोग किया जाता है।&lt;br /&gt;मध्‍यप्रदेश में मुख्‍य रूप से विदिशा, सागर, रायसेन, दमोह, जबलपुर, सतना, पन्‍ना, रीवा, नरसिंहपुर, सीहोर, ग्‍वालियर एवं भिण्‍ड आदि जिलों में इसकी खेती की जाती है।&lt;br /&gt;भूमि: मसूर सभी प्रकार की भूमि में उगाई जा सकती है, किंतु दुमट और भारी भूमि इसके लिये अधिक उपयुक्‍त है। भूमि का पीएच मान 6.5 से 7.0 के बीच होना चाहिये तथा खेत में जल निकास का भी अच्‍छा प्रबंध होना चाहिये अन्‍यथा फसल की बढ़वार पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।&lt;br /&gt;भूमि की तैयारी: भूमि के तैयारी के लिये खेत की पहले एक बार हल्‍की जुताई कर बखनी करें तथा पाटा चलाकर भूमि को समतल करें जिससे नमी संरक्षित रहे। समतल खेत में बुआई से बीज एक समान गहराई पर गिरता है। इससे अंकुरण अच्‍छा होता है।&lt;br /&gt;उन्‍नत किस्‍में: प्रदेश में उन्‍नत किस्‍मों का फैलाव हो रहा है। स्‍थानीय जातियों की तुलना में अधिक उपज तथा रोग प्रकोप में कमी के कारण उन्‍नत जातियॉं कृषकों द्वारा अपनाई जा रही हैं। उन्‍नत किस्‍मों का विवरण निम्‍नानुसार है:-&lt;br /&gt;1. के-75 (मल्लिका): यह जाति 115-120 दिन में पकती है। इसकी औसत उपज 10-12 क्विंटल प्रति हेक्‍टेयर है। इसका दाना छोटा होता है, जिसके 100 दानों का वजन 2.6 ग्राम है। यह जाति संपूर्ण विंध्‍य क्षेत्र अर्थात सीहोर, भोपाल, विदिशा, नरसिंहपुर, सागर, दमोह एवं रायसेन आदि जिलों के लिये उपयुक्‍त है।&lt;br /&gt;2. जे.एल.-1: इस जाति की पकने की अवधि 112-118 दिन है तथा औसत उपज 11-13 क्विंटल प्रति हेक्‍टेयर है। इसका दाना मध्‍यम आकार का होता है तथा 100 दानों का वजन 2.8 ग्राम होता है। यह जाति भी संपूर्ण विश्‍व क्षेत्र के लिये उपयुक्‍त है।&lt;br /&gt;3.एल-4076: यह जाति 115-125 दिन में पककर तैयार होती है। इसकी औसत उपज 10-15 क्विंटल प्रति हेक्‍टेयर है। यह उकठा रोग निरोधक है। इसका दाना अपेक्षाकृत बड़े आकार का होता है। 100 दानों का वजन 3.0 ग्राम होता है। यह जाति प्रदेश के सभी क्षेत्रों के लिये उपयुक्‍त है।&lt;br /&gt;4. जे.एल.-3: मध्‍यम अवधि की नई विकसित यह किस्‍म 110-115 दिन में पकती है तथा 14-15 क्विंटल प्रति हेक्‍टेयर उपज देती है। इसका दाना मध्‍यम आकार का होता है। इसके 100 दानों का वजन लगभग 3.0 ग्राम होता है। यह जाति संपूर्ण विंध्‍य क्षेत्र के लिये उपयुक्‍त है।&lt;br /&gt;5. आई.पी.एल.-18 (नूरी): यह किस्‍म 110-115 दिन में पकती है तथा औसत उत्‍पादन 12-14 क्विंटल प्रति हेक्‍टेयर है। मध्‍यम आकार के दानों वाली इस जाति का वजन 3.0 ग्राम है।&lt;br /&gt;6. एल. 9-2: देरी से पकने वाली यह किस्‍म 135-140 दिन में पकती है। इसकी औसत उपज 8-10 क्विंटल प्रति हेक्‍टेयर है। इसके दाने छोटे आकार के होते हैं। यह जाति भिण्‍ड तथा ग्‍वालियर क्षेत्रों के लिये अधिक उपयुक्‍त है।&lt;br /&gt;बीज की मात्रा एवं बोने की विधि: सामान्‍यत: 40 किलोग्राम बीज प्रति हेक्‍टेयर क्षेत्र में बोनी के लिये पर्याप्‍त होता है। बीज का आकार छोटा होने पर यह मात्रा 35 किलोग्राम प्रति हेक्‍टेयर होनी चाहिये। सामान्‍य समय में बुवाई के लिये कतार से कतार की दूरी 30 सेमी. रखना चाहिये। देरी से बुवाई के लिये कतारों की दूरी कम कर 20-25 सेमी. कर देना चाहिए। बुवाई नारी या सीडड्रिल से 5-6 मी. की नमी युक्‍त गहराई पर करना चाहिये।&lt;br /&gt;बीजोपचार: मसूर की फसल को विभिन्‍न बीज जनित रोगों विशेषकर उकठा रोग से बचाने के लिये बीज को उपचारित करके बोना आवश्‍यक है। थाइरम 2 ग्राम तथा 1 ग्राम कार्बेन्‍डाजिम दवा से प्रति किलोग्राम बीज को उपचारित करें। बीज उपचार करने के यंत्र से बीज उपचारित करें। इसके बाद बीज को 5 ग्राम राइजोबियम कल्‍चर एवं 5 ग्राम पी.एस.बी. क्‍ल्‍चर से उपचारित कर बोना चाहिये। फफूंद नाशक से उपचारित करने के बाद दोनों कल्‍चर को बीज में मिलाकर थोड़ा पानी छिड़क कर हाथ से अच्‍छी तरह मिलाएं। बीज को थोड़ी देर छाया में सुखा कर बोनी शीघ्रता से पूरी करें।&lt;br /&gt;बुवाई का समय: असिंचित अवस्‍था में नमीं उपलब्‍ध रहने पर अक्‍टूबर के प्रथम सप्‍ताह से नवम्‍बर के प्रथम सप्‍ताह तक मसूर की बोनी करनी चा‍हिये। मसूर की सिंचित अवस्‍था में बोनी मध्‍य अक्‍टूबर से मध्‍य नवम्‍बर तक की जा सकती है। नवम्‍बर के अंतिम सप्‍ताह के बाद बोनी करने से पकने की अवस्‍था में तापक्रम बढ़ने से फसल समय से पूर्व पकने लगती है तथा दाना छोटा पड़ जाता है और उपज में कमी आती है।&lt;br /&gt;खाद एवं उर्वरक: सिंचित फसल के लिये 20-25 किलोग्राम नत्रजन तथा 50 किलोग्राम स्‍फुर प्रति हेक्‍टेयर उपयोग करना चाहिए। असिंचित फसल के लिये 15-20 किलोग्राम नत्रजन एवं 30-40 किलोग्राम स्‍फुर का उपयोग प्रति हेक्‍टेयर करना चाहिये। भूमि में पोटाश की कमी होने पर बुवाई के समय 20 किलोग्राम पोटाश देना चाहिये। 5-6 टन प्रति हेक्‍टेयर के हिसाब से गोबर की खाद या कम्‍पोस्‍ट खाद अवश्‍य देना चाहिये।&lt;br /&gt;सिंचाई: सामान्‍यत: मसूर बरानी फसल के रूप में ली जाती है। यदि सिंचाई उपलब्‍ध है तो खेत में पलेवा देकर बुवाई करना चाहिये। इससे अंकुरण अच्‍छा होता है। सामान्‍यत: बाद में सिंचाई की आवश्‍यकता नहीं होती है। सिंचाई उपलब्‍ध होने पर फूल आने के पूर्व एक हल्‍की सिंचाई करना चा‍हिये। इससे भरपूर पैदावार ली जा सकती है।&lt;br /&gt;निंदाई-गुड़ाई: मसूर की फसल में 50 दिनों तक खरपतवारों को नियंत्रित रखना चाहिये। खेत में नींदा उगने पर हैंड हो या डोरा चलाना चाहिये इससे खरपतवार नियंत्रण होगा तथा वायु संचार के लिये गुड़ाई भी हो जाती है। रासायनिक खरपतवार नियंत्रण्‍ के लिये बुवाई पूर्व फ्लूक्‍लोरोलीन 0.75 किलोग्राम सक्रिय तत्‍व प्रति हेक्‍टेयर 600 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।&lt;br /&gt;पौध संरक्षण:&lt;br /&gt;(अ) कीट: मसूर में माहों, थ्रिप्‍स तथा फली छेदक इल्‍ली कीटों का प्रकोप होता है। माहो एवं थ्रिप्‍स के नियंत्रण के लिये मोनोक्रोटोफास एक मि.ली. प्र‍ति लीटर पानी या मेटासिस्‍टाक्‍स 1.5 मि.ली. प्रति लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करें। फल छेदक इल्‍ली के लिए इण्‍डोसल्‍फान 2 मि.ली. प्रति लीटर पानी या क्विनालफास एक मि.ली. प्रति लीटर पानी के हिसाब से घोल बनाकर छिड़काव करने से कीट नियंत्रित हो जाते हैं। खेत में छिड़काव एक समान होना चाहिए।&lt;br /&gt;(ब) रोग: मसूर में मुख्‍य रूप से उकठा तथा गेरूआ रोग का प्रकोप होता है। उकठा रोग की उग्रता को कम करने हेतु थायरम (3 ग्राम प्रति किलोग्रामे या थायरम 1.5 ग्राम + कार्बन्‍डाजिम 1.5 ग्राम का मिश्रण प्रति किलोग्राम) से बीजोपचार कर बोयें। उकठा निरोधक जैसे जे.एल.-3 आदि बोयें। कभी-कभी गेरूआ रोग का भी प्रकोप होता है। इसके नियंत्रण के लिये डायथेन एम 45, 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी के हिसाब से घोल बनाकर खड़ी फसल में छिड़काव करना चाहिए। गेरूआ प्रभावित क्षेत्रों में एल 4076 आदि गेरूआ निरोधक जातियॉं बोयें।&lt;br /&gt;कटाई एवं गहाई: फसल पकने की अवस्‍था में पीली पड़ कर सूखने लगती हैं। फसल की कटाई कर खलिहान में बैलों या ट्रेक्‍टर से गहाई कर पंखे से सफाई करें। बीज को सुखाकर भंडारण करें।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/7319195525113358508-5039625309023134644?l=smalik06.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://smalik06.blogspot.com/feeds/5039625309023134644/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=7319195525113358508&amp;postID=5039625309023134644' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7319195525113358508/posts/default/5039625309023134644'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/7319195525113358508/posts/default/5039625309023134644'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://smalik06.blogspot.com/2008/10/blog-post_1154.html' title='मसूर'/><author><name>malik</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09139758814525364467</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='29' height='32' src='http://4.bp.blogspot.com/_Eh8BkyTxt58/SJqthbJOKKI/AAAAAAAAADI/uvkv7Qt-o9A/s1600-R/hllo009%25255B1%25255D.gif'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-7319195525113358508.post-3143804006865746736</id><published>2008-10-13T02:07:00.000-07:00</published><updated>2008-10-13T02:08:58.222-07:00</updated><title type='text'>मक्‍का</title><content type='html'>&lt;div align="justify"&gt;मक्‍का&lt;br /&gt;मध्‍यप्रदेश में मक्‍का खरीफ के मौसम में बोई जाने वाली एक प्रमुख फसल है। मध्‍यप्रदेश के विभिन्‍न जिले जिनमें मक्‍का की खेती बहुतायत से की जाती है, उनमें छिंदवाड़ा, मंदसौर, धार, झाबुआ, रतलाम, सरगुजा, खरगौन, गुना, मंडला, शिवपुरी, शाजापुर एवं राजगढ़ जिले प्रमुख हैं। राज्‍य में क्षेत्र एवं उत्‍पादन की दृष्टि से छिंदवाड़ा अग्रणी जिला है।&lt;br /&gt;      भारत वर्ष के अनेक राज्‍य जिनमें मक्‍का की फसल प्रमुख रूप से ली जाती है उनमें उत्‍तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, पश्चिम बंगाल, आंध्रप्रदेश, मध्‍यप्रदेश इत्‍यादि प्रमुख हैं। भारत में मक्‍का की खेती 8.5 लाख हेक्‍टेयर में होती है और उत्‍पादन 14 लाख टन प्रति वर्ष होती है। वर्ष 2000 के आंकड़े के अनुसार कुल मक्‍का उत्‍पादन में मध्‍यप्रदेश का योगदान अन्‍य प्रदेशों की तुलना में चौथे स्‍थान पर है।&lt;br /&gt;इसी तरह मध्‍यप्रदेश में भी अन्‍य जिलों की अपेक्षा छिंदवाड़ा जिले का योगदान मक्‍का उत्‍पादन में अधिक है। अकेले छिंदवाड़ा जिले का क्षेत्रफल पूरे मध्‍यप्रदेश के मक्‍का क्षेत्र का 10 प्रतिशत है। सतपुड़ा अंचल की जलवायु मक्‍का की खेती के अनुकूल है। अत: उन्‍नत जातियों की जानकारी व उनका चयन प्रदेश में मक्‍का का उत्‍पादन बढ़ाने की दिशा में एक सार्थक प्रयास होगा।&lt;br /&gt;      मध्‍यप्रदेश में मक्‍का के लिए जलवायु अनुकूलता, इसकी उपयोगिता एवं उत्‍पादन क्षमता के कारण इस फसल की लोकप्रियता बहुत अधिक है। वर्ष 1969-70 में इसका क्षेत्र मात्र 6.1 लाख हेक्‍टेयर था। वह बढ़कर वर्ष 2000-2001 में 17 लाख हेक्‍टेयर हो गया। इसी प्रकार उत्‍पादन 5.1 लाख टन से बढ्कर 1200 लाख टन हो गया और औसत उत्‍पादकता 551 क्विं./हेक्‍टेयर से बढ्कर 1468 क्विं./हेक्‍टेयर हो गई है।&lt;br /&gt;मक्‍का का लगभग 55 प्रतिशत मात्रा भोजन के रूप में उपयोग किया जा रहा है। लगभग 14 प्रतिशत पशुआहार, 18 प्रतिशत मुर्गीदाना, 12 प्रतिशत स्‍टार्च में, 1.2 प्रतिशत बीज के रूप में उपयोग होता है। मक्‍का के एक परिपक्‍व बीज में लगभग 65-75 प्रतिशत स्‍टार्च, 10-11 प्रतिशत प्रोटीन एवं 5 प्रतिशत तेल होता है। मक्‍का के दाने में 30 प्रतिशत तेल एवं 18 प्रतिशत प्रोटीन होता है। सफेद एंडोस्‍पर्म में लगभग 90 प्रतिशत स्‍टार्च पाया जाता है।&lt;br /&gt;      मक्‍का की फसल की शुरूआत के दिनों में भूमि में पर्याप्‍त नमी की आवश्‍यकता होती है। साथ ही पर्याप्‍त सूर्य के प्रकाश की भी आवश्‍यकता होती है। भूमि में पर्याप्‍त नमी की कमी हो जाने पर इसकी बढ़वार पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। जुलाई से अग्स्‍त माह की वर्षा का मक्‍का की फसल पर विशेष प्रभाव पड़ता है।&lt;br /&gt;      विगत वर्षों में सोयाबीन फसल में कुछ विशेष कारकों से उत्‍पादन में कमी आने के कारण कृषकों का रूझान मक्‍का फसल की ओर बढ़ा है। मक्‍का फसल में अन्‍य खरीफ फसलों की तुलना में कुछ विशेषताएं है जैसे:&lt;br /&gt;1. मक्‍का की उत्‍पादकता वर्षा पर आधारित खेतों में भी अत्‍यधिक है।&lt;br /&gt;2. अन्‍तरण अधिक होने से खाली जगह में अन्‍तरवर्तीय फसल बोनस के रूप में लेना संभव है।&lt;br /&gt;3. अन्‍तरण अधिक होने से खरपतवार नियंत्रण का खर्च सीमित होता है।&lt;br /&gt;4. प्रति हेक्‍टेयर बीज लागत व्‍यय बहुत कम।&lt;br /&gt;5. अनाज के साथ-साथ चारे की प्राप्ति।&lt;br /&gt;6. आवश्‍यकता पड़ने पर हरे चारे (35 से 60 दिन) के रूप में उपयोग।&lt;br /&gt;मक्‍का फसल की मुख्‍य आवश्‍यकताएं:&lt;br /&gt;1. खेत में कभी भी पानी भरा न हो।&lt;br /&gt;2. क्रांतिक अवस्‍थाओं में भूमि में नमी होना अति आवश्‍यक है।&lt;br /&gt;3. विपुल उत्‍पादन के लिए आवश्‍यक उर्वरक देना जरूरी है।&lt;br /&gt;मौसम: मक्‍का उत्‍पादन के लिए 26-30 डिग्री से.ग्रे. तापमान उपयुक्‍त है किंतु विषम परिस्थितियों में 15 से 40 डिग्री सें.ग्रे. के तापामन में उत्‍पादन लिया जा सकता है। मैदानी क्षेत्र से लेकर पहाड़ी क्षेत्र में जहां ऊंचाई 2700 मीटर तक मक्‍का उगाई जा सकती है।&lt;br /&gt;भूमि चुनाव: मध्‍यम से भारी भूमि जिसमें जल निकास अच्‍छा हो, सबसे उपयुक्‍त होती है। लवणीय, क्षारीय भूमि एवं निचली भूमि जहां पानी का भराव होता हो, वहां मक्‍का नहीं लगाना उचित होगा।&lt;br /&gt;भूमि की तैयारी: भूमि की तैयारी के लिए दो बार हल, दो बार बखर चलाकर मिट्टी भुरभुरी कर पाटा से समतल करके बोनी हेतु खेत तैयार करें। जहां बुवाई के समय या पौध अवस्‍था में खेत में पानी भरता हो वहां जल निकास हेतु नालियॉं बनायें जो कि जमीन के प्रकार, ढाल के आधार पर 5 से 10 मीटर के अंतर से निकालना चाहिए जिससे वर्षा का अतिरिक्‍त पानी शीघ्रता से बाहर निकले। निचले भूमि में या जहां पानी भरने की दशा वाली भूमि में कूड़-नाली बनाकर कूड़ के बाजू में बुवाई करना लाभप्रद होता है। सामान्‍य रूप से मक्‍का काफी अंतर पर लगाया जाता है। इन स्थिति में गोबर खाद, कम्‍पोस्‍ट खाद या केचुआ खाद का प्रयोग कतारों में करना लाभप्रद होगा। इन खादों का प्रयोग कतार में करने में भूमि में नमी की कम उपलब्‍धता की दशा में पानी सोखकर रखने की क्षमता को बढ़ाती है तथा अधिक पानी के भराव की दशा में जल निकास हेतु सहायता मिलती है। इन खादों/उर्वरकों की उपलब्‍धता की कमी के कारण छिड़काव बिखेरना नहीं चाहिए, इसलिए जहां तक संभव हो कतार में ही दें।&lt;br /&gt;उन्‍नत जातियॉं: क्षेत्र की उपयुक्‍कता, भूमि की दशा, सिंचाई की व्‍यवस्‍था, खाद की मात्रा देने की क्षमता, फसल चक्र में अवधि के अनुसार, साथ ही विभिन्‍न उद्वेश्‍यों के लिए उन्‍नत जातियों का चयन करना जरूरी होता है।&lt;br /&gt;संकुलित किस्‍में: इन्‍हें कम्‍पोजिट किस्‍मों के नाम से जाना जाता है। इन किस्‍मों के बीज को किसान दो-तीन वर्षों तक लगातार उपयोग कर सकता है।&lt;br /&gt;संकर किस्‍में: इन किस्‍मों को हायब्रिड के नाम से जाना जाता है। किसान को संकर किंस्‍मों का उपयोग करते समय इस बात का अवश्‍य ध्‍यान रखना चाहिए कि प्रत्‍येक वर्ष बीज नया ही लेना है।&lt;br /&gt;    मध्‍यप्रदेश के लिये मक्‍का की अधिक उत्‍पादन देने वाली किस्‍मों की जानकारी निम्‍न प्रकार हैं:-&lt;br /&gt;पकने की अवधि के आधार पर अनाज उत्‍पादन के लिए:&lt;br /&gt;शीघ्र अवधि के पकने वाली (80 से 90 दिन)&lt;br /&gt;जवाहर मक्‍का-8, जवाहर मक्‍का-12, सूर्या, किरण, पूसा कम्‍पोजिस्‍ट-2, पूसा अर्ली कम्‍पोजिट-2, हिम-129, जे.के.एस.एच.-175, कोहिनूर, अरूण&lt;br /&gt;मध्‍यम अवधि में पकने वाली (90 से 100 दिन)&lt;br /&gt;नवजोत, अरूणा, जवाहर मक्‍का-216, प्रो-311, जवाहर मक्‍का-13, सरताज, डेकन-107, पूसा कम्‍पोजिट-2, विजय    &lt;br /&gt;देरी से पकने वाली (100 से 130 दिन)   &lt;br /&gt;गंगा-3, प्रभात, त्रिसुलता, डेकन-103, डेकन-105, गंगा सफेद-2, गंगा-11, प्रभात&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विभिन्‍न उद्वेश्‍यों के लिए:&lt;br /&gt;पापकार्न हेतु (लाही)&lt;br /&gt;अम्‍बर पाप, बजीरा पाप।&lt;br /&gt;क्‍वलिटी प्रोटिन (शक्तिवर्धक)&lt;br /&gt;शक्ति, शक्तिमान-1, शक्तिमान-2    &lt;br /&gt;मिठा मक्‍का (मधुर मक्‍का)&lt;br /&gt;माधुरी, अम्‍बर मधुर मक्‍का-1, अम्‍बर मधुर मक्‍का-2          &lt;br /&gt;बेबी कार्न&lt;br /&gt;वी.एल.’42, त्रिशुलता, प्रभात&lt;br /&gt;चारा हेतु&lt;br /&gt;अफ्रीकन टाल, जे.-1006, विजय   &lt;br /&gt;स्‍टार्च हेतु&lt;br /&gt;हाई स्‍टार्च             &lt;br /&gt;रबी मौसम हेतु (अवधि 150 दिन)&lt;br /&gt;गंगा-11, त्रिशुलता, सरताज, डेकन-103, डेकन-105, एच.-216/जवाहर मक्‍का-216&lt;br /&gt;चारे के लिये मक्‍का&lt;br /&gt;आफ्रीकन टाल, गंगा-7, गंगा-11, विजय कम्‍पोजिट&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीज की मात्रा: बोनी हेतु बीज की मात्रा 16 से 20 किग्रा. प्रति हेक्‍टेयर उपयोग करें। फसल अवधि के आधार पर बीज की मात्रा कम और अधिक हो सकती है।&lt;br /&gt;बुवाई का समय: वर्षा आधारित क्षेत्रों में मानसून के प्रारंभ होते ही मक्‍का की बुवाई करें। जहां सिंचाई उपलब्‍ध हो तो मानसून आने के 20 दिन पूर्व भी बुवाई की जा सकती है। कम वर्षा वाले क्षेत्रों में पहली वर्षा के तुरंत बाद शीघ्रता से बुवाई करें।&lt;br /&gt;बुवाई पद्धति: कतार में ही बुवाई करें। बीज छिड़ककर न बोयें। सबसे अच्‍छा होगा कि हाथ से टुपाई करें। बुवाई भूमि ढाल से आड़ी दिशा में करें। टुपाई करने पर समतल खेत में सरता से खाद की बुवाई करें एवं कतार में 20 सेमी. की अंतर पर 2 दाने थोड़ी दूर पर डालें, बाद में 15 दिन पर पौध विरलन कार्य करें। मक्‍का बीज की बुवाई के लिए गहराई 3 से 5 सेमी. होनी चाहिए।&lt;br /&gt;पौध अंतरण और बीज की गहराई:&lt;br /&gt;खरीफ के लिये&lt;br /&gt;कतार से कतार अंतर (सेमी.)&lt;br /&gt;पौध से पौध अंतर (सेमी.)&lt;br /&gt;पौध संख्‍या प्रति हेक्‍टेयर&lt;br /&gt;शीघ्रता से पकने वाली जातियों के लिये&lt;br /&gt;60&lt;br /&gt;20&lt;br /&gt;80,000&lt;br /&gt;मध्‍यम अवधि से पकने वाली जातियों के लिये&lt;br /&gt;60&lt;br /&gt;22&lt;br /&gt;57,000        &lt;br /&gt;देरी से पकने वाली जातियों के लिये&lt;br /&gt;75&lt;br /&gt;20&lt;br /&gt;65,000        &lt;br /&gt;अंतरवर्तीय फसल पद्धति में (1:1 कतार)&lt;br /&gt;60&lt;br /&gt;20&lt;br /&gt;80,000&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीज उपचार: बीज उपचार हेतु 2 ग्राम थाइरम एवं 1 ग्राम कार्बन्‍डाजिम प्रति किलो ग्राम बीज हेतु प्रयोग करें।&lt;br /&gt;बीज अंकुरण: मक्‍का फसल के बीज शीघ्रता से अपनी अंकुरण क्षमता खो देते हैं। साथ ही भंडारण में कीट की समस्‍या अधिक आती है। अत: यह जरूरी है कि बुवाई पूर्व बीज की अंकुरण क्षमता जरूर ज्ञात करें।&lt;br /&gt;पौध विरलन: यह क्रिया मक्‍का फसल में अति आवश्‍यक है क्‍योंकि 60 से 70 प्रतिशत किसान भाइयों के खेत में वांछित पौध संख्‍या न होने से उत्‍पादन में कमी आती है। इसलिए बुवाई के समय कतार का अंतर तो निश्चित रहता है परंतु पौध से पौध के अंतर बीज टुपाई में या बुवाई में कम अंतर पर डालते हैं। बाद में 15 से 20 दिन पर प्रथम गुड़ाई के तुरंत बाद पौध विरलन का कार्य किया जाता है। इससे पौधे 20 से 22 सेमी. के अंतर पर बनाये रखते हुए कमजोर पौधों को खेत से निकाल दिया जाता है। साथ ही जहां जगह खाली हो वहां स्‍वस्‍थ पौधों को रोपित किया जाता है। आवश्‍यक है कि इस क्रिया के समय हल्‍की वर्षा का मौसम होना चाहिए।&lt;br /&gt;कम्‍पोस्‍ट खाद: उपलब्‍ध सड़ी हुई गोबर की खाद, कम्‍पोस्‍ट या केंचुआ द्वारा बनी खाद का प्रयोग करना जरूरी है क्‍योंकि मक्‍का फसल खेत में पानी का भराव एवं पानी की कमी इन दोनों दशाओं के प्रति अति संवेदनशील है। खाद बुवाई के समय कतारों में दें, जिससे फसल को सीधा फायदा होगा। अनुमानत: 8 से 10 टन खाद प्रति हेक्‍टेयर देना चाहिए।&lt;br /&gt;रासायनिक खाद:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पोषक तत्‍व, किग्रा./हेक्‍टेयर&lt;br /&gt;खरीफ के लिये&lt;br /&gt;नत्रजन&lt;br /&gt;स्‍फुर&lt;br /&gt;पोटाश&lt;br /&gt;शीघ्र पकने वाली जातियों के लिये&lt;br /&gt;60&lt;br /&gt;40&lt;br /&gt;30                &lt;br /&gt;मध्‍यम अवधि में पकने वाली जातियों के लिये&lt;br /&gt;90&lt;br /&gt;50&lt;br /&gt;30                &lt;br /&gt;देरी से पकने वाली जातियों के लिये&lt;br /&gt;120&lt;br /&gt;60&lt;br /&gt;40                &lt;br /&gt;अंतरवर्तीय फसल पद्धति में (1:1 कतार)&lt;br /&gt;150&lt;br /&gt;80&lt;br /&gt;60                &lt;br /&gt;रबी एवं जायद के लिये&lt;br /&gt;120&lt;br /&gt;60&lt;br /&gt;40&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;     नत्रजन की एक-तिहाई मात्रा एवं स्‍फुर तथा पोटाश की पूरी मात्रा बुवाई करते समय सरते से कतार में दें। शेष दो-तिहाई से क्रमश: एक-तिहाई नत्रजन 25-30 दिनों पर एवं 45-50 दिनों पर खड़ी मक्‍का फसल में दे। खेत में पानी भरने की दशा में एवं निंदाई-गुड़ाई में देरी होने पर नत्रजन 20 किलोग्राम प्रति हेक्‍टेयर निश्चित रूप से दें। खड़ी फसल में नत्रजन का प्रयोग निंदाई उपरांत ही करें।&lt;br /&gt;   रासायनिक खाद की संतुलित मात्रा मिट्टी परीक्षण परिणाम के आधार पर देना अधिक लाभप्रद होगा।&lt;br /&gt;सूक्ष्‍म तत्‍व: जिेक सल्‍फेट 20 किग्रा./हेक्‍टेयर बुवाई के समय देना चाहिए।&lt;br /&gt;जैविक खाद: कम खर्च में अधिक फायदे व आर्थिक उद्देश्‍य के मद्देनजर रखते हुए एजेटोबेक्‍टर, एजोस्‍प्रेलियम एवं पी.एस.बी. जैव उर्वरकों का प्रयोग करें। जैविक खाद तथा रासायनिक खाद को यथा संभव कतारों में दें।&lt;br /&gt;अंतर सस्‍य क्रियाएँ: खेत को 35 से 40 दिन तक नींदा रहित रखना जरूरी है। अत: फसल अंकुरण के 15-20 एवं 25-30 दिन पर खेत में डोरा चलाना जरूरी है। इसके बाद मिट्टी चढ़ाने का कार्य डोरा में फट्टी लगाकर (सारपाटी) खेत में चलाने से कम लागत में मिट्टी चढ़ाने का कार्य किया जा सकता है। गुड़ाई के तुरंत बाद निंदाई करने से मिट्टी से दबे पौधे निकालना एवं खेत नींदा रहित करने में कम खर्च आता है। अत: गुड़ाई के बाद निंदाई अवश्‍य करें। नींदा जड़ से निकालते समय उसे जल्‍दी में तोड़े या काटे नहीं अन्‍यथा खरपतवार शीघ्रता से बढ्कर फसल से प्रतिस्‍पर्धा करेंगे। संभव होने पर निंदाई किया गया कचरा खेत से बाहर मेंड़ पर निकाले या केचुआ, नाडेप, कम्‍पोस्‍ट खाद बनाने में इसका प्रयोग करें।&lt;br /&gt;रासायनिक नींदा नियंत्रण: मक्‍का फसल में एट्राजीन 1 किग्रा. प्रति हेक्‍टेयर बुवाई के बाद परंतु उगने के पूर्व उपयोग करें। अंतरवर्ती (मक्‍का+दलहन/तिलहन) फसल व्‍यवस्‍था में पेंडीमिथिलिन 1.5 किग्रा. प्रति हेक्‍टेयर बुवाई के बाद परंतु उगने के पूर्व रसायन का प्रयोग करें। मक्‍का फसल में चौड़ी पत्‍ती वाले खरपतवारों की अधिकता होने पर 30-35 दिन पर 2,4-डी का 1.0 किग्रा. प्रति हेक्‍टेयर उगे हुए खरपतवारों पर छिड़काव कर नियंत्रण किया जा सकता है।&lt;br /&gt;सिंचाई एवं जल निकास: वर्षा आधारित क्षेत्रों में खेतों में नमी की कमी होने पर सिंचाई की जानी चाहिए। विशेष रूप से उन क्रांतिक अवस्‍थाओं पर जहां फसल अ
