Monday, October 13, 2008

मसूर

मसूर
मसूर का दलहनी फसल के रूप में महत्‍वपूर्ण स्‍थान है। मध्‍यप्रदेश में इसका क्षेत्रफल लगभग 5 लाख हेक्‍टेयर है। राज्‍य में चने के बाद मसूर का क्षेत्रफल एवं उत्‍पादन दोनों में दूसरा स्‍थान है। बारानी क्षेत्रों में इसकी खेती सफलतापूर्वक की जाती है। अच्‍छे बाजार भाव और अधिक उपज मिलने से कृषक इसे सिंचित क्षेत्र में भी ले रहे हैं। दाल के लिये उपयोग के अतिरिक्‍त कई प्रकार के व्‍यंजनों में भी इसका उपयोग किया जाता है।
मध्‍यप्रदेश में मुख्‍य रूप से विदिशा, सागर, रायसेन, दमोह, जबलपुर, सतना, पन्‍ना, रीवा, नरसिंहपुर, सीहोर, ग्‍वालियर एवं भिण्‍ड आदि जिलों में इसकी खेती की जाती है।
भूमि: मसूर सभी प्रकार की भूमि में उगाई जा सकती है, किंतु दुमट और भारी भूमि इसके लिये अधिक उपयुक्‍त है। भूमि का पीएच मान 6.5 से 7.0 के बीच होना चाहिये तथा खेत में जल निकास का भी अच्‍छा प्रबंध होना चाहिये अन्‍यथा फसल की बढ़वार पर विपरीत प्रभाव पड़ता है।
भूमि की तैयारी: भूमि के तैयारी के लिये खेत की पहले एक बार हल्‍की जुताई कर बखनी करें तथा पाटा चलाकर भूमि को समतल करें जिससे नमी संरक्षित रहे। समतल खेत में बुआई से बीज एक समान गहराई पर गिरता है। इससे अंकुरण अच्‍छा होता है।
उन्‍नत किस्‍में: प्रदेश में उन्‍नत किस्‍मों का फैलाव हो रहा है। स्‍थानीय जातियों की तुलना में अधिक उपज तथा रोग प्रकोप में कमी के कारण उन्‍नत जातियॉं कृषकों द्वारा अपनाई जा रही हैं। उन्‍नत किस्‍मों का विवरण निम्‍नानुसार है:-
1. के-75 (मल्लिका): यह जाति 115-120 दिन में पकती है। इसकी औसत उपज 10-12 क्विंटल प्रति हेक्‍टेयर है। इसका दाना छोटा होता है, जिसके 100 दानों का वजन 2.6 ग्राम है। यह जाति संपूर्ण विंध्‍य क्षेत्र अर्थात सीहोर, भोपाल, विदिशा, नरसिंहपुर, सागर, दमोह एवं रायसेन आदि जिलों के लिये उपयुक्‍त है।
2. जे.एल.-1: इस जाति की पकने की अवधि 112-118 दिन है तथा औसत उपज 11-13 क्विंटल प्रति हेक्‍टेयर है। इसका दाना मध्‍यम आकार का होता है तथा 100 दानों का वजन 2.8 ग्राम होता है। यह जाति भी संपूर्ण विश्‍व क्षेत्र के लिये उपयुक्‍त है।
3.एल-4076: यह जाति 115-125 दिन में पककर तैयार होती है। इसकी औसत उपज 10-15 क्विंटल प्रति हेक्‍टेयर है। यह उकठा रोग निरोधक है। इसका दाना अपेक्षाकृत बड़े आकार का होता है। 100 दानों का वजन 3.0 ग्राम होता है। यह जाति प्रदेश के सभी क्षेत्रों के लिये उपयुक्‍त है।
4. जे.एल.-3: मध्‍यम अवधि की नई विकसित यह किस्‍म 110-115 दिन में पकती है तथा 14-15 क्विंटल प्रति हेक्‍टेयर उपज देती है। इसका दाना मध्‍यम आकार का होता है। इसके 100 दानों का वजन लगभग 3.0 ग्राम होता है। यह जाति संपूर्ण विंध्‍य क्षेत्र के लिये उपयुक्‍त है।
5. आई.पी.एल.-18 (नूरी): यह किस्‍म 110-115 दिन में पकती है तथा औसत उत्‍पादन 12-14 क्विंटल प्रति हेक्‍टेयर है। मध्‍यम आकार के दानों वाली इस जाति का वजन 3.0 ग्राम है।
6. एल. 9-2: देरी से पकने वाली यह किस्‍म 135-140 दिन में पकती है। इसकी औसत उपज 8-10 क्विंटल प्रति हेक्‍टेयर है। इसके दाने छोटे आकार के होते हैं। यह जाति भिण्‍ड तथा ग्‍वालियर क्षेत्रों के लिये अधिक उपयुक्‍त है।
बीज की मात्रा एवं बोने की विधि: सामान्‍यत: 40 किलोग्राम बीज प्रति हेक्‍टेयर क्षेत्र में बोनी के लिये पर्याप्‍त होता है। बीज का आकार छोटा होने पर यह मात्रा 35 किलोग्राम प्रति हेक्‍टेयर होनी चाहिये। सामान्‍य समय में बुवाई के लिये कतार से कतार की दूरी 30 सेमी. रखना चाहिये। देरी से बुवाई के लिये कतारों की दूरी कम कर 20-25 सेमी. कर देना चाहिए। बुवाई नारी या सीडड्रिल से 5-6 मी. की नमी युक्‍त गहराई पर करना चाहिये।
बीजोपचार: मसूर की फसल को विभिन्‍न बीज जनित रोगों विशेषकर उकठा रोग से बचाने के लिये बीज को उपचारित करके बोना आवश्‍यक है। थाइरम 2 ग्राम तथा 1 ग्राम कार्बेन्‍डाजिम दवा से प्रति किलोग्राम बीज को उपचारित करें। बीज उपचार करने के यंत्र से बीज उपचारित करें। इसके बाद बीज को 5 ग्राम राइजोबियम कल्‍चर एवं 5 ग्राम पी.एस.बी. क्‍ल्‍चर से उपचारित कर बोना चाहिये। फफूंद नाशक से उपचारित करने के बाद दोनों कल्‍चर को बीज में मिलाकर थोड़ा पानी छिड़क कर हाथ से अच्‍छी तरह मिलाएं। बीज को थोड़ी देर छाया में सुखा कर बोनी शीघ्रता से पूरी करें।
बुवाई का समय: असिंचित अवस्‍था में नमीं उपलब्‍ध रहने पर अक्‍टूबर के प्रथम सप्‍ताह से नवम्‍बर के प्रथम सप्‍ताह तक मसूर की बोनी करनी चा‍हिये। मसूर की सिंचित अवस्‍था में बोनी मध्‍य अक्‍टूबर से मध्‍य नवम्‍बर तक की जा सकती है। नवम्‍बर के अंतिम सप्‍ताह के बाद बोनी करने से पकने की अवस्‍था में तापक्रम बढ़ने से फसल समय से पूर्व पकने लगती है तथा दाना छोटा पड़ जाता है और उपज में कमी आती है।
खाद एवं उर्वरक: सिंचित फसल के लिये 20-25 किलोग्राम नत्रजन तथा 50 किलोग्राम स्‍फुर प्रति हेक्‍टेयर उपयोग करना चाहिए। असिंचित फसल के लिये 15-20 किलोग्राम नत्रजन एवं 30-40 किलोग्राम स्‍फुर का उपयोग प्रति हेक्‍टेयर करना चाहिये। भूमि में पोटाश की कमी होने पर बुवाई के समय 20 किलोग्राम पोटाश देना चाहिये। 5-6 टन प्रति हेक्‍टेयर के हिसाब से गोबर की खाद या कम्‍पोस्‍ट खाद अवश्‍य देना चाहिये।
सिंचाई: सामान्‍यत: मसूर बरानी फसल के रूप में ली जाती है। यदि सिंचाई उपलब्‍ध है तो खेत में पलेवा देकर बुवाई करना चाहिये। इससे अंकुरण अच्‍छा होता है। सामान्‍यत: बाद में सिंचाई की आवश्‍यकता नहीं होती है। सिंचाई उपलब्‍ध होने पर फूल आने के पूर्व एक हल्‍की सिंचाई करना चा‍हिये। इससे भरपूर पैदावार ली जा सकती है।
निंदाई-गुड़ाई: मसूर की फसल में 50 दिनों तक खरपतवारों को नियंत्रित रखना चाहिये। खेत में नींदा उगने पर हैंड हो या डोरा चलाना चाहिये इससे खरपतवार नियंत्रण होगा तथा वायु संचार के लिये गुड़ाई भी हो जाती है। रासायनिक खरपतवार नियंत्रण्‍ के लिये बुवाई पूर्व फ्लूक्‍लोरोलीन 0.75 किलोग्राम सक्रिय तत्‍व प्रति हेक्‍टेयर 600 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करें।
पौध संरक्षण:
(अ) कीट: मसूर में माहों, थ्रिप्‍स तथा फली छेदक इल्‍ली कीटों का प्रकोप होता है। माहो एवं थ्रिप्‍स के नियंत्रण के लिये मोनोक्रोटोफास एक मि.ली. प्र‍ति लीटर पानी या मेटासिस्‍टाक्‍स 1.5 मि.ली. प्रति लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करें। फल छेदक इल्‍ली के लिए इण्‍डोसल्‍फान 2 मि.ली. प्रति लीटर पानी या क्विनालफास एक मि.ली. प्रति लीटर पानी के हिसाब से घोल बनाकर छिड़काव करने से कीट नियंत्रित हो जाते हैं। खेत में छिड़काव एक समान होना चाहिए।
(ब) रोग: मसूर में मुख्‍य रूप से उकठा तथा गेरूआ रोग का प्रकोप होता है। उकठा रोग की उग्रता को कम करने हेतु थायरम (3 ग्राम प्रति किलोग्रामे या थायरम 1.5 ग्राम + कार्बन्‍डाजिम 1.5 ग्राम का मिश्रण प्रति किलोग्राम) से बीजोपचार कर बोयें। उकठा निरोधक जैसे जे.एल.-3 आदि बोयें। कभी-कभी गेरूआ रोग का भी प्रकोप होता है। इसके नियंत्रण के लिये डायथेन एम 45, 2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी के हिसाब से घोल बनाकर खड़ी फसल में छिड़काव करना चाहिए। गेरूआ प्रभावित क्षेत्रों में एल 4076 आदि गेरूआ निरोधक जातियॉं बोयें।
कटाई एवं गहाई: फसल पकने की अवस्‍था में पीली पड़ कर सूखने लगती हैं। फसल की कटाई कर खलिहान में बैलों या ट्रेक्‍टर से गहाई कर पंखे से सफाई करें। बीज को सुखाकर भंडारण करें।

मक्‍का

मक्‍का
मध्‍यप्रदेश में मक्‍का खरीफ के मौसम में बोई जाने वाली एक प्रमुख फसल है। मध्‍यप्रदेश के विभिन्‍न जिले जिनमें मक्‍का की खेती बहुतायत से की जाती है, उनमें छिंदवाड़ा, मंदसौर, धार, झाबुआ, रतलाम, सरगुजा, खरगौन, गुना, मंडला, शिवपुरी, शाजापुर एवं राजगढ़ जिले प्रमुख हैं। राज्‍य में क्षेत्र एवं उत्‍पादन की दृष्टि से छिंदवाड़ा अग्रणी जिला है।
भारत वर्ष के अनेक राज्‍य जिनमें मक्‍का की फसल प्रमुख रूप से ली जाती है उनमें उत्‍तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, पश्चिम बंगाल, आंध्रप्रदेश, मध्‍यप्रदेश इत्‍यादि प्रमुख हैं। भारत में मक्‍का की खेती 8.5 लाख हेक्‍टेयर में होती है और उत्‍पादन 14 लाख टन प्रति वर्ष होती है। वर्ष 2000 के आंकड़े के अनुसार कुल मक्‍का उत्‍पादन में मध्‍यप्रदेश का योगदान अन्‍य प्रदेशों की तुलना में चौथे स्‍थान पर है।
इसी तरह मध्‍यप्रदेश में भी अन्‍य जिलों की अपेक्षा छिंदवाड़ा जिले का योगदान मक्‍का उत्‍पादन में अधिक है। अकेले छिंदवाड़ा जिले का क्षेत्रफल पूरे मध्‍यप्रदेश के मक्‍का क्षेत्र का 10 प्रतिशत है। सतपुड़ा अंचल की जलवायु मक्‍का की खेती के अनुकूल है। अत: उन्‍नत जातियों की जानकारी व उनका चयन प्रदेश में मक्‍का का उत्‍पादन बढ़ाने की दिशा में एक सार्थक प्रयास होगा।
मध्‍यप्रदेश में मक्‍का के लिए जलवायु अनुकूलता, इसकी उपयोगिता एवं उत्‍पादन क्षमता के कारण इस फसल की लोकप्रियता बहुत अधिक है। वर्ष 1969-70 में इसका क्षेत्र मात्र 6.1 लाख हेक्‍टेयर था। वह बढ़कर वर्ष 2000-2001 में 17 लाख हेक्‍टेयर हो गया। इसी प्रकार उत्‍पादन 5.1 लाख टन से बढ्कर 1200 लाख टन हो गया और औसत उत्‍पादकता 551 क्विं./हेक्‍टेयर से बढ्कर 1468 क्विं./हेक्‍टेयर हो गई है।
मक्‍का का लगभग 55 प्रतिशत मात्रा भोजन के रूप में उपयोग किया जा रहा है। लगभग 14 प्रतिशत पशुआहार, 18 प्रतिशत मुर्गीदाना, 12 प्रतिशत स्‍टार्च में, 1.2 प्रतिशत बीज के रूप में उपयोग होता है। मक्‍का के एक परिपक्‍व बीज में लगभग 65-75 प्रतिशत स्‍टार्च, 10-11 प्रतिशत प्रोटीन एवं 5 प्रतिशत तेल होता है। मक्‍का के दाने में 30 प्रतिशत तेल एवं 18 प्रतिशत प्रोटीन होता है। सफेद एंडोस्‍पर्म में लगभग 90 प्रतिशत स्‍टार्च पाया जाता है।
मक्‍का की फसल की शुरूआत के दिनों में भूमि में पर्याप्‍त नमी की आवश्‍यकता होती है। साथ ही पर्याप्‍त सूर्य के प्रकाश की भी आवश्‍यकता होती है। भूमि में पर्याप्‍त नमी की कमी हो जाने पर इसकी बढ़वार पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। जुलाई से अग्स्‍त माह की वर्षा का मक्‍का की फसल पर विशेष प्रभाव पड़ता है।
विगत वर्षों में सोयाबीन फसल में कुछ विशेष कारकों से उत्‍पादन में कमी आने के कारण कृषकों का रूझान मक्‍का फसल की ओर बढ़ा है। मक्‍का फसल में अन्‍य खरीफ फसलों की तुलना में कुछ विशेषताएं है जैसे:
1. मक्‍का की उत्‍पादकता वर्षा पर आधारित खेतों में भी अत्‍यधिक है।
2. अन्‍तरण अधिक होने से खाली जगह में अन्‍तरवर्तीय फसल बोनस के रूप में लेना संभव है।
3. अन्‍तरण अधिक होने से खरपतवार नियंत्रण का खर्च सीमित होता है।
4. प्रति हेक्‍टेयर बीज लागत व्‍यय बहुत कम।
5. अनाज के साथ-साथ चारे की प्राप्ति।
6. आवश्‍यकता पड़ने पर हरे चारे (35 से 60 दिन) के रूप में उपयोग।
मक्‍का फसल की मुख्‍य आवश्‍यकताएं:
1. खेत में कभी भी पानी भरा न हो।
2. क्रांतिक अवस्‍थाओं में भूमि में नमी होना अति आवश्‍यक है।
3. विपुल उत्‍पादन के लिए आवश्‍यक उर्वरक देना जरूरी है।
मौसम: मक्‍का उत्‍पादन के लिए 26-30 डिग्री से.ग्रे. तापमान उपयुक्‍त है किंतु विषम परिस्थितियों में 15 से 40 डिग्री सें.ग्रे. के तापामन में उत्‍पादन लिया जा सकता है। मैदानी क्षेत्र से लेकर पहाड़ी क्षेत्र में जहां ऊंचाई 2700 मीटर तक मक्‍का उगाई जा सकती है।
भूमि चुनाव: मध्‍यम से भारी भूमि जिसमें जल निकास अच्‍छा हो, सबसे उपयुक्‍त होती है। लवणीय, क्षारीय भूमि एवं निचली भूमि जहां पानी का भराव होता हो, वहां मक्‍का नहीं लगाना उचित होगा।
भूमि की तैयारी: भूमि की तैयारी के लिए दो बार हल, दो बार बखर चलाकर मिट्टी भुरभुरी कर पाटा से समतल करके बोनी हेतु खेत तैयार करें। जहां बुवाई के समय या पौध अवस्‍था में खेत में पानी भरता हो वहां जल निकास हेतु नालियॉं बनायें जो कि जमीन के प्रकार, ढाल के आधार पर 5 से 10 मीटर के अंतर से निकालना चाहिए जिससे वर्षा का अतिरिक्‍त पानी शीघ्रता से बाहर निकले। निचले भूमि में या जहां पानी भरने की दशा वाली भूमि में कूड़-नाली बनाकर कूड़ के बाजू में बुवाई करना लाभप्रद होता है। सामान्‍य रूप से मक्‍का काफी अंतर पर लगाया जाता है। इन स्थिति में गोबर खाद, कम्‍पोस्‍ट खाद या केचुआ खाद का प्रयोग कतारों में करना लाभप्रद होगा। इन खादों का प्रयोग कतार में करने में भूमि में नमी की कम उपलब्‍धता की दशा में पानी सोखकर रखने की क्षमता को बढ़ाती है तथा अधिक पानी के भराव की दशा में जल निकास हेतु सहायता मिलती है। इन खादों/उर्वरकों की उपलब्‍धता की कमी के कारण छिड़काव बिखेरना नहीं चाहिए, इसलिए जहां तक संभव हो कतार में ही दें।
उन्‍नत जातियॉं: क्षेत्र की उपयुक्‍कता, भूमि की दशा, सिंचाई की व्‍यवस्‍था, खाद की मात्रा देने की क्षमता, फसल चक्र में अवधि के अनुसार, साथ ही विभिन्‍न उद्वेश्‍यों के लिए उन्‍नत जातियों का चयन करना जरूरी होता है।
संकुलित किस्‍में: इन्‍हें कम्‍पोजिट किस्‍मों के नाम से जाना जाता है। इन किस्‍मों के बीज को किसान दो-तीन वर्षों तक लगातार उपयोग कर सकता है।
संकर किस्‍में: इन किस्‍मों को हायब्रिड के नाम से जाना जाता है। किसान को संकर किंस्‍मों का उपयोग करते समय इस बात का अवश्‍य ध्‍यान रखना चाहिए कि प्रत्‍येक वर्ष बीज नया ही लेना है।
मध्‍यप्रदेश के लिये मक्‍का की अधिक उत्‍पादन देने वाली किस्‍मों की जानकारी निम्‍न प्रकार हैं:-
पकने की अवधि के आधार पर अनाज उत्‍पादन के लिए:
शीघ्र अवधि के पकने वाली (80 से 90 दिन)
जवाहर मक्‍का-8, जवाहर मक्‍का-12, सूर्या, किरण, पूसा कम्‍पोजिस्‍ट-2, पूसा अर्ली कम्‍पोजिट-2, हिम-129, जे.के.एस.एच.-175, कोहिनूर, अरूण
मध्‍यम अवधि में पकने वाली (90 से 100 दिन)
नवजोत, अरूणा, जवाहर मक्‍का-216, प्रो-311, जवाहर मक्‍का-13, सरताज, डेकन-107, पूसा कम्‍पोजिट-2, विजय
देरी से पकने वाली (100 से 130 दिन)
गंगा-3, प्रभात, त्रिसुलता, डेकन-103, डेकन-105, गंगा सफेद-2, गंगा-11, प्रभात

विभिन्‍न उद्वेश्‍यों के लिए:
पापकार्न हेतु (लाही)
अम्‍बर पाप, बजीरा पाप।
क्‍वलिटी प्रोटिन (शक्तिवर्धक)
शक्ति, शक्तिमान-1, शक्तिमान-2
मिठा मक्‍का (मधुर मक्‍का)
माधुरी, अम्‍बर मधुर मक्‍का-1, अम्‍बर मधुर मक्‍का-2
बेबी कार्न
वी.एल.’42, त्रिशुलता, प्रभात
चारा हेतु
अफ्रीकन टाल, जे.-1006, विजय
स्‍टार्च हेतु
हाई स्‍टार्च
रबी मौसम हेतु (अवधि 150 दिन)
गंगा-11, त्रिशुलता, सरताज, डेकन-103, डेकन-105, एच.-216/जवाहर मक्‍का-216
चारे के लिये मक्‍का
आफ्रीकन टाल, गंगा-7, गंगा-11, विजय कम्‍पोजिट

बीज की मात्रा: बोनी हेतु बीज की मात्रा 16 से 20 किग्रा. प्रति हेक्‍टेयर उपयोग करें। फसल अवधि के आधार पर बीज की मात्रा कम और अधिक हो सकती है।
बुवाई का समय: वर्षा आधारित क्षेत्रों में मानसून के प्रारंभ होते ही मक्‍का की बुवाई करें। जहां सिंचाई उपलब्‍ध हो तो मानसून आने के 20 दिन पूर्व भी बुवाई की जा सकती है। कम वर्षा वाले क्षेत्रों में पहली वर्षा के तुरंत बाद शीघ्रता से बुवाई करें।
बुवाई पद्धति: कतार में ही बुवाई करें। बीज छिड़ककर न बोयें। सबसे अच्‍छा होगा कि हाथ से टुपाई करें। बुवाई भूमि ढाल से आड़ी दिशा में करें। टुपाई करने पर समतल खेत में सरता से खाद की बुवाई करें एवं कतार में 20 सेमी. की अंतर पर 2 दाने थोड़ी दूर पर डालें, बाद में 15 दिन पर पौध विरलन कार्य करें। मक्‍का बीज की बुवाई के लिए गहराई 3 से 5 सेमी. होनी चाहिए।
पौध अंतरण और बीज की गहराई:
खरीफ के लिये
कतार से कतार अंतर (सेमी.)
पौध से पौध अंतर (सेमी.)
पौध संख्‍या प्रति हेक्‍टेयर
शीघ्रता से पकने वाली जातियों के लिये
60
20
80,000
मध्‍यम अवधि से पकने वाली जातियों के लिये
60
22
57,000
देरी से पकने वाली जातियों के लिये
75
20
65,000
अंतरवर्तीय फसल पद्धति में (1:1 कतार)
60
20
80,000

बीज उपचार: बीज उपचार हेतु 2 ग्राम थाइरम एवं 1 ग्राम कार्बन्‍डाजिम प्रति किलो ग्राम बीज हेतु प्रयोग करें।
बीज अंकुरण: मक्‍का फसल के बीज शीघ्रता से अपनी अंकुरण क्षमता खो देते हैं। साथ ही भंडारण में कीट की समस्‍या अधिक आती है। अत: यह जरूरी है कि बुवाई पूर्व बीज की अंकुरण क्षमता जरूर ज्ञात करें।
पौध विरलन: यह क्रिया मक्‍का फसल में अति आवश्‍यक है क्‍योंकि 60 से 70 प्रतिशत किसान भाइयों के खेत में वांछित पौध संख्‍या न होने से उत्‍पादन में कमी आती है। इसलिए बुवाई के समय कतार का अंतर तो निश्चित रहता है परंतु पौध से पौध के अंतर बीज टुपाई में या बुवाई में कम अंतर पर डालते हैं। बाद में 15 से 20 दिन पर प्रथम गुड़ाई के तुरंत बाद पौध विरलन का कार्य किया जाता है। इससे पौधे 20 से 22 सेमी. के अंतर पर बनाये रखते हुए कमजोर पौधों को खेत से निकाल दिया जाता है। साथ ही जहां जगह खाली हो वहां स्‍वस्‍थ पौधों को रोपित किया जाता है। आवश्‍यक है कि इस क्रिया के समय हल्‍की वर्षा का मौसम होना चाहिए।
कम्‍पोस्‍ट खाद: उपलब्‍ध सड़ी हुई गोबर की खाद, कम्‍पोस्‍ट या केंचुआ द्वारा बनी खाद का प्रयोग करना जरूरी है क्‍योंकि मक्‍का फसल खेत में पानी का भराव एवं पानी की कमी इन दोनों दशाओं के प्रति अति संवेदनशील है। खाद बुवाई के समय कतारों में दें, जिससे फसल को सीधा फायदा होगा। अनुमानत: 8 से 10 टन खाद प्रति हेक्‍टेयर देना चाहिए।
रासायनिक खाद:

पोषक तत्‍व, किग्रा./हेक्‍टेयर
खरीफ के लिये
नत्रजन
स्‍फुर
पोटाश
शीघ्र पकने वाली जातियों के लिये
60
40
30
मध्‍यम अवधि में पकने वाली जातियों के लिये
90
50
30
देरी से पकने वाली जातियों के लिये
120
60
40
अंतरवर्तीय फसल पद्धति में (1:1 कतार)
150
80
60
रबी एवं जायद के लिये
120
60
40

नत्रजन की एक-तिहाई मात्रा एवं स्‍फुर तथा पोटाश की पूरी मात्रा बुवाई करते समय सरते से कतार में दें। शेष दो-तिहाई से क्रमश: एक-तिहाई नत्रजन 25-30 दिनों पर एवं 45-50 दिनों पर खड़ी मक्‍का फसल में दे। खेत में पानी भरने की दशा में एवं निंदाई-गुड़ाई में देरी होने पर नत्रजन 20 किलोग्राम प्रति हेक्‍टेयर निश्चित रूप से दें। खड़ी फसल में नत्रजन का प्रयोग निंदाई उपरांत ही करें।
रासायनिक खाद की संतुलित मात्रा मिट्टी परीक्षण परिणाम के आधार पर देना अधिक लाभप्रद होगा।
सूक्ष्‍म तत्‍व: जिेक सल्‍फेट 20 किग्रा./हेक्‍टेयर बुवाई के समय देना चाहिए।
जैविक खाद: कम खर्च में अधिक फायदे व आर्थिक उद्देश्‍य के मद्देनजर रखते हुए एजेटोबेक्‍टर, एजोस्‍प्रेलियम एवं पी.एस.बी. जैव उर्वरकों का प्रयोग करें। जैविक खाद तथा रासायनिक खाद को यथा संभव कतारों में दें।
अंतर सस्‍य क्रियाएँ: खेत को 35 से 40 दिन तक नींदा रहित रखना जरूरी है। अत: फसल अंकुरण के 15-20 एवं 25-30 दिन पर खेत में डोरा चलाना जरूरी है। इसके बाद मिट्टी चढ़ाने का कार्य डोरा में फट्टी लगाकर (सारपाटी) खेत में चलाने से कम लागत में मिट्टी चढ़ाने का कार्य किया जा सकता है। गुड़ाई के तुरंत बाद निंदाई करने से मिट्टी से दबे पौधे निकालना एवं खेत नींदा रहित करने में कम खर्च आता है। अत: गुड़ाई के बाद निंदाई अवश्‍य करें। नींदा जड़ से निकालते समय उसे जल्‍दी में तोड़े या काटे नहीं अन्‍यथा खरपतवार शीघ्रता से बढ्कर फसल से प्रतिस्‍पर्धा करेंगे। संभव होने पर निंदाई किया गया कचरा खेत से बाहर मेंड़ पर निकाले या केचुआ, नाडेप, कम्‍पोस्‍ट खाद बनाने में इसका प्रयोग करें।
रासायनिक नींदा नियंत्रण: मक्‍का फसल में एट्राजीन 1 किग्रा. प्रति हेक्‍टेयर बुवाई के बाद परंतु उगने के पूर्व उपयोग करें। अंतरवर्ती (मक्‍का+दलहन/तिलहन) फसल व्‍यवस्‍था में पेंडीमिथिलिन 1.5 किग्रा. प्रति हेक्‍टेयर बुवाई के बाद परंतु उगने के पूर्व रसायन का प्रयोग करें। मक्‍का फसल में चौड़ी पत्‍ती वाले खरपतवारों की अधिकता होने पर 30-35 दिन पर 2,4-डी का 1.0 किग्रा. प्रति हेक्‍टेयर उगे हुए खरपतवारों पर छिड़काव कर नियंत्रण किया जा सकता है।
सिंचाई एवं जल निकास: वर्षा आधारित क्षेत्रों में खेतों में नमी की कमी होने पर सिंचाई की जानी चाहिए। विशेष रूप से उन क्रांतिक अवस्‍थाओं पर जहां फसल अधिक संवदेनशील होती है।
सिचांई एवं जल निकास हेतु क्रांतिक अवस्‍था
1. पौधे की अवस्‍था
(5 से 15 दिन)
2. घुटने की ऊंचाई वाली अवस्‍था
(30 से 35 दिन)
3. पुष्‍पन की अवस्‍था
(50 से 55 दिन)
4. दाना बनने की प्रारंभिक अवस्‍था
(70 से 75 दिन)

इन अवस्‍थाओं में भूमि में नमी की कमी होने पर फसल उत्‍पादन पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इसी समय खेत में पानी की अधिकता एवं पानी का भराव होने पर फसल को काफी नुकसान होता है। पौध की अवस्‍था पानी भरने के लिए एवं पुष्‍पन अवस्‍था भूमि में नमी की कमी होने के प्रति अति संवदेनशील है।
अंतरवर्तीय फसलें: अंतरवर्तीय फसलों में 2:2, 2:4, 2:6 अनुपात में फसल लगाई जा सकती है। परंतु 1:1 सबसे उपयुक्‍त पाया गया है क्‍योंकि इस पद्धति में मक्‍का की 100 प्रतिशत पौध संख्‍या होती है एवं अंतरवर्तीय फसल की 50 प्रतिशत उपज बोनस के रूप में प्राप्‍त होती है।
खरीफ मौसम में:
मक्‍का : दलहन में उड़द, बरबटी, ग्‍वार एवं मूंग
मक्‍का : तिलहन में सोयाबीन एवं तिल
मक्‍का : सब्‍जी में सेम, भिंडी, हरी धनियॉं
मक्‍का : चारा (पौष्टिक) ग्‍वार, बरबटी एवं मक्‍का
मक्‍का : हरी खाद, ढेंचा, सन
रबी मौसम में:
मक्‍का: मटर, मेथी, पालक, धनियॉं एवं मूली
1 कतार : हरी खाद, ढेंचा, सन
जायद में:
मक्‍का : मूंग, हरी धनियॉं एवं पालक
पौध संरक्षण
(अ) रोग
1. पर्ण अंगमारी
(अ) मैडिस पर्ण अंगमारी: अंकुरण के 4-5 सप्‍ताह के बाद इस रोग के लक्षण दिखाई देने लगते हैं। प्रारंभिक अवस्‍था में छोटे गोलाकार/अंडाकार धब्‍बे भूरे कत्‍थई रंग के अधिक संख्‍या में बनते हैं जिनके किनारे भूरे बैंगनी रंग के होते हैं। मौसम की अनुकूलता से ये धब्‍बे बड़े होकर आपस में मिल जाते हैं। जिससे पत्तियों पर धारियॉं बन जाती हैं। ग्रसित पौधे की बढ़वार रूक जाती है। यह मृदा जनित रोग है जो हेलमेन्‍योपोरियम मेडिस नामक फफूंद द्वारा फैलता है। इस रोग के तीव्र प्रकोप की अवस्‍था में 90 प्रतिशत तक हानि हो जाती है।
(ब) टर्सिकम पर्ण अंगमारी: अंकुरण के 4-5 सप्‍ताह बाद इस रोग के लक्षण दिखाई देने लगते हैं। सर्वप्रथम इस रोग के लक्षण नीचे की प‍त्तियों पर दिखते हैं। लम्‍ब वृत्‍ताकार या नाव के आकार के धूसर हरे रंग के 15 सेमी. लम्‍बे व 3-4 सेमी. चौड़े होते हैं। तीव्र प्रकोप की अव‍स्‍था में पत्तियां पूरी तरह से सूख जाती हैं एवं भुट्टे की संख्‍या एवं वजन में कमी आ जाती है। यह मृदा जनित रोग है जो हेलमेन्‍योस्‍पोरियम टर्सिकम नामक फफूंद द्वारा फैलता है। इस रोग के प्रकोप से उपज में 30 प्रतिशत तक कमी आ जाती है।
नियंत्रण:
1. पुराने पौधों के अवशेषों को जलाकर नष्‍ट करें।
2. रोग सहनशील जातियां- गंगा-21, एच-216, जय किसान इत्‍यादि लगायें।
3. बोने के पूर्व बीजों को थायरम फफूंदनाशक दवा 3 ग्राम/किलो ग्राम बीज की दर से उपचारित करें।
4. खड़ी फसल पर प्रारंभिक लक्षण दिखते ही डायथेन जेड-78 या डायथेन एम-45 दवा का 3 ग्राम/लीटर की दर से घोल बनाकर छिड़काव करें। रोग की तीव्रता को देखते हुए 15 दिनों के अंतराल से छिड़काव दुहरायें।
5. ताम्रयुक्‍त फफूंदनाशक दवा जैसे ब्लिटाक्‍स- 50 या फाइटोलान दवा 3 ग्राम/लीटर की दर से छिड़काव करें।
2. भूरी चित्‍ती: पत्तियों, पर्णछेदक, तने एवं भुट्टे के बाहरी छिलके पर हल्‍के पीले रंग के 1-5 मि.मी. व्‍यास के गोलाकार/अंडाकार धब्‍बे बनते जाते हैं। तीव्र प्रकोप की अवस्‍था में धब्‍बे अधिक संख्‍या में बनते हैं और आपस में मिल जाते है व भूरे रंग में परिवर्तित हो जाते हैं और आपस में मिल जाते हैं। रोग ग्रस्‍त भाग जंग लगा सा दिखता है। तीव्र प्रकोप की अवस्‍था में पत्तियां विकसित हुए बिना ही सूख जाती हैं तथा धब्‍बे भुट्टों पर बन जाते हैंं। अत्‍यधिक प्रकोप से उपज में 25 प्रतिशत तक हानि हो जाती है। यह बीज जनित रोग है जो फाइसोर्मा मेडिस नामक फफूंद से होता है।
नियंत्रण:
1. खेतों को खरपतवारों से मुक्‍त रखें।
2. फसल चक्र अपनाएं।
3. बोनी के पूर्व बीजों को थायरम या डाययेन एम-45 फफूंदनाशक दवा 3 ग्राम/किलो ग्राम की दर से उपचारित करें।
4. रोग के प्रारंभिक लक्षण दिखते ही ताम्रयुक्‍त फफूंदनाशक दवा, फाइटोलान या ब्लिटाक्‍स-50 का 3 ग्राम/लीटर के हिसाब से घोल बनाकर छिड़काव करें। रोग की तीव्रता को देखते हुए 10-15 दिनों के अंतराल से छिड़काव दुहरायें।
3. मृदरोमिल आसिता (डाउनी मिल्‍डयू): प्रारंभ में निचली पत्तियों पर लम्‍बवत 3 मि.मी. चौड़ी पीले रंग की धारियां समानान्‍तर रूप में बनती है। बाद में धारियां भूरे रंग में परिवर्तित होती है व इन धारियों पर सफेद रंग की कवर वृद्धि दिखाई देती हैं। कुछ समय पश्‍चात ऊपर की पत्तियों पर भी दिखाई देने लगते हैं। पौधे की प्रारंभिक अवस्‍था में रोग की तीव्रता अधिक हो जाये तो पौधे समय से पूर्व ही मर जाते है। इस रोग से 20-60 प्र‍तिशत तक हानि होती है। यह बीज एवं मृदा जनित रोग है जो स्‍कलेरोस्‍पोरा टैसीनामक फफूंद द्वारा होता है।
नियंत्रण:
1. फसल अवशेषों को इकट्ठा कर जलायें।
2. फसल चक्र अपनायें।
3. खेतों में जल निकासी की उचित व्‍यवस्‍था कर समय-समय पर खेत से पानी की निकासी करें।
4. रोग रोधी किस्‍में गंगा-2, तरूण, जवाहर, किसान आदि लगाये।
5. खड़ी फसल में रोग के प्रारंभिक लक्षण दिखते ही ताम्रयुक्‍त फफूंदनाशक जैसे फाइटोलान या क्लिटाक्‍स-50 का 3 ग्राम/लीटर पानी के हिसाब से घोल बनाकर छिड़काव करें। रोग की तीव्रता देखते हुए 10-15 दिनों के अंतराल से छिड़काव दुहराये।
(ब) कीट
1. सफेद लट: सफेद रंग की अंगूठी के समान मोटी मांसल इल्‍ली जिसका सिर भूरे रंग का होता है, पौधे की जड़ों को खाकर नुकसान पहुंचाती है। ये इल्लियां नमीयुक्‍त जमीन में 5-10 सेमी. तथा सूखी जमीन में 30-60 सेमी. गहराई तक पाई जाती हैं। क्षतिग्रस्‍त पौधे मुरझा कर सूख जाते हैं जिसे आसानी से खीचकर भूमि में निकाला जा सकता है।
नियंत्रण: फोरेट 10 जी. दवा की 10 किलो ग्राम/हेक्‍टेयर मात्रा बोनी से पूर्व खेतों में प्रयोग करें।
2. तना छेदक मक्‍खी: यह गहरे भूरे रंग की मक्‍खी घरेलू मक्‍खी से छोटी होती है। पत्तियों की निचली सतह पर दिये अंडों से 2 दिन बाद छोटे-छोटे हल्‍के सफेद रंग की गिहारे निकलती हैं। गिहारे रेंगकर पर्णच्‍छेद में पहुंच जाते हैं तथा उसे भेदकर तने में प्रवेश कर जाते हैं। पौधे का मुख्‍य प्ररोह कट जाने से मृत केन्‍द्र (डेडहार्ट) बन जाता है तथा पौधा मर जाता है। प्रकोपित पौधे में बाजू से कल्‍ले निकल जाते हैं। प्रकोप से लगभग 20 प्रतिशत तक उपज में कमी आंकी गई है। इस कीट का प्रकोप पौधे की तीन पत्‍ती की अवस्‍था से 25 दिन की अवस्‍था तक होता हैं।
नियंत्रण: नियंत्रण के निम्‍नलिखित उपाय एक साथ अपनाने से अच्‍छे परिणाम प्राप्‍त होते है:-
1. शीघ्र बोनी (जुलाई के प्रथम सप्‍ताह तक) से कीट का प्रकोप कम होता है।
2. बीज दर में थोड़ी सी वृद्धि कर बाद में पौध संख्‍या में विरलन करें।
3. कार्बोप्‍यूरान 50 एस.पी. 100 ग्राम/किलोग्राम बीज के हिसाब से बीजोपचार करें।
4. फोरेट 10 जी दानेदार 10 किलोग्राम/हेक्‍टेयर भूमि में बोनी से पूर्व प्रयोग करें।
3. तना छेदक कीट
1. धारीदार तना छेदक: इल्लियां हल्‍के पीले रंग की काले सिर वाली होती हैं जिनके शरीर पर लंबाई में भूरी धारियां पाई जाती हैं। पूर्ण विकसित इल्‍ली 2-3 सेमी. लंबी होती है। इल्लियां पहले पत्‍ती को खुरच-खुरच कर खाती हैं और बाद में इस प्रकार से क्षति करती हैं जिससे मृत केन्‍द्र (डेड हार्ट) बन जाता है। इस कीट के प्रकोप से 80 प्रतिशत तक हानि आंकी गई है।
नियंत्रण:
1. कीट ग्रस्‍त पौधों को उखाड़ कर नष्‍ट कर देना चाहिए।
2. फसल कटाई के बाद बचे हुए ठूंठों को जला देना चाहिए।
3. गंगा-5 तथा संकुलित जातियों में इस कीट का प्रकोप कम होता है।
4. छोटी अवस्‍था में पौधों पर फासफोमिडान 100-150 मि.ली./हेक्‍टेयर का छिड़काव करें।
5. इण्‍डोसल्‍फान 4 जी. अथवा कार्बोफ्यूरान 3 जी, 10 किलोग्राम/हेक्‍टेयर के हिसाब से पोंगली में डाले।
4. गुलाबी तना छेदक: इस कीट की इल्लियां हल्‍की गुलाबी रंग की लाल भूरे सिर वाली होती हैं। ये लगभग 2.5 सेमी. लंबी होती हैं। अंडे से बाहर निकलने के बाद इल्‍ली पर्णच्‍छेद में छेद कर तने में प्रवेश करके उसे खाती है। फलस्‍वरूप पौधे पीले पड़ जाते हैं तथा मध्‍य की पत्तियां सूख कर मृत केन्‍द्र बन जाता है।
नियंत्रण: पूर्व में बताये गये धारीदार तना छेदक कीट के नियंत्रण के लिए दिये गये उपायों के समान।
5. माहू: हरे काले रंग के माहू कीट झुंडों में रहते हैं जो ऊपरी नाजुक पत्तियों तथा मांझर से रस चूसकर नुकसान पहुंचाते हैं। रस चूसने से पत्तियों पीली पड़ जाती हैं तथा पराग भी झड़ता है।
नियंत्रण: मिथाइल डेमेटान 25 ई.सी. अथवा डायमिथोयेट 30 ई.सी. का 1 मि.ली./लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।
6. भुट्टे की इल्‍ली (चने की इल्‍ली): ये इल्‍ली हल्‍के भूरे रंग की होती हैं जिसके पृष्‍ठ भाग पर तथा बाजू में एक-एक रेखाएं होती हैं। पूर्ण विकसित इल्‍ली लगभग 3.5 सेमी. लंबी होती हैं। इल्लियां भुट्टे के अग्र भाग, मांझर तथा कलीकाओं के साथ ही नरम दानों को खाकर नुकसान पहुंचाती हैं।
नियंत्रण: कार्बोरिल 10 प्रतिशत 20 किलोग्राम/हेक्‍टेयर का भुरकाव अथवा इण्‍डोसल्‍फान 35 ई.सी; 1200 मि.ली./हेक्‍टेयर का छिड़काव करें।
गहाई: मक्‍का फसल में सबसे महत्‍वपूर्ण कार्य गहाई है क्‍योंकि अधिक उत्‍पादन के बाद गहाई करना एक मुख्‍य समस्‍या के रूप में सामने आती है। दाने निकालने हेतु सेलर उपलब्‍ध है। साधारण थ्रेसर में थोड़ा सुधार कर मक्‍का की गहाई की जा सकती है। इसमें मक्‍के के भुट्टे के छिलके निकालने की आवश्‍यकता नहीं है। सीधे भुट्टे सूखे जाने पर थ्रेसर में डालकर गहाई की जा सकती है, साथ ही दाने का कटाव भी नहीं होता।
कड़बी एवं भुट्टे खेत में काफी सूख जाते हैं। इस दशा में सीधे कड़बी भुट्टे सहित थ्रेसर में डालने से भी दाने आसानी से निकाले जा सकते हैं एवं कड़बी का भूसा जानवरों के खाने योग्‍य बन जाते हैं।

गन्‍ना

गन्‍ना
गन्‍ना एक महत्‍वपूर्ण नगदी फसल है। यह मध्‍यप्रदेश में प्राय: सभी क्षेत्रों में लगाई जाती है जहां पर सिंचाई की उचित व्‍यवस्‍था तथा खेत में पानी का निकास अच्‍छा होता है।
खेत की तैयारी: दोमट भूमि जिसमें पानी का निकास अच्‍छा हो, गन्‍ने के लिये सर्वोत्‍तम होती है। खेत की तैयारी के लिये ग्रीष्‍म ऋतु में मिट्टी पलटने वाले हल से दो बार आड़ी व खड़ी जुताई करें। अक्‍टूबर माह के प्रथम सप्‍ताह में जुताई कर पाटा चलाकर खेत समतल करें। रिजर की सहायता से खेत में 3 फीट की दूरी पर नालियां बनायें। बसंतकालीन गन्‍ने जो फरवरी मार्च में लगाया जाता है, नालियों का अंतर 2 फीट तक रखना चाहिए।
उन्‍नत बीज: गर्म हवा से उपचारित (50 से.ग्र. पर 4 घंटे) स्‍वस्‍थ, कीट व रोग सहित बीज का उपयोग करें। गन्‍ना का बीज स्‍वस्‍थ फसल से प्राप्‍त करना चाहिए।
जातियॉं:
शीघ्र पकने वाली जातियॉं: को.सी. 671, को. 7314, को. 8383, को. 87008 एवं को. 87010, को. जवाहर 86-141 एवं को. जवाहर 86-572 लगायें। गुड़ बनाने के लिये को.सी. 671, को. जवाहर 86-141 एवं को. 86-572 सर्वोत्‍तम है। इन जातियों की उपज 800-900 क्विंटल प्रति हेक्‍टेयर होती है।
मध्‍यम-देर से पकने वाली जातियॉं: को. 7318, को. 6304, को. 86032, को. 7219, को. जे.एन. 86-600 लगाई जाये। को. 7318 एवं को. 86032 गुड़ बनाने के लिये अधिक उपयुक्‍त है। इन जातियों की उपज 1000-1200 क्विंटल प्रति हेक्‍टेयर होती है।
बुवाई का समय: अधिक उपज के लिए बुवाई का सर्वोत्‍तम समय अक्‍टूबर-नवम्‍बर माह है। गन्‍ने की बोनी मार्च तक की जा सकती है। बसंतकालीन गन्‍ना फरवरी-मार्च में लगाना चाहिए।
अंतरवर्तीय फसलें: अक्‍टूबर-नवम्‍बर में 90 सेमी. की दूरी पर निकाली गरेड़ों में गन्‍ने की फसल बोते ही मेड़ों के दोनों ओर प्‍याज, लहसुन, आलू, रांजमा, ईसबगोल तथा सीधी बढ़ने वाली मटर लगाना बहुत उपयुक्‍त है। इन फसलों से गन्‍ने की फसल को कोई हानि नहीं होती है तथा इनसे किसान को अतिरिक्‍त नगद लाभ प्राप्‍त हो जाता है।
बसंतकालीन फसल में गरेड़ों की मेड़ों के दोनों ओर मूंग या उड़द लगाना बहुत लाभदायक है। इन अंतवर्तीय फसलों से अतिरिक्‍त लाभ मिल जाता है। अंतरवर्तीय फसलों की खाद की निर्धारित मात्रा गन्‍ने की फसल में दी मात्रा के अतिरिक्‍त देना चाहिए।
बीजोपचार व बुवाई: गन्‍ने के दो या तीन ऑंख वाले टुकड़े का कार्बेन्‍डाजिम 2 ग्राम/लीटर के घोल में 15-20 मिनट तक डुबाना चाहिए। इसके पश्‍चात टुकड़ों को नालियों में रखकर मिट्टी से ढ़क कर सिंचाई कर दें या नालियों में सिंचाई करके टुकड़ों को हल्‍के से नालियों में दबा दें। बीज की मात्रा 1,25,000 ऑंखें (कलिकायें) या 100 से 125 क्विंटल बीज प्रति हेक्‍टेयर लगायें।
खाद एवं उर्वरक: गन्‍ने में 300 किलोग्राम नत्रजन (650 किलोग्राम यूरिया) 80 किलोग्राम स्‍फुर (500 किलोग्राम सिंगल सुपर फास्‍फेट) एवं 60 किलोग्राम पोटाश (100 किलोग्राम म्‍यूरेट ऑफ पोटाश) प्रति हेक्‍टेयर देना चाहिऐ। स्‍फुर एवं पोटाश की पूरी मात्रा बोनी के पूर्व गरेड़ों में दें। नत्रजन की मात्रा अक्‍टूबर में बोई गई फसल के लिए 4 भागों में बांट कर अंकुरण के समय (30 दिन), कल्‍ले निकलते समय (90 दिन), हल्‍की मिट्टी चढ़ाते समय (120 दिन) दें। गन्‍ने की फसल में नत्रजन की एक-चौथाई मात्रा की पूर्ति अच्‍छी सड़ी गोबर की खाद या हरी खाद से करना बहुत लाभप्रद होता है।
उर्वरक की बचत:
1. यूरिया उर्वरक पर नीम, महुआ या करंज की खली के बारीक पाउडर से यूरिया को उपचारित करने से नत्रजन की बचत होती है।
2. गन्‍ना मिल का व्‍यर्थ पदार्थ सल्‍फीनेटेड प्रेसमड केक की 6 टन मात्रा या 4 टन प्रेसमड केक तथा 5 किलोग्राम एजेक्‍टोबेक्‍टर जीवाणु खाद का प्रयोग करने से 75 किलोग्राम नत्रजन की बचत होती है।
जैव उर्वरक: जैविक खादें फसल के लिये पोषक तत्‍वों का पूरक स्रोत हैं। गन्‍ना की फसल में एजोस्‍पीरिलियम, ग्‍लूकोनाटोबेक्‍टर एवं फास्‍फोबेक्‍टेरिया की पहचान मुख्‍य खादों के रूप में की गई है। यह जैविक खादें 20 प्रतिशत नत्रजन एवं 25 प्रतिशत स्‍फुर की प्रतिपूर्ति प्रत्‍यक्ष रूप से कर सकते हैं एवं अप्रत्‍यक्ष रूप से गन्‍ना वृद्धि में सहायक होते हैं। एजोस्‍पीरिलियम एवं ग्‍लूकोनासेटोबेक्‍टर गन्‍ना की जड़ों पर उपनिसेचित होकर वायुमंडलीय नत्रजन का स्थिरीकरण करते हैं। फास्‍फोबेक्‍टेरिया जड़ों के आसपास की मिट्टी में रहते हुए मृदा की अघुलनशील, अनुपलब्‍ध स्‍फुर को घुलनशील, उपलब्‍ध स्‍फुर परिवर्तन में सहायक होता है।
सूक्ष्‍म पोषक तत्‍व: गन्‍ना के शर्कर संचय, तंतु भाग एवं नत्रजन, स्‍फुर, पोटाश उपभोग क्षमता एवं गन्‍ना उत्‍पादकता में सूक्ष्‍म पोषक तत्‍वों का विशेष योगदान होता है। सूक्ष्‍म पोषक तत्‍वों का प्रबंधन जो कि समय-समय पर कराये गये मृदा परीक्षण पर आधारित हो अथवा फसल के लक्षणों पर आधारित हो, गन्‍ना उत्‍पादन बढ़ाता है। सामान्‍यत: गन्‍ना में लौह एवं जस्‍ता की कमी परिलक्षित होती है। इनकी कमी को पूरा करने हेतु फैरस सल्‍फेट/जिंक सल्‍फेट 0.5 से 2.0 प्रतिशत का घोल, फुहार, सप्रेद्ध ? के रूप में अथवा बोनी के समय फैरस सल्‍फेट 50 किलोग्राम/हेक्‍टेयर तथा जिंक सल्‍फेट 25 किलोग्राम/हेक्‍टेयर मृदा में मिलाया जा सकता है।
निंदाई-गुड़ाई: बुवाई के लगभग 4 माह तक खरपतवारों की रोकथाम आवश्‍यक है। इसके लिये 3-4 निंदाई आवश्‍यक है। रासायनिक नियंत्रण के लिये एट्राजिन 1 किलो सक्रिय तत्‍व/हेक्‍टेयर 600 लीटर पानी में घोलकर अंकुरण पूर्व छिड़काव करना चाहिए। बाद में उगे चौड़ी पत्‍ती खरपतवारों के लिये 2-4, डी. सोडियम साल्‍ट 0.5 किलोग्राम सक्रिय तत्‍व प्रति हेक्‍टेयर 600 लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए। छिड़काव के समय खेत में नमीं होना आवश्‍यक है।
मिट्टी चढ़ाना: गन्‍ने को गिरने से बचाने के लिये रिजर की सहायता से मिट्टी चढ़ाना चाहिए। अक्‍टूबर-नवम्‍बर माह में बोई फसल में प्रथम मिट्टी मई माह में चढ़ाना चाहिये। कल्‍ले फूटने के पहले मिट्टी न चढ़ायें।
सिंचाई: गर्मी के दिनों में 8-10 दिनों के अंतर पर एवं सर्दी के दिनों में 15 दिन के अंतर से सिंचाई करें। सिंचाई सर्पाकार विधि से करें। सिंचाई की मात्रा कम करने के लिये गरेड़ों में गन्‍ने की सूखी पत्तियों की 10-15 सेमी. तह बिछायें। गर्मी में पानी की मात्रा कम होने पर एक गरेड़ छोड़कर सिंचाई देकर फसल बचावें। कम पानी उपलब्‍ध होने पर ड्रिप (टपका विधि) से सिंचाई करने से 40 प्रतिशत पानी की बचत होती है।
गर्मी के मौसम तक जब फसल 5-6 महीने तक की होती है स्‍प्रींकलर (फब्‍बारा) विधि से सिंचाई करके पानी की बचत की जा सकती है।
वर्षा के मौसम में खेत में उचित जल निकास का प्रबंध रखें। खेत में पानी के जमाव होने से गन्‍ने की बढ़वार एवं रस की गुणवत्‍ता प्रभावित होती है।
बंधाई: गन्‍ना न‍ गिरे इसके लिये गन्‍नों के झुण्‍डों को गन्‍ने की सूखी पत्तियों से बांधना चाहिये। यह कार्य अगस्‍त माह के अंत में या सितम्‍बर माह में करना चाहिए।
पौध सरंक्षण:
(अ) कीट: गन्‍ने की फसल को रोग व कीटों से बचाव के लिये पौध संरक्षण उपाय अपनायें।
1. अग्र तना छेदक के प्रकोप से बचाव हेतु सितम्‍बर-अक्‍टूबर में बोनी करें।
2. गन्‍ने के टुकड़ों को क्‍लोरपायरीफॉस 20 ई.सी. दवा के 0.1 प्रतिशत या मेलाथियान 50 ई.सी. दवा के 0.1 प्रतिशत घोल में 15 मिनट तक डुबोकर बीजोपचार करें।
3. अग्रतना छेदक के प्रकोप के नियंत्रण हेतु फोरेट 10 जी दानेदार या कार्बोफ्यूरान 3 जी दानेदार दवा को जड़ों के पास डालें। फोरेट दवा की मात्रा 1.5 किलोग्राम सक्रिय तत्‍व/हेक्‍टेयर या कार्बोफ्यूरान 1 किलोग्राम तत्‍व/हेक्‍टेयर उपयोग करें।
4. पइरिल्‍ला एवं सफेद मक्‍खी नियंत्रण के लिये मेलाथियान 50 ई. सी. का 0.05 प्रतिशत का घोल या मोनोक्रोटोफास 36 एस.एल. दवा का 0.01 प्रतिशत घोल 600 लीटर प्रति हेक्‍टेयर के हिसाब से छिड़कें।
5. पायरिल्‍ला कीट के जैविक नियंत्रण हेतु जब 3-5 अंडे/शिशु/प्रौढ़ प्रति पत्‍ती हो तो एपीरिकेनिया के जीवित ककून 4000-5000 ककून या 4-5 लाख अंडे/हेक्‍टेयर की दर से छोड़ें।
6. शीर्ष तना छेदक का प्रकोप होने पर कार्बोफ्यरान 3 प्रतिशत दानेदार दवा का 1 किलोग्राम सक्रिय तत्‍व प्रति हेक्‍टेयर की दर से जड़ों के पास डालें।
(ब) रोग
1. उकठा रोग: यह एक प्रमुख बीमारी है जो लगभग पूरे प्रदेश में व्‍याप्‍त है। इस बीमारी के कारण गन्‍ने के बीज के साथ रहते हैं जिससे बीमारी एक स्‍थान से दूसरे स्‍थान तक आसानी से पहुंचती है। इसके बीजाणु भूमि में फैल जाते हैं।
कारक: यह बीमारी फ्यूजेरियम मोनीलीफारमिस तथा एफ. आक्‍सीस्‍पोरम नामक फफूंद से होती है।
लक्षण: वर्षा ऋतु के उपरांत पत्तियॉं पीली पड़ने व मुरझाने लगती हैं तथा बाद में धीरे-धीरे सूखने लगती हैं। प्रभावित पौधों की बढ़वार कम हो जाती है। उग्र अवस्‍था में पौधों का सूखना तथा पत्तियों में पीलापन आना है। यदि ग्रसित गन्‍ना फाड़ कर देखें तो अंदर के उत्‍तक व गॉंठों के पास के भाव का उत्‍तक मटमैला रंग का दिखाई देता है। रोग ग्रसित गन्‍ना खोखला हो जाता है तथा गन्‍ने के अंदर फफूंद की बढ़वार देखी जा सकती है।
नियंत्रण: स्‍वस्‍थ व रोग रहित गन्‍ने का बीज प्रयोग करें। उकठा अवरोधी किस्‍मों को उपयोग में लाये जैसे सी.ओ.जे.एन. 86-171, सी.ओ.जे.एन. 866-600, सी.ओ. 94014, सी.ओ. 94015 तथा सी.ओ. 860321 गन्‍ना बुवाई से पूर्व बीज को कार्बेन्‍डाजिम (0.1 प्रतिशत) दवा से बीजोपचार करें।
2. लाल सड़न: यह भी एक महत्‍वपूर्ण व अधिक हानि पहुंचाने वाली फफूंद बीमारी है। इस रोग का प्रभाव प्रदेश के उत्‍तर-पश्चिम भाग में ज्‍यादा पाया जाता है। यह बीमारी बीज जनक होती है। परंतु इसके पश्‍चात भूमि में तथा फसल अवशेष पर रहने लगता है। इस रोग का प्रकोप दोमट भूमि तथा अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में ज्‍यादा होता है।
कारक: यह रोग को लेटोट्रइकम फाल्‍केटम नामक फफूंद के द्वारा होता है। इस रोग का प्रसारण रोग ग्रसित फसल की पेड़ी लेने व रोग ग्रसित बीज के उपयोग से होता है।
लक्षण: इस रोग का प्रथम लक्षण फसल पर वर्षा उपरांत रोगी पौधे की ऊपरी 2-3 पत्तियों के नीचे की पत्तियॉं किनारे से पीली पड़कर सूखने लगती हैं तथा नीचे की ओर झुक जाती हैं। पत्तियों की मध्‍य शिरा पर लाल कत्‍थई रंग के धब्‍बों का दिखना तथा बाद में राख के रंग का हो जाना। धब्‍बों के बीच में फफूंद के बीजाणुओं के समूह काले बिंदु के रूप में दिखाई देते हैं। रोगी गन्‍ना फाड़ कर देने पर अंदर का पूरा उत्‍तक चमकीला लाल रंग का दिखाई देता है तथा बीच-बीच में सफेद रंग की आड़ी पट्टी दिखाई देती है। रोग ग्रस्‍त भाग से सिरका या शराब जैसी दुर्गंध आती है। रोग की उग्र अवस्‍था में गठानों के निकट काले रंग के बिंदु दिखाई देते हैं।
नियंत्रण: लाल सड़न अवरोधी व सहनशील किस्‍में जैसे सी.ओ.जे.एन. 86-141, सी.ओ. 86032, सी.ओ. पंत 84212, सी.ओ. 52101 तथा सी.ओ. 1148 को उपयोग करें। बुआई हेतु गर्म हवा से उपचारित बीज का उपयोग करें। खेत से पूर्व फसल के अवशेष को नष्‍ट करें। खेत में पानी निकास की उचित व्‍यवस्‍था करें। एक ही खेत में एक ही किस्‍म का उपयोग लगातार न करें। बीज को फफूंदनाशक दवा कार्बेन्‍डाजिम (0.1 प्रतिशत) से उपचारित करें।
3. कंडवा रोग: यह रोग संपूर्ण मध्‍यप्रदेश में पाया जाता है। यह भी एक फफूंद जनित बीज जनक रोग है। इसका प्रभाव प्रमुख फसल की अपेक्षा पेड़ी की फसल पर अधिक होता है।
कारक: यह अस्टिलागो सिटामिनिया नामक फफूंद के द्वारा होता है। इसके विषाणु गन्‍ने के बीच में मौजूद रहते हैं तथा उसके द्वारा ही इनका प्रसारण एक स्‍थान से दूसरे स्‍थान पर होता है। यह फफूंद अपना जीवन यापन रोग ग्रसित फसल के अवशेष पर भी करता है।
लक्षण: इस रोग का प्रभाव मई-जुलाई तथा अक्‍टूबर-दिसम्‍बर माह में अधिक होता है। रोगी पौधों के शिरे से काले रंग के चाबुक के आकार के समान संरचना निकलती है। काला चाबुक के आकार वाला भाग काले रंग के चूर्ण से भरा रहता है जो प्रारंभिक अवस्‍था में सफेद चमकदार झिल्‍ली से ढ़का रहता है। बाद में शुष्‍क मौसम में झिल्‍ली फट जाती है जिसके फलस्‍वरूप हजारों की संख्‍या में विषाणु वायु द्वारा स्‍वस्‍थ फसल पर गिरते हैं। रोग ग्रसित पौधों के नीचे से अनेक पतली शाखाएं निकलती हैं जिनकी पत्तियॉं छोटी, सकरी तथा गहरी हरी रहती हैं और इनके ऊपरी भाग से भी चाबुक के समान संरचना निकलती है। ग्रसित पौधे आमतौर पर पतले तथा लंब होते हैं।
नियंत्रण: कंडवा रोग अवरोधी व सहनशील जातियॉं जैसे सी.ओ.जे.एन. 86-141, सी.ओ.जे.एन. 86-572, सी.ओ.जे.एन. 86-600, सी.ओ. 94012, सी.ओ. 86032, सी.ओ. 88230 एवं सी.ओ. पंत 84212 का उपयोग करें। बुवाई पूर्व बीजोपचार कार्बेन्‍डाजिम फफूंदनाशक से 0.1 प्रतिशत की दर से करें। खेत में मौजूद पूर्व फसल के अवशेष को जलाकर नष्‍ट करें। रोग ग्रसित पौधों को खेत से निकालकर सावधानीपूर्वक जला दें। प्रमाणित एवं स्‍वस्‍थ बीज का प्रयोग करें।
4. पेड़ी का बौनापन: यह जीवाणु जनित रोग है इस रोग का प्रकोप कहीं-कहीं पेड़ी फसल पर भी दिखाई देता है।
कारक: यह रोग क्‍लेवीबैक्‍टर जाइली नामक जीवाणु से होता है।
लक्षण: रोग ग्रसित पौधों कमजोर तथा छोटा रह जाते हैं। प‍त्तियॉं सामान्‍यत: पीली तथा गन्‍ने के पोरों की लंबाई कम हो जाती है। गन्‍ने को फाड़कर देखने पर गठान के उत्‍तक नारंगी लाल या पीला नारंगी या भूरे रंग के दिखाई देते हैं।
नियंत्रण: गन्‍ने की कटाई करते समय स्‍वच्‍छ साफ धारदार चाकू का प्रयोग करें। ग्रसित फसल से बीज बुवाई हेतु न लें। फसल में पोषक तत्‍वों व पानी की कमी न होने दें। पेड़ी की फसल दो बार से ज्‍यादा न लें। बुवाई हेतु बीज को नम गर्म हवा से 4 घंटे उपचारित करें।
5. घसी या प्ररोह रोग (ग्रासी शूट): यह रोग मध्‍यप्रदेश के कई भागों में पाया जाता है। इस रोग का विपरीत प्रभाव गन्‍ने की उपज तथा शक्‍कर की मात्रा पर सीधा पड़ता है। रोग का प्रभाव जून-सितम्‍बर तक होता है।
कारक: यह रोग माइक्रोप्‍लाजमा द्वारा होता है।
लक्षण: गन्‍ने के तने घास के समान पतला तथा नीचे से एक साथ समूह में तनों का निकलना। रोगी गन्‍ना पतला पत्तियॉं हल्‍की पील से सफेद रंग की हो जाती हैं। ग्रसित गन्‍ने की गठानों की दूरी कम होती है तथा खड़े गन्‍ने से ऑंखों का अंकुरण होना इस रोग के प्रमुख लक्षण हैं।
नियंत्रण: बुवाई से पूर्व बीज को गर्म नम हवा से 4 घंटे उपचारित करें। गन्‍ना काटने का औजार स्‍वच्‍छ होना चाहिये। फसल में पोषक तत्‍वों की कमी न होने दें।
कटाई पश्‍चात प्रबंधन: गन्‍ना की खेती मुख्‍यत: शक्‍कर प्राप्‍त करने हेतु की जाती है। यदि गन्‍ने का उपयोग रस निकालने हेतु चौबिस घंटों के अंदर न किया जाये तो रस एव रस में शर्करा की मात्रा में कमी आ जाती है। इस क्षति को रोकने हेतु गन्‍ने को छाया में रखें एवं पानी का छिड़काव करें।
जड़ी फसल से भरपूर पैदावार: गन्‍ना उत्‍पादक यदि जड़ी फसल पर भी बीजू फसल की तरह ही ध्‍यान दें और बताये गये कम लागत वाले उपाय अपनायें, तो जड़ी से भरपूर पैदावार ले सकते हैं:-
समय पर गन्‍ने की कटाई: मुख्‍य फसल को समय पर काटने से पेड़ी की अधिक उपज ली जा सकती है। नवम्‍बर माह में काटे गये गन्‍ने की पेड़ी से अधिक उपज प्राप्‍त होती है। फरवरी माह में भी गन्‍ने की फसल काटने पर कल्‍ले अधिक निकलते हैं और पेड़ी की अच्‍छी उपज प्राप्‍त होती है। मार्च के बाद काटे गये गन्‍ने की पेड़ी अच्‍छी नहीं होती है।
जड़ी फसल दो बार से अधिक न लें: बीजू फसल के अलावा जड़ी फसल दो बार से अधिक न लें अन्‍यथा कीट और रोगों का प्रकोप बढ़ने से पैदावार कम हो जाती है।
गन्‍ने की कटाई सतह से करें: गन्‍ने की कटाई जमीन की सतह से करना चाहिए, जिससे कल्‍ले अधिक फूटेंगे और उपज अधिक होगी।ठूंठ अवश्‍य काटें: यदि कटाई के बाद गन्‍ने के ठूंठ रह जायें तो उनकी कटाई अवश्‍य करें नहीं तो कल्‍ले कम फूटेंगे।
गरेड़े तोड़े: सिंचाई देने के बाद खेत में बतर आने पर गरेड़ो को बाजू से हल चलायें। इससे पुरानी जड़े टूटेंगी और नई जड़ें दिये गये खाद का पूरा उपयोग करेगी।
खाली जगह भरें: खेत में खाली स्‍थान का रहना ही कम पैदावार का मुख्‍य कारण है। अत: जो जगह एक फुट से अधिक खाली हो उसमें नये गन्‍ने के टुकड़े लगाकर सिंचाई करें।
पर्याप्‍त उर्वरक दें: जड़ी का उत्‍तम उत्‍पादन लेने के लिये मुख्‍य फसल की तरह 15-20 गाड़ी सड़ी गोबर की खाद प्रति हेक्‍टेयर डालें। बीजू फसल की तरह ही जड़ी फसल में भी 300 किलोग्राम नत्रजन (650 किलो ग्राम यूरिया), 80 किलोग्राम स्‍फुर (500 किलोग्राम सिंगल सुपर फास्‍फेट), 60 किलोग्राम पोटश (100 किलोग्राम म्‍यूरेट ऑफ पोटाश) प्रति हेक्‍टेयर की दर से देना चाहिए। स्‍फुर व पोटाश की पूरी मात्रा तथा नत्रजन की आधी मात्रा गरेड़ तोड़ते समय हल की सहायता से नाली में देना चाहिये। नत्रजन की बची हुई मात्रा आखिरी मिट्टी चढ़ाते समय दें। नाली में खाद देने के बाद रिजर या देशी हल में पोटली बांध कर हल्‍की मिट्टी चढ़ायें।
सूखी पत्‍ती बिछायें: प्राय: किसान भाई कटाई के बाद सूखी पत्‍ती खेत में जला देते हैं जो भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ाने में सहायता होती है। उक्‍त सूखी प‍त्तियां जलायें नहीं उन्‍हें गरेड़ों में बिछा दें। इससे खेत से पानी का भाप बनकर उड़ने में कमी आती है। सूखी पत्तियॉं बिछाने के बाद 1.5 प्रतिशत क्‍लोरपायरीफॉस या 1.3 प्रतिशत लिंडेन का प्रति हेक्‍टेयर दवा का भुरकाव करें।
पौध संरक्षण अपनायें: कटे हुये ठूंठों पर कार्बेन्‍डाजिम 500 ग्राम मात्रा 250 लीटर पानी में घोलकर झारे की सहायता से ठूंठों के कटे हुये भाग पर छिड़कें।
उपयुक्‍त जातियॉं: जड़ी की अधिक पैदावार लेने हेतु उन्‍नत जातियॉं जैसे को. 7318, को. 6304 तथा को. 86033 का चुनाव करें।

कपास

कपास
कपास रेशे वाली औद्योगिक एवं उपयोगी फसल है। कपास की खेती मध्‍यप्रदेश में लगभग 6 लाख हेक्‍टेयर भूमि में की जाती है। सिंचित कपास का रकबा लगभग 1 लाख हेक्‍टेयर है। प्रदेश में देशी तथा अमेरिकन दोनों प्रकार की कपास की खेती होती है। देशी कपास का उत्‍पादन मुख्‍यत: हल्‍की भूमि वाले क्षेत्रों में किया जाता है। देशी कपास का क्षेत्र लगभग 1 लाख हेक्‍टेयर है। मध्‍य प्रदेश में कपास का उत्‍पादन लगभग 15-16 लाख गॉंठ (370 किलोग्राम प्रति गॉंठ) है।
उपयुक्‍त क्षेत्र: मध्‍य प्रदेश में कपास की खेती के लिये निम्‍नलिखित क्षेत्र उपयुक्‍त पाये गये हैं।
(अ) निमाड़ क्षेत्र: औसत वर्षा लगभग 600 से 800 मिली मीटर, भूमि मध्‍यम, हल्‍की काली एवं अच्‍छे निथार वाली है। इसमें नत्रजन कम एवं स्‍फुर तथा पोटाश मध्‍यम मात्रा में पाये जाते हैं। इसके अंतर्गत खरगोन, खंडवा तथा धार जिले के कुक्षी तथा मनावर क्षेत्र आते हैं।
(ब) मालवा क्षेत्र: क्षेत्रफल करीब 50 हजार हेक्‍टेयर- वर्षा 1000 से 1500 मिली मीटर, मिट्टी मध्‍यम तथा गहरी, नत्रजन की कमी, स्‍फुर तथा पोटाश प्रचुर मात्रा में है। इनमें इंदौर, देवास, धार (कुक्षी) तथा मनावर छोड़कर उज्‍जैन, शाजापुर, रतलाम, राजगढ़, सीहोर जिले आते हैं।
(स) नर्मदा घाटी: क्षेत्रफल करीब 5 हजार हेक्‍टेयर। यह पूरा क्षेत्र पश्चिमी होशंगाबाद तथा हरदा जिले में आता है। वर्षा 1200 मि.मी. तथा भूमि मध्‍यम काली और रेतीली मटियार है।
(द) सतपुड़ा क्षेत्र: क्षेत्रफल करीब 25 हजार हेक्‍टेयर। इस क्षेत्र में सांसर, पाण्‍डुरना, छिंदवाड़ा तथा भेसदही और मुलताई, बैतूल आते हैं। वर्षा 1000-1200 मि.ली. होती है। भूमि हल्‍की तथा मध्‍यम काली हैं।
(ई) झाबुआ क्षेत्र: इसमें झाबुआ जिले के पेटलावद, अलीराजपुर आदि क्षेत्र हैं। कुल रकबा लगभग 20 हजार हेक्‍टेयर है।
भूमि का चुनाव: बालुई, दोमट या मध्‍यम गहरी भूमि जिसमें पर्याप्‍त जीवांश एवं उत्‍तम निकास हो, कपास की फसल के लिये उपयुक्‍त है। भूमि का पी.एच. मान 6.5 से 7.5 बीच होना चाहिये।
भूमि की तैयारी: फसल के पुराने अवशेष निकाल कर खेत की अच्‍छी सफाई करें। खेत की मिट्टी देशी हल अथवा कल्‍टीवेटर चलाकर पलट दें। तीन साल में एक बार मिट्टी पलटने वाले हल से खेत की गहरी जुताई करना आवश्‍यक है। मानसून से पहले बखर या कल्‍टीवेटर से 2-3 बार जुताई कर खेत समतल करें। अंतिम बखरनी से पूर्व 40-45 गाड़ी पका हुआ गोबर खाद या कम्‍पोस्‍ट प्रति हेक्‍टेयर की दर से मिलायें। तीन वर्ष में एक बार जिंक सल्‍फेट, 25 किलो ग्राम प्रति हेक्‍टेयर की दर से गोबर खाद में मिलाकर दें।
अनुशंसित जातियॉं:
क्षेत्र
उपयुक्‍त जातियॉं
निमाड़ घाटी
खंडवा-2, जवाहर ताप्‍ती, जे.के.-4, विक्रम, एल.आर.ए.-5166, हाइब्रिड- जे.के.एच.-1, जे.के.एच.-2 एवं जवाहर प्रकाश
मालवा का पठार
विक्रम, जवार ताप्‍ती, हाइब्रि‍ड-संकर-8, जे.के.एच.-1, जे.के.एच.-2 एवं जवाहर आकाश
नर्मदा घाटी
जे.के.-4, जवाहर ताप्‍ती, हाइब्रिड-एन.एच.एच.-44, जे.के.एच.-2 एवं जवाहर आकाश
सतपुड़ा का पठार
जे.के.-4, जवाहर ताप्‍ती, एल.आर.ए.-5166, हाइब्रिड-जे.के.एच.-2, संकर-8, संकर-10 एवं एन.एच.एच.-44

बीज की मात्रा:
सिंचाई की सुविधा
बीज की मात्रा, किलोग्राम प्रति हेक्‍टेयर

अमेरिकन कपास
देशी कपास
संकर कपास
सिंचित/अर्द्धसिंचित
4-6
6-8
2.5-4.0
असिंचित
6-8
8-10
3.0-5.0

बोनी का समय: सिंचित क्षेत्र में पलेवा देकर कपास की बोनी 25 मई से जून के प्रथम सप्‍ताह तक करें। असिंचित कपास की बोनी वर्षा प्रारंभ होने से एक सप्‍ताह पूर्व सूखे में या वर्षा प्रारंभ होने पर सरता या चौफुली पद्धति से करें।
बीजोपचार: बोने से पूर्व बीज को प्रति किलोग्राम 2.5 ग्राम कार्बेन्‍डाजिम या केप्‍टान दवा से उपचारित करें। इमिडा क्‍लोप्रिड 7.0 ग्राम अथवा कार्बोराल्‍फान 20 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज उपचारित कर बोने से फसल को 40 से 60 दिन तक रस चूसक कीड़ों से सुरक्षा मिलती है।
बोआई विधि: संकर कपास 90 X 90 सेमी. या 120 X 90 सेमी. की दूरी पर लगाएं तथा उन्‍नत जातियों के लिए 60 X 60 सेमी. की दूरी सामान्‍यत: रखें। हल्‍की भूमि में यह दूरी 45 X 45 अथवा 45 X 30 सेमी. रखी जा सकती है।
खाद एवं उर्वरक:
(अ) जीवांश खाद: गोबर की खाद, कम्‍पोस्‍ट/नाडेप कम्‍पोस्‍ट 40-45 गाड़ी प्रति हेक्‍टेयर, नीम की खली 25-30 किलोग्राम प्रति हेक्‍टेयर डालें।
(ब) रासायनिक उर्वरक: संतुलित मात्रा में रासायनिक उर्वरकों का उपयोग आवश्‍यक है। निम्‍न मात्रा (किलोग्राम प्रति हेक्‍टेयर) में उर्वरकों का उपयोग करना चाहिए:
1. सिंचित 160 नत्रजन : 80 स्‍फुर : 40 पोटाश
2. अर्द्धसिंचित 100 नत्रजन : 60 स्‍फुर : 40 पोटाश
3. असिंचित 80 नत्रजन : 40 स्‍फुर : 40 पोटाश
उर्वरक देने का समय
उर्वरक की मात्रा (प्रतिशत में)

सिंचित असिंचित

नत्रजन
फास्‍फोरस
पोटाश
नत्रजन
फास्‍फोरस
पोटाश
1. बोनी के समय
10%
50%
50%
33%
50%
50%
2. अंकुरण के 1 माह बाद
25%
-
-
33%
-
-
3. अंकुरण 2 माह बाद
25%
50%
50%
33%
50%
50%
4. अंकुरण के 3 माह बाद
24%
-
-
-
-
-
5. अंकुरण के 4 माह बाद
15%
-
-
-
-
-

बोनी के समय खाद बीज के नीचे 6-10 सेमी. गहराई पर दें। अंकुरण के 60-65 दिन बाद पौधे के पास रिंग पद्धति अथवा कॉलम पद्धति से (गड्डे बनाकर) उर्वरक दें।
कपास के साथ उड़द, सोयाबीन, मूंगफली की अंतरवर्ती फसल लाभप्रद पाई गई है। इसे कतार छोड़ कतार जोड़ पद्धति से लगाएं। इसके अतिरिक्‍त संकर मक्‍का या तिल की अंतरवर्ती फसल लेना लाभकारी पाया गया है।
(क) कपास की हर 2 कतार के बाद दो कतार अंतरवर्ती फसल लगाएं। सिंचित में अंतरवर्ती फसल की कतारें 45 सेमी. तथा असिंचित में 30 सेमी. दूरी पर लगाएं।
(ख) कपास की हर 6-8 कतारों के बाद अरहर की दो कतारें लगाना लाभप्रद रहता है।
जीवित बिछावन: असिंचित कपास में कतारों के बीच, उड़द, मूंग, सोयाबीन अथवा फ्रेंचबीन 30-35 किलोग्राम प्रति हेक्‍टेयर की बीज दर से लगाएं। इसे अंकुरण के 25 दिन बाद खेत में मिला दें। इससे खेत की नमी काफी दिनों तक बनी रहती है एवं भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ती है।
सिंचाई: वर्षा समाप्‍त होने पर हल्‍की भूमि में 12-15 दिन तथा मध्‍यम-भारी भूमि में 25-35 दिन के अंतराल पर आवश्‍यकतानुसार सिंचाई करें। कली एवं फूल बहार के समय नमी की आवश्‍यकता अधिक होती है। प्रत्‍येक बार एक कतार छोड़ कर सिंचाई करें।
खरपतवार नियंत्रण: अंकुरण के 20-25 दिन पश्‍चात हाथ से निंदाई कर कोल्‍पा- डोरा चलाएं। वर्षा के बीच समय मिलने पर डोरा चलाएं तथा हाथ से निंदाई करते रहें।
नींदा नाशक रसायन लासो (ऐलाक्‍लोर) 5 लीटर या पेंडीमिथिलीन 5 किग्रा. या डाययूरान 750 ग्राम सक्रिय तत्‍व प्रति हेक्‍टेयर के मान से 500-600 लीटर पानी में घोल कर बोआई के बाद एवं अंकुरण से पहले छिड़काव करें। दवा के प्रयोग के समय खेत में पर्याप्‍त नमी होना चाहिए।
कपास की चुनाई:
अ. केवल पूरी तरह खिले घेटों से कपास की चुनाई करें।
ब. गीले कपास की चुनाई न करें। ओस सूखने के बाद दिन में कपास की चुनाई करें।
स. चुने हुए कपास में पेड़ के सूखे पत्‍ते, डंठल, मिट्टी आदि रहने पर कपास की गुणवत्‍ता कम हो जाती है तथा बाजार भाव कम मिलता है।
ड. आखिरी तुड़ाई का कपास पहले की चुनाई में ना मिलाएं।
पौध संरक्षण:
(अ) कीट: कपास में मुख्‍यत: दो प्रकार के कीटों का प्रकोप देखा गया है।
1. रस चूसने वाले कीट: हरा मच्‍छर, माहो, तेला एवं सफेद मक्‍खी। इन कीटों का प्रकोप जुलाई से सितम्‍बर के मध्‍य प्राय: होता है। प्रकोपित पौधे की पत्तियां लाल व सिकुड़ जाती हैं, फलस्‍वरूप पौधों की बढ़वार बहुत कम होती है।
2. डेडूं छेदक इल्लियॉं: इनमें मुख्‍यत: चित्‍तीदार इल्‍ली, चने की इल्‍ली (अमेरिकन बालवर्म) एवं गुलाबी इल्‍ली है।
(अ) चित्‍तीदार इल्‍ली: इस इल्‍ली का प्रकोप फसल अंकुरण से 15-20 दिन की अवस्‍था पर एवं डेंडू बनने पर होता है। प्रकोप अगस्‍त से सितम्‍बर माह के मध्‍य अधिक होता है।
(ब) अमेरिकन बालवर्म: फूल अवस्‍था पर इसका प्रकोप शुरू होता है। प्रकोपित पुडि़यों के सहपत्र चौड़े होकर फैल जाते हैं व डेंडूओं में खुले बड़े छेद पाये जाते हैं। इन इल्लियों का प्रकोप अगस्‍त-सितम्‍बर से अक्‍टूबर-नवम्‍बर तक होता है।
(स) गुलाबी इल्‍ली: मालवा एवं निमाड़ में इस कीट का प्रकोप कम होता है। इल्‍ली फूलों की पंखुडि़यों को जाले से लपेट कर फिरकनी का आकार बना लेती है।
नियंत्रण:
1. फसल कटाई उपरांत अवशेषों को नष्‍ट करें।
2. ग्रीष्‍मकालीन मिण्‍डी की फसल को अप्रैल में समाप्‍त करें।
3. बोनी वर्षा आगमन के पूर्व सूखे खेतों में या वर्षा के तुरंत बाद करें।
4. कपास के साथ चौला अन्‍तरवर्तीय फसल के रूप में लें।
5. रस चूसने वाले कीट सहनशील प्रजातियां- खण्‍डवा’2, जे.के.-4, ताप्‍ती, जे.के.एच.वायु-1 लगायें।
6. बीजोपचार इमिडाक्‍लोप्रिड 7 ग्राम/प्रति किलोग्राम बीज के हिसाब से करें।
7. रस चूषक कीटों के प्रति सहनशील किस्‍मों को लगावें तथा दो माह तक कीटनाशकों का छिड़काव न करें।
8. आवश्‍यतानुसार 5% निम्‍बोली का रस एवं नीम का तेल एक लीटर प्रति हेक्‍टेयर की दर से छिड़काव करें।9. फसल की 60-90 दिन की अवस्‍था के दौरान (यदि 40 पौधों में से 20 पौधों की फूल पुडियों कीट/प्रकोपित हैं व सहपत्र चौड़े हैं) तब ट्रायकोगामा 1.5 लाख अंडे प्रति हेक्‍टेयर की दर से या एन.पी.व्‍ही. 250 लीटर प्रति हेक्‍टेयर अथवा इण्‍डोसल्‍फान दवा का छिड़काव करें।
10. फसल की उपरोक्‍त अवस्‍था पर आर्गेनोफास्‍फेट्स या पायरेथ्राइड्स दवा का छिड़काव नहीं करें।
11. छिड़काव के 2-3 दिन बाद शेष बची हुई इल्लियों को एकत्रित कर नष्‍ट करें।
12. अक्‍टूबर के द्वितीय सप्‍ताह के बाद इण्‍डोसल्‍फान का छिड़काव नहीं करें।
13. निर्धारित आर्थिक क्षति स्‍तर, ई.टी.एल. (20 लार्वा प्रति 20 पौधे) होने पर क्‍यूनालफास अथवा क्‍लोरपयारीफास या प्रोफेनोफास 20-25 मि.ली. प्रति लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें।
14. फेरोमोन्‍स ट्रेप 5 प्रति हेक्‍टेयर गुलाबी इल्‍ली (पिंक बालवर्म) के लिये उपयोग करें।
15. विलम्‍ब से आने वाले अमेरिकन बालवर्म एवं पिंक बालवर्म का प्रकोप फसल की 30-120 दिन की अवस्‍था पर होता है। इसके नियंत्रण के हेतु पायरेथ्राइड्स का उपयोग सेसेमम ऑयल (1 लीटर प्रति हेक्‍टेयर) के साथ प्रभावशाली पाया गया है।
16. दो या तीन दवाओं को एक साथ मिलाकर न छिड़कें।
17. एक ही प्रकार की दवा का लगातार उपयोग नहीं करें।
(ब) रोग: बीज को अम्‍ल उपचारित करने के बाद बोते समय स्‍ट्रेप्‍टोसायक्लिन के 200 पी.पी.एम. घोल में 20 मिनट तक डुबोये। जीवाणु झुलसा रोग की रोकथाम हेतु फसल (विशेषकर हाइब्रिड-4, डी.सी.एच.-32) पर फायटोलान या ब्‍लायटाक्‍स 50 एक किलो ग्राम + स्‍ट्रेप्‍टोसायक्लिन 6 ग्राम प्रति एकड़ का 15 दिन के अंतर पर छिड़काव करें। रोग रोधी संकर किस्‍में जे.के.एच.-1 तथा जे.के.एच.-2 का चयन करें। इन्‍हीं दवाओं के प्रयोग से आल्‍टनेरिया, माइरीधीसियम पर्ण झुलसा तथा डेंटू सड़न एवं दाहिया (रेमूलेरिया) रोग का भी नियंत्रण हो जाता है। जड़ सड़न रोग की रोकथाम हेतु केप्‍टान 3 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज के मान से उपचार करें तथा कपास के साथ मोठ एवं मूंग की अंतरवर्तीय फसल लगायें। पौधे सूखने (नई विल्‍ट) की समस्‍या के निदान के लिये मुरझाते हुये पौधों की जड़ों में डी.ए.पी. + यूरिया के घोल का 3-4 लीटर प्रति पौधा दें। 100 लीटर घोल के लिये 1200 ग्राम डी.ए.पी. तथा 600 ग्राम यूरिया पर्याप्‍त होगा।
आवश्‍यक सुझाव:
1. क्षेत्र के अनुसार सिफारिश की गई किस्‍म लगाएं।
2. बीजोपचार कर सही विधि से उचित समय पर बोनी करें।
3. विभिन्‍न रासायनिक उर्वरक उचित मात्रा में सही विधि से उचित समय पर दें।
4. ऐजेटोबेक्‍टर एवं पी.एस.बी. कल्‍चर का उपयोग करें।
5. खरपतवार नियंत्रण एवं पौध संरक्षण तकनीक अपनाएं।
6. असिंचित कपास की फसल के बीच जीवित बिछावन का उपयोग कर खेत में अधिक समय तक नमी बनाएं रखें।

मिट्टी गुणवत्‍ता की जॉच

मिट्टी गुणवत्‍ता की जॉच
अर्थात
मिट्टी – परीक्षण
क्‍यों – कब – कैसे ?
महत्‍व – जिस प्रकार मनुष्‍य एवं जानवरों को संतुलित आहार की आवश्‍यकता होती है, उसी प्रकार फसलों के लिये भी संतुलित आहार ( पोषक तत्‍वों) की आवश्‍यकता होती है। अत्‍यधिक एवं असंतुलित उर्वरकों तथा कृषि रसायनों के प्रयोग से खेत की मिट्रृटी मृत हो रही है या दिनों दिन उत्‍पादन क्षमता घट रही है। जिन क्षेत्रों में अधिक उपज वाली उन्‍नत, संशोधित (रिसर्च) एवं संकर किस्‍में उगाई जाती है वहॉं मिट्टी में आवश्‍यक पोषक तत्‍वों की कमी बहुत तेजी से होती है। अत: भरपूर उत्‍पादन लेने के लिए खेत की मिट्टी में उपलब्‍ध तत्‍वों की मात्रा एवं मिट्टी में स्‍वस्‍थ्‍य जानने के लिए मिट्टी परीक्षण (जॉंच) करना आवश्‍यक हो जाता है-
मिट्टी की जॉंच आवश्‍यक क्‍यों ?
(1) फसलों से अधिक उपज लेने के लिये यह जानना जरूरी हो जाता है कि मिट्टी में कौन-कौन से पोषक तत्‍व कितनी मात्रा में उपलब्‍ध हैं।
(2) फसल के अनुरूप जैविक खाद, उर्वरकों की मात्रा निर्धारण के लिये
(3) खेत की मिट्टी कौन-कौन से फसल के लिये उपयुक्‍त है।
(4) मिट्टी की अम्‍लीयता, क्षारीयता (पी.एच.) विद्युत चालकता का स्‍तर जानने के लिए।
(5) लक्षित उत्‍पादन प्राप्‍त करने एवं उर्वरकों की उपयोगिता क्षमता में वृद्धि के लिये।
(6) समस्‍याग्रस्‍त, अम्‍लीय, क्षारीय, ऊसर मिट्टी के सुधार हेतु।
(1) कृषि विभाग, कृषि वि.वि.एवं कृषि तकनीकी संस्‍थाओं द्वारा फसलों, सब्जियों, फलों, औषधीय पौधों की खेती के लिये की गई पोषक तत्‍वों की अनुसंशित मात्रा के निर्धारण के लिये।
मिट्टी का नमूना कब लें ?
गर्मियों में रबी फसल की कटाई के बाद से लेकर खरीफ की बुवाई के पहले त‍क।
जहां लगातार पूरे वर्ष फसलें ली जाती है वहां कटाई के तुरंत बाद।
बहुवर्षीय/खड़ी फसल में पौधों की कतार के बीच से मिट्टी का नमूना लें।
मिट्टी नमूना लेने के लिए सामग्री
खुरपी या आगर, तसला या प्‍लास्टिक की साफ बाल्‍टी, एक किग्रा. की दो पॉलीथीन, धागा, सादा कागज, साफ पुराना अखबार।
सावधानियॉं - किसान भाइयों मिट्टी नमूना लेने के पहले निम्रलिखित सुझावों पर अवश्‍य ध्‍यान दें-
1. वृक्ष और देशी खाद के ढेर के नीचे की मिट्टी न ले।
1.
2. खेत के कोनों एवं मेड़ से एक मीटर अंदर के ओर की मिट्टी न लें।
2.
3. अधिकतर समय पानी भरे रहने वाले एवं नाली के पास के स्‍थान से मिट्टी न लें।
3.
4. खेत की मिट्टी यदि अलग – अलग है तो नमूना की मिट्टी अलग –लगग लें।
5. उर्वरक, खाद, नमक की बोरी के ऊपर मिट्टी नमूना न सुखवायें।
6. खेत की मिट्टी में स्‍वाभाविक रूप से पाये जाने वाले कंकड़ आदि अलग न करें।
7. मिट्टी नमूना रखने के लिए नई एवं साफ पॉलीथीन का प्रयोग करें।
8. यदि खेत ऊंचहन, निचहन है और फसल अलग- अलग बोते हैं तो मिट्टी का नमूना अलग – अलग लें।
9. चाही गई जानकारी नमूना पत्रक में भरकर मिट्टी के साथ अवश्‍य भेजें।
10. नमूना पत्रक उपलब्‍ध न होने पर सादे कागज में नाम, पता, रकबा, खेत निशानी, सिंचाई स्‍त्रोत, असिंचित, ली गई फसल, प्रस्‍तावित अगली फसल दिनांक, अन्‍य संबंधित जानकारी लिखकर मिट्टी नमूना के साथ भेजें।
11. अधिकतम एक हेक्‍टेयर क्षेत्रफल तक के खेत से एक नमूना लें।
मिट्टी का नमूना कैसे लें (तरीका) ?

जिस खेत में मिट्टी लेना हो उसमें अनिश्चित आधार पर दस से बारह बिंदुओं/जगहों का चुनाव करें।
चुने गये बिंदुओं/स्‍थानों की उपरी एक-दो सेमी. सतह साफ करके घास, पत्‍थर, कचड़ा आदि हटा दें।
खुरपी की सहायता से चुने गये स्‍थानों में व्‍ही आकार का 6 – 8 इंच गहरा काट लगाकर तसला या बाल्‍टी में रखते जायें।
खेत से लायी गई मिट्टी को साफ फर्श के ऊपर अखबार में बिछाकर छाया में सुखा लें।
अब मिट्टी से घास, गोबर, पत्‍थर के टुकडे फसल अवशेष निकालकर फेंक दें व मिट्टी को भुरभुरी बना लें।
अब मिट्टी के ढेर को लगभग 3 इंच की मोटाई में गोलाकार रूप देकर सीधी रेखा चार बराबर भागों में बॉटकर आमने- सामने की दो भाग मिट्टी हटा दें। शेष दो भाग को मिलाकर इसे भी चार भागों में बॉटकर दो आमने – सामने के भाग अलग करें। ऐसा तब कि करें जब कि कि शेष दो भाग की मिट्टी (500 ग्राम) आधा किलोग्राम के लगभग हो जाये।
साफ पॉलीथीन में शेष आधा किलोग्राम मिटटी भरकर धागा से बांध दें।
दूसरी नई पॉलीथीन में मिट्टी वाली पॉलीथीन, जानकारी सहित नमूना पत्रक रखकर धागा से पॉलीथीन को बॉंध दें।
अब आपका यह मिट्टी नमूना जांच के लिए तैयार है।
जल्‍दी से जल्‍दी मिट्टी नमूना
कृषि विभाग कृषि विस्‍तार अधिकारी के द्वारा
कृषि विज्ञान केन्‍द्र शहडोल स्थित मिट्टी परीक्षण प्रयोगशाला में जांच के लिये भेजे।

अनमोल जैविक खाद

अनमोल जैविक खाद
वर्मीकम्‍पोस्‍ट (केंचुआ खाद)
मिट्टी की उर्वरता एवं उत्‍पादकता को लंबे समय तक बनाये रखने में पोषक तत्‍वों के संतुलन का विशेष योगदान है, जिसके लिए फसल मृदा तथा पौध पोषक तत्‍वों का संतुलन बनाये रखने में हर प्रकार के जैविक अवयवों जैसे- फसल अवशेष, गोबर की खाद, कम्‍पोस्‍ट, हरी खाद, जीवाणु खाद इत्‍यादि की अनुशंसा की जाती है वर्मी कम्‍पोस्‍ट उत्‍पादन के लिए केंचुओं को विशेष प्रकार के गडढों में तैयार किया जाता है तथा इन केचुओं के माध्‍यम से अनुपयोगी जैविक वानस्पितिक जीवांशो को अल्‍प अवधि में मूल्‍याकन जैविक खाद का निर्माण करके, इसके उपयोग से मृदा के स्‍वास्‍थ्‍य में आशातीत सुधार होता है एवं मृदा की उर्वरा शक्ति बढ़ती है जिससे फसल उत्‍पादन में स्थिरता के साथ गुणात्‍मक सुधार होता है इस प्रकार केंचुओं के माध्‍यम से जो जैविक खाद बनायी जाती है उसे वर्मी कम्‍पोस्‍ट कहते हैं। वर्मी कम्‍पोस्‍ट में नत्रजन फास्‍फोरस एवं पोटाश के अतिरिक्‍त में विभिन्‍न प्रकार सूक्ष्‍म पोषक तत्‍व भी पाये जाते हैं।
वर्मी कम्‍पोस्‍ट के लाभ
(1) जैविक खाद होने के कारण वर्मीकम्‍पोस्‍ट में लाभदायक सूक्ष्‍म जीवाणुओं की क्रियाशीलता अधिक होती है जो भूमि में रहने वाले सूक्ष्‍म जीवों के लिये लाभदायक एवं उत्‍प्रेरक का कार्य करते हैं।
(2) वर्मीकम्‍पोस्‍ट में उपस्थित पौध पोषक तत्‍व पौधों को आसानी से उपलब्‍ध हो जाते हैं।
(2)
(3) वर्मीकम्‍पोस्‍ट के प्रयोग से मृदा की जैविक क्रियाओं में बढ़ोतरी होती है।
(4) वर्मीकम्‍पोस्‍ट के प्रयोग से मृदा में जीवांश पदार्थ (हयूमस) की वृद्धि होती है, जिससे मृदा संरचना, वायु संचार तथा की जल धारण क्षमता बढ़ने के साथ-साथ भूमि उर्वरा शक्ति में वृद्धि होती है।
(5) वर्मीकम्‍पोस्‍ट के माध्‍यम से अपशिष्‍ट पदार्थो या जैव उपघटित कूड़े-कचरे का पुन: चक्रण (Recycling) आसानी से हो जाता है।
(6) वर्मीकम्‍पोस्‍ट जैविक खाद होने के कारण इससे उत्‍पादित गुणात्‍मक कृषि उत्‍पादों का मूल्‍य अधिक मिलता है।
वर्मीकम्‍पोस्‍ट उत्‍पादन के लिए आवश्‍यक अवयव
(1) केंचुओं का चुनाव – एपीजीक या सतह पर निर्वाह करने वाले केंचुए जो प्राय: भूरे लाल रंग के एवं छोटे आकार के होते है, जो कि अधिक मात्रा में कार्बनिक पदार्थो को विघटित करते है।
(2) नमी की मात्रा – केंचुओं की अधिक बढवार एवं त्‍वरित प्रजनन के लिए 30 से 35 प्रतिशत नमी होना अति आवश्‍यक है।
(3) वायु – केंचुओं की अच्‍छी बढ़वार के‍ लिए उचित वातायन तथा गड्ढे की गहराई ज्‍यादा नहीं होनी चाहिए।
(4) अंधेरा – केंचुए सामान्‍यत: अंधेरे में रहना पसंद करते हैं अत: केचुओं के गड्ढों के ऊपर बोरी अथवा छप्‍पर युक्‍त छाया या मचान की व्‍यवस्‍था होनी चाहिए।
(5) पोषक पदार्थ – इसके लिए ऊपर बताये गये अपघटित कूड़े-कचरे एवं गोबर की उचित व्‍यवस्‍था होनी चाहिए।
केंचुओं में प्रजनन – उपयुक्‍त तापमान, नमी खाद्य पदार्थ होने पर केंचुए प्राय: 4 सप्‍ताह में वयस्‍क होकर प्रजनन करने लायक बन जाते है। व्‍यस्‍क केंचुआ एक सप्‍ताह में 2-3 कोकून देने लगता है एवं एक कोकून में 3-4 अण्‍डे होते हैं। इस प्राकर एक प्रजनक केंचुए से प्रथम 6 माह में ही लगभग 250 केंचुए पैदा होते है।
वर्मीकम्‍पोस्‍ट के लिए केंचुए की मुख्‍य किस्‍में-
(1) आइसीनिया फोटिडा
(2) यूड्रिलस यूजीनिया
(2)
(3) पेरियोनेक्‍स एक्‍जकेटस
गड्ढ़े का आकार – (40’x3’x1’) 120 घन फिट आकार के गढ्ढे से एक वर्ष में लगभग चार टन वर्मीकम्‍पोस्‍ट प्राप्‍त होती है। तेज धूप व लू आदि से केंचुओं को बचाने के लिए दिन में एक- दो बाद छप्‍परों पर पानी का छिड़काव करते रहे ताकि अंदर उचित तापक्रम एवं नमी बनी रहे।
वर्मी कम्‍पोस्‍ट बनाने की विधि- उपरोक्‍त आकार के गड्ढों को ढंकने के‍ लिए 4 -5 फिट ऊंचाई वाले छप्‍पर की व्‍यवस्‍था करें, (जिसके ढंकने के लिए पूआल/ टाट बोरा आदि का प्रयोग किया जाता है) ताकि तेज धूप, वर्षा व लू आदि से बचाव हो सके। गड्ढे में सबसे नीचे ईटो के टुकडो छोटे पत्‍थरों व मिट्टी 1-3 इंच मोटी त‍ह मिछाएं।
गड्ढा भरना – सबसे पहले दो-तीन इंच मोटी मक्‍का, ज्‍वार या गन्‍ना इत्‍यादि के अवशेषों की परत बिछाएं। इसके ऊपर दो- ढाई इंच मोटी आंशिक रूप के पके गोबर की परत बिछाएं एवं इसके ऊपर दो इंच मोटी वर्मी कम्‍पोस्‍ट जिसमें उचित मात्रा कोकुन (केचुए के अण्‍डे) एवं वयस्‍क केंचुए हो, इसके बाद 4-6 इंच मोटी घास की पत्तियां, फसलों के अवशेष एवं गोबर का मिश्रण बिछाएं और सबसे ऊपर गड्ढे को बोरी या टाट आदि से ढक कर रखें। मौसम के अनुसार गड्ढों पर पानी का छिड़काव करते रहें। इस दौरान गड्ढे में उपस्थित केंचुए इन कार्बनिक पदार्थो को खाकर कास्टिंग के रूप में निकालते हुए केंचुएं कड्रढे को ऊपरी सतह पर आने लगते है। इस प्रक्रिया में 3-4 माह का समय लगता है। गड्ढे की ऊपरी सतह का कालो होना वर्मी कम्‍पोस्‍ट के तैयार होने का संकेत देता है। इसी प्रकार दूसरी बार गड्ढा भरने पर कम्‍पोस्‍ट 2-3 महीनों में तैयार होने लगती है।
उपयोग विधि – वर्मी कम्‍पोस्‍ट तैयार होने के बाद इसे खुली जगह पर ढेर बनाकर छाया में सूखने देना चाहिए परन्‍तु इस बात का ध्‍यान रहे कि उसमें नमी बने। इसमें उपस्थित केंचुए नीचे की सतह पर एकत्रित हो जाते है। जिसका प्रयोग मदर कल्‍चर के रूप में दूसरे गड्ढे में डालने के लिए किया जा सकता है। सूखने के पश्‍चात वर्मीकम्‍पोस्‍ट का उपयोग अन्‍य खादों की तरह बुवाई के पहले खेत/वृक्ष के थालों में किया जाना चाहिए। फलदार वृक्ष – बड़े फलदार वृक्षों के लिए पेड़ के थालों में 3-5 किलो वर्मीकम्‍पोस्‍ट मिलाएं एवं गोबर तथा फसल अवशेष इत्‍यादि डालकर उचित नमी की व्‍यवस्‍था करें।
सब्‍जी वाली फसलें- 2-3 टन प्रति एकड़ की दर वर्मीकम्‍पोस्‍ट खेत में डालकर रोपाई या बुवाई करें।
मुख्‍य फसलें – सामान्‍य फसलों के लिए भी 2-3 टन वर्मी कम्‍पोस्‍ट उपयोग बुवाई के पूर्व करें।

जैव उर्वकर

जैव उर्वकर
(खेती के लिए एक अनिवार्य अदान-प्रदान)
परिचय- पोषण भोजन सजीवों की प्राथमिक आवश्‍यकता है जो पौधों की वृद्धि एवं विकास में सहायक है, जिसमें सभी तत्‍वों का आवश्‍यक एवं संतुलित मात्रा में होना अति आवश्‍यक है, पौधो के लिए मुख्‍यत: हवा पानी भूमि तथा उर्वरकों से प्राप्‍त होते है। पोषक तत्‍वों को पौधों की प्राय अवस्‍था में बदलने का कार्य सूक्ष्‍म जीवों द्वारा किया जाता है। ये सूक्ष्‍म जीव ही जैव उर्वरकों के नाम से जाने जाते है, जो भोजन की पूर्ति के साथ-साथ फसल को कई प्रकार से लाभान्वित करते है जैसे पादप क्रियाओं में वृद्धि पौधों के लिए विटामिन्‍स तथा हारमोन्‍स का निर्माण तथा उनका क्रियान्‍वयन, एन्‍टीबायोटिक व रोग निरोधक क्षमता का निर्माण तथा पौधों के जड़ भाग में नमी का संरक्षण कर अन्‍य कई प्रकार सो पौधों को सुरक्षा प्रदान करते हुए मृदा की उर्वरता को लम्‍बे समय उपजाऊ बनाने में सहायक है। अत: जैव उर्वरक भूमि की लम्‍बी आयु के द्योतक है।
मुख्‍य जैव उर्वरक एवं उनकी कार्य क्षमता
राइजोबियम- यह सिर्फ दलहनों में नत्रजन का स्‍थरीकरण करता है।
एजैटोबैक्‍टर- यह नत्रजन स्‍थरीकरण व पादप क्रियाओं को तेज करता है।
एजोस्पिरिलियम- सभी गैर दलहन एवं दलहनों में भी उपयोगी।
एसीटोबैक्‍टर- गन्‍ने की फसल में नत्रजन की पूर्ति करता है।
पी.एस.बी.कल्‍चर- यह फसलों फास्‍फोरस की उपलब्‍धता बढ़ाता है।
वैम माइकोराइजा- यह सभी पोषक तत्‍वों की उपलब्‍धता बढ़ाते हैं।
एजोला- यह धान में नत्रजन की पूर्ति तथा मृदा उर्वरता को बढ़ाता है।
बी.जी.ए- यह धान में नत्रजन की पूर्ति करता है।
कम्‍पोस्‍ट डिकम्‍पोजर- यह कल्‍चर से कम्‍पोस्‍ट खाद कम समय में तैयार हो जाती है।
रोग बायोकल्‍ट्रोलर – ये रोग व कीट लार्वो से पादक सुरक्षा प्रदान करते है।
प्‍लान्‍ट राइजोबैक्टिरिया- ये लाभदायक सूक्ष्‍म जीव जो फसल वृद्धि एवं विकास में कई पकार से लाभदायक है।
राइजोबियम – यह जीवाणु सभी दलहन फसलों के जड़ भाग में ग्रंथि का निर्माण कर दलहन फसलों की 80-90 प्रतिशत नत्रजन मांग की पूर्ति करता है। जिसे बीजोपचार द्वारा 10 से 12 किलो बीज में एक राइजोबियम 200 ग्राम के पैकिट को एक गिलास पानी या चावल के माड़ में लेही बनाकर बाजो में मिलाया जाता है। तथा सभी दलहनों के लिए अलग- अलग विशेष राइजोबियम कल्‍चर का प्रयोग होता है।
एजैटोबैक्‍टर – यह जीवाणु कल्‍चर सभी फसलों के लिए नत्रजन की 15 से 35 किलो प्रति हेक्‍टेयर तक की पूर्ति करता है।
एजोस्पिरिलयम - यह जीवाणु एजोटोबैक्‍टर जैसा ही जैव उर्वरक है तथा इसे बीजोपचार पौध-जड़ोपचार तथा मृदा उपचार द्वारा सभी फसलों में प्रयोग किया जा सकता है। तथा नत्रजन की स्थितिकरण क्षमता 20-20 किलो प्रति फसल है।
एसीटोबैक्‍टर – यह जैव उर्वरक मुख्‍यत: गन्‍ने के लिए विशेष उपयोगी है। गन्‍ने के साथ-साथ सभी शर्करा वाली फसलों के सम्‍पूर्ण भाग में पनपकर 65 से 150 किलो प्रति हेक्‍टर तक नत्रजन की पूर्ति करता है।
पी.एस.बी.कल्‍चर – इसमें प्रयोग होने वाले जीवाणु खेत में पड़े फास्‍फोरस को जो कि पौधों को पूरी तरह प्राप्‍त नहीं होता, को घुलनशील अवस्‍था में परिवर्तित कर फसल के लिए उपयोगी बनाता है जिससे व्‍यर्थ फास्‍फोरस का अधिकतम उपयोग हो जाता है जिससे फसल को 10-40 किलो फास्‍फोरस उपलब्‍ध होकर फसल में 7-21 प्रतिशत तक की वृद्धि होती है। तथा सभी फसलों के लिए लाभदायक होता है।
वैम माइकोराइजा – यह जीवित लाभदायक फफूंदी जो फसलों के सम्‍पूर्ण जड़ भाग में पनपकर पौधों में फास्‍फोरस के साथ-साथ अनेक सभी आवश्‍यक पोषक तत्‍वों की उपलब्‍धता को बढ़ाते है तथा नमी संरक्षण व कई रोगों से सुरक्षा प्रदान करते है। उसका प्रयोग बीजोपचार व पौध –जड़ोंपचार द्वारा किया जा सकता है।
एलोजा एवं बी.जी.ए. – एजोला एक जलीय खरपतवार है। इसे तालाब व झील आदि से एकत्रित कर धान के खेत में डाल सकते हैं। जबकि बी.जी.ए. कल्‍चर (5 किलो प्रति एकड़) को जैव उर्वरक उत्‍पादन केन्‍द्र से खरीद कर धान के खेत में रोपाई के समय प्रयोग करते है। तथा दोनो ही अलग-अलग 30 से 40 किलो प्रति हैक्‍टर नत्रजन की पूर्ति करते है। एजोला एवं बी.जी.ए दोनो ही धान के लिए बहु उपयोगी है।
कम्‍पोस्‍ट डिकम्‍पोजर – यह कल्‍चर गोबर की खाद व कम्‍पोस्‍ट की विच्‍छेदन क्रिया को तेल कर कम समय में खाद तैयार हो जाती है तथा इस कल्‍चर को 1 से 3 प्रतिशत कच्‍चे खाद की मात्रा के अनुसार गढडा भरते समय अथवा इसे एक सप्‍ताह बाद गड्ढों में मिला देते हैं।
रोग बायोकन्‍ट्रोलर – ऐसे बहुत से कल्‍चर अब बाजार में उपलब्‍ध होने लगे है जो कि जैविक क्रिया के उत्‍पादों द्वारा कई बीमारियों एवं कीट-लार्वो आदि से फसल सुरक्षा करते है। तथा फसलों में कल्‍चर की तरह से प्रयोग किये जाते है।
प्‍लान्‍ट राजोबैक्टिरिया – इसमें प्राप्‍त लाभदायक सभी जीवाणु जो पौधो के जड़ क्षेत्र में पनपते हुए फसलों को विभिन्‍न प्रकार से लाभान्वित करते है जिसमें मृदा, पौधो दोनो का स्‍वास्‍थ्‍य अच्‍छा रहता है।
जैव उर्वरकों की प्रयोग विधि –
(1) बीजोपचार – सीधी बीजाई वाली सभी फसलों के लिए बीजोपचार उत्‍तम तरीका है। इसके लिए नत्रजन देने वाले तथा फास्‍फोरस देने वाले एक-एक पैकिट को घोले पानी अथवा ठंडे चावल के मांड में लेही बनाकर 10-12 किलो बीज पर काली परत चढ़ाने तक मिलायें तथा छाया में सुखाकर तुरंत बीजाई करें।
(2) पौध जड़ोपचार – रोपाई की जाने वाली सभी फसलों के लिए 2 किलो एजैटोबैक्‍टर/ एजोस्पिरिलयम तथा उतनी ही मात्रा में फास्‍फोटिका आवश्‍यक जल में घोल बनाकर एक-दो घंटे रखें तथा धान के लिए रात भर रखें। इससे एक एकड़ पौध की रोपाई की जा सकती है।
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(3) मृदाउपचार – चार किलो एजैटोबेक्‍टर या एलोस्पिरियलम अथवा दोनो दो-दो किलो तथा चार किलो पी.एस.बी. कल्‍चर को उचित नमी वाले 100 से 150 किलो गोबर की तैयार खाद में मिश्रण तैयार कर 24 घंटे बाद फसालों की जड़ वाले भाग में प्रयोग करें।
(3)
वावधानियॉं –
हमेशा ताजे कल्‍चर का प्रयोग करें।
रासायनिक उर्वरकों व रसायनों के साथ नहीं मिलाचा चाहिए।
कल्‍चर हमेशा ठंडे स्‍थानों पर रखें।
दलहन फसल के अनुसार विशेष राइजोबियम का चयन करें।