पर्यटन
उदयपुर में सास-बहू के मंदिर – राजपाल सिंह
झीलों की नगरी उदयपुर से मात्र अट्ठाइस किलोमीटर की दूरी पर है- जगप्रसिद्ध एकलिंग जी का मंदिर। इस मंदिर से थोड़ा पहले, कच्चे रास्ते पर खड़े हैं वास्तुकला के बेजोड़ नमूने- सास-बहू के मंदिर। इन्ही मंदिरों के आसपास कभी मेवाड़ राजवंश की स्थापना हुई थी। इनकी पहली राजधानी थी- नागदा। नागदा के वैभव की याद दिलाने में ये सास-बहू के मंदिर आज भी सक्षम हैं। मेवाड़ राज्य के संस्थापक बप्पा रावल ने अपना प्रारंभिक जीवन यहीं नागदा में व्यतीत किया था।
मेवाड़ की यह प्राचीन राजधानी नागदा तो आज ध्वस्त हो चुकी है, लेकिन किसी तरह से यहाँ सास-बहू मंदिर बचे रह गए हैं। इन मंदिरों और नागदा के ध्वंसावशेष के आधार पर यह कहना अतिश्योक्तिपूर्ण नहीं होगा कि यहाँ कभी उत्कृष्ट कला का विकास हुआ।
मेवाड़ राज्य अपने जन्म से ही दिल्ली की आँख में चुभता रहा। दिल्ली के तत्कालीन सुल्तान शम्सुद्दीन अल्तमश ने तो इस पर आक्रमण कर इसे ध्वस्त कर डाला।
मंदिर सहस्रबाहु का
विक्रमी संवत ग्यारहवीं शताब्दी के आसपास बने सास-बहु के इन मंदिरों के बारे में अनुमान है कि मेवाड़ राजघराने की राजमाता ने विष्णु का मंदिर तथा बहू ने शेष नाग के मंदिर का निर्माण कराया। सास-बहू के द्वारा निर्माण कराए जाने से इन मंदिरों को सास-बहू के मंदिर के नाम से पुकारा जाता है। लेकिन, एक अन्य किंवदंती के अनुसार यहाँ पहले भगवान सहस्रबाहु का मंदिर था, जिसका नाम सहस्रबाहु से बिगड़कर सास-बहू हो गया। कारण जो भी रहा हो, आज ये मंदिर उस प्राचीन कला-संस्कृति के उत्कृष्ट नमूने हैं, जो कभी यहाँ फली-फूली थी।
वास्तुकला के बेजोड़ नमूने ये दोनों मंदिर एक ही परिसर में स्थित हैं। आज दोनों ही मंदिरों के गर्भगृहों में से देव प्रतिमाएँ गायब हैं। मंदिर बनानेवाले कलाकारों ने तत्कालीन परंपरा के अनुसार अपनी बारीक छैनी से समसामयिक जीवन व संस्कृति के अमर तत्वों को इन मंदिरों में उकेरा है। दोनों ही मंदिरों के बरामदों, तोरण-द्वारों व मंडपों को शिल्पकला के उत्कृष्ट नमूनों से सजाया है।
मंदिर की बाहरी दीवारों पर लगी सुर-सुंदरियों की प्रतिमाएँ नारी सौंदर्य का सजीव वर्णन करती-सी प्रतीत होती हैं। नर-नारी जीवन-जगत की गतिविधियों में शृंगार, नृत्य, क्रीड़ा और प्रेम आदि की अभिव्यक्ति बड़े सुंदर ढंग से अंकित की गई हैं। मिथुन-युगलों के बीच के प्यार-व्यापार को इतने सुंदर ढंग से दर्शाया गया है कि नर-नारी मूर्तियाँ शारीरिक सौंदर्य की पराकाष्ठा बन गई हैं।
कारीगरी, अद्भुत सूक्ष्म नक्काशी व भव्यता की दृष्टि से इन दोनों मंदिरों की समानता आबू पर्वत के जगप्रसिद्ध देलवाड़ा के मंदिरों व रणकपुर के जैन मंदिर से की जा सकती है। लेकिन प्राचीनता की दृष्टि से सास-बहू के मंदिर के प्रवेश-द्वार पर बने छज्जों पर महाभारत की पूरी कथा अंकित है। इन छज्जों से लगे बायें स्तंभ पर शिव-पार्वती की प्रतिमाएँ हैं, जो खजुराहो की मिथुन मूर्तियों से होड़ लेती-सी प्रतीत होती हैं। तोरणों का अलंकरण तो देखते ही बनता है।
मंदिर बहू का
बहू के मंदिर का सभामंडप तो अपने आप में अनूठा है। प्रत्येक स्तंभ पर लगभग चार फुट ऊँची, एक ही पत्थर से निर्मित प्रतिमाएँ लगी हुई हैं। ये नारी प्रतिमाएँ उत्कष्ट कलात्मक रूप में नारी सौंदर्य को दर्शाने के लिए उल्लेखनीय हैं। मंदिर के सामने एक ही भारी पत्थर से बना तोरण है, जिसमें तीन द्वार हैं। सास-बहू के दोनों मंदिरों के बीच में ब्रह्मा जी का मंदिर है। ब्रह्मा जी का मंदिर दोनों से छोटा है, फिर भी वह दोनों से कम नहीं है। इसके गुंबद को देखकर ऐसा लगता है मानो उसे बारीक जाली से ढक दिया गया हो।
हालाँकि, सास-बहू के ये मंदिर अपने समकालीन अन्य मंदिरों की तुलना में कहीं अच्छी दशा में हैं, फिर भी उचित साज-सँभाल के अभाव में ये धीरे-धीरे क्षरण का शिकार होने लगे हैं। समय के थपेड़ों ने मंदिर की दीवारों व मूर्तियों पर कालेपन की परछायीं डालना शुरू कर दी है। गर्भगृहों से आराध्य देवों की मूर्तियाँ गायब हैं। जब आराध्य देवों की मूर्तियाँ ही गायब हों, तो फिर मंदिर कैसा? राज्य पुरतत्व विभाग ने यहाँ एक नीला सूचना-पट्ट लगाकर उन्हें संरक्षित स्मारक घोषित कर अपने फ़र्ज़ से भी छुट्टी पा ली है। पर्यटन विभाग द्वारा ऐसे दुर्लभ स्मारकों की ख़ैर-ख़बर रख पाना तो और भी दूर की बात है। हालात, तो यहाँ तक बिगड़े हुए हैं कि उदयपुर स्थित राज्य सरकार के पर्यटन अधिकारी पूछने पर भी इन मंदिरों के बारे में किसी भी तरह की कोई जानकारी नहीं दे पाते। इन हालातों में तो ऐसे लगता है कि अब वह दिन दूर नहीं जब कि इन मंदिरों के खंडहर ढूँढ़े न मिलेंगे।
Tuesday, September 27, 2011
Monday, July 4, 2011
Tuesday, October 14, 2008
मुलाकात 1
एक मुलाक़ात करो हमसे इनायत समझकर,हर चीज़ का हिसाब देंगे क़यामत समझकर,मेरी दोस्ती पे कभी शक ना करना,हम दोस्ती भी करते है इबादत समझकर
मुलाकात
Kisi ne kaha tha..Kisi se na kehnaLagi chot dil pe to khamosh hi rehnaJahan chot khana wahan muskuranaMagr muskurana iss trah se ki ro de zamanaPhool bankar muskurana zindagi hai,Muskurake gum bhulana zindagi hai,Mil ke khush hue to kya hua,Bina mile rishte nibhana zindagi hai....Din beet jaate hain suhaani yaadein bankar,Baatein reh jaati hain kahani bankar,Par Aap hamesha dil ke karib rahenge,Kabhi muskaan to kabhi aankhon mein paani bankarJis ki kurbat mein qarar bahut hai...Uska milna dushwaar bahut hai...Jo mere hathon ki lakeeron mein nahi...Us Shaks se mujhe pyar bahut hai...Kaise kahoon ki tumse milne ki chahat nahi,Bekrar Dil ko abh bhi rahat nahi,Bhula deta magar kya karun,Aap ko bhul jane ki dil ko aadat nahi
रामतिल
रामतिल
जगनी के नाम से आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में पहचानी जाने वाली फसल रामतिल है। मध्यप्रदेश में इसकी खेती लगभग 220 हजार हेक्टेयर भूमि में की जाती है तथा उपज 44 हजार टन मिलती है। प्रदेश में देश के अन्य उत्पादक प्रदेशों की तुलना में औसत उपज अत्यंत कम (198 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर ) है। मध्यप्रदेश में इसकी खेती प्रधान रूप से छिंदवाडा , बैतूल, मंडला, सिवनी, डिन्डौरी एवं शहड़ोल जिलों में की जाती है।
रामतिल के बीजों में 35 – 45 प्रतिशत तेल एवं 25 से 35 प्रतिशत की मात्रा पायी जाती है। रामतिल की फसल विषम परिस्थितियों में भी उगाई जा सकती है। फसल को अनुपजाऊ एवं कम उर्वराशक्ति वाली भूमि में भी लिया जा सकता है। इसका तेल एवं बीज पूर्णत: विषैले तत्वों से मुक्त रहता है तथा यह कीडों बीमारियों जंगली जानवरों तथा पक्षियों से होने वाली क्षति से कम प्रभावित होती है। फसल भूमि का कटाव रोकती है। रामतिल की फसल के बाद उगाई जाने वाली फसल की उपज अच्छी आती है। प्रदेश में फसल की उपज को निम्नानुसार उन्नत कृषि तकनीकी अपनाकर बढ़ाया जा सकता है।
भूमि का चुनाव
फसल को आमतौर पर सभी प्रकार की भूमि में उगाया जा सकता है। उत्तम जल निकासी वाली गहरी दुमट भूमि काश्त हेतु अच्छी होती है।
भूमी की तैयारी
खेत की तैयारी करते समय पिछली फसल की कटाई पश्चात हल से दो बाद गहरी जुताई करें तथा 3-4 बाद बखर एवं पाटा चलाकर भूमि को समतल एवं खरपतवार रहित करना चाहिये जिसमें बीज समान गहराई तक पहुंचकर उचित अंकुरण एवं पौध संख्या प्राप्त हो सके।
जातियों का चुनाव
प्रदेश में फसल की काश्त हेतु निम्नलिखित अनुशंसित उन्नत किस्मों को अपनाना चाहिये:
(1) उटकमंड़ – मध्यम अवधि में पककर तैयार होने वाली किस्म जो कि लगभग 110 दिनों में परिपक्व होकर तैयार होती है। बीजों में 43 प्रतिशत तेल की मात्रा होती है तथा उपज क्षमता औसतन 500 किलोग्राम प्रति हेक्टर है।
(2) नंबर 5 - बीजों का रंग काला मध्यम अवधि में (लगभग 105 दिनों में) पककर तैयार होती है। बीजों में 40 प्रतिशत तेल की मात्रा होती है तथा उपज क्षमता औसतन 475 किलोग्राम प्रति हेक्टर है।
(3) आई .जी.पी 76 (सध्याढ़ी) मध्यम अवधि में (लगभग 105 दिनों में) पककर तैयार होती है। बीजों का आकार छोटा होता है तथा बीजों में 40 प्रतिशत तेल की मात्रा होती है। किस्म ताप एवं प्रकाश काल हेतु संवेदनशील होती है तथा उपज क्षमता औसतन 475 किलोग्राम प्रति हेक्टर है।
(4) नंबर 71 – जल्दी पकने वाली (लगभग 92 -95 दिनों में) किस्म है जिसका रंग गहरा काला चमकीला होकर दाना आकार में बड़ा होता है। बीजों में 42 प्रतिशत तेल की मात्रा होती है। पौधों की ऊंचाई ज्यादा होती है तथा औसत उपज क्षमता 475 किलोग्राम प्रति हेक्टर है।
(5) बिरसा नाइजर – 1 – किस्म जब पककर तैयार होती है तब तने का रंग हल्का गुलाबी होता है। मध्यम अवधि में (95-100 दिनों में ) पक्कर तैयार होती है। बीजों में 41 प्रतिशत तेल पाया जाता है तथा औसत उपज क्षमता 600 – 700 किलोग्राम / हेक्टर है।
(6) श्रीलेखा – नई विकसित शीघ्र पकने वाली (86 दिनों में) पककर तैयार होती है। बीजों में 41 प्रतिशत तेल पाया जाता है तथा औसत उपज क्षमता 500 किलोग्राम / हेक्टर है।
(7) पैयूर – 1 नई विकसित किस्म जो कि लगभग 90 दिनों में पककर तैयार होती है। पर्वतीय क्षेत्रों में काश्त हेतु उत्तम है। बीजों का रंग काला होता है तथा बीजों में 40 प्रतिशत तेल होता है। औसत उपज क्षमता 500 किलोग्राम/ हेक्टर है।
(8) जे.एन.सी सी 1 – इसके पकने की अवधि 95 -100 दिन है। बीजों के 35 -38 प्रतिशत तेल की मात्रा होती है। इस किस्म की उपज क्षमता औसत 5 -7 क्विंटल प्रति हेक्टर है। यह किस्म सूखा के लिये सहनशील होती है।
(9) जे.एन.सी -7 इसके पकने की अवधि 95 दिन है। इसका बीज पुष्ट तथा काले रंग का होता है। औसत उपज क्षमता 5-50 – 6.50 क्विंटल प्रति हेक्टर है। यह सूखा के लिये सहनशील है।
(10) जे.एन.सी. 9 – इसके पकने की अवधि 95 दिन है। इसका बीज पुष्ट तथा काले रंग का होता है। औसत उपज क्षमता 5.50 – 7 क्विंटल प्रति हेक्टर है। बीजों में 38 – 40 प्रतिशत तेल होता है। यह किस्म ताप एवं प्रकाश काल हेतु संवेदनशील होती है।
फसल चक्र
फसल को दलहनी , अनाजवाली फसलों तथा मोटे अनाज वाली फसलों के साथ बोया जाता है। एकल फसल में इसकी उपज मिश्रित फसल की अपेक्षा ज्यादा आती है। फसल हेतु कुछ लाभदायक फसल चक्र निम्नानुसार है:
फसल क्रम
कुटकी - रामतिल
रागी(अगेती) - रामतिल
उड़द(अगेती) - रामतिल
मिश्रित फसल प्रणाली
रामतिल + कोदो (2:2) रामतिल + कुटकी (2:2)
रामतिल + बाजरा (2:2) रामतिल + मूंग (2:2)
रामतिल + मूंगफली ( 6:2 अथवा 4:2)
बीजोपचार
फसल को भूमिजनित या बीजजनित बीमारियों से बचने के लिये बोनी के पूर्व बीजों को थाइरस अथवा केप्टान 3 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करना चाहिये।
बोने का समय
फसल की बोनी जुलाई माह के दूसरे सप्ताह से अगस्त माह के दूसरे सप्ताह तक की जा सकती है।
बोने की विधि
सामान्यत: 5 -8 किलोग्राम बीज / हेक्टर के मान से बोनी हेतु आवश्यक होता है। अंतरवर्तीय फसल हेतु बीज की दर कतारों के अनुपात पर निर्भर करती है। बोनी करते समय बीजों को पूरे खेत (कतारों) में समान रूप से वितरण हेतु बीजों को 1:20 के अनुपात में गोबर की छनी हुई अच्छी सड़ी खाद के साथ मिलाकर बोनी करना चाहिये।
खाद एवं उर्वरक की मात्रा एवं देने की विधि
फसल को 10 किलोग्राम नत्रजन + 20 किलोग्राम फास्फोरस / हेक्टेयर बोनी के समय ओर 10 किलोग्राम नत्रजन प्रति हेक्टेयर की दर से खड़ी फसल में बोनी के 35 दिन बाद देवें। इसके अलावा स्फुर घुलनशील जैव उर्वरक कल्चर (पी.एस.बी) भूमि में अनुपलब्ध स्फुर को उपलब्ध कर फसल को लाभ पहुंचाता है। पी.एस.बी. कल्चर को बोनी के पूर्व आखरी बखरनी के समय मिटटी में 5 से 7 किलोग्राम प्रति हेक्टर की दर से गोबर की खाद अथवा सूखी मिटटी में मिलाकर खेत में समान रूप से बिखेरें। इस समय खेत में नमी का होना आवश्यक होता है।
भूमि में उपलब्ध तत्वों के परीक्षण उपरांत यदि भूमि में गंधक तत्व की कमी पायी जाती है तो 20 – 30 किलोग्राम / हेक्टेयर की दर से गंधक का प्रयोग करने पर तेल के प्रतिशत एवं पैदावार में बढ़ोतरी होती है।
कतारों की दूरी
अच्दे उत्पादन हेतु कतारों में बोनी हेतु अनुशंसा की जाती है। अच्छी उपज लेने हेतु बुवाई 30 x 10 से.मी. दूरी पर करें तथा बीज को 3 से.मी. की गहराई पर बोना चाहिये। पौधों की संख्या 3,00,000 पूरे खेत (कतारों) में समान रूप से वितरण हेतु 1:20 के अनुपात में गोबर की छनी हुई खाद के साथ मिलाकर बोनी करना चाहिये।
सिंचाई
रामतिल की फसलों को मुख्यत: खरीफ मौसम में वर्षा आधारित स्थिति में यदि सिंचाई का साधन उपलब्ध है तो सुरक्षा सिंचाई करना चाहिये। फूल आते समय एवं फल्लियॉ बनते समय सिंचाई देने से उपज में अच्छे परिणाम मिलते हैं।
निंदाई – गुडाई
बोनी के 15 -20 दिन पश्चात पहली निंदाई करना चाहिये तथा इसी समय आवश्यकता से अधिक पौधों को खेत से निकालना चाहिये। यदि आवश्यकता हुआ तो दूसरी निंदाई बोनी के करीब 35 -40 दिन बाद (नत्रजन युक्त उर्वरकों की खड़ी फसल में छिड़काव के पूर्व ) करना चाहिये। कतारों में बोयी गई फसल में हाथों द्वारा चलने वाला हो अथवा डोरा चलाकर नींदा नियंत्रण करें। रासायनिक नींदा नियंत्रण के लिये ‘’एलाक्लोर ‘’ 1.5 किलोग्राम सक्रिय घटक / हेक्टेयर की दर से 500 लीटर पानी में छिड़काव अथवा ‘’ लासो ‘’ दानेदार 20 किलोग्राम / हेक्टेयर की दर से बोनी के तुरंत बाद एवं अंकुरण के पूर्व भुरकाव करें।
अमरबेल परजीवी संक्रमित क्षेत्रों से प्राप्त बीजों का प्रयोग बोनी हेतु नहीं करना चाहिये। यदि अमरबेल के बीज रामतिल के साथ मिल गये हो तो बोनी पूर्व छलनी से छानकर इसे अलग कर देना चाहिये।
पौध संरक्षण
(अ) कीट
रामतिल पर आनेवाले प्रमुख कीट रामतिल की सूंडी, सतही टिडडी माहों, बिहार रोमिल सूंडी सेमीलूपर आदि हैं। रामतिल की इल्ली हरे रंग की होती है जिस पर जामुनी रंग की धारियॉ रहती है। पत्तियों को खाकर पौधे की प्रारंभिक अवस्था में ही पौधे से रस चूसते हैं जिससे उपज में कमी आती है।
सतही टिडडी के शिशु एवं वयस्क फसल की प्रारंभिक अवस्थाओं में पत्तियों को काटकर हानि पहुंचाते हैं।
नियंत्रण
(1) रामतिल की इल्ली के नियंत्रण के लिये पेराथियान 2 प्रतिशत चूर्ण का भुरकाव 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से करना चाहिये। इस चूर्ण के उपयोग से सतही टिडडी को भी नियंत्रित किया जा सकता है।
(2) माहों कीट के नियंत्रण के लिये वावधानी रखकर कीटनाशक दवा का चयन करना चाहिये। क्योंकि इसका आक्रमण पौधे पर फूल आने पर होता है। चूंकि रामतिल में परागीकरण होता है अत: ऐसी दवा का प्रयोग नहीं करना चाहिये जिससे मधुमक्खियों को नुकसान हो। इण्डोसल्फान 35 सी.की 1 मिली लीटर मात्रा प्रति 1 लीटर पानी के मान से 600 – 700 लीटर पानी में अच्छी तरह से बनाकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करने पर माहों का प्रभावी ढंग से नियंत्रण किया जा सकता है। कीटनाशकों का प्रयोग सुबह या देर शाम न करें।
(ब) रोग
(1) सरकोस्पोरा पर्णदाग – इस रोग में पत्तियों पर छोटे धूसर से भूरे धब्बे बनते हैं जिसके मिलने पर रोग पूरी पत्ती पर फैल जाता है तथा पत्ती गिर जाती है। नियंत्रण हेतु बोनी पूर्व बीजों को 0.3 प्रतिशत थायरस से बीजोपचार करें।
(2) अल्अरनेरिया पत्ती धब्बा – इस रोग में पत्तियों पर भूरे, अंडाकार , गोलाकार एवं अनियंत्रित वलयाकार धब्बे दिखते हैं। रोग के नियंत्रण हेतु बोनी पूर्व बीजों को 0.3 प्रतिशत थायरस से बीजोपचार करें। जीनेब (0.2 प्रतिशत) अथवा बाविस्टीन (0.05 प्रतिशत) या टापसिन (0.25 प्रतिशत) दवा का छिड़काव रोग आने पर 15 दिन के अंतराल से करें।
(3) जड़ सडन – तना अधार एवं जड़ का छिलका हटाने पर फफूंद के स्कलेरोशियम होने के कारण कोयले के समान कालापन होता है। नियंत्रण हेतु 0.3 प्रतिशत थायरम से बोनी के पूर्व बीजोपचार करें।
(4) भभूतिया रोग (चूर्णी फफूंद) – रोग में पत्तियों एवं तनों पर सफेद चूर्ण दिखता है। नियंत्रण हेतु 0.2 प्रतिशत घुलनशील गंधक का फुहारा पद्धति से फसल पर छिड़काव करें।
फसल कटाई
रामतिल की फसल लगभग 100 -120 दिनों में पककर तैयार होती है। जब पौधों की पत्तियां सूखकर गिरने लगे, फल्ली का शीर्ष भाग भूरे काले रंग का होकर मुड़ने लगे तब फसल को काट लेना चाहिये। कटाई उपरांत पौधों को गटठों में बॉधकर खेत में खुली धूप में एक सप्ताह तक सुखाना चाहिये उसके बाद खलिहान में लकड़ी / डंडों द्वारा पीटकर गहाई करना चाहिये। गहाई के बाद प्राप्त दानों को सूपे से फटककर साफ कर लेना चाहिये। बीजों को धूप में अच्छी तरह सुखाकर 9 प्रतिशत नमीं पर भंडारण करना चाहिये।
उपज
उचित प्रबंधन से रामतिल की उपज 600 -700 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तक प्राप्त होती है जो कि मुख्यत: अच्छी वर्षा एवं उन्नत तकनीक के अंगीकरण से प्राप्त होती है।
जगनी के नाम से आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों में पहचानी जाने वाली फसल रामतिल है। मध्यप्रदेश में इसकी खेती लगभग 220 हजार हेक्टेयर भूमि में की जाती है तथा उपज 44 हजार टन मिलती है। प्रदेश में देश के अन्य उत्पादक प्रदेशों की तुलना में औसत उपज अत्यंत कम (198 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर ) है। मध्यप्रदेश में इसकी खेती प्रधान रूप से छिंदवाडा , बैतूल, मंडला, सिवनी, डिन्डौरी एवं शहड़ोल जिलों में की जाती है।
रामतिल के बीजों में 35 – 45 प्रतिशत तेल एवं 25 से 35 प्रतिशत की मात्रा पायी जाती है। रामतिल की फसल विषम परिस्थितियों में भी उगाई जा सकती है। फसल को अनुपजाऊ एवं कम उर्वराशक्ति वाली भूमि में भी लिया जा सकता है। इसका तेल एवं बीज पूर्णत: विषैले तत्वों से मुक्त रहता है तथा यह कीडों बीमारियों जंगली जानवरों तथा पक्षियों से होने वाली क्षति से कम प्रभावित होती है। फसल भूमि का कटाव रोकती है। रामतिल की फसल के बाद उगाई जाने वाली फसल की उपज अच्छी आती है। प्रदेश में फसल की उपज को निम्नानुसार उन्नत कृषि तकनीकी अपनाकर बढ़ाया जा सकता है।
भूमि का चुनाव
फसल को आमतौर पर सभी प्रकार की भूमि में उगाया जा सकता है। उत्तम जल निकासी वाली गहरी दुमट भूमि काश्त हेतु अच्छी होती है।
भूमी की तैयारी
खेत की तैयारी करते समय पिछली फसल की कटाई पश्चात हल से दो बाद गहरी जुताई करें तथा 3-4 बाद बखर एवं पाटा चलाकर भूमि को समतल एवं खरपतवार रहित करना चाहिये जिसमें बीज समान गहराई तक पहुंचकर उचित अंकुरण एवं पौध संख्या प्राप्त हो सके।
जातियों का चुनाव
प्रदेश में फसल की काश्त हेतु निम्नलिखित अनुशंसित उन्नत किस्मों को अपनाना चाहिये:
(1) उटकमंड़ – मध्यम अवधि में पककर तैयार होने वाली किस्म जो कि लगभग 110 दिनों में परिपक्व होकर तैयार होती है। बीजों में 43 प्रतिशत तेल की मात्रा होती है तथा उपज क्षमता औसतन 500 किलोग्राम प्रति हेक्टर है।
(2) नंबर 5 - बीजों का रंग काला मध्यम अवधि में (लगभग 105 दिनों में) पककर तैयार होती है। बीजों में 40 प्रतिशत तेल की मात्रा होती है तथा उपज क्षमता औसतन 475 किलोग्राम प्रति हेक्टर है।
(3) आई .जी.पी 76 (सध्याढ़ी) मध्यम अवधि में (लगभग 105 दिनों में) पककर तैयार होती है। बीजों का आकार छोटा होता है तथा बीजों में 40 प्रतिशत तेल की मात्रा होती है। किस्म ताप एवं प्रकाश काल हेतु संवेदनशील होती है तथा उपज क्षमता औसतन 475 किलोग्राम प्रति हेक्टर है।
(4) नंबर 71 – जल्दी पकने वाली (लगभग 92 -95 दिनों में) किस्म है जिसका रंग गहरा काला चमकीला होकर दाना आकार में बड़ा होता है। बीजों में 42 प्रतिशत तेल की मात्रा होती है। पौधों की ऊंचाई ज्यादा होती है तथा औसत उपज क्षमता 475 किलोग्राम प्रति हेक्टर है।
(5) बिरसा नाइजर – 1 – किस्म जब पककर तैयार होती है तब तने का रंग हल्का गुलाबी होता है। मध्यम अवधि में (95-100 दिनों में ) पक्कर तैयार होती है। बीजों में 41 प्रतिशत तेल पाया जाता है तथा औसत उपज क्षमता 600 – 700 किलोग्राम / हेक्टर है।
(6) श्रीलेखा – नई विकसित शीघ्र पकने वाली (86 दिनों में) पककर तैयार होती है। बीजों में 41 प्रतिशत तेल पाया जाता है तथा औसत उपज क्षमता 500 किलोग्राम / हेक्टर है।
(7) पैयूर – 1 नई विकसित किस्म जो कि लगभग 90 दिनों में पककर तैयार होती है। पर्वतीय क्षेत्रों में काश्त हेतु उत्तम है। बीजों का रंग काला होता है तथा बीजों में 40 प्रतिशत तेल होता है। औसत उपज क्षमता 500 किलोग्राम/ हेक्टर है।
(8) जे.एन.सी सी 1 – इसके पकने की अवधि 95 -100 दिन है। बीजों के 35 -38 प्रतिशत तेल की मात्रा होती है। इस किस्म की उपज क्षमता औसत 5 -7 क्विंटल प्रति हेक्टर है। यह किस्म सूखा के लिये सहनशील होती है।
(9) जे.एन.सी -7 इसके पकने की अवधि 95 दिन है। इसका बीज पुष्ट तथा काले रंग का होता है। औसत उपज क्षमता 5-50 – 6.50 क्विंटल प्रति हेक्टर है। यह सूखा के लिये सहनशील है।
(10) जे.एन.सी. 9 – इसके पकने की अवधि 95 दिन है। इसका बीज पुष्ट तथा काले रंग का होता है। औसत उपज क्षमता 5.50 – 7 क्विंटल प्रति हेक्टर है। बीजों में 38 – 40 प्रतिशत तेल होता है। यह किस्म ताप एवं प्रकाश काल हेतु संवेदनशील होती है।
फसल चक्र
फसल को दलहनी , अनाजवाली फसलों तथा मोटे अनाज वाली फसलों के साथ बोया जाता है। एकल फसल में इसकी उपज मिश्रित फसल की अपेक्षा ज्यादा आती है। फसल हेतु कुछ लाभदायक फसल चक्र निम्नानुसार है:
फसल क्रम
कुटकी - रामतिल
रागी(अगेती) - रामतिल
उड़द(अगेती) - रामतिल
मिश्रित फसल प्रणाली
रामतिल + कोदो (2:2) रामतिल + कुटकी (2:2)
रामतिल + बाजरा (2:2) रामतिल + मूंग (2:2)
रामतिल + मूंगफली ( 6:2 अथवा 4:2)
बीजोपचार
फसल को भूमिजनित या बीजजनित बीमारियों से बचने के लिये बोनी के पूर्व बीजों को थाइरस अथवा केप्टान 3 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करना चाहिये।
बोने का समय
फसल की बोनी जुलाई माह के दूसरे सप्ताह से अगस्त माह के दूसरे सप्ताह तक की जा सकती है।
बोने की विधि
सामान्यत: 5 -8 किलोग्राम बीज / हेक्टर के मान से बोनी हेतु आवश्यक होता है। अंतरवर्तीय फसल हेतु बीज की दर कतारों के अनुपात पर निर्भर करती है। बोनी करते समय बीजों को पूरे खेत (कतारों) में समान रूप से वितरण हेतु बीजों को 1:20 के अनुपात में गोबर की छनी हुई अच्छी सड़ी खाद के साथ मिलाकर बोनी करना चाहिये।
खाद एवं उर्वरक की मात्रा एवं देने की विधि
फसल को 10 किलोग्राम नत्रजन + 20 किलोग्राम फास्फोरस / हेक्टेयर बोनी के समय ओर 10 किलोग्राम नत्रजन प्रति हेक्टेयर की दर से खड़ी फसल में बोनी के 35 दिन बाद देवें। इसके अलावा स्फुर घुलनशील जैव उर्वरक कल्चर (पी.एस.बी) भूमि में अनुपलब्ध स्फुर को उपलब्ध कर फसल को लाभ पहुंचाता है। पी.एस.बी. कल्चर को बोनी के पूर्व आखरी बखरनी के समय मिटटी में 5 से 7 किलोग्राम प्रति हेक्टर की दर से गोबर की खाद अथवा सूखी मिटटी में मिलाकर खेत में समान रूप से बिखेरें। इस समय खेत में नमी का होना आवश्यक होता है।
भूमि में उपलब्ध तत्वों के परीक्षण उपरांत यदि भूमि में गंधक तत्व की कमी पायी जाती है तो 20 – 30 किलोग्राम / हेक्टेयर की दर से गंधक का प्रयोग करने पर तेल के प्रतिशत एवं पैदावार में बढ़ोतरी होती है।
कतारों की दूरी
अच्दे उत्पादन हेतु कतारों में बोनी हेतु अनुशंसा की जाती है। अच्छी उपज लेने हेतु बुवाई 30 x 10 से.मी. दूरी पर करें तथा बीज को 3 से.मी. की गहराई पर बोना चाहिये। पौधों की संख्या 3,00,000 पूरे खेत (कतारों) में समान रूप से वितरण हेतु 1:20 के अनुपात में गोबर की छनी हुई खाद के साथ मिलाकर बोनी करना चाहिये।
सिंचाई
रामतिल की फसलों को मुख्यत: खरीफ मौसम में वर्षा आधारित स्थिति में यदि सिंचाई का साधन उपलब्ध है तो सुरक्षा सिंचाई करना चाहिये। फूल आते समय एवं फल्लियॉ बनते समय सिंचाई देने से उपज में अच्छे परिणाम मिलते हैं।
निंदाई – गुडाई
बोनी के 15 -20 दिन पश्चात पहली निंदाई करना चाहिये तथा इसी समय आवश्यकता से अधिक पौधों को खेत से निकालना चाहिये। यदि आवश्यकता हुआ तो दूसरी निंदाई बोनी के करीब 35 -40 दिन बाद (नत्रजन युक्त उर्वरकों की खड़ी फसल में छिड़काव के पूर्व ) करना चाहिये। कतारों में बोयी गई फसल में हाथों द्वारा चलने वाला हो अथवा डोरा चलाकर नींदा नियंत्रण करें। रासायनिक नींदा नियंत्रण के लिये ‘’एलाक्लोर ‘’ 1.5 किलोग्राम सक्रिय घटक / हेक्टेयर की दर से 500 लीटर पानी में छिड़काव अथवा ‘’ लासो ‘’ दानेदार 20 किलोग्राम / हेक्टेयर की दर से बोनी के तुरंत बाद एवं अंकुरण के पूर्व भुरकाव करें।
अमरबेल परजीवी संक्रमित क्षेत्रों से प्राप्त बीजों का प्रयोग बोनी हेतु नहीं करना चाहिये। यदि अमरबेल के बीज रामतिल के साथ मिल गये हो तो बोनी पूर्व छलनी से छानकर इसे अलग कर देना चाहिये।
पौध संरक्षण
(अ) कीट
रामतिल पर आनेवाले प्रमुख कीट रामतिल की सूंडी, सतही टिडडी माहों, बिहार रोमिल सूंडी सेमीलूपर आदि हैं। रामतिल की इल्ली हरे रंग की होती है जिस पर जामुनी रंग की धारियॉ रहती है। पत्तियों को खाकर पौधे की प्रारंभिक अवस्था में ही पौधे से रस चूसते हैं जिससे उपज में कमी आती है।
सतही टिडडी के शिशु एवं वयस्क फसल की प्रारंभिक अवस्थाओं में पत्तियों को काटकर हानि पहुंचाते हैं।
नियंत्रण
(1) रामतिल की इल्ली के नियंत्रण के लिये पेराथियान 2 प्रतिशत चूर्ण का भुरकाव 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से करना चाहिये। इस चूर्ण के उपयोग से सतही टिडडी को भी नियंत्रित किया जा सकता है।
(2) माहों कीट के नियंत्रण के लिये वावधानी रखकर कीटनाशक दवा का चयन करना चाहिये। क्योंकि इसका आक्रमण पौधे पर फूल आने पर होता है। चूंकि रामतिल में परागीकरण होता है अत: ऐसी दवा का प्रयोग नहीं करना चाहिये जिससे मधुमक्खियों को नुकसान हो। इण्डोसल्फान 35 सी.की 1 मिली लीटर मात्रा प्रति 1 लीटर पानी के मान से 600 – 700 लीटर पानी में अच्छी तरह से बनाकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करने पर माहों का प्रभावी ढंग से नियंत्रण किया जा सकता है। कीटनाशकों का प्रयोग सुबह या देर शाम न करें।
(ब) रोग
(1) सरकोस्पोरा पर्णदाग – इस रोग में पत्तियों पर छोटे धूसर से भूरे धब्बे बनते हैं जिसके मिलने पर रोग पूरी पत्ती पर फैल जाता है तथा पत्ती गिर जाती है। नियंत्रण हेतु बोनी पूर्व बीजों को 0.3 प्रतिशत थायरस से बीजोपचार करें।
(2) अल्अरनेरिया पत्ती धब्बा – इस रोग में पत्तियों पर भूरे, अंडाकार , गोलाकार एवं अनियंत्रित वलयाकार धब्बे दिखते हैं। रोग के नियंत्रण हेतु बोनी पूर्व बीजों को 0.3 प्रतिशत थायरस से बीजोपचार करें। जीनेब (0.2 प्रतिशत) अथवा बाविस्टीन (0.05 प्रतिशत) या टापसिन (0.25 प्रतिशत) दवा का छिड़काव रोग आने पर 15 दिन के अंतराल से करें।
(3) जड़ सडन – तना अधार एवं जड़ का छिलका हटाने पर फफूंद के स्कलेरोशियम होने के कारण कोयले के समान कालापन होता है। नियंत्रण हेतु 0.3 प्रतिशत थायरम से बोनी के पूर्व बीजोपचार करें।
(4) भभूतिया रोग (चूर्णी फफूंद) – रोग में पत्तियों एवं तनों पर सफेद चूर्ण दिखता है। नियंत्रण हेतु 0.2 प्रतिशत घुलनशील गंधक का फुहारा पद्धति से फसल पर छिड़काव करें।
फसल कटाई
रामतिल की फसल लगभग 100 -120 दिनों में पककर तैयार होती है। जब पौधों की पत्तियां सूखकर गिरने लगे, फल्ली का शीर्ष भाग भूरे काले रंग का होकर मुड़ने लगे तब फसल को काट लेना चाहिये। कटाई उपरांत पौधों को गटठों में बॉधकर खेत में खुली धूप में एक सप्ताह तक सुखाना चाहिये उसके बाद खलिहान में लकड़ी / डंडों द्वारा पीटकर गहाई करना चाहिये। गहाई के बाद प्राप्त दानों को सूपे से फटककर साफ कर लेना चाहिये। बीजों को धूप में अच्छी तरह सुखाकर 9 प्रतिशत नमीं पर भंडारण करना चाहिये।
उपज
उचित प्रबंधन से रामतिल की उपज 600 -700 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तक प्राप्त होती है जो कि मुख्यत: अच्छी वर्षा एवं उन्नत तकनीक के अंगीकरण से प्राप्त होती है।
मूंगफली
मूंगफली
मूंगफली म.प्र. की एक प्रमुख तिलहनी फसल है। राज्य में इसकी उत्पादकता स्थिर नहीं है। इसका प्रमुख कारण वर्षा की अनिश्चित्ता, सूखा पड़ना अथवा कभी- कभी लगातार वर्षा होना तथा किसानों द्वारा इस फसल की उन्नत कृषि कार्यमाला को न अपनाना आदि है।
भूमि का चुनाव
पानी का अच्छा निकास, हल्की से मध्यम रेतीली कछारी या दुमट भूमि उपयुक्त है।
भूमि की तैयारी
तीन साल के अन्तराल में एक बार गहरी जुताई करें इसके बाद दो बार देशी हल या कल्टीवेटर चलायें एवं बखर चलाकर पाटा लगाना चाहिए।
बीज दर
100 – 120 किलोग्राम/ हेक्टर दाने बोने से 3.33 लाख के लगभग पौध संख्या प्राप्त होती है।
उन्नत जातियॉं
किस्म
पकने की अवधि
फलियॉं कि.ग्रा./ हे.
तेल प्रतिशत
अन्य विवरण
फूलो प्रगति (जे.एल. – 24)
95 -100
1500-2400
50.8
अगेती उन्नत जाति है तथा पूरे देश में इसे सफलतापूर्वक लगाया जा रहा है। इसे ग्रीष्म ऋतु में नहीं लगाना चाहिए। यह किस्म खरीफ एवं ग्रीष्म के लिये उपयुक्त है। यह मध्यम से भारी मिटटी के लिये उपयुक्त है। यह कालर राट रोगी रोधी किस्म है मध्यम से भारी मिटटी के लिये उपयुक्त है। इसको खरीफ एवं गर्मी दोनों मौसमों में उगाया जा सकता है। 3 -4 दाने वाली लम्बी फली इसमें रूट राट (जड़सडन) का प्रभाव कम पाया गया है। दोनों ही मौसम में उगाया जा सकता है। खरीफ मौसम के लिये अनुसंशित ।
जूनागढ़ – 11 (एस.बी. -11)
107-150
1000-1500
49.5
ए.के. 12 – 24
105- 110
1000- 1500
48.5
गंगापुरी
95-100
1500-2000
48
ज्योति
105-110
1500-2000
53.3
जे.जी.एन -3
100 – 105
1500- 2000
50
बीजोपचार
3 ग्राम थीरम या 2 ग्राम कार्बनडेजिम दवा/ किलो ग्राम बीज की दर से बीजोपचार करें। पौधों के सूखने की समस्या वाले क्षेत्र में 2 ग्राम थीरम + 1 ग्राम कार्बेन्डाजिम / किलो ग्राम बीज मिलाकर उपचारित करें या जैविक उपचार ट्रायकोडर्मा 4 ग्राम चूर्ण / किलो ग्राम बीज की दर से उपयोग करें। इसके पश्चात 10 ग्राम / किलो ग्राम बीज के मान से रायजोबियम कल्चर (मूंगफली) से भी उपचार करें।
बोने का समय
वर्षा प्रारंभ होने पर जून के मध्य से लेकर जुलाई के प्रथम सप्ताह तक बोनी करना चाहिए।
बोने का तरीका
बोनी कतारों में सरता दुफन या तिफन से लगभग 4 -6 से.मी. गहराई पर करना चाहिए। कतार से कतार की दूरी 30 से.मी. तथा पौधे की दूरी 8 – 10 से.मी. रखना चाहिए।
खाद एवं उर्वरक
भूमि की तैयारी के समय गोबर की खाद 5 -10 टन/ हेक्टर प्रयोग करें। उर्वरक के रूप में 20 किलोग्राम नत्रजन , 40 – 80 किलोग्राम स्फुर एवं 20 किलोग्राम पोटाश/ हेक्टर देना चाहिए। यदि खेत में गोबर की खाद तथा पी.एस.बी. का प्रयोग किया जाता है तो स्फुर की मात्रा 80 किलो ग्राम/ हेक्टर की जगह मात्र 40 किलो ग्राम / हेक्टर ही पर्याप्त है। खाद की पूरी मात्रा आधार खाद के रूप में प्रयोग करें। मूंगफली फसल में गंधक का विशेष महत्व है। इसलिए 25 किलो ग्राम/ हेक्टेयर के मान से गंधक अवश्य दिया जाना चाहिए। यदि यूरिया की जगह अमोनिया सल्फेट तथा फास्फेट के रूप में सिंगल सुपर फास्फेट का प्रयोग किया जाता है तो गंधक पर्याप्त मात्रा में मिल जाता है। अन्यथा 2 क्विंटल / हेक्टर की दर से जिप्सम या पाइराइटस का उपयोग आखिरी बखरनी के साथ करें। साथ ही 25 किलो ग्राम/ हेक्टर के मान से तीन साल के अन्तर पर जिंक सल्फेट का प्रयोग अवश्य करें।
फसल चक्र:
1 . मूंगफली (खरीफ) – गेहूं (रबी)
2 . मूंगफली (खरीफ) – मक्का (खरीफ)
3 . मूंगफली (खरीफ) – चना (रबी)
4 . मूंगफली ग्रीष्म कपास (खरीफ)
5 . मूंगफली ग्रीष्म मक्का / ज्वार / कपास
अंतरवर्तीय फसलें
अन्तवर्तीय फसल के रूप में मक्का, ज्वार, सोयाबीन, मूंग, उड़द, तुअर, सूर्यमुखी आदि फसलों को 4:2, 2:1, 8:2, 3:1, 6:3, 9:3, अनुपात में आवश्यकतानुसार लिया जा सकता है।
सिचाई
सिंचाई की सुविधा होने पर अवर्षा से उत्पन्न सूखे की अवस्था में पहला पानी 50- 55 दिन में तथा दूसरा पानी 70 – 75 दिन में दिया जाना चाहिए।
निंदाई – गुडाई
फसल बोने के 15 -20, 25 -30 तथा 40 -45 दिन की अवस्था में डोरा या कोल्पा चलावें जिससे समय – समय पर नींदा नियंत्रण किया जा सके। नींदानाशक दवाओं के उपयोग से भी नींदा नियंत्रण किया जा सकता है।
खरपतवारनाशी रसायनों की मात्रा एवं प्रयोग विधि
खरपतवारनाशी रसायन
मात्रा सक्रिय तत्व, लीटर / हेक्टेयर
उपयोग विधि / समय
पेंडीमिथेलिन
0.75 – 1.0
बुवाई बाद तुरंत फसल तथा खरपतवारों के उगने से पूर्व
फलुक्लोरेलीन
0.75 – 1.0
बुवाई से पूर्व जमीन में
एलाक्लोर
1.0 – 1.5
बुवाई के बाद परंतु अंकुरण से पूर्व
नोट: आवश्यकता पड़ने पर ही खरपतवारनाशी दवाओं का प्रयोग पूर्ण सावधानी अपनाते हुये करें।
पौध संरक्षण
(अ) कीडे
(अ)बोडला कीट (ब्हाइट ग्रब)
(अ) मई – जून के महीने में खेत की दो बार जुताई करना चाहिए।
(अ)(ब) अगेती बुआई ‘’10 -20 जून के बीच ‘’ करना चाहिए।
(अ)(स) मिटटी में फोरेट 10 जी या कारबोफयूरान 3 जी 25 किलो ग्राम / हेक्टेयर डालना चाहिए।
(अ)(द) बीज को फफूंदनाशक उपचार से पहले क्लोरपायरीफास 12.5 मि.ली / किलो ग्राम बीज को उपचार कर छाया में सुखकर बोनी चाहिए।
(अ)कामलिया कीट
मिथाइल पेराथियान 2 प्रतिशत चूर्ण का 25 से 30 किलो ग्राम / हे. प्रारंभिक अवस्था में भुरकाव या पैराथियान 50 ईसी का 700 से 750 मिली. / हें के मान से छिड़काव करें।
महों, थ्रिप्स एवं सफेद मक्खी
इनके नियंत्रण लिए मोनोक्रोटोफॉस 36 ईसी का 550 मि.ली. / हे. या डाईमिथिएट का 30 ईसी का 500 मि.ली / हे. 500 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रयोग करें।
सूरंग कीट
क्यूनालफास 25 ई.सी का 1000 मि.ली या मोनोक्रोटोफॉस 36 एस.एल. 600 मि.ली / हे. का छिड़काव करें।
चूहा एवं गिलहरी
यह भी मूंगफली को नुकसान करते है अत: इनके नियंत्रण पर ध्यान दें।
(ब) रोग
टिक्का / पर्ण धब्बा
बोने के 4-5 सप्ताह से प्रारंभ कर 2-3 सप्ताह के अन्तर से दो-तीन बार कार्बेन्डाजिम 0.05 प्रतिशत या डायथेन एम – 45 का 0.2 प्रतिशत का छिड़काव करना चाहिए।
कालर सडन / शुष्क जड़ सड़न
बीज को 5 ग्राम थाइरम अथवा 3 ग्राम डाइथेन एम- 45 या 1 ग्राम कार्बेन्डाजिम प्रति किलो ग्राम बीज दर से उपचार करना चाहिए।
फसल कटाई
जैसे ही फसल पीली पड़ने लगे तथा प्रति पौधा 70- 80 प्रतिशत फली पक जावें उस समय पौधों को उखाड़ लेना चाहिए। फलियों को धूप में इतना सूखाना चाहिए कि नमी 8-10 प्रतिशत रह जाये तभी बोरों में रखकर भण्डारण नमी रहित जगह पर करें। बोरियों रखने के बाद उन पर मेलाथियान दवा का छिड़काव करना चाहिए।
उपज
समयानुकूल पर्याप्त वर्षा होने पर खरीफ में मूंगफली की उपज लगभग 15 से 20 क्विंटल / हे. तक ली जा सकती हैं।
मूंगफली म.प्र. की एक प्रमुख तिलहनी फसल है। राज्य में इसकी उत्पादकता स्थिर नहीं है। इसका प्रमुख कारण वर्षा की अनिश्चित्ता, सूखा पड़ना अथवा कभी- कभी लगातार वर्षा होना तथा किसानों द्वारा इस फसल की उन्नत कृषि कार्यमाला को न अपनाना आदि है।
भूमि का चुनाव
पानी का अच्छा निकास, हल्की से मध्यम रेतीली कछारी या दुमट भूमि उपयुक्त है।
भूमि की तैयारी
तीन साल के अन्तराल में एक बार गहरी जुताई करें इसके बाद दो बार देशी हल या कल्टीवेटर चलायें एवं बखर चलाकर पाटा लगाना चाहिए।
बीज दर
100 – 120 किलोग्राम/ हेक्टर दाने बोने से 3.33 लाख के लगभग पौध संख्या प्राप्त होती है।
उन्नत जातियॉं
किस्म
पकने की अवधि
फलियॉं कि.ग्रा./ हे.
तेल प्रतिशत
अन्य विवरण
फूलो प्रगति (जे.एल. – 24)
95 -100
1500-2400
50.8
अगेती उन्नत जाति है तथा पूरे देश में इसे सफलतापूर्वक लगाया जा रहा है। इसे ग्रीष्म ऋतु में नहीं लगाना चाहिए। यह किस्म खरीफ एवं ग्रीष्म के लिये उपयुक्त है। यह मध्यम से भारी मिटटी के लिये उपयुक्त है। यह कालर राट रोगी रोधी किस्म है मध्यम से भारी मिटटी के लिये उपयुक्त है। इसको खरीफ एवं गर्मी दोनों मौसमों में उगाया जा सकता है। 3 -4 दाने वाली लम्बी फली इसमें रूट राट (जड़सडन) का प्रभाव कम पाया गया है। दोनों ही मौसम में उगाया जा सकता है। खरीफ मौसम के लिये अनुसंशित ।
जूनागढ़ – 11 (एस.बी. -11)
107-150
1000-1500
49.5
ए.के. 12 – 24
105- 110
1000- 1500
48.5
गंगापुरी
95-100
1500-2000
48
ज्योति
105-110
1500-2000
53.3
जे.जी.एन -3
100 – 105
1500- 2000
50
बीजोपचार
3 ग्राम थीरम या 2 ग्राम कार्बनडेजिम दवा/ किलो ग्राम बीज की दर से बीजोपचार करें। पौधों के सूखने की समस्या वाले क्षेत्र में 2 ग्राम थीरम + 1 ग्राम कार्बेन्डाजिम / किलो ग्राम बीज मिलाकर उपचारित करें या जैविक उपचार ट्रायकोडर्मा 4 ग्राम चूर्ण / किलो ग्राम बीज की दर से उपयोग करें। इसके पश्चात 10 ग्राम / किलो ग्राम बीज के मान से रायजोबियम कल्चर (मूंगफली) से भी उपचार करें।
बोने का समय
वर्षा प्रारंभ होने पर जून के मध्य से लेकर जुलाई के प्रथम सप्ताह तक बोनी करना चाहिए।
बोने का तरीका
बोनी कतारों में सरता दुफन या तिफन से लगभग 4 -6 से.मी. गहराई पर करना चाहिए। कतार से कतार की दूरी 30 से.मी. तथा पौधे की दूरी 8 – 10 से.मी. रखना चाहिए।
खाद एवं उर्वरक
भूमि की तैयारी के समय गोबर की खाद 5 -10 टन/ हेक्टर प्रयोग करें। उर्वरक के रूप में 20 किलोग्राम नत्रजन , 40 – 80 किलोग्राम स्फुर एवं 20 किलोग्राम पोटाश/ हेक्टर देना चाहिए। यदि खेत में गोबर की खाद तथा पी.एस.बी. का प्रयोग किया जाता है तो स्फुर की मात्रा 80 किलो ग्राम/ हेक्टर की जगह मात्र 40 किलो ग्राम / हेक्टर ही पर्याप्त है। खाद की पूरी मात्रा आधार खाद के रूप में प्रयोग करें। मूंगफली फसल में गंधक का विशेष महत्व है। इसलिए 25 किलो ग्राम/ हेक्टेयर के मान से गंधक अवश्य दिया जाना चाहिए। यदि यूरिया की जगह अमोनिया सल्फेट तथा फास्फेट के रूप में सिंगल सुपर फास्फेट का प्रयोग किया जाता है तो गंधक पर्याप्त मात्रा में मिल जाता है। अन्यथा 2 क्विंटल / हेक्टर की दर से जिप्सम या पाइराइटस का उपयोग आखिरी बखरनी के साथ करें। साथ ही 25 किलो ग्राम/ हेक्टर के मान से तीन साल के अन्तर पर जिंक सल्फेट का प्रयोग अवश्य करें।
फसल चक्र:
1 . मूंगफली (खरीफ) – गेहूं (रबी)
2 . मूंगफली (खरीफ) – मक्का (खरीफ)
3 . मूंगफली (खरीफ) – चना (रबी)
4 . मूंगफली ग्रीष्म कपास (खरीफ)
5 . मूंगफली ग्रीष्म मक्का / ज्वार / कपास
अंतरवर्तीय फसलें
अन्तवर्तीय फसल के रूप में मक्का, ज्वार, सोयाबीन, मूंग, उड़द, तुअर, सूर्यमुखी आदि फसलों को 4:2, 2:1, 8:2, 3:1, 6:3, 9:3, अनुपात में आवश्यकतानुसार लिया जा सकता है।
सिचाई
सिंचाई की सुविधा होने पर अवर्षा से उत्पन्न सूखे की अवस्था में पहला पानी 50- 55 दिन में तथा दूसरा पानी 70 – 75 दिन में दिया जाना चाहिए।
निंदाई – गुडाई
फसल बोने के 15 -20, 25 -30 तथा 40 -45 दिन की अवस्था में डोरा या कोल्पा चलावें जिससे समय – समय पर नींदा नियंत्रण किया जा सके। नींदानाशक दवाओं के उपयोग से भी नींदा नियंत्रण किया जा सकता है।
खरपतवारनाशी रसायनों की मात्रा एवं प्रयोग विधि
खरपतवारनाशी रसायन
मात्रा सक्रिय तत्व, लीटर / हेक्टेयर
उपयोग विधि / समय
पेंडीमिथेलिन
0.75 – 1.0
बुवाई बाद तुरंत फसल तथा खरपतवारों के उगने से पूर्व
फलुक्लोरेलीन
0.75 – 1.0
बुवाई से पूर्व जमीन में
एलाक्लोर
1.0 – 1.5
बुवाई के बाद परंतु अंकुरण से पूर्व
नोट: आवश्यकता पड़ने पर ही खरपतवारनाशी दवाओं का प्रयोग पूर्ण सावधानी अपनाते हुये करें।
पौध संरक्षण
(अ) कीडे
(अ)बोडला कीट (ब्हाइट ग्रब)
(अ) मई – जून के महीने में खेत की दो बार जुताई करना चाहिए।
(अ)(ब) अगेती बुआई ‘’10 -20 जून के बीच ‘’ करना चाहिए।
(अ)(स) मिटटी में फोरेट 10 जी या कारबोफयूरान 3 जी 25 किलो ग्राम / हेक्टेयर डालना चाहिए।
(अ)(द) बीज को फफूंदनाशक उपचार से पहले क्लोरपायरीफास 12.5 मि.ली / किलो ग्राम बीज को उपचार कर छाया में सुखकर बोनी चाहिए।
(अ)कामलिया कीट
मिथाइल पेराथियान 2 प्रतिशत चूर्ण का 25 से 30 किलो ग्राम / हे. प्रारंभिक अवस्था में भुरकाव या पैराथियान 50 ईसी का 700 से 750 मिली. / हें के मान से छिड़काव करें।
महों, थ्रिप्स एवं सफेद मक्खी
इनके नियंत्रण लिए मोनोक्रोटोफॉस 36 ईसी का 550 मि.ली. / हे. या डाईमिथिएट का 30 ईसी का 500 मि.ली / हे. 500 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रयोग करें।
सूरंग कीट
क्यूनालफास 25 ई.सी का 1000 मि.ली या मोनोक्रोटोफॉस 36 एस.एल. 600 मि.ली / हे. का छिड़काव करें।
चूहा एवं गिलहरी
यह भी मूंगफली को नुकसान करते है अत: इनके नियंत्रण पर ध्यान दें।
(ब) रोग
टिक्का / पर्ण धब्बा
बोने के 4-5 सप्ताह से प्रारंभ कर 2-3 सप्ताह के अन्तर से दो-तीन बार कार्बेन्डाजिम 0.05 प्रतिशत या डायथेन एम – 45 का 0.2 प्रतिशत का छिड़काव करना चाहिए।
कालर सडन / शुष्क जड़ सड़न
बीज को 5 ग्राम थाइरम अथवा 3 ग्राम डाइथेन एम- 45 या 1 ग्राम कार्बेन्डाजिम प्रति किलो ग्राम बीज दर से उपचार करना चाहिए।
फसल कटाई
जैसे ही फसल पीली पड़ने लगे तथा प्रति पौधा 70- 80 प्रतिशत फली पक जावें उस समय पौधों को उखाड़ लेना चाहिए। फलियों को धूप में इतना सूखाना चाहिए कि नमी 8-10 प्रतिशत रह जाये तभी बोरों में रखकर भण्डारण नमी रहित जगह पर करें। बोरियों रखने के बाद उन पर मेलाथियान दवा का छिड़काव करना चाहिए।
उपज
समयानुकूल पर्याप्त वर्षा होने पर खरीफ में मूंगफली की उपज लगभग 15 से 20 क्विंटल / हे. तक ली जा सकती हैं।
चना
चना
चना मध्य प्रदेश की एक महत्वपूर्ण दलहनी फसल है। प्रदेश में देशी, काबुली और गुलाबी चना की फसल सफलतापूर्वक ली जाती है। प्रदेश में लगभग 28.50 लाख हेक्टेयर में चने की फसल ली जाती है तथा उत्पादन लगभग 24.76 लाख टन है। इस प्रकार मध्यप्रदेश पूरे देश में सबसे अधिक चना उत्पादन वाला प्रदेश है। प्रदेश की औसत उपज लगभग 900 किलोग्राम प्रति हेक्टर है। चना उत्पादन की उन्नत तकनीक को अपनाना आवश्यक है।
भूमि का चुनाव एवं खेत की तैयारी
चना फसल के लिए सबसे उपयुक्त मध्यम से भारी भूमि होती है। भूमि का पी.एच.मान 5.6 से 8.6 के बीच होता होना चाहिए। हल्की भूमि में चना फसल लेने की बाध्यता होने पर उसमें गोबर की खाद या हरी खाद का आवश्यक रूप से उपयोग करना चाहिए जिससे भूमि की जल धारण क्षमता बढ़ जाए।
जिन खेतों में खरीफ फसल नहीं ली गई हो दो बाद आड़ा एवं खड़ा बखर चलाकर नमी को संरक्षित करें। जहां खरीफ फसल ली गई है वहां फसल की कटाई के तुरंत बाद पहले दिन एक बखर चलाकर दूसरे दिन उसके विपरीत दिशा में दूसरी बार पाटा सहित बखर चलाएं और खेत को बोने के लिए तैयार करें। खरीफ फसलों के अवशेषों को खेत से बाहर निकालें।
उन्नत किस्में
चने की उन्नत किस्मों का चुनाव भूमि के प्रकार सिंचाई जल की उपलब्धता व पिछले वर्षो में रोगों के प्रकोप की स्थिति आदि को ध्यान में रखकर ही करें। विभिन्न जातियों का प्रमाणित बीज ही उपयोग करें। चने की संस्तुत किस्मों का विवरण तालिका में दिया गया है।
बीज की मात्रा एवं बीजोपचार
चने की फसल से अधिक पैदावार लेने के लिए पौधों की संख्या तीन से साढ़े तीन लाख / हेक्टेयर होनी चाहिए। इसके लिए प्रति वर्गमीटर 30 से 35 पौधे होना चाहिये। सामान्य रूप से इस पौध संख्या को प्राप्त करने के लिए 75 से 100 किलोग्राम बीज / हेक्टेयर की आवश्यकता किस्मों के बीज आकार के अनुसार होती है। कतारों से कतारों की दूरी 30 से.मी. तथा पौधे से पौधे की दूरी 10 से.मी. रखकर वांछित पौध संख्या प्राप्त की जा सकती है।
बुवाई के पूर्व बीज को फफूंदनाशक दवा से अवश्य उपचारित करें। थायरम 2 ग्राम तथा कार्बेन्डाजिम 1 ग्राम प्रति किलो ग्राम बीज के हिसाब से उपचारित करें। इसके बाद बीज को राइजोबियम तथा पीएचबी कल्चर से 5 ग्राम प्रत्येक को प्रति किलो ग्राम बीज के हिसाब से उपचारित करें और उपचारित बीज को छाया में सुखाकर बोआई करें। राइजोबियम कल्चर जे.पी.एस 65 का उपयोग लाभप्रद पाया गया है।
बोने का समय
सामान्य बोनी का समय 15 अक्टूबर से 15 नवम्बर तक है। सिंचित खेती के लिए नवंबर अन्त तक बोआई कर सकते हैं। देर से बोनी की स्थिति में उपयुक्त जाति का चयन करें तथा दिसंबर के प्रथम सप्ताह तक बोनी करें।
खाद एवं उर्वरक
मिटटी परीक्षण के अनुसार खाद एवं उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिए। चने की फसल को सामान्यत: 15 से 20 किलोग्राम नत्रजन , 45 – 50 किलो ग्राम स्फुर 20 किलोग्राम पौटाश की आवश्यकता होती है। सिंचिंत फसल में उपरोक्त नत्रजन एंव पोटाश के साथ स्फुर 60 किलोग्राम प्रति हेक्टर दें। देर से बोई गई चने की फसल में नत्रजन 40 किलोग्रमा प्रति हेक्टर की दर से दें। जीवाणु खाद राइजोबियम तथा पी.एच.बी. के साथ 2.5 टन प्रति हेक्टर कम्पोस्ट खाद का उपयोग लाभप्रद होता है।
असिंचित खेती में लाभदायक उपाय
चने की असिंचित खेती में नमी की कमी ही मुख्य समस्या होती है। इससे अंकुरण कम हो सकता है तथा पौधों की बढ़वार और बीज के आकार में कमी होने से उपज कम हो जाती है। इससे बचने के लिए बोआई के पूर्व बखर, पाटा चलाकर नमी संरक्षित करें। वर्षा होने या सिंचाई देने के बाद हेण्ड – हो आवश्य चलायें इससे नमी एवं खरपतवार संरक्षण होगा।
सिंचाई
चने की फसल के लिए सामान्यरूप से दो सिंचाई की आवश्यकता होती है। पहली सिंचाई फूल आने के पहले बुवाई के लगभग 40 – 50 दिन बाद तथा दूसरी सिंचाई घेंटियों में दाना भरते समय बुवाई के 60 - 65 दिन बाद करना चाहिए। यदि एक ही सिंचाई उपलब्ध है तो उसे फूल आने के पहले दें। अधिक सिंचाई करने से पौधों की बढ़वार अधिक होती है और उपज में कमी आती है। फब्बारा विधि से सिंचाई करें। बहाव विधि से सिंचाई करने पर खेत को छोटी क्यारियों में बांट कर सिंचाई करें। इसके लिए बुवाई के तुरन्त बाद खेत में नालियां बना देना चाहिए।
अन्तर्वर्तीय फसलें
चने में अलसी और गेहूं को अन्तर्वर्तीय फसल के रूप में सफलतापूर्वक लिया जा सकता है। चना की चार कतारों के बाद अलसी या गेहूं की दो कतार के हिसाब से बुवाई अधिक लाभप्रद होती है।
खरपतवार नियंत्रण
असिंचित खेती में खरपतवार कम आते है फिर भी बुवाई के लगभग एक माह बाद हेण्ड हो चलाएं जिससे खरपतवार नियंत्रतण होगा और नमी भी संरक्षित होगी। सिंचिंत फसल में नींदा नियंत्रण के लिए पेन्डिमिथलीन 1 लीटर प्रति हेक्टर 500 – 600 लीटर पानी मिलाकर अंकुरण पूर्व फलैट फेन नोजल से छिड़काव करें।
पौध संरक्षण
(अ) रोग
(i) जड़ तथा तने के रोग
(1) उक्ठा रोग – इस रोग से नए पौधे मुरझाकर मर जाते हैं। सामान्यत: यह रोग लगभग 30 से 35 दिन की अवस्था में आता है। रोगी पौधे के तने के नीचे वाले भाग को चीरकर देखने से आन्तरिक तन्तुओं में हल्का भूरा या काला रंग दिखाई देता है।
(2) कालर राट रोग – सोयाबीन की फसल लेने के बाद चना फसल लेने पर इसका प्रकोप बढ़ जाता है। रोगी पौधों की पत्तियां पीली पड़ जाती है और पौधे मर जाते हैं। पौधें की स्तम्भ मूल संधि भाग में सिकुडन प्रारंभ हो जाती है। प्रभावित भाग पर सफेद फफूंद दिखाई पड़ती है। सोयाबीन फसल के अवशेष खेत में होने तथा सिंचाई करने पर इसकी तीव्रता बढ़ जाती है।
(3) शुष्क विगलन रोग- पौधे पीले पड़ कर सूख जाते हैं। मृत जड़ शुष्क तथा कड़ी हो जाती है। निचले हिस्से को फाड कर देखने से कोयले के कणों के समान स्कलेरोशिया दिखाई देते हैं। फली बनने की अवस्था में नमी की कमी तथा तापक्रम अधिक होने पर जड़ काली हो जाती है।
नियंत्रण
जड़ तथा तने वाले रोगों की रोकथाम के लिए गर्मी में खेत की गहरी जुताई करें। समय पर बोआई करें, अलसी की अंतवर्तीय फसल लें। फसल अवशेष को खेत से निकाल दें। रोग निरोधक जातियां लगायें। बीज उपचारित कर बुवाई करें।
(ii) पत्तियों व शाखाओं के रोग
अल्टरनेरिया झुलसा रोग
फूल, फल बनते समय इस रोग का प्रकोप अधिक प्रकोप होता है। तने पर भूरे काले धब्बे बन जाते हैं। इसकी रोकथाम के लिए रोगी पौधें को उखाड दें तथा फसल को अत्यधिक बढ़वार से बचाएं। कम प्रकोप होने पर मेन्कोजेब के 0.3 प्रतिशत घोल का फसल पर छिडकाव करें।
(ब) कीट
चने की इल्ली का बहुत अधिक प्रकोप होता है। इल्ली प्राय: हरे रंग की होती है परन्तु पीले, गुलाबी, भूरे व स्लेटी रंग की भी पायी जाती है। इल्लियों के बगल में लंबी सफेद पीली पटटी दोनों ओर आवश्यक रूप से पाई जाती है।
रासायनिक नियंत्रण
इण्डोसल्फान 35 ई.सी 1.5 लीटर या प्रोफेनोफॉस 50 ई.सी 1.50 लीटर या क्विनालफॉस 25 ई.सी 1.00 लीटर को 500 - 600 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टर की दर से छिड़काव करें। आवश्यकता पड़ने पर 15 दिन बाद पुन: कीटनाशक बदल कर छिड़काव करें। पंप या पानी उपलब्ध न हो तो क्विनालफॉस 1.5 प्रतिशत चूर्ण या मिथाइल पैराथियान 2 प्रतिशत चूर्ण या फेनवेलरेट 0.4 प्रतिशत चूर्ण 25 किलो ग्राम प्रति हेक्टर यन्त्र की सहायता से भुरकाव करें। यदि इल्लियां बड़ी हो गई हो और उपरोक्त कीटनाशकों से नियंन्त्रित नहीं हो रही हों तो मिश्रित कीटनाशकों का उपयोग करें जैसे प्रोफेनोफॉस + डेल्टामेथ्रिन का 1.50 लीटर या मिथोमिल का 1.00 लीटर प्रति हेक्टर छिड़काव करें। प्रभावी नियंत्रण के लिए दवा व पानी की सही मात्रा तथा खेत में एक समान छिड़काव करें। प्रभावी नियंत्रण के लिए दवा व पानी की सही मात्रा तथा खेत में एक समान छिड़काव करें। अंकुरण उपरांत टी (T) आकार की लकड़ी की खूटियां (50 प्रति हेक्टर ) खेत में समान रूप से लगायें जिस पर चिडि़यॉ बैठकर इल्ली को नियंत्रित रखेगी।
तालिका - चने की उन्नत किस्मों का विवरण
क्र
किस्म
अवधि (दिन)
उपज (क्विं / हे.)
विशेषताएं
(अ) देशी चना
1
जवाहर चना 74
110- 120
15 -16
उकठा अवरोधी , देर से बोआई के लिए उपयुक्त
2
भारती (आई.सी.सी.व्ही 10)
110 – 120
13 – 15
उकठा अवरोधी
3
जवाहर चना 218
115 – 120
15 – 18
4
विजय
115 – 120
13 – 16
5
जवाहर चना 322
115
15 – 18
6
जवाहर 11
97 5 105
15 – 18
बड़ा दाना उकठा निरोधी, तथा स्टंट विषाणु अवरोधी
7
जवाहर चना 130
110
18 – 20
बडा दाना उकठा निरोधी, शुष्क मूल विगलन सहनशील सूखा व चने की उल्ली के प्रति सहनशील
8
जवाहर चना 16
112
18 – 20
उकठा निरोधी, स्तम्भ मूल विगलन, बीजीएम तथा स्टंट हेतु मध्यम अवरोधी
9
जवाहर चना 315
115
15 – 18
उकठा अवरोधी
10
जवाहर चना 63
120 – 125
18 – 20
11
बी.जी.डी. 72
115 – 120
15 – 18
12
जी.सी.पी. 101
110 – 150
15 – 18
(ब) गुलाबी
जवाहर गुलाबी चना 1
120 -125
14 – 16
भूनने के लिए उपयुक्त
(स) काबुली
1
काक- 2
110 - 150
15 – 18
बड़ा दाना 100 दानों का बजन 38 ग्राम उकठा अवरोधी
2
जे.जे.के. – 1
110 – 150
15 – 18
बड़ा दाना 100 दानों का बजन 36 ग्राम, उकठा अवरोधी
चना मध्य प्रदेश की एक महत्वपूर्ण दलहनी फसल है। प्रदेश में देशी, काबुली और गुलाबी चना की फसल सफलतापूर्वक ली जाती है। प्रदेश में लगभग 28.50 लाख हेक्टेयर में चने की फसल ली जाती है तथा उत्पादन लगभग 24.76 लाख टन है। इस प्रकार मध्यप्रदेश पूरे देश में सबसे अधिक चना उत्पादन वाला प्रदेश है। प्रदेश की औसत उपज लगभग 900 किलोग्राम प्रति हेक्टर है। चना उत्पादन की उन्नत तकनीक को अपनाना आवश्यक है।
भूमि का चुनाव एवं खेत की तैयारी
चना फसल के लिए सबसे उपयुक्त मध्यम से भारी भूमि होती है। भूमि का पी.एच.मान 5.6 से 8.6 के बीच होता होना चाहिए। हल्की भूमि में चना फसल लेने की बाध्यता होने पर उसमें गोबर की खाद या हरी खाद का आवश्यक रूप से उपयोग करना चाहिए जिससे भूमि की जल धारण क्षमता बढ़ जाए।
जिन खेतों में खरीफ फसल नहीं ली गई हो दो बाद आड़ा एवं खड़ा बखर चलाकर नमी को संरक्षित करें। जहां खरीफ फसल ली गई है वहां फसल की कटाई के तुरंत बाद पहले दिन एक बखर चलाकर दूसरे दिन उसके विपरीत दिशा में दूसरी बार पाटा सहित बखर चलाएं और खेत को बोने के लिए तैयार करें। खरीफ फसलों के अवशेषों को खेत से बाहर निकालें।
उन्नत किस्में
चने की उन्नत किस्मों का चुनाव भूमि के प्रकार सिंचाई जल की उपलब्धता व पिछले वर्षो में रोगों के प्रकोप की स्थिति आदि को ध्यान में रखकर ही करें। विभिन्न जातियों का प्रमाणित बीज ही उपयोग करें। चने की संस्तुत किस्मों का विवरण तालिका में दिया गया है।
बीज की मात्रा एवं बीजोपचार
चने की फसल से अधिक पैदावार लेने के लिए पौधों की संख्या तीन से साढ़े तीन लाख / हेक्टेयर होनी चाहिए। इसके लिए प्रति वर्गमीटर 30 से 35 पौधे होना चाहिये। सामान्य रूप से इस पौध संख्या को प्राप्त करने के लिए 75 से 100 किलोग्राम बीज / हेक्टेयर की आवश्यकता किस्मों के बीज आकार के अनुसार होती है। कतारों से कतारों की दूरी 30 से.मी. तथा पौधे से पौधे की दूरी 10 से.मी. रखकर वांछित पौध संख्या प्राप्त की जा सकती है।
बुवाई के पूर्व बीज को फफूंदनाशक दवा से अवश्य उपचारित करें। थायरम 2 ग्राम तथा कार्बेन्डाजिम 1 ग्राम प्रति किलो ग्राम बीज के हिसाब से उपचारित करें। इसके बाद बीज को राइजोबियम तथा पीएचबी कल्चर से 5 ग्राम प्रत्येक को प्रति किलो ग्राम बीज के हिसाब से उपचारित करें और उपचारित बीज को छाया में सुखाकर बोआई करें। राइजोबियम कल्चर जे.पी.एस 65 का उपयोग लाभप्रद पाया गया है।
बोने का समय
सामान्य बोनी का समय 15 अक्टूबर से 15 नवम्बर तक है। सिंचित खेती के लिए नवंबर अन्त तक बोआई कर सकते हैं। देर से बोनी की स्थिति में उपयुक्त जाति का चयन करें तथा दिसंबर के प्रथम सप्ताह तक बोनी करें।
खाद एवं उर्वरक
मिटटी परीक्षण के अनुसार खाद एवं उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिए। चने की फसल को सामान्यत: 15 से 20 किलोग्राम नत्रजन , 45 – 50 किलो ग्राम स्फुर 20 किलोग्राम पौटाश की आवश्यकता होती है। सिंचिंत फसल में उपरोक्त नत्रजन एंव पोटाश के साथ स्फुर 60 किलोग्राम प्रति हेक्टर दें। देर से बोई गई चने की फसल में नत्रजन 40 किलोग्रमा प्रति हेक्टर की दर से दें। जीवाणु खाद राइजोबियम तथा पी.एच.बी. के साथ 2.5 टन प्रति हेक्टर कम्पोस्ट खाद का उपयोग लाभप्रद होता है।
असिंचित खेती में लाभदायक उपाय
चने की असिंचित खेती में नमी की कमी ही मुख्य समस्या होती है। इससे अंकुरण कम हो सकता है तथा पौधों की बढ़वार और बीज के आकार में कमी होने से उपज कम हो जाती है। इससे बचने के लिए बोआई के पूर्व बखर, पाटा चलाकर नमी संरक्षित करें। वर्षा होने या सिंचाई देने के बाद हेण्ड – हो आवश्य चलायें इससे नमी एवं खरपतवार संरक्षण होगा।
सिंचाई
चने की फसल के लिए सामान्यरूप से दो सिंचाई की आवश्यकता होती है। पहली सिंचाई फूल आने के पहले बुवाई के लगभग 40 – 50 दिन बाद तथा दूसरी सिंचाई घेंटियों में दाना भरते समय बुवाई के 60 - 65 दिन बाद करना चाहिए। यदि एक ही सिंचाई उपलब्ध है तो उसे फूल आने के पहले दें। अधिक सिंचाई करने से पौधों की बढ़वार अधिक होती है और उपज में कमी आती है। फब्बारा विधि से सिंचाई करें। बहाव विधि से सिंचाई करने पर खेत को छोटी क्यारियों में बांट कर सिंचाई करें। इसके लिए बुवाई के तुरन्त बाद खेत में नालियां बना देना चाहिए।
अन्तर्वर्तीय फसलें
चने में अलसी और गेहूं को अन्तर्वर्तीय फसल के रूप में सफलतापूर्वक लिया जा सकता है। चना की चार कतारों के बाद अलसी या गेहूं की दो कतार के हिसाब से बुवाई अधिक लाभप्रद होती है।
खरपतवार नियंत्रण
असिंचित खेती में खरपतवार कम आते है फिर भी बुवाई के लगभग एक माह बाद हेण्ड हो चलाएं जिससे खरपतवार नियंत्रतण होगा और नमी भी संरक्षित होगी। सिंचिंत फसल में नींदा नियंत्रण के लिए पेन्डिमिथलीन 1 लीटर प्रति हेक्टर 500 – 600 लीटर पानी मिलाकर अंकुरण पूर्व फलैट फेन नोजल से छिड़काव करें।
पौध संरक्षण
(अ) रोग
(i) जड़ तथा तने के रोग
(1) उक्ठा रोग – इस रोग से नए पौधे मुरझाकर मर जाते हैं। सामान्यत: यह रोग लगभग 30 से 35 दिन की अवस्था में आता है। रोगी पौधे के तने के नीचे वाले भाग को चीरकर देखने से आन्तरिक तन्तुओं में हल्का भूरा या काला रंग दिखाई देता है।
(2) कालर राट रोग – सोयाबीन की फसल लेने के बाद चना फसल लेने पर इसका प्रकोप बढ़ जाता है। रोगी पौधों की पत्तियां पीली पड़ जाती है और पौधे मर जाते हैं। पौधें की स्तम्भ मूल संधि भाग में सिकुडन प्रारंभ हो जाती है। प्रभावित भाग पर सफेद फफूंद दिखाई पड़ती है। सोयाबीन फसल के अवशेष खेत में होने तथा सिंचाई करने पर इसकी तीव्रता बढ़ जाती है।
(3) शुष्क विगलन रोग- पौधे पीले पड़ कर सूख जाते हैं। मृत जड़ शुष्क तथा कड़ी हो जाती है। निचले हिस्से को फाड कर देखने से कोयले के कणों के समान स्कलेरोशिया दिखाई देते हैं। फली बनने की अवस्था में नमी की कमी तथा तापक्रम अधिक होने पर जड़ काली हो जाती है।
नियंत्रण
जड़ तथा तने वाले रोगों की रोकथाम के लिए गर्मी में खेत की गहरी जुताई करें। समय पर बोआई करें, अलसी की अंतवर्तीय फसल लें। फसल अवशेष को खेत से निकाल दें। रोग निरोधक जातियां लगायें। बीज उपचारित कर बुवाई करें।
(ii) पत्तियों व शाखाओं के रोग
अल्टरनेरिया झुलसा रोग
फूल, फल बनते समय इस रोग का प्रकोप अधिक प्रकोप होता है। तने पर भूरे काले धब्बे बन जाते हैं। इसकी रोकथाम के लिए रोगी पौधें को उखाड दें तथा फसल को अत्यधिक बढ़वार से बचाएं। कम प्रकोप होने पर मेन्कोजेब के 0.3 प्रतिशत घोल का फसल पर छिडकाव करें।
(ब) कीट
चने की इल्ली का बहुत अधिक प्रकोप होता है। इल्ली प्राय: हरे रंग की होती है परन्तु पीले, गुलाबी, भूरे व स्लेटी रंग की भी पायी जाती है। इल्लियों के बगल में लंबी सफेद पीली पटटी दोनों ओर आवश्यक रूप से पाई जाती है।
रासायनिक नियंत्रण
इण्डोसल्फान 35 ई.सी 1.5 लीटर या प्रोफेनोफॉस 50 ई.सी 1.50 लीटर या क्विनालफॉस 25 ई.सी 1.00 लीटर को 500 - 600 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टर की दर से छिड़काव करें। आवश्यकता पड़ने पर 15 दिन बाद पुन: कीटनाशक बदल कर छिड़काव करें। पंप या पानी उपलब्ध न हो तो क्विनालफॉस 1.5 प्रतिशत चूर्ण या मिथाइल पैराथियान 2 प्रतिशत चूर्ण या फेनवेलरेट 0.4 प्रतिशत चूर्ण 25 किलो ग्राम प्रति हेक्टर यन्त्र की सहायता से भुरकाव करें। यदि इल्लियां बड़ी हो गई हो और उपरोक्त कीटनाशकों से नियंन्त्रित नहीं हो रही हों तो मिश्रित कीटनाशकों का उपयोग करें जैसे प्रोफेनोफॉस + डेल्टामेथ्रिन का 1.50 लीटर या मिथोमिल का 1.00 लीटर प्रति हेक्टर छिड़काव करें। प्रभावी नियंत्रण के लिए दवा व पानी की सही मात्रा तथा खेत में एक समान छिड़काव करें। प्रभावी नियंत्रण के लिए दवा व पानी की सही मात्रा तथा खेत में एक समान छिड़काव करें। अंकुरण उपरांत टी (T) आकार की लकड़ी की खूटियां (50 प्रति हेक्टर ) खेत में समान रूप से लगायें जिस पर चिडि़यॉ बैठकर इल्ली को नियंत्रित रखेगी।
तालिका - चने की उन्नत किस्मों का विवरण
क्र
किस्म
अवधि (दिन)
उपज (क्विं / हे.)
विशेषताएं
(अ) देशी चना
1
जवाहर चना 74
110- 120
15 -16
उकठा अवरोधी , देर से बोआई के लिए उपयुक्त
2
भारती (आई.सी.सी.व्ही 10)
110 – 120
13 – 15
उकठा अवरोधी
3
जवाहर चना 218
115 – 120
15 – 18
4
विजय
115 – 120
13 – 16
5
जवाहर चना 322
115
15 – 18
6
जवाहर 11
97 5 105
15 – 18
बड़ा दाना उकठा निरोधी, तथा स्टंट विषाणु अवरोधी
7
जवाहर चना 130
110
18 – 20
बडा दाना उकठा निरोधी, शुष्क मूल विगलन सहनशील सूखा व चने की उल्ली के प्रति सहनशील
8
जवाहर चना 16
112
18 – 20
उकठा निरोधी, स्तम्भ मूल विगलन, बीजीएम तथा स्टंट हेतु मध्यम अवरोधी
9
जवाहर चना 315
115
15 – 18
उकठा अवरोधी
10
जवाहर चना 63
120 – 125
18 – 20
11
बी.जी.डी. 72
115 – 120
15 – 18
12
जी.सी.पी. 101
110 – 150
15 – 18
(ब) गुलाबी
जवाहर गुलाबी चना 1
120 -125
14 – 16
भूनने के लिए उपयुक्त
(स) काबुली
1
काक- 2
110 - 150
15 – 18
बड़ा दाना 100 दानों का बजन 38 ग्राम उकठा अवरोधी
2
जे.जे.के. – 1
110 – 150
15 – 18
बड़ा दाना 100 दानों का बजन 36 ग्राम, उकठा अवरोधी
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