Thursday, August 7, 2008

ग़ज़ल

ग़ज़ल
किसी को दुख नहीं होता, कहीं मातम नहीं होताबिछड़ जाने का इस दुनिया को कोई ग़म नहीं होताजगह मिलती है हर इक को कहां फूलों के दामन मेंहर इक क़तरा मेरी जां क़तरा-ए-शबनम नहीं होताहम इस सुनसान रस्ते में अकेले वो मुसाफिर हैंहमारा अपना साया भी जहां हमदम नहीं होताचरागे-दिल जला रखा है हमने उसकी चाहत मेंहज़ारों आंधियां आएं, उजाला कम नहीं होताहर इक लड़की यहां शर्मो-हया का एक पुतला हैमेरी धरती पे नीचा प्यार का परचम नहीं होताहमारी ज़िन्दगी में वो अगर होता नहीं शामिलतो ज़ालिम वक़्त शायद हम पे यूं बारहम नहीं होताअजब है वाक़ई 'फ़िरदौस' अपने दिल का काग़ज़ भीकभी मैला नहीं होता, कभी भी नम नहीं होता-फ़िरदौस खान

2 comments:

Dr. Uday 'Mani' Kaushik said...

नये ब्लॉग के लिए बहुत बहुत बधाई साथी
मैं इन पंक्तियों से अपना परिचय कराऊंगा की

आज अपना हो न हो पर ,कल हमारा आएगा
रौशनी ही रौशनी होगी, ये तम छंट जाएगा

आज केवल आज अपने दर्द पी लें
हम घुटन में आज जैसे भी हो ,जी लें
कल स्वयं ही बेबसी की आंधियां रुकने लगेंगी
उलझने ख़ुद पास आकर पांव में झुकने लगेंगी
देखना अपना सितारा जब बुलंदी पायेगा
रौशनी के वास्ते हमको पुकारा जाएगा

आज अपना हो न हो पर कल हमारा आएगा ..

आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतज़ार रहेगा

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हिंदी-लेखक said...

नए चिठ्ठे के लिए बधाई हो !
आशा रखता हूँ कि आप भविष्य में भी इसी प्रकार लिखते रहे |
आपका
विजयराज चौहान (गजब)
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